Tuesday, November 29, 2022

न्याय के माध्यम के साथ उत्पीड़न का औजार भी हो सकता है कानून: चीफ जस्टिस चंद्रचूड़

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कानून और न्याय सदैव साथ नहीं चलते हैं। जो कानून न्याय का माध्यम होता है, वही उत्पीड़न का हथियार भी हो सकता है। सिर्फ जज ही नहीं, सभी नीति नियंताओं का दायित्व है कि कानून को उत्पीड़न का हथियार न बनने दें। भारत के चीफ जस्टिस (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को एक कार्यक्रम में यह बात कही। उन्होंने कहा कि नागरिक के रूप में हम सबको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून उत्पीड़न का माध्यम न बनने पाए।

सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि लंबे समय तक जो चीज न्यायिक संस्थानों को बनाए रखती है, वह करुणा की भावना, सहानुभूति की भावना और नागरिकों के रोने का जवाब देने की क्षमता है।उन्होंने कहा कि यह आश्वस्त करना हम सभी की जिम्मेदारी है कि कानून दमन का जरिया न बने, बल्कि न्याय का साधन बना रहे। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि नागरिकों को अपेक्षा रखना अच्छी बात है, लेकिन इनके बीच हमें सीमाओं के साथ संस्थानों के रूप में अदालतों की क्षमता को भी समझने की जरूरत है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह बात हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में कही।

सीजेआई ने कहा कि औपनिवेशिक काल में वही कानून जैसा कि आज कानून की किताबों में मौजूद है, दमन के एक साधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। हम नागरिकों के रूप में यह कैसे आश्वस्त करें कि कानून न्याय का साधन बने और कानून उत्पीड़न का साधन न बने?

सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि एक संस्थान के तौर पर अदालतों की सीमा एवं क्षमता को भी समझने की आवश्यकता है। जो कानून आज हमारी किताबों में हैं, औपनिवेशिक काल में इन्हीं कानूनों का प्रयोग उत्पीड़न के लिए किया जा सकता था। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि कानूनों का प्रयोग कैसे किया जा रहा है। इसमें मात्र जजों की ही नहीं, बल्कि सभी नीति नियंताओं की भूमिका है।

न्यायपालिका के दायित्व पर सीजेआई ने कहा कि कोई न्यायिक संस्थान तभी लंबे समय तक टिका रह सकता है, जब उसमें करुणा एवं सहानुभूति की भावना हो और वह लोगों के दुखों को दूर करने में सक्षम हो। उन्होंने कहा, ‘जब आपमें अनसुनी आवाज को सुनने और अनदेखे चेहरों को देखने की क्षमता होती है, तब कानून एवं न्याय के बीच संतुलन बनाकर आप एक न्यायाधीश के तौर पर अपने मिशन को पूरा कर सकते हैं।’

सीजेआई ने इंटरनेट मीडिया के कारण आ रही चुनौतियों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में अदालत में जज द्वारा कहे गए हर शब्द की रियल टाइम रिपोर्टिंग होती है। आपके वकील दोस्त बता सकते हैं कि बहस के दौरान कही गई हर बात जज का विचार या निष्कर्ष नहीं है। वकीलों और जजों के बीच संवाद होता है, जिससे सच सामने आ सके। उन्होंने कहा कि अब हम इंटरनेट मीडिया के दौर में हैं, जो आगे भी बना रहेगा। मेरा मानना है कि हमें इस दौर की चुनौतियों को देखते हुए अपनी भूमिका को लेकर नए तरीके से सोचना होगा।

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने न्यायिक पेशे के पूरे ढांचे पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भारत में न्यायिक पेशे का ढांचा आज भी सामंती, पुरुषप्रधान और महिलाओं को साथ लेकर चलने वाला नहीं है। इसलिए जब हम न्यायपालिका में ज्यादा महिलाओं को लाने की बात करते हैं, तो हमें आज से ही आधार बनाना होगा, जिससे महिलाओं के लिए रास्ता बने। पहला कदम है कि उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चैंबर में जगह मिले, जो बस पुरुष अधिवक्ताओं का क्लब बना हुआ है। सीजेआई ने कहा कि जब तक प्रवेश के रास्ते पर ही लोकतांत्रिक एवं मेरिट आधारित व्यवस्था नहीं होगी, हम महिलाओं एवं हाशिए पर जी रहे अन्य वर्गों को न्यायिक पेशे में आगे नहीं ला पाएंगे।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक बेहतर न्यायाधीश को परिभाषित करते हुए कहा कि जब आपके पास अपने सिस्टम में अनसुनी आवाजों को सुनने की क्षमता है, सिस्टम में अनदेखे चेहरे को देखने की कुवत है और फिर देखें कि कानून और इंसाफ के बीच संतुलन कहां है, तो आप वास्तव में एक न्यायाधीश के रूप में अपना मिशन पूरा कर सकते हैं।

भारत में न्यायाधीशों के अत्यधिक केसलोड पर बोलते हुए, सीजेआई ने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम की शीर्ष अदालतों की तुलना में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश एक सप्ताह में अधिक मामलों की सुनवाई करते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के सबसे निचले पायदान पर अनिर्णय की संस्कृति के कारण सरकार अदालत में सबसे बड़ी वादी है।

सीजेआई ने कानूनी कार्यवाही में प्रौद्योगिकी के उपयोग पर जोर देते हुए कहा, “सूर्य का प्रकाश सबसे अच्छा कीटाणुनाशक है। संवैधानिक लोकतंत्र में संस्थानों के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक अपारदर्शी होने का खतरा है। जब आप अपनी प्रक्रिया को खोलते हैं, तो आप एक डिग्री उत्पन्न करते हैं। जवाबदेही, पारदर्शिता और नागरिकों की जरूरतों के प्रति जवाबदेही की भावना।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि नागरिकों से उम्मीदें रखना बहुत अच्छी बात है लेकिन हमें संस्थानों के रूप में अदालतों की सीमाओं और क्षमता को समझने की जरूरत है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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