Tuesday, July 5, 2022

स्पेशल: ज्ञानवापी मामले में फव्वारे के पक्ष के लोगों की दलील, कहा-शिवलिंग में छेद नहीं होता

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वाराणसी। बनारस के ज्ञानवापी मस्जिद में कथित ‘शिवलिंग’ की तरह की आकृति मिलने के बाद छिड़े चौतरफा विवाद के बीच एक बहस शुरू हो गई है। तकरार इस बात पर हो रही है कि विवादित स्ट्रक्चर आखिर है क्या-शिवलिंग अथवा फव्वारा। हिन्दू पक्ष का दावा है कि पुराने जमाने में बिजली नहीं होती थी, तो फव्वारा कैसे चलता होगा, इसलिए वह शिवलिंग ही है। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष का दावा है कि शिवलिंग में छेद नहीं होता। ऐसे में उसके शिवलिंग होने का सवाल ही नहीं उठता है। विवादित स्ट्रक्चर की जांच-परख बाकी और मामला कोर्ट में विचाराधीन है। शुरू में सर्वे करने वालों ने खुद ही विवादित स्ट्रक्चर की फोटोग्राफ लीक कराई और अब हिन्दू पक्ष कोर्ट से गुहार लगा रहा है कि इसका वीडियो लीक करने पर पाबंदी लगाई जाए। इस बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने ज्ञानवापी की देखरेख करने वाली अंजुमन इंतजामिया कमेटी के दावे को पुष्ट करते हुए विवादित स्ट्रक्चर को 2700 साल पुराना फव्वारा बताया है। ओवैसी के हालिया बयान से फव्वारा-शिवलिंग विवाद नए सिरे से तूल पकड़ने लगा है।

ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख के लिए साल 1922 में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी बनाई गई थी। मोहम्मद यासीन साल 1989 से इस कमेटी के सेक्रेटरी हैं और वही मस्जिद की देखरेख करते हैं। वह कहते हैं, “दिल्ली का लालकिला हो या फिर ताजमहल, दोनों जगहों की मस्जिदों में वजू के लिए हौज मौजूद है। गर्मी के दिनों में हौज का पानी उबलने लगता था, जिसे ठंडा करने के लिए फव्वारा बनाने की तकनीक विकसित हुई थी। ज्ञानवापी परिसर में जो फव्वारा है,  उसे इसी मकसद से बनाया गया था।” वह कहते हैं, “ज्ञानवापी में सर्वे के दौरान जब एडवोकेट कमिश्नर की टीम ने उस फव्वारे के छेद में सलाई डाली तो वह 64 सेंटीमीटर अंदर तक चली गई। आप ही बताइए कि क्या शिवलिंग में छेद हो सकता है। ज्ञानवापी में जो स्ट्रक्चर मिला है वो फव्वारा था, फव्वारा है और फव्वारा रहेगा। आजादी से पहले 1937 में कोर्ट ने यह मान लिया था कि ज्ञानवापी वक्फ बोर्ड की प्रॉपर्टी है, तो इस पर बितंडा क्यों खड़ा किया जा रहा है?”

पिछली दीवार पर बने फूल और घंटे के बारे में यासीन कहते हैं, “मुगल बादशाह अकबर ने सभी धर्मों को एक माला में पिरोने के लिए दीन-ए-इलाही धर्म चलाया था। हालांकि अकबर के नए धर्म को सामाजिक मान्यता नहीं मिल पाई थी। मस्जिद के पीछे की दीवार के बारे में कहा जा रहा कि उनमें मंदिर की तरह नक्काशी है। मैं बताना चाहता हूं मस्जिद के पीछे वाली दीवार पर जो अवशेष हैं उसे अकबर ने साल 1585 के आस-पास नए मजहब ‘दीन-ए-इलाही’ के तहत ही बनवाए थे। उन दिनों मस्जिद हिंदू-मुस्लिम एकता की प्रतीक मानी जाती थीं। औरंगजेब का शासन आया तो उसने ज्ञानवापी मस्जिद को रेनोवेट कराया था। ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण 14वीं सदी में जौनपुर के सुल्तानों ने कराया था। ज्ञानवापी कूप ज्यादा गहरा नहीं है। वह मामूली कुआं, जिसकी गहराई 30 से 40 फीट है। करीब दो साल पहले मैंने कुएं की सफाई कराई थी, तब उसमें सिर्फ कचरा ही निकला था। कुएं के नीचे हमारा जेट पंप लगा है। यह कुआं अब कॉरिडोर परिसर का हिस्सा है। ज्ञानवापी के वजू वाली हौज में पहले इसी कुएं से पानी आता था,  जिसके स्ट्रक्चर को शिवलिंग बताकर झूठा प्रचार किया जा रहा है वह सचमुच फव्वारा है।”

