Friday, August 12, 2022

जुगनू का जानाः पत्रकारिता के एक पुराने पन्ने का उड़ जाना

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हिंदी के जाने-माने पत्रकार जुगनू शारदेय का मंगलवार को दिल्ली के एक वृद्धाश्रम मेें निधन हो गया। नई पीढ़ी के पत्रकार और पाठक उन्हें शायद ही जानते होंगे। वह बिहार के थे और बहुत कम उम्र में समाजवादी आंदोलन से जुड़ गए थे। उनके पिता व्यापारी थे। उनकी माता के देहांत के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। इसलिए बचपन के उनके अनुभव सुखद नहीं थे। वह कम उम्र में ही घर से बाहर रहने लगे थे। साठ के दशक के उत्तरार्ध और सत्तर के दशक का पूर्वार्ध उत्तर भारत,खासकर बिहार की राजनीति के लिए उथल-पुथल के थे। समाजवादी आंदोलन अपने शीर्ष पर था। जुगनू समाजवादी युवजन सभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे। वह बहुत जल्द ही देश की उस समय की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में छपने लगे थे और जेपी आंदोलन को लेकर ‘दिनमान’ में छपी उनकी रिपोर्टों की खासी चर्चा रही है।

आंदोलन के महत्वपूर्ण नेता रहे रघुपति सिंह मानते हैं कि आंदोलन को जिंदा रखने में उनकी रिपोर्टों ने काफी मदद की। वह हिंदी पत्रकारिता की तीन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं  धर्मयुग, दिनमान तथा रविवार में नियमित लेखन कर रहे थे। इनके संपादक धर्गवीर भारती, गणेश मंत्री, रघुवीर सहाय और सुरेंद्र प्रताप सिंह उनके व्यक्तिगत मित्र थे। अपने लेखन के दम पर उन्होंने अपनी जगह बनाई थी और बिहार की उस समय की सारी राजनीतिक और साहित्यिक हस्तियों से उनकी घनिष्ठता थी। यहां यह याद दिलाना जरूरी होगा कि इस घनिष्ठता को लोग आज फैली चाटुकारिता न समझें। वह कभी किसी की आलोचना करने से नहीं चूके। मशहूर लेखक फणीश्वरनाथ रेणु के वह बहुत प्रिय थे। कोलकाता के समाजवादी लेखक-साहित्यकार अशोक सेकसरिया भी उन्हें चाहते थे। बहुत कम उम्र में उनके किसी लेखन की प्रशंसा में सेकसरिया ने उन्हें एक पत्र लिखा था जिसे जुगनू जी ने उम्र भर संभाल कर रखा।  

सामाजिक न्याय के दो महत्वपूर्ण नेता लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के उदय तथा सत्तासीन होने के वह महत्वपूर्ण गवाह रहे हैं। इस राजनीतिक उतार-चढ़ाव में वह एक पत्रकार ही नहीं बल्कि समाजवादी के रूप में भी भागीदार रहे हैं। लेकिन वह कभी सक्रिय राजनीति में नहीं उतरे। शायद इसके पीछे लेखक और पत्रकार के रूप में जीने का मोह था। उन्हें सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों के साथ पर्यावरण की गहरी समझ थी।

