Tuesday, January 31, 2023

ग्राउंड रिपोर्ट: फ्रेट विलेज के लिए छीनी जा रही किसानों की जमीनें, बुद्ध विहार पर बुल्डोजर चलाने की धमकी

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चंदौली\वाराणसी। हम लोग कई पीढ़ियों से गंगा में मछली पकड़कर अपने परिवार का पेट पालते आ रहे हैं। यहां से विस्थापित होकर कहां जाएंगे ? जहां हम पले-बढ़े, खेले-कूदे, खेतीबाड़ी, मछली पकड़े और मन हुआ तो गंगा में घंटों नाव चलाए। यह सच है कि सरकार हमारी जमीनों का पैसा दे रही है, लेकिन वह, हमारे पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे पड़ोसी, मित्र-साथी, गालियां, चौबारे, खून में रच-बस जाने वाले काम-धंधे और जीवन के खटराग कैसे दे पायेगी? 

कई पीढ़ियों की हाड़-तोड़ मेहनत और मरने-खपने के बाद जीवन को आधार और सही पता मिला था, जो अब जल्द ही बेपता होने वाला है। हम अपने कुनबे के साथ कहां जाएंगे? उस जगह को सपने में भी नहीं खोज पाएं हैं। इन्हीं बातों की उधेड़बुन से रोज की सुबह होती और रात गुजर जाती है। गांव, गलियों और इलाकाई खेत-खलिहानों, गंगा और घाट और साथी-सहपाठी हमेशा-हमेशा के लिए छूट जाएंगे। 

ये शब्द कहते हुए ताहिरपुर गांव के चालीस वर्षीय बृजेश साहनी के चेहरे पर गहरी उदासी तैर जाती हैं और कंधा झुक जाता है। 

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सदमे में मल्लाह समाज के लोग. थ्रेड विलेज में इनकी भी कई बीघे जमीनें जा रही है।

समूचे जीवन के खटराग पर डाका 

ताहिरपुर बृजेश की तकरीबन 20 विस्वा जमीन भी बंदरगाह के फ्रेट विलेज परियोजना में जाने वाली है। राल्हूपुर बंदरगाह फ्रेट विलेज बसाने के लिए ताहिरपुर-रसूलगंज, मिल्कीपुर और राल्हूपुर को चुना गया है। वह आगे कहते हैं “भविष्य में छोटा मिर्जापुर, नरायनपुर से लगायत चुनार तक फ्रेट विलेज का विस्तार किया जा सकता है। बंदरगाह जब बनने लगा था तो सबसे अधिक खुशी ताहिरपुर, मिल्कीपुर, राल्हूपुर और आसपास के दर्जनों गांवों के लोगों को हुई थी, कि अब रोजगार मिलेंगे और हाशिए पर पड़े ग्रामीणों का जीवन मुख्य धारा से जुड़ जाएगा, लेकिन हमें इस बात की ज़रा भी फ़िक्र नहीं थी कि, सरकार और प्रशासन हमारे खेत-खलिहान, नहर-मैदान सपनों और समूची समाजिक-आर्थिक विरासत को एक पल में लूट जाने का फरमान सुना देगी।”  

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ताहिरपुर-रसूलगंज गांव जो भूमि अधिग्रहण के बाद उजड़ जाएगा।

 उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद पश्चिमी छोर का अंतिम गांव ताहिरपुर-रसूलगंज गंगा के किनारे बसा हुआ है। यहां 2,500 से अधिक की तादाद में लोगबाग रहते हैं। इनमें सबसे अधिक मल्लाह और मुस्लिमों की आबादी है। इसके बाद कोइरी, भर, दलित, डोम, अनुसूचित जाति समेत पिछड़े वर्ग की अन्य जातियों के लोग भी रहते हैं। मौजूदा समय में उक्त गांवों के भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) हल्दिया-वाराणसी के फ्रेट विलेज योजना में 415 परिवारों की जमीन का अधिग्रहण करने की कार्यवाही जारी है। 

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चंदौली डीएम को ज्ञापन देकर जमीन और बुद्ध विहार के अधिग्रण को रद्द करने की मांग रखते ग्रामीण।