यासीन कहते हैं, ” साल 1991 के पूजा कानून के मुताबिक 15 अगस्त 1947 से पहले के धार्मिक स्थानों के “करेक्टर (स्ट्रक्चर नहीं)” को किसी सूरत में नहीं बदला जा सकता है। साल 1936 में मस्जिद कमेटी के खिलाफ दायर एक मुकदमे में साल 1937 में फैसला आया था, जिसमें कोर्ट ने माना था कि ज्ञानवापी नीचे से ऊपर तक मस्जिद है और वह वक्फ की प्रॉपर्टी है। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया। मस्जिद के पश्चिमी छोर पर दो कब्रें हैं जहां पहले सालाना उर्स होता था। साल 1937 में कोर्ट के फैसले में इंतजामिया कमेटी को वहां उर्स कराने की इजाजत मिली। ज्ञानवापी में दोनों कब्रें आज भी मौजूद हैं, मगर अब वहां उर्स नहीं होता है। मस्जिद में नमाज तभी से पढ़ी जा रही है जब से इसका निर्माण किया गया था। रही बात मुकदमे की तो कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी और मस्जिद कमेटी कोर्ट में अपना पक्ष रखता रहेगा।”

मस्जिद में हिन्दू धर्म से जुड़ी आकृतियों पर अपना पक्ष रखते हुए यासीन कहते हैं, “हम जो मकान बनाते हैं तो ईंटों पर कहीं स्वस्तिक बना होता है तो कहीं राम-कृष्ण लिखा होता है। किसी इमारत में ऐसा मैटीरियल निकलने का मतलब यह नहीं है कि वह मंदिर हो जाएगा। कोर्ट की सर्वे रिपोर्ट अभी जगजाहिर नहीं हुई है। फिर भी मस्जिद में शिवलिंग और मूर्तियां होने के दुष्प्रचार किए जा रहे हैं। दुनिया भर के लोगों को बेवजह भ्रम में डाला जा रहा है। मेरी सभी से गुजारिश है कि किसी मामले को बेवजह तूल न दिया जाए। मैं चाहता हूं कि काशी के लोग प्यार-मुहब्बत से रहें और गंगा-जमुनी संस्कृति को बरकरार रखें।”

स्ट्रक्चर जिसके निकलने का दावा किया जा रहा है

नंदी बता रहे वह शिवलिंग है

विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख आलोक कुमार अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के दावों पर इत्तेफाक नहीं रखते। वह दावा करते हैं, “हिंदू पक्ष यह साबित करने में सक्षम है कि ज्ञानवापी में पाया गया शिवलिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, क्योंकि इसके आगे नंदी हैं जो उसे देख रहे हैं। ज्ञानवापी की सर्वे रिपोर्ट्स में भी वहां कमल के फूल, स्वास्तिक, घंटियों, त्रिशूल के चिह्न मिलने की बात है। इससे पता चलता है कि ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का वजू खाना मंदिर तोड़कर बनाया गया है। हम कोर्ट के जरिए अपने भगवान विश्वेश्वर को लेकर रहेंगे।”