उन्होंने महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों में पत्रकारिता की। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, पटना, जबलपुर, धनबाद जैसे शहर इनमें प्रमुख हैं। वह मुंबई में फिल्मी दुनिया से भी जुड़े रहे और अपना लंबा समय वहां गुजारा। वह अभिनेता संजीव कुमार और राजबब्बर के अलावा कई महत्वपूर्ण फिल्मकारों के दोस्त रहे। उन्होंने अपने रसूख का इस्तेमाल कभी पैसा, मकान बनाने या घर बसाने के लिए नहीं किया। सलाहकार या निगम के सदस्य के पद पर वह जरूर रहे, लेकिन नौकरशाही या नेता की जी-हुजूरी उनके स्वभाव में नहीं था और अपने मुंहफट तथा कड़वी जुबान के कारण उन्हें इसे छोड़ना पड़ा। उनका जीवन कमोबेश पत्रकारीय लेखन से ही चला। उन्होंने निधन के कुछ साल पहले तक दिल्ली की पत्रिका ‘यथावत’ में काम किया।  कुछ दोस्तों ने उनके आवास तथा रहने आदि की व्यवस्था में जरूर मदद की होगी। वह यायावर और मनमौजी जीवन ही जीते रहे।  
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनकी काफी समय तक बनती रही और उन्होंने उन्हें किसी सरकारी कमिटी में भी जगह दी थी। जब बिहार में नीतीश बनाम लालू चल रहा था तो वह नीतीश के साथ खड़े रहे और बुद्धिजीवियों के बीच जगह बनाने में उनकी भरसक मदद की। वह जब गुदा कैंसर से पीड़ित हुए तो उनके इलाज में भी मुख्यमंत्री ने सहायता की। लेकिन अपनी आलोचना से नाराज होने के बाद नीतीश ने उनसे अपना नाता तोड़ लिया और उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया।

वह बार-बार बिहार खासकर पटना लौटते रहे और वहां बसने की कोशिश करते रहे, लेकिन काम के अभाव में उन्हें शहर छोड़ना पड़ता था। गुदा कैंसर के बाद तो उनका स्वास्थ्य एकदम बिगड़ गया था ओर वह स्थाई ठिकाने की तलाश में बिहार में अपने गांव भी लौटे, लेकिन सौतेले भाइयों के परिवार ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। वह कुछ दिनों में वहां से चल पड़े। उनके किसी मित्र ने पटना के एक वृद्धाश्रम में उनकी व्यवस्था की। कहते हैं कि वहां के कुप्रबंधन के खिलाफ
उन्होंने आवाज उठा दी और उन्हें वह जगह भी छोड़नी पड़़ी। वह दिल्ली आ गए और अपने एक पुराने मित्र की मदद से यहां के किसी सरकारी गांधीवादी संस्थान में कुछ समय रहे। लेकिन अधिक समय तक रूकने की व्यवस्था संभव नहीं होने के कारण उन्हें बाहर निकलना पड़ा। कुछ परिचितों के यहां कुछ दिन उन्होंने बिताए, लेकिन बिगड़े स्वास्थ्य के कारण किसी ने उन्हें अधिक समय तक आश्रय नहीं दिया।

अंत में, उनके एक युवा मित्र ने लक्ष्मीनगर के इलाके में छात्रों के बीच रखने की व्यवस्था कराई, लेकिन उनके बिगड़े स्वास्थ्य को देख कर छात्रों ने पुलिस को सूचना दे दी। उन्होंने अपनी नियति स्वीकार कर ली थी और पुलिस के साथ हो लिए। लक्ष्मीनगर पुलिस ने उन्हें दिन भर थाने में रखा और कोशिश की उनका कोई मित्र उनकी जिम्मेदारी ले ले। दिल्ली में उनके कई पुराने मित्र और परिचित रहते हैं, लेकिन पुलिस उनका एक भी खैरख्वाह नहीं ढूंढ पाई। अंत में, उन्हें लावारिस बता कर गौतमपुरी के एक प्राइवेट वृद्धाश्रम में भर्ती करा दिया।  