जमीन के अधिग्रहण का विरोध करते हुए 13 दिसंबर को अखिल भारतीय किसान महासभा और बुद्ध विहार बचाओ संघर्ष मोर्चा के तले 450 से अधिक किसान, मजदूर, एक्टिविस्ट व ग्रामीणों ने रैली निकालकर जिलाधिकारी ईशा दुहन को अपनी मांगों का ज्ञापन दिया, और भूमि अधिग्रहण रद्द करने की मांग की। केंद्रीय जलमार्ग विकास प्रोजेक्ट की राल्हूपुर बंदरगाह और फ्रेट विलेज की लागत ₹ 5,369.18 के आस-पास है। 

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अखिल भारतीय किसान महासभा और बुद्ध विहार बचाओ संघर्ष मोर्चा का प्रदर्शन मार्च।

समतल खेत और मकान बनाने में पीढ़ियां गुजर गईं 

मिल्कीपुर के पूर्व प्रधान भाईराम साहनी ने “जनचौक” को बताया कि यहां के लोगों का कहना है कि कई दशक पहले यहां की जमीनें अनुपजाऊ, उबड़-खाबड़ और राढ़ी, कुश और बबूल जैसे जंगली घासों से घिरी हुई थीं। इन लोगों के बाप-दादा हाड़तोड़ परिश्रम कर इन जमीनों को समतल कर धान, गेहूं, चना, सरसों, टमाटर, आलू, मक्का, ज्वार-बाजरा समेत हर जरूरी फसल उगाने लगे।

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निजी साधन के अलावे पास में ही दशकों पुराने बौद्ध विहार के पास स्थित कैनाल पंप से सिंचाई की व्यवस्था है। अनाज की समस्या दूर होने पर लोगों ने खून-पसीने की कमाई से छोटे-बड़े पक्के मकान बनाए। अब इन्हें अपने ही घर, खेत-खलियान और बाग़-बगीचे से उजड़ने का भय सता रहा है। इन गांवों के विकास के लिए अब भी शासन की तरफ से बजट जारी किया जा रहा है। सैकड़ों किसानों की बिना सहमति जमीनें अधिग्रहीत की जा रही हैं।”

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लाखों लोग जता रहे कड़ा विरोध 

ताहिरपुर में दशकों से पूर्वांचल व बिहार के मौर्य, कुशवाहा, यादव, पटेल और दलित समाज के सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक उत्थान का केंद्र रहा बुद्ध विहार भी फ्रेट विलेज की रडार पर है। यहां विहार में बुद्ध की शांति मुद्रा में प्रतिमा लगी है। सारनाथ स्थित बोधिवृक्ष का क्लोन भी यहां है। मौर्य शासनकाल में स्थापत्य का बेजोड़ उदाहरण रहे चुनार के बलुआ पत्थरों से तराशे गए 42 फीट ऊंचे अशोक स्तंभ भी आकर्षण का केंद्र हैं। 

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राल्हूपुर बंदरगाह पर लगी कीमती क्रेनें, जो सिर्फ हाथी के दांत बनी हुई हैं।

यह बुद्ध विहार गंगा ग्रीन बेल्ट (दो सौ मीटर के दायरे) में शामिल है, नियम-कानून के अनुसार विहार की भौतिक स्थिति को नहीं बदला जा सकता है।  सात बीघे में विस्तारित बुद्ध विहार में अशोक, आंवला, नारियल, साखू-सागौन, आम, नीम, शीशम और बेर के एक हजार से अधिक पेड़ हैं। बुद्ध विहार पर भी थ्रेड विलेज के लिए जमीन अधिग्रहीत करने की योजना प्रशासन की है। जिसका वाजिदपुर, रामनगर, बनारस, चंदौली, मिर्जापुर, गाजीपुर समेत दर्जनों जनपद के बुद्ध को मानने वाले लाखों वैज्ञानिक चेतना के लोग कड़ा विरोध कर रहे हैं। 

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बुद्ध विहार में स्थापित चुनार के लाल बलुआ पत्थर से निर्मित अशोक स्तंभ।

सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का केंद्र

तथागत विहार चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़े सत्तर वर्षीय विद्याधर कुशवाहा बुद्ध विहार में नोटबुक पर कुछ लिखते हुए मिले। वे “जनचौक” से कहते हैं कि ” बुद्ध विहार कई दशकों से पूर्वांचल के दर्जन भर से अधिक जिलों के लाखों नागरिकों के शैक्षिक, बौद्धिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का केंद्र है। लोगों ने बड़े ही जतन से बुद्ध विहार और अशोक स्तंभ को बनवाया है। वाजिदपुर स्थित दुर्गा मंदिर को फ्रेट विलेज से दूर रखा गया है, ठीक उसी प्रकार बुद्ध विहार को भी जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई से दूर रखा जाए।

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भूमि अधिग्रहण को रद्द करने के लिए जन जागरण करते किसान-मजदूर समिति के सदस्य और ग्रामीण।

बुद्ध विहार पर बुल्डोजर चलाने की धमकी देना बंद किया जाए। यहां पाक्षिक मासिक विपश्यना, शान्ति पाठ, ध्यान, मानव जाति उत्थान पर चर्चा और रोजाना लोग ध्यान-साधना करते हैं। ध्यान के पश्चात राष्ट्रीयता मजबूत करने वाले नारे लगते हैं। पूर्वांचल के सैकड़ों खेतिहर किसानों और बौद्ध अनुयायियों ने चंदा जुटाकर 05 सितंबर 2004 को इस जमीन का बैनामा लिया था। बुद्ध विहार को उजाड़ने से लाखों लोगों में गलत संदेश जाएग।”

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मांद में मिल सकती है मात 

पत्रकार राजीव सिंह कहते हैं कि “बनारस, चंदौली समेत पूर्वांचल में कोइरी, कुशवाहा, मौर्य, महतो और कुर्मी-पटेल की आबादी प्रतिशत में लगभग 27 फीसदी है। मौजूदा वक्त में यह समाज बीजेपी का एकमुश्त वोट बैंक भी रहा है। फ्रेट विलेज के लिए केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के फैसले को लेकर इस इलाके के बौद्ध अनुयायी काफी क्षुब्ध हैं। ऐसे में बुद्ध विहार को तोड़ने और उजाड़ने की कुचेष्टा हुई तो इसका सीधा असर आगामी लोकसभा चुनाव-2024 में पड़ना तय है। इससे बीजेपी को बड़े पैमाने पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

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जबकि, तथागत विहार चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़े चंदौली, मिर्जापुर, सोनभद्र, जौनपुर, आजमगढ़, गाजीपुर, प्रयागराज, भदोही और पश्चिमी बिहार से काफी संख्या में मौर्य समाज का जुड़ाव है। मिसाल के तौर पर जब बीजेपी यूपी और देश में पहचान के लिए जूझ रही थी, तब इसी मौर्य बाहुल्य चंदौली जनपद के लोगों ने लगातार तीन बार बीजेपी कैंडिडेट आनंद रत्न मौर्य को जिताकर दिल्ली के संसद में भेजा था। खेतिहर जातियों का कुछेक कारणों से बीजेपी से मोहभंग होने से सत्ता में आने के लिए बीजेपी को लोहे के चने चबाने पड़े। अब इतिहास उसी कहानी को दुहराने के मुहाने पर खड़ा है। लिहाजा, फ्रेट विलेज की योजना में स्थानीय दुर्गा मंदिर के साथ बुद्ध विहार को भी मुक्त रखा जाए।”

रद्द हो भूमि अधिग्रहण 

वाराणसी लोकसभा सीट से नरेंद्र मोदी को चुनाव में कड़ी टक्कर देने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक अजय राय केंद्र सरकार पर जनता की गाढ़ी कमाई को मूर्खतापूर्ण कामों पर खर्च करने का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि “बनारस से कलकत्ता तक छोटी नदियों में जहाज परिवहन का कोई सरोकार नहीं है। समंदर होता हो तो बात कुछ हद तक ठीक रहती, लेकिन गंगा और सहायक नदियों के भरोसे, जिनमें वर्ष भर पानी ही नहीं रहता है। इसमें सैकड़ों टन क्षमता के माल वाहक जहाज कैसे चलाये जा सकते है? केंद्र सरकार सीधे तौर पर जनता और अन्य मदों से मिलने वाले पैसे को बिना सोचे-समझे खर्च कर रही है, जिसका हासिल शून्य है।”