बनारस के सिविल कोर्ट (सीनियर डिवीजन) में पहुंचने से पहले एडवोकेट कमिश्नर की जो सर्वे रिपोर्ट मीडिया में लीक की गई थी, उसमें दावा किया गया है कि वजू स्थल पर एक तालाब मिला है जिसकी गहराई करीब तीन फीट है। तालाब में सैकड़ों मछलियां हैं। वजू करने के लिए 30 टोटियां लगी हैं, जिसका पानी तालाब में बहता है। पानी निकालने पर गोल पत्थरनुमा आकृति दिखाई दी, जिसकी ऊंचाई 2.5 फीट रही होगी, जिसे इसे वादी पक्ष ने शिवलिंग बताया तो प्रतिवादी के अधिवक्ता ने कहा कि फव्वारा है, जो काफी समय से बंद है। सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि पत्थर के ऊपर एक आधे से कम इंच का छेद मिला है, जो 63 सेंटीमीटर गहरा था। फव्वारा के लिए पाइप घुसाने का स्थान नहीं है। गोलाकार पत्थर के ऊपर अलग से सफेद पत्थर लगाया गया है, जिस पर बीच में पांच खाने हैं। करीब ढाई फीट ऊंची गोलाकार आकृति पर अलग तरह का घोल चढ़ी है, जिसमें थोड़ा क्रेक आ गया है। स्ट्रक्चर पर काई जमी थी और उसे साफ कराने पर उसकी आकृति काली पाई गई। आकृति बड़े शिवलिंग के आकार जैसी दिखती है।”

फव्वारा-शिवलिंग विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 20 मई 2022 को विशेष निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने कहा है, “यह मामला जटिल और संवेदनशील है। अगर 25-30 साल से अधिक का अनुभव रखने वाला एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी मामले को संभालता है तो बेहतर है। इसलिए इस मुकदमे को वाराणसी के जिला न्यायाधीश को ट्रांसफर किया जा रहा है। जिला जज आठ हफ्ते में सुनवाई पूरी करेंगे। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई 2022 को कहा था कि शिवलिंग के दावे वाली जगह को सुरक्षित किया जाए और मुस्लिम पक्ष को नमाज पढ़ने से न रोका जाए। स्वेच्छानुसार जितने लोग चाहें नमाज अदा कर सकते हैं।” हालांकि इस बीच ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी प्रकरण में एडवोकेट कमिश्नर की ओर से अदालत में दाखिल रिपोर्ट में शामिल फोटोग्राफ व वीडियो अभी तक पक्षकारों को नहीं मिल सका है। वादी पक्ष ने इसकी प्रति प्राप्त करने के लिए जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत में प्रार्थना पत्र दिया है। वहीं, इसी मामले में प्रतिवादी पक्ष की ओर से शुक्रवार को एक प्रार्थना पत्र अदालत में दाखिला किया गया, जिसमें मांग की गई कि फोटोग्राफ व वीडियो सिर्फ पक्षकारों को दिया जाए और इसे सार्वजनिक करने पर रोक लगे। माना जा रहा है कि विवादित स्ट्रक्चर का सच जनता के बीच सामने न आ सके, इसके लिए अब इसे तोपने की कवायद शुरू हो गई है।

संघ पर ओवौसी ने कसे तंज

ज्ञानवापी विवाद के बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 21 मई 2022 को एक ट्वीट कर मामले को और गरमा दिया कि मस्जिद में कोई शिवलिंग नहीं, बल्कि फव्वारा है जो इस्लामी वास्तुकला को उकेरता है। बिजली मुक्त फव्वारे के बारे में विकिपीडिया और न्यूयॉर्क टाइम्स के एक पुराने लेख के लिंक साझा करते हुए ओवैसी कहते हैं, “ऐसे फव्वारे गुरुत्वाकर्षण पर काम करते हैं और प्राचीन रोमन और यूनानियों के पास पहली और छठी शताब्दी ईसा पूर्व के फव्वारे थे। ओवैसी ने ट्वीट में यह भी कहा है, “संघी जीनियस पूछ रहे हैं कि बिजली के बिना एक फव्वारा कैसे चलता था? इसे ग्रेविटी कहा जाता है। संभवतः दुनिया का सबसे पुराना कामकाजी फव्वारा 2700 साल प्राचीन है। प्राचीन रोमन और यूनानियों के पास पहली और छठी शताब्दी में ऐसे फव्वारे थे। शाहजहां के शालीमार उद्यान में 410 फव्वारे हैं। संघियों को विकिपीडिया का लिंक दे रहा हूं, क्योंकि इससे ज्यादा वह कुछ नहीं समझ सकते हैं।”

