Tuesday, January 31, 2023

दो दिवसीय सम्मेलन में राजकीय दमन व मानवाधिकार हनन पर पीयूसीएल ने जताई चिंता

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झारखंड ही नहीं देश भर में मानवाधिकार हनन व नागरिक स्वतंत्रता पर हमला तेज होता जा रहा है। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर व जंगल की बहुलता के लिए जाना जाने वाला झारखंड आज प्राकृतिक संसाधनों की लूट से जलवायु परिवर्तन का कोपभाजन बना हुआ है। जल, जंगल व जमीन की लूट में काफी तेजी आई है।

विस्थापन, भूख से मौतें, पलायन, भूमि अधिग्रहण, जेल की दयनीय स्थिति, कैदियों की दुर्दशा, झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल में डालना, हाजत में मौत, मुठभेड़ के नाम पर हत्या, मॉब लिंचिंग, महिलाओं की असुरक्षा व इज्ज़त से खिलवाड़, लैंगिक हिंसा जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

राजकीय दमन व मानवाधिकार हनन से पूरा राज्य त्रस्त है। राज्य में क्षमता से अधिक कैदी भेड़-बकरी की तरह ठूंस कर जेल में रखे गए हैं। राज्य में 31 जेलें हैं, जिनकी क्षमता 17,421 है। जबकि 20,000 हजार से अधिक कैदी इनमें बंद हैं। कुल कैदियों में विचाराधीन कैदियों की संख्या 14,445 है। विचाराधीन कैदियों में समाज के हाशिए पर पड़े दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक व कमजोर तबके के लोग तो हैं ही साथ ही राज्य में इनके पक्ष में खड़े होने वाले पत्रकारों, समाजिक कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया जा रहा है। इनमें से बहुत तो अपराध के लिए निर्धारित सज़ा से अधिक या आधी से अधिक जेल में बिता चुके हैं।

न्यायालय के आदेश के बाद भी इनका क़ैद में रहना कई सवालों के बीच कैद है। हाजत में हो रही मौतें सदमे में डालती हैं। 2021-22 में 81 मौतें राज्य में हुई हैं। हाजत में हुई मौत के आंकड़े राज्य सरकार के अनुसार 166 हैं।  मुठभेड़ों की संख्या इस अवधि में 9 है। भूख से मौत की संख्या व भीड़ द्वारा की गई हत्या दर्जनों से अधिक हैं। दमनकारी कानूनों का दुरूपयोग धड़ल्ले से जारी है।

अब तो मानवाधिकार हनन पर सवाल उठाने वाले, सरकारी नीतियों से असहमति रखने वाले हर एक सत्ता के आंखों के किरकिरी बन चुके हैं। देश के दर्जनों लोग जेल में बंद हैं। पीयूसीएल की राष्ट्रीय सचिव सुधा भारद्वाज हों या गौतम नवलखा, अनिल तेलतुंबडे व वरवर राव जैसे कवि-लेखक इसके उदाहरण हैं। झारखंड पीयूसीएल के वरिष्ठ सदस्य स्टेन स्वामी की सांस्थानिक हत्या कर दी गई।

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झारखंड में संवैधानिक संस्थानों की हालत गंभीर ही नहीं बेहद दयनीय भी है। राज्य मानवाधिकार आयोग, राज्य महिला आयोग, सूचना आयोग, बाल अधिकार संरक्षण आयोग, अनुसूचित जनजाति व जाति आयोग जैसे संस्थान मृत प्राय हैं।

इन तमाम सवालों को लेकर पीयूसीएल, झारखंड द्वारा राज्य के मेदिनीनगर, पलामू, शांतिपुरी स्थित नागलोक भवन में 17 व 18 दिसम्बर को दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया।

इस दो दिवसीय सम्मेलन के प्रथम दिन के उद्घाटन सत्र में संविधान: व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हो रहे हमलों पर सभी वक्ताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की व नागरिक समाज से एक जुट होकर मुखर होने का आह्वान किया।

सम्मेलन में अतिथि वक्ता सेवा निवृत्त न्यायाधीश बीबी सिंह ने सत्ता व सरकार के साथ ही न्यायालयों द्वारा मानवाधिकारों के सवाल पर अनदेखी को गंभीर बताया। उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संविधान का मूल आधार बताते हुए संवैधानिक संस्थानों को सजग और जिम्मेवार बनाने पर जोर दिया। इसके लिए उन्होंने समाज में मानवाधिकार व नागरिक स्वतन्त्रता पर सजगता लाने की जरूरत बताई।

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टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के प्रोफेसर पुष्पेन्द्र ने 20 वीं सदी को मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्ध बताते हुए आज़ादी के 50 वर्ष तक के समय को अनुकूल बताया। उन्होंने अपने संबोधन में इस काल में भारत में बने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए गठित की गई आयोगों की चर्चा की और कहा कि लेकिन इसके बाद के काल में सत्ता द्वारा व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर संकट बढ़ने लगे। कई कानून बना कर और कानूनों का उल्लंघन कर मानवाधिकार का हनन किया गया। सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर मानवाधिकार का हनन जारी है। हर व्यक्ति को इसके प्रति संवेदनशील बना कर ही इसकी रक्षा व बढ़ावा संभव है।

