Wednesday, July 6, 2022

झारखंड: मनरेगा में रोजगार से ज्यादा भ्रष्टाचार का बोलबाला

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रांची। 16 साल पहले 2 फरवरी, 2006 को देश में मनरेगा कानून लागू हुआ। जिसके तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में न्यूनतम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी की गई है। देश में 12.30 करोड़ परिवार इस कानून के अंतर्गत संचालित योजना में पंजीकृत हैं। झारखण्ड जैसे कई अन्य पिछड़े राज्यों के लिए यह कानून कई मायने में वरदान साबित हो रहा है।

इस बाबत नरेगा वाच ने एक सर्वे किया है जिसमें कई अचरज भरी जानकारियां सामने आयी हैं। नरेगा वाच के झारखंड राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज ने बताया कि प्रथम लॉकडाउन के ठीक पूर्व राज्य में 48.87 लाख परिवार पंजीकृत थे। इसके ठीक एक वर्ष बाद 02 फरवरी 2021 को जब देश में कोरोना की दूसरी लहर दस्तक दे रही थी तब तक पंजीकृत परिवारों का यह आंकड़ा 62.80 लाख हो गई। क्योंकि लॉकडाउन अवधि में देश के विभिन्न हिस्सों में राज्य से पलायन किये अप्रवासी मजदूर वापस इस उम्मीद में लौट आए कि आकर अब अपने ही राज्य में मेहनत मजदूरी करेंगे। ऐसे परिवारों की संख्या तकरीबन 13.93 लाख थी। इन परिवारों ने जॉब कार्ड बनवाया। आज की तारीख में यह संख्या बढ़कर कुल 69.19 लाख हो गई है। जिसमें 1 करोड़ 13 लाख व्यक्ति शामिल हैं।

वे आगे कहते हैं कि दूसरी तरफ पिछले तीन वित्तीय वर्षों के बजटीय राशि का आवंटन और क्रियान्वयन पर हम नजर डालते हैं तो तस्वीर हमें बेहद निराश करती है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में केन्द्रीय आवंटन 1311 करोड़ था, जिसके विरुद्ध राज्य ने कुल 1700 करोड़ खर्च किये। वहीं कोविड 19 के गंभीर प्रभाव वाले वर्ष अर्थात 2020-21 में 3489 करोड़ रूपये केंद्र सरकार ने रिलीज किया था और इस वर्ष कुल 3150 करोड़ रूपये खर्च किये गए।

वर्तमान वित्तीय वर्ष में अब तक 2278 करोड़ रिलीज किया जा चुका है, लेकिन इसके विपरीत 2664 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। जबकि वित्तीय वर्ष समाप्त होने में 57 दिन अभी बाकी हैं। वित्तीय वर्ष 2019-20 में 700 करोड़ प्रस्तावित श्रम बजट के विरुद्ध 641 करोड़ मानव दिवस सृजित किये गए। पिछले वर्ष यह आंकड़ा रिकार्ड 1150 करोड़ श्रम बजट निर्धारण के विरुद्ध मानव दिवस का सृजन हुआ।

उनका कहना था कि इस वित्तीय वर्ष में जबकि दोनों केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों को इस बात का आकलन करना चाहिए था कि पिछले वर्षों के मुकाबले करीब 20.32 लाख परिवारों ने मनरेगा में पंजीयन कराया है, तो जाहिर सी बात है काम की मांग बढ़ेगी। इस बात की सम्भावना होते हुए भी सरकारों ने सीमित श्रम बजट का निर्धारण कर मजदूरों द्वारा काम की मांग को अप्रत्यक्ष तौर पर रोका।

बता दें कि वित्तीय वर्ष 2021-22में झारखण्ड के लिए सिर्फ 800 करोड़ श्रम बजट की स्वीकृति मिली थी। फिर दिसम्बर में आंशिक संशोधन करते हुए इसे 900 करोड़ तक ले जाया गया है।

जब हम श्रमिकों के मजदूरी भुगतान की स्थिति पर नजर डालते हैं, तो झारखण्ड में इस वित्तीय वर्ष के प्रारंभ में ही 2 महीनों तक मजदूरों का भुगतान करीब 2662 करोड़ लंबित रखा गया। मनरेगा मजदूरों के लिए साल के यही उपयुक्त महीने होते हैं जब वे साल भर के अपने हिस्से की अधिक से अधिक मजदूरी कर लेना चाहते हैं। लेकिन सरकारों ने मजदूरों को समय पर मजदूरी न देकर खासा निराश किया और कोविड जैसी संकटकालीन स्थिति में उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया। अक्टूबर और नवम्बर महीने में भी झारखंड के मनरेगा मजदूरों का तकरीबन 176.6 करोड़ रूपये लंबित रखा गया था। आज जब मनरेगा दिवस का जश्न मनाया जा रहा है, वहीं राज्य के लाखों मजदूरों की मजदूरी विगत दिसम्बर महीने से कुल 434.14 करोड़ बकाया है। ये हालात मजदूरों के लिए काफी परेशान करने वाले और निराश करने वाले हैं जिसके लिए सरकार जिम्मेवार है। 