फव्वारा-शिवलिंग प्रकरण में ओवैसी के ट्वीट के बाद विवादित स्ट्रक्चर को लेकर बनारस के इतिहासकार और आर्किटेक्ट दो खेमें में बंट गए हैं। बीएचयू आईआईटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर आरएस सिंह का दावा है, “विवादित स्ट्रक्टर शिवलिंग जैसा है, लेकिन इसके एक सिरे पर फव्वारे जैसी संरचना है। पहले बिजली नहीं होती थी। लोग ऊंचाई से पानी छोड़ते थे, तब यह काम करता था। ज्ञानवापी मस्जिद में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है। बगैर इलेक्ट्रिक के कोई भी फव्वारा तभी काम कर सकता है जब काफी ऊंचाई से उसमें पानी पहुंचाने की कोई तकनीक हो। स्ट्रक्चर का कोई केमिकल परीक्षण नहीं हुआ है। ऐसे में कोई यह नहीं बता सकता है कि वह संरचना किस चीज से बनी है? विवादित आकृति फव्वारा हो सकता है, लेकिन वह जितने रेडियस में है, वह संभव नहीं है। अगर कोई दावा कर रहा है कि यह फव्वारा है तो इसे चलाकर दिखा दे। तब हम मान लेंगे कि यह फव्वारा है। हमारा तो यही मानना है कि वह संरचना शर्तिया शिवलिंग है। विवादित स्ट्रक्चर का केमिकल एनालिसिस नहीं हुआ है, इसलिए यह पन्ना है या नहीं है, कुछ भी कह पाना कठिन है? संरचना के रंग को देखने से लग रहा है कि वह काफी पुराना है और लंबे समय से पानी में है, जिससे उसका रंग काला पड़ गया है। वह कौन सा पत्थर है यह कह पाना मुश्किल है।”

वाराणसी के जाने-माने आर्किटेक्ट अरुण सिंह कहते हैं, “ज्ञानवापी में जो मौजूद संचरना है वह विश्वेश्वर महादेव नहीं हो सकते। संभव है कि वह शिवलिंग हो, लेकिन उसमें ज्योर्तिलिंग की तनिक भी आभा नहीं है। दिक्कत की बात यह है कि अगर यह साबित हो गया कि शिवलिंग नहीं है तो कितनी फजीहत होगी। हम मानते हैं कि संभव है ज्ञानवापी कभी मंदिर रही होगी, जिसे तोड़ा नहीं, बल्कि उखाड़ा गया होगा। संभव है कि मंदिर में मौजूद किसी शिवलिंग को मुस्लिम समुदाय के लोगों ने यूज कर लिया हो। कोई नहीं जानता कि असली विश्वेश्वर कहां हैं?”

अरुण यह भी कहते हैं, “मुगलकालीन फव्वारों में आज की तरह पानी नहीं निकलता था। उनकी तकनीक अलग थी, जिसके चलते उसमें से बुलबुले की तरह पानी निकलता था। इन फव्वारों से एक अलग तरह एक मधुर ध्वनि निकलती थी जो सुकून देने वाली होती थी। मुगलकालीन की मस्जिदों के हौज को रेहट से भरा जाता था। रेहट वाले कुएं आमतौर पर नदी किनारे होते थे। ऐसा ही कुआं हुमायूं के मकबरे में था, जिसका प्रयोग वजू करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। अगर विवादित संचरना फव्वारा है तो इसके नीचे कोई सिस्टम और मेकैनिज्म जरूर होगा। रिसर्च से यह पता चल जाएगा कि फव्वारे में पानी की सप्लाई कैसे होती रही होगी? अगर कोई सिर्फ फव्वारा बनाएगा तो बेसमेंट में पूरा सिस्टम जरूर होगा। गहन जांच-पड़ताल से ही सच सामने आएगा।”

