Friday, August 12, 2022

दिल्ली कोर्ट ने कुतुब मीनार परिसर के भीतर पुन: मंदिर बनाने की याचिका खारिज की

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एक और भाजपा सांसद रवींद्र कुशवाहा ने मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर अहम बयान देते हुए कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार किसानों के विरोध को देखते हुए तीनों नये कृषि कानून को वापस ले सकती है तो फिर मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण के लिए उपासना स्‍थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 को भी वापस लिया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली की एक अदालत ने जैन देवता तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव और हिंदू देवता भगवान विष्णु की ओर से दायर एक दीवानी मुकदमा यह कहते हुए कि अतीत की गलतियां वर्तमान शांति को भंग करने का आधार नहीं हो सकतीं खारिज कर दिया।

इस मुकदमे में आरोप लगाया गया कि महरौली में कुतुब मीनार परिसर के भीतर स्थित कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद एक मंदिर परिसर के स्थान पर बनाई गई थी और मांग की गई थी कि मंदिर परिसर का जीर्णोद्धार किया जाए, जिसमें 27 मंदिर शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि मुकदमा पूजा स्थल अधिनियम 1991 के प्रावधानों का उल्लंघन करता है और अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 (ए) के तहत याचिका खारिज कर दी।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि 1198 में सल्तनत दौर में कुतुब-दीन-ऐबक के शासन में लगभग 27 हिंदू और जैन मंदिरों को अपवित्र और क्षतिग्रस्त कर दिया गया था, उन मंदिरों के स्थान पर उक्त मस्जिद का निर्माण किया गया था। याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि अतीत की गलतियां वर्तमान शांति को भंग करने का आधार नहीं हो सकतीं।

सिविल जज नेहा शर्मा ने कहा, “भारत का सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इतिहास रहा है। इस पर कई राजवंशों का शासन रहा है। तर्कों के दौरान, वादी के वकील ने राष्ट्रीय शर्म के मुद्दे पर जोरदार तर्क दिया। हालांकि किसी ने भी इनकार नहीं किया है कि अतीत में गलतियां की गई थीं, लेकिन इस तरह की गलतियां हमारे वर्तमान और भविष्य की शांति भंग करने का आधार नहीं हो सकतीं”।

याचिका में कहा गया कि मोहम्मद गोरी के एक कमांडर कुतुबदीन ऐबक ने विष्णु हरि मंदिर और 27 जैन और हिंदू मंदिरों को संबंधित देवताओं के साथ ध्वस्त कर दिया और मंदिर परिसर के भीतर कुछ आंतरिक निर्माण किए। मंदिर परिसर का नाम बदलकर ‘कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद’ कर दिया गया। वाद पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक बार सरकार द्वारा किसी स्मारक को संरक्षित घोषित कर दिए जाने के बाद वादी इस बात पर जोर नहीं दे सकते कि इसका उपयोग अन्य उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि इसलिए, इस तरह के प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक का उपयोग किसी ऐसे उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता जो धार्मिक पूजा स्थल के रूप में इसकी प्रकृति के विपरीत है, लेकिन इसका उपयोग हमेशा किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जा सकता है जो इसके धार्मिक चरित्र से असंगत नहीं है। इसलिए मेरे विचार में एक बार एक स्मारक को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया है और सरकार के स्वामित्व में है तो वादी इस बात पर जोर नहीं दे सकते कि पूजा स्थल को वास्तव में और सक्रिय रूप से धार्मिक सेवाओं के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।” कोर्ट ने कहा कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के उद्देश्य को लागू करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए और इसका उद्देश्य राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखना है।