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” बनारस की गंगा में अप्रैल-मई में ही कई स्थानों पर रेत के टीले उभर जाते है। इसमें कैसे जहाज आएंगे ? दूसरी बात पोर्ट के उद्घाटन के कई साल बीत गए हैं, कितने शिप आये और बनारस से कितना माल बाहर भेजा गया है। पोर्ट को माल ढोने और उतार-चढ़ाव से कितना मुनाफा हुआ है ? इसका विवरण जारी क्यों नहीं किया जा रहा है ? यह बंदरगाह शुरू से ही सवालों के घेरे में रहा है। इसका हश्र भी सभी जानते हैं -एक दिन कबाड़ बन जाएगा और फेल होती इस योजना को बंद कर दिया जाएगा ?”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2018 में बनारस के राल्हूपुर बंदरगाह का शुभारंभ किया था। नाममात्र के मालढुलाई के बाद अब पीएम मोदी के एक और ड्रीम प्रोजेक्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। फ्रेट विलेज के नाम पर भूमि अधिग्रहण से सैकड़ों लोगों का जीवन संकट में है। इसे भी रद्द करने की आवश्यकता है।” 

आस्था से छेड़छाड़ बंद हो 

बरहनी विकास खंड के किसान नेता रामविलास मौर्य कहते हैं कि “फ्रेट विलेज बनाने की योजना से पहले किसानों की आम सहमति नहीं ली गई। इसके बाद प्रभावित किसानों को नोटिस भी जारी कर दिया गया है। मिल्कीपुर के समीप बौद्ध मंदिर और विशाल परिसर भी हैं, जो अधिग्रहण के दायरे में हैं। चंदौली में बरहनी, धानापुर, सकलडीहा, कमालपुर, भतीजा, जलालपुर, चकिया, नौगढ़ और चहनिया में बड़ी संख्या में महात्मा बुद्ध के मानने वाले उनके विचारों पर चलने वाले लोग हैं। लाखों लोगों के आस्था के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की जा रही है।

इसे तत्काल रोका जाए। प्रदर्शन के बाद जिलाधिकारी को ज्ञापन देने में महेंद्र प्रसाद, वीरेंद्र सिंह मौर्य, सुधाकर कुशवाहा, विनय मौर्य, हेमन्त कुशवाहा, मोतीलाल शास्त्री, सूबेदार, घरभरन, संतोष पांडेय, सुजीत मौर्य, रामललित मौर्य, अवधेश मौर्य, भोलानाथ विश्वकर्मा, सुनील मौर्य समेत सैकड़ों की तादाद में किसान  रहे। इस संबंध में जिलाधिकारी से पक्ष जानने के लिए फोन किया गया तो उनका फोन ही नहीं उठा। 

आईडब्ल्यूएआई के फ्रेट विलेज योजना पर एक नजर 

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) हल्दिया-वाराणसी के बीच गंगा में जलयान मार्ग की लंबाई 1390 किलोमीटर है। शुरुआत में इस परियोजना के लिए 70 एकड़ जमीन की जरूरत बताई गई थी, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ा दिया गया है। दूसरे चरण में ताहिरपुर व मिल्कीपुर की करीब 121 बीघा भूमि का अधिग्रहण किया जाना है। आईडब्ल्यूएआई मिल्कीपुर में करीब पौने तीन हेक्टेयर यानी 6.79 एकड़ जमीन ले चुका है और बाकी भूमि उसे खरीदनी है। सिंचाई विभाग की डेढ़ एकड़ जमीन भी इस महकमे के नाम दर्ज हो चुकी है। इसी तरह ताहिरपुर में 40.77 एकड़ के मुकाबले 2.47 एकड़ खरीदी जा चुकी है। यह योजना शुरुआत से ही विवादों के घेरे में है।

( वाराणसी से पत्रकार पीके मौर्य की रिपोर्ट।)

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