फव्वारे का विज्ञान

इतिहास के जानकार और समाजवादी जन परिषद के महासचिव अफलातून देसाई कहते हैं, ” किसी भी शिवलिंग में सुराख नहीं होता। मस्जिद में जो आकृति मिली है उसके बारे में सर्वे में कहा गया है कि उसमें करीब आधे इंच का 63 सेंटीमीटर गहरा होल है। ऐसे में वह आकृति शिवलिंग कैसे हो सकती है?” वह कहते हैं, “मुगलकालीन इमारतों में स्थापित फव्वारों के मैकेनिज्म को समझिए। उनमें गुरुत्वाकर्षण व हाइड्रालॉजिकल सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। यह एक ऐसा सिस्टम है, जिसमें पानी के फ्लो, बारिश और वाष्पीकरण को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। मुगलकालीन मक़बरे चारबाग़ के तर्ज पर बनते हैं और इसमें जगह-जगह फव्वारे लगे होते हैं। इसी तरह हुमायूं का मक़बरा भी बना है। लाल किले में नहर-ए-बहिश्त हुआ करती थी, जो पूरे लाल किले में बहती थी और इसमें जगह-जगह फव्वारे लगे थे। जामा मस्जिद में हौज़ (तालाब) तक पानी लाने के लिए रहट का कुआं था, जो आज भी मौजूद है। दुनिया के सबसे पुराने फव्वारे मेसोपोटामिया (इराक़, ईरान, तुर्की और सीरिया) में मिलते हैं, जो 3000 ईसा पूर्व के हैं। फव्वारों के लिए इटली दुनिया भर में मशहूर है। ‘फाउंटेन ऑफ द फोर रिवर’ हो या फिर ट्रिवी फाउंटेन, जिसमें टूरिस्ट सिक्का फेंककर दुआ मांगने में यक़ीन रखते हैं। यूरोपीय देश फ्रांस और जर्मनी में भी पुराने फव्वारे हैं।”

अफलातून कहते हैं, “देश भर में बितंडा खड़ा किया जा रहा है कि विवादित स्ट्रक्चर फव्वारा नहीं हो सकता, क्योंकि पहले बिजली नहीं हुआ करती थी। सच यह है कि पुराने जमाने में सभी फव्वारे बिना बिजली के ही चला करते थे। दुनिया भर में कई जगहों पर ऐसे प्राकृतिक फव्वारे हैं जो गुरुत्वाकर्षण शक्ति, हवा के दबाव से चलते हैं और खूबसूरत भी दिखाई देते हैं। ऐसे फव्वारों में बिजली वाला कोई पंप नहीं होता। प्राचीन काल रोम में फव्वारा बनाने वाले डिजाइनर गुरुत्वाकर्षण पर भरोसा करते थे, दबाव उत्पन्न करने के लिए बंद सिस्टम में ऊंचे स्रोत से पानी को चैनलाइज़ किया करते थे। रोम के जलसेतु पहाड़ों से ऊंचे कुंडों तक पीने और सजाने दोनों कामों के लिए पाइपों के जरिए पानी ले जाते थे। एक फव्वारे के संतोषजनक उछाल के लिए बस कुछ फीट की ऊंचाई पर्याप्त पानी का दबाव बना सकती है। शोध से पता चलता है कि आदिम युग और माया सभ्यता में भी ऐसे फव्वारों का आनंद लिया गया होगा।”

“रोम के वर्साय में किंग लुइस सोलहवें के बनवाए गए फव्वारे में 14 विशाल पहियों के एक जटिल और महंगे सिस्टम का इस्तेमाल किया गया था। जिनका व्यास 30 फीट से ज्यादा था, जो सीन नदी की एक शाखा की धारा से चलते थे। बिना बिजली वाली इस मशीन ने एक सदी से भी ज्यादा समय तक काम किया। वैज्ञानिक दृष्टि से समझें तो फव्वारे के पीछे केशिका क्रिया या केपिलरी एक्शन काम करता है। केपलरी एक्शन को एक संकीर्ण ट्यूब अथवा पोरस सामग्री में तरल के सहज प्रवाह के रूप में परिभाषित किया गया है। वास्तव में यह गुरुत्वाकर्षण के विरोध में काम करता है। कैपिलरी एक्शन, कोहेसिव फोर्स और एडहेसिव फोर्स के कॉम्बिनेशन की वजह से ऐसा होता है। कोहेसिव फोर्स यानी वह बल जो लिक्विड मॉलीक्यूल्स के बीच में लगता है और एडहेसिव फोर्स जो लिक्विड मॉलीक्यूल्स और ट्यूब मॉलीक्यूल्स के बीच में लगता है। कोहेसिव और एडहेसिव फोर्स इंटरमॉलीक्यूलर फोर्स होते हैं। यह बल पानी को ट्यूब में खींचने का काम करते हैं। इसके लिए कैपिलरी ट्यूब का महीन होना ज़रूरी होता है।”