बता दें कि मई 2021 में Libtech नामक एक स्वतंत्र एजेंसी ने अपने विश्लेषण अध्ययन में पाया कि राज्य में स्टेज-2 लेवल पर मजदूरी भुगतान में औसतन 26 दिनों की देरी की गई है।

स्टेज- 2 लेवल पर मजदूरी भुगतान प्रक्रिया में पूरी तरह केन्द्रीय सरकार की जवाबदेही होती है। लेकिन मनरेगा वेबसाइट में बेहद चालाकी से इस प्रकार की देरी को सार्वजनिक नहीं की जाती है। बल्कि सरकारी वेबसाइट 100% भुगतान 15 दिनों के अन्दर कर दिए जाने का भ्रामक दावा करती है, जो मजदूरों के साथ सबसे बड़ी धोखेबाजी है।

राज्य रोजगार गारंटी परिषद सदस्य बलराम जी बताते हैं कि मजदूरों में मनरेगा के प्रति अनिश्चितता का माहौल पैदा हो रहा है। सरकार अपने एमआईएस में जो सूचनाएं संधारित करती है, वही इन तथ्यों की पुष्टि भी करते हैं। झारखण्ड में आदिवासी परिवारों की मनरेगा रोजगार में भागीदारी के आंकड़े इसका एक नमूना मात्र हैं। जहां वित्तीय वर्ष 2015-16 में आदिवासी मजदूरों का मनरेगा रोजगार में योगदान 38.95 फीसदी था। वहीं पिछले 6 सालों से लगातार घटते हुए इस वर्ष अब तक सिर्फ 23.69 तक के न्यूनतम स्तर पर आ गई है। गिरावट का एक दूसरा कारण मनरेगा योजनाओं में व्यापक भ्रष्टाचार भी है।

वे आगे कहते हैं कि सरकारों ने मनरेगा मजदूरों और ग्राम सभाओं को यहीं तक यातना नहीं दिया है, बल्कि उनको हकों से वंचित रखने का हर वो हथकंडा अपना रही है जो वो कर सकती है। कानूनी प्रावधान में जवाबदेही और पारदर्शिता का स्पष्ट प्रावधान होते हुए भी फरवरी 2020 से सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया को बंद कर रखा है। राज्य के सभी जिलों में मनरेगा लोकपालों की नियुक्ति विगत 5 सालों से लंबित है। कोविड 19 का बहाना बनाकर ग्राम सभाओं से योजना चयन, श्रम बजट का निर्धारण जो कि क़ानूनी प्रक्रिया है, बंद कर दी गई है। आम नागरिकों और मजदूरों के मार्फ़त यदा-कदा अनियमिताओं पर शिकायतें दर्ज करने की कोशिशें की जाती रही हैं।

लेकिन विभागीय अधिकारी उल्टा शिकायतों को ही झूठा साबित करने में पूरी ताकत लगा देते हैं। सामाजिक अंकेक्षण की नीतियों पर फैसले लेने के लिए जो संचालन समिति बनी है, उसकी बैठक नई सरकार के आने के बाद से नहीं हुई है। इसी प्रकार राज्य रोजगार गारंटी परिषद की आखरी बैठक पिछले साल फ़रवरी में हुई थी। 2017 और 2021 की बैठकों में लिए गए निर्णयों पर भी सरकार अमल नहीं कर रही है।

वहीं सोशल ऑडिट यूनिट के राज्य प्रशिक्षक, विश्वनाथ सिंह कहते हैं कि पिछले वर्ष 1,118 पंचायतों में क्रियान्वित मनरेगा 29,059 योजनाओं के सामाजिक अंकेक्षण प्रतिवेदन अवलोकन से ज़मीनी हालात और भी भयावह दिखाई देते हैं। अंकेक्षित योजनाओं में से 36 योजनायें जेसीबी से कराये जाने के स्पष्ट प्रमाण मिले। कुल 1,59,608 मजदूरों के नाम से मस्टर रोल (हाजिरी शीट) निकाले गए थे, उसमें सिर्फ 40,629 वास्तविक मजदूर (25%) ही कार्यरत पाए गए। शेष सारे फर्जी नाम के मस्टर रोल थे। 1,787 मजदूर ऐसे मिले जिनका नाम मस्टर रोल में था ही नहीं। 85 योजनायें ऐसी मिलीं जिनमें कोई मस्टर रोल सृजित नहीं किये गए थे, लेकिन काम शुरू कर दिया गया था। 376 मजदूर ऐसे मिले जिनका जॉब कार्ड बना ही नहीं था। पूर्व के वर्षों में भी सोशल ऑडिट के माध्यम से करीब 94 हजार विभिन्न तरह की शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं, जिसमें करीब 54 करोड़ राशि की गबन की पुष्टि हो चुकी है। उन पर भी सरकारी अधिकारी कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं। राज्य भर में शिकायत निवारण प्रक्रिया पूरी तरह फेल है। 