इस जानकारी के बाद कुछ मित्रों ने वृद्धाश्रम में उनकी बेहतर देखभाल की व्यवस्था के लिए वहां संपर्क साधा। सामाजिक कार्यकर्ता और साइकल रिक्शा वालों के बीच लंबे समय से सक्रिय रहने वाले राजेंद्र रवि लगातार उनके संपर्क में रहे। आश्रम वालों ने उन्हें अपने गढ मुक्तेश्वर वाले केंद्र में भेज दिया था। वृद्धाश्रम के कर्मचारियों और वहां रहने वालों से उनके काफी अच्छे संबंध बन गए थे। वे उन्हें जुगनू दादा कह कर बुलते थे। गढ मुक्तेश्वर में उन्हें न्यूमोनिया हो गया और उन्हें इलाज के लिए दिल्ली लाया गया। यहीं उनका निधन हो गया। लावारिस दर्ज रहने के कारण उनकी मौत की सूचना किसी को नहीं दी गई और उनका दाह संस्कार कर दिया गया। रवि जी ने जब उनके स्वास्थ्य की जानकारी लेने किसी को भेजा तभी यह जानकारी उन्हें मिली। रवि बदरपुर बार्डर के श्मशान में जाकर उनकी ठंडी चिता को श्रद्धांजलि दे आए। वह उनकेे मित्र नहीं, प्रशंसक थे और उन्हें जानते भर थे। लेकिन उनकी अहमियत जानते थे। कितना अच्छा होता कि उनके नजदीकी मित्र उनकी अहमियत समझते।

मैंने जुगनू के अकेलेपन और असहाय अवस्था में गुजर जाने की कहानी को  विस्तार से इसलिए नहीं लिखा है कि बीते जमाने के लेखक-पत्रकार का मर्सिया लिखने की औपचारिकता पूरी कर दूं। जूगनू की मौत की कहानी पत्रकारिता , समाज और राजनीति के विघटन की कहानी है। यह सत्ता के निरंकुश होते  जाने की कहानी है। समाजवादी आंदोलन की सीढ़ियां चढ़ कर सत्ता और प्रतिष्ठा  हसिल करने वाले उनके करीबी मित्र जब तक उनकी ऊर्जा में कुछ संभावना देख रहे थे, तब तक उनका नाम लेते रहते थे और उनकी अराजक जीवन शैली को झेलते थे। उनके बीमार हो जाने के बाद उन्हें संभालने में किसी को रूचि नहीं थी।

सबसे दुखद तो यह था कि जुगनू बीमार हालत में भटक रहे थे और उनका एक मित्र-वर्ग यह साबित करने में लगा था कि उनका कुछ नहीं हो सकता है। इस तर्क का क्या जवाब हो सकता है? उनकी अराजक शैली का कायल होने की जरूरत नहीं है, लेकिन यह सवाल तो उठता ही है कि क्या ऐसे लोगों की देखभाल की व्यवस्था नहीं की जाए? लेकिन उनकी अराजक जीवन शैली से उन पत्रकारों की तुलना जरूर की जानी चाहिए जो सत्ता के सामने बिछे हैं और पैसा तथा प्रतिष्ठा पाने के साथ दुराचारी भी हैं। जुगनू पर दलाली तथा सत्ता के साथ साठगांठ के जरिए पैसा या प्रतिष्ठा अर्जित करने का कोई आरोप नहीं है। सत्ता-प्रतिष्ठान का आलम यह है कि पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का ज्ञापन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भेजा गया था और कुछ साझा मित्रों के जरिए उन पर दबाव बनाने की कोशिश भी हुई तो मुख्यमंत्री टस से मस नहीं हुए। लोगों का कहना था कि मुख्यमंत्री उनसे नाराज हैं। ज्ञापन में सिर्फ उनके इलाज और आश्रय की समुचित व्यवस्था की मांग की गई थी जो सरकार का दायित्व है। दिलचस्प तो यह है कि जुगनू के कई मित्र बिहार सरकार की इस बेरूखी के लिए जुगनू को ही जिम्मदार मानते हैं। यह सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति बनी नई समझ है जिसमें अपनी बदहाली के लिए लोगों को ही जिम्मेदार माना जाता है।

इस कहानी से यह भी पता चलता है कि बिहार में महत्वपूर्ण समझे जाने के लिए उसके लेखन की नहीं, उसके जातिगत जुड़ाव महत्वपूर्ण हैं। जुगनू कुजात थे। कभी कभी व्यंग्य में ही अपनी जाति का उल्लेख करते थे।
जुगनू को नमन!
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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