बयानबाजी का नया दौर

ओवैसी का ट्वीट के बाद से सियासी हलके में बयानबाजी का नया दौर शुरू हो गया है। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री व राज्यसभा सांसद दुष्यंत कुमार गौतम ने 21 मई को मेहंदीपुर बालाजी में मीडिया से बातचीत में कहा, “ज्ञानवापी के बारे में बताया जा रहा है कि वहां नंदी महाराज शिवजी की मूर्ति के सामने बैठे हैं। प्रतीत होता है कि मुगलों ने हिन्दू धर्म को अपमानित करने का काम किया है। मुसलमानों को चिंतन करना चाहिए कि वे देश को लूटने वाले मुगलों के साथ हैं या फिर भारत देश के साथ। उन्हें साफ-साफ निर्णायक भूमिका अदा करनी होगी। इस बीच भाजपा से जुड़ी निग़हत अब्बास ने ट्वीट कर कहा है, “चार सौ साल पहले बिजली तो थी नहीं तो क्या औरंगज़ेब फूंक मारकर फव्वारा चलाते थे?”

तो मुस्लिम समाज भी करेगा सहयोग

भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत कुमार गौतम का बयान आने के बाद उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष शाहनवाज़ आलम ने आगरा में मीडिया से बात की और कहा, “ज्ञानवापी मस्जिद में लगे फव्वारे के पत्थर को शिवलिंग बताकर माहौल खराब करने से अच्छा है कि मोदी सरकार कैलाश मानसरोवर को मुक्त कराने के लिए चीन पर दबाव बनाए इसमें मुस्लिम समाज भी सरकार की मदद करेगा। निचली अदालत ने ज्ञानवापी मामले की सुनवाई गैर विधिक तरीके से की। पूजा स्थल अधिनियम 1991 की साफ-साफ अनदेखी की गई। कानूनी तौर पर किसी भी अदालत, ट्रिब्यूनल या प्राधिकारण में ऐसी याचिका स्वीकार योग्य नहीं थी, लेकिन बनारस की निचली अदालत ने इस क़ानून का उल्लंघन करते हुए फैसला दिया। ऐसा फैसला देने वाले जज के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट को अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए।”

दीन मोहम्मद बनाम सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के मुकदमे का हवाला देते हुए शाहनवाज़ आलम कहते हैं, “सिविल जज को वह फैसला देख लेना चाहिए था जिसमें विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद की ज़मीन को अलग-अलग करके बैरिकेडिंग की गई थी, जिसमें वजुखाना मस्जिद के हिस्से में था। जज को बताना चाहिए कि जब 1937 और 1942 में अदालत को वजुखाने में कोई शिवलिंग नहीं दिखा तो सालों बाद सर्वे रिपोर्ट मिलने से पहले ही उन्हें कहां से दिख गया? ” शाहनवाज़ आलम ने गोदी मीडिया को आड़े हाथ लिया और कहा, “मीडिया का एक बड़ा वर्ग इस मुद्दे को बेवजह तूल दे रहा है। अफवाह फैलाकर देश का माहौल बिगाड़ने से अच्छा होता कि वो चीन पर दबाव बनाकर कैलाश मानसरोवर को मुक्त कराने में सहयोग करते। ठीक वैसे ही जैसे औरंगजेब के शासन में उनके मनसबदार बाज बहादुर ने 1670 ईसवी में किया था।”

ज्ञानवापी मस्जिद में कथित शिवलिंग का बिहार में विरोध तेज हो गया है। जदयू नेता ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर हो रही कार्रवाई पर सवाल खड़े कर रहे हैं। वहीं भाजपा नेता ज्ञानवापी पर कार्रवाई को लेकर खासे उत्साहित हैं और उनका मानना है कि तीस हजार से अधिक हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है। इसलिए जो हो रहा है, वो ठीक हो रहा है। दूसरी ओर, बिहार सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमा खान ने कहा है, “बनारस में जो कुछ हो रहा है ठीक नहीं है। इस विवाद की वजह से पूरे देश में तनाव बढ़ेगा, जो किसी के लिए उचित नहीं है।” मंत्री जमा खान के धार्मिक सद्भाव बिगड़ने के मामले पर बिहार सरकार के मंत्री प्रमोद कुमार ने तंज कसा और कहा कि देश संविधान पर चलता है। इस मसले पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कोई भी बयान देने से बच रहे हैं।

(वाराणसी से पत्रकार पीके मौर्य की रिपोर्ट।)

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