वे बताते हैं कि राज्य में मनरेगा के तहत संचालित योजनाओं में केवल 52 करोड़ के वित्तीय गड़बड़ी का मामला नहीं है, यदि मनरेगा के एमआईएस के आंकड़ों को देखें तो स्पष्ट है कि वित्तीय वर्ष 2017-18, 18-19 और 19-20 में कुल मिलाकर एक बार ही सामाजिक अंकेक्षण हो पाया, इससे यह स्पष्ट है कि यदि तीन सालों में हर वर्ष सभी पंचायतों का सामजिक अंकेक्षण किया गया होता तो यह राशि तीन गुना यानि कि 150 करोड़ की होती, साथ ही यह भी दिखाई देता है कि 13% योजनाओं का रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं कराया गया, जिसकी वजह से ऐसी योजनाओं का अंकेक्षण नहीं हो पाया।

वित्तीय वर्ष 2020-21 के आंकड़े पूरी तरह अपलोड नहीं हैं। पर यदि समवर्ती सामाजिक अंकेक्षण की जारी रिपोर्ट पर ध्यान दिया जाए तो सिर्फ 25% मजदूर कार्यस्थल पर काम करते मिले। जिसका अर्थ है कि 75% राशि का विचलन सिर्फ मजदूरी भुगतान में हुआ है, जो प्रति वर्ष करीब 1500-1600 करोड़ के करीब होता है। इससे यह नतीजा निकला जा सकता है कि यदि पिछले दो सालों में हर वर्ष प्रत्येक पंचायत का एक बार नियमित सामाजिक अंकेक्षण होता तो यह वित्तीय हेराफेरी इन दो सालों में ही शायद करोड़ों में सामने आती। मनरेगा में मशीन का प्रयोग और ठेकेदारी व्यवस्था जो कानूनन वर्जित है, आज वह झारखण्ड की जमीनी हकीकत बन गई है।

बता दें कि मनरेगा मजदूरों के द्वारा नहीं, बल्कि जॉब कार्ड सूची के आधार पर ठेकेदार और बिचौलिए सीधे कम्प्यूटर ऑपरेटर से मिलकर काम की मांग कर रहे हैं। ठेकेदार और बिचौलिए अधिकांश वैसे मजदूरों के काम की मांग कर रहे हैं जो उनके करीबी हैं या फिर जिनको आसानी से बेवकूफ बनाकर या थोड़े पैसे का लालच देकर मजदूरी राशि निकासी कराई जा सकती है। कोविड महामारी में आपदा को अवसर में बदलते हुए परिवार के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर मजदूरों का जॉब कार्ड बनवा लिया गया है। इस श्रेणी में कई ऐसे लोगों के भी जॉब कार्ड बनवा लिए गए हैं जिनकी आयु 18 वर्ष से कम की हैं।

बगैर ग्राम सभा की जानकारी और प्रस्ताव के ठेकेदार मनरेगा योजनाओं की फ़ाइल लेकर अधिकारियों/कर्मियों के साथ साठगांठ कर स्वीकृति करवा रहे हैं। मिट्टी, मोरम, सड़क निर्माण, डोभा निर्माण और TCB जैसी योजनाओं को JCB से कराने के उपरान्त कुछ दिनों के लिए मजदूरों से काम कराते हैं, जिससे कि मशीन निर्मित कार्य के निशान को मिटाया जा सके और मजदूरों की सहानुभति भी ठेकेदार बटोर सकें। प्रज्ञा केंद्र संचालक या मोबाइल बैंकिंग के जरिये ठेकेदार मजदूरों के घरों तक पहुंचकर अंगूठे के निशान लगवा ले रहे हैं। सोशल ऑडिट जैसी प्रक्रिया में ग्राम सभाओं में भी ठेकेदार हावी हैं और मुद्दों को स्थापित नहीं होने दे रहे हैं।

जेम्स हेरेंज बताते हैं कि सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया को बाधित करने के बाद जो सुधार इसके कारण शुरूआती दौर में दिखाई दे रहा था, उसका लाभ राज्य को नहीं मिल पाया। 2017-18 से 2019-20 तक वित्तीय विचलन 32% से घट कर 17% तक आ गया था, वित्तीय हेराफेरी के मामले भी 32% से घट कर 17% हो गया था और शिकायतों की संख्या 26% से घट कर 16% तक आ गयी थी। इससे यह समझा जा सकता है कि मनरेगा में यदि पारदर्शिता और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था हो तो गड़बड़ियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है और यह भी स्पष्ट है कि इस सम्बन्ध में वर्तमान सरकार प्रशासनिक और राजनैतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाई और उसका गलत सन्देश गया है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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