कोर्ट ने कहा कि हमारे देश का एक समृद्ध इतिहास रहा है और हमने चुनौतीपूर्ण समय देखा है। फिर भी इतिहास को समग्र रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। क्या हमारे इतिहास से अच्छे को बरकरार रखा जा सकता है और बुरा हटाया जा सकता है? इस प्रकार पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के पीछे उद्देश्य को ताकत देने के लिए दोनों विधियों की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या आवश्यकता है। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, स्वामित्व सरकार के पास है और वादी को अधिसूचना को चुनौती दिए बिना उसी में बहाली और धार्मिक पूजा के अधिकार का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि यह एक स्वीकृत तथ्य है कि मुकदमा संपत्ति मंदिरों पर बनी एक मस्जिद पर है और जो किसी भी धार्मिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं की जा रही है। सूट संपत्ति में कोई प्रार्थना / नमाज़ अदा नहीं की जा रही है। इसलिए मेरी राय में वादी के पास सार्वजनिक आदेश के रूप में सूट संपत्ति में पूजा का पूर्ण अधिकार नहीं है, जो अनुच्छेद 25 और 26 के अपवाद है और उसके लिए आवश्यक है कि यथास्थिति बनाए रखी जाए और संरक्षित स्मारक का उपयोग किसी धार्मिक उद्देश्य के लिए नहीं किया जाए।”

वादी ने पुरातत्व स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम की धारा 16 पर भरोसा किया जो धार्मिक पूजा जारी रखने की अनुमति देता है जो शायद इमारत के चरित्र के अनुरूप हो। हालांकि कोर्ट ने माना कि इस प्रावधान को पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के अनुरूप पढ़ा जाना चाहिए। “वादी का तर्क है कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की धारा 4 (3) (ए) में एक प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या एक पुरातात्विक स्थल शामिल नहीं है या एएमएएसआर अधिनियम द्वारा कवर किया गया है और इसलिए वर्तमान सूट के तहत वर्जित नहीं है। मेरी राय में यह पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।” कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या मामले के फैसले के उन अंशों का भी उल्लेख किया, जिन्होंने पूजा स्थल अधिनियम की वैधता को बरकरार रखा था।

इस बीच भाजपा के सलेमपुर (यूपी) से सांसद रवींद्र कुशवाहा ने सोमवार को जिले के सीयर क्षेत्र पंचायत में विकास कार्यों के शिलान्यास से जुड़े एक कार्यक्रम में कहा कि भाजपा का शुरू से ही काशी, मथुरा और अयोध्या को लेकर स्पष्ट मत रहा है। यह तीनों हमारे लिए आस्था का विषय हैं। उन्होंने कहा कि अयोध्या का फैसला हो गया। काशी विश्वनाथ मंदिर में कार्य तेजी से जारी है तथा अब मथुरा की बारी है।

गौरतलब है किप्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजन) एक्ट, 1991 या उपासना स्‍थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 18 सितंबर 1991 को पारित किया गया था। इसके मुताबिक 15 अगस्त 1947 की तारीख में जो धार्मिक स्थल जिस धर्म का था, उसी के पास रहेगा। हालांकि, अयोध्या के श्री रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद मामले को इस कानून से अलग रखा गया था। इस अधिनियम के मुताबिक किसी स्मारक का धार्मिक आधार पर रखरखाव नहीं किया जा सकता है। मान्यता प्राप्त प्राचीन स्मारकों पर उपासना स्थल कानून की धाराएं लागू नहीं होती हैं। बाबरी मस्जिद ढांचे को गिराने से एक साल पहले 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार यह कानून लाई थी। यह अधिनियम जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर पूरे भारत में लागू किया गया।

1991 में अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का आंदोलन तेजी से चल रहा था। अयोध्या का मामला गरम था ही, मथुरा और काशी में भी ऐसी ही स्थित हो सकती थी। मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थल से सटी मस्जिद हो या वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर से लगी ज्ञानवापी मस्जिद दोनों के निर्माण और पुनर्निमाण को लेकर कई तरह के विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे धार्मिक स्थलों पर विवाद न गहराए, इसको लेकर 1991 में ये कानून पास करना पड़ा। 

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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