पीयूसीएल, झारखंड के महासचिव अरविन्द अविनाश ने विषय प्रवेश कराते वक्त भयावह दौर में सम्मेलन आयोजित होने की बात कहते हुए कानून के शासन के समाप्त होने की बात कही। राज्य भर में भूख से मौत, हिरासत में मौत, मुठभेड़ के नाम पर हत्या, पुलिस द्वारा झूठे मुकदमे में फंसाना व जेल में बंद कैदियों के मानवाधिकार के सवाल की ओर ध्यान आकृष्ट कराया। समाज के दबंग लोगों द्वारा मानवाधिकारों के हनन पर भी सचेत होने की बात कही और लोगों से समाज में मानवाधिकार के प्रति उदासीनता को दूर करने में मदद की गुहार लगाई।

इप्टा के राष्ट्रीय सचिव शैलेन्द्र ने संविधान के इतिहास इसके उद्देश्यों एवं हालात पर चिंता जाहिर करते हुए सभी से मुखर होने की बात कही। किसान सभा के केडी सिंह, जन संग्राम मोर्चा के युगल पाल, पंकज श्रीवास्तव ने भी मानवाधिकार हनन पर साथ खड़े होने की जरूरत बताई।

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18 दिसम्बर को दूसरे सत्र की शुरुआत मुद्दों पर चर्चा के साथ हुई। इस सत्र के मॉडरेटर के रूप में बिहार पीयूसीएल के उपाध्यक्ष अवधेश जी चौधरी व डेविड सोलोमन जी रहे।

दूसरे सत्र के दौरान भूख से मौत व पांचवी अनुसूची पेसा पर सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज ने झारखंड में भूख से हो रही मौतों पर गहरी चिंता जताई और बताया कि सरकार के नकारने के बाद भी 2017 से लेकर 2021 तक में झारखंड में 25 लोगों की मौत भूख से हुई है।

उन्होंने कहा कि वैश्विक भूख सूचकांक 2022 में भारत अपने पड़ोसी देशों यथा बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका से भी नीचे चला गया है। दुनिया के 121 देशों में भारत 107 पायदान पर खिसक गया है। भारत सरकार इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने पर काफी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहा लेकिन देश के अंदर भुखमरी की स्थिति से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 जो 2019-21 में संपन्न हुए हैं। आंकड़े आईने की तरह देश में गंभीर भुखमरी की परिस्थिति को दर्शा रही है। देश भर में 15 से 49 वर्ष की 59.1 फीसदी महिलाएं एनीमिक हैं और 67.1 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। आदिवासी बहुल राज्य झारखण्ड में भी 67.5 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं और 65.7 फीसदी महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं। इसके अतिरिक्त अन्य दूसरे अध्ययन भी हैं जो हमारी अदृश्य भूख को दर्शाता है, जैसे देश में 37 फीसद लोगों में फोलिक एसिड की कमी है। 

53% लोग विटामिन बी-12 की कमी से जूझ रहे हैं, 19 प्रतिशत भारतीय विटामिन ए एवं 61% आबादी विटामिन की कमी में जीवनयापन कर रहे हैं। ये सभी कारण परिवारों को पर्याप्त और पौष्टिक आहार मुहैया नहीं होने की वजह से है। इसका दुष्प्रभाव सीधे-सीधे इन्सान की कार्यक्षमता पर पड़ता है। खाद्यान्न न मिलने के अधिकांश कारण मानवकृत हैं, उदाहरण के लिए राशन कार्ड, पेंशन योजना, मनरेगा इत्यादि में आधार नम्बर नहीं होने से उनको इन बुनियादी योजनाओं से वंचित करना है। आंगनबाड़ी केन्द्रों में वर्ष 2021 में और आज भी 6-6 महीने तक बच्चों को पोषाहार नहीं दिया जा रहा है। मनरेगा जैसी योजनाओं को सरकार ने इतना तकनीक आधारित कर दिया है कि आम अकुशल मजदूर काम करके भी मजदूरी नहीं ले पाते हैं। ऐसे आंकड़ों से देश अंदर ही अंदर कमजोर हो रहा है, जिसका समय रहते बुनियादी मुद्दों पर केन्द्रित नीतियों में बदलाव और उनका बेहतरीन अमल आवश्यक है, अन्यथा आज नहीं कल देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

उन्होंने पांचवीं अनुसूची की अनदेखी से आदिवासी समुदाय के हितों की अनदेखी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पेसा कानून के पक्ष में आम लोगों से साथ खड़ा होने की जरूरत पर जोर दिया।

मुठभेड़ के नाम पर हत्या और हाजत में मौत व पुलिस टॉर्चर के साथ ही पुलिसिया दमन पर अधिवक्ता संजय अकेला ने मानवाधिकार हनन पर सजग होकर आवाज उठाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हालांकि झारखंड में 2020-21 में मुठभेड़ के नाम पर हुई हत्या 9 की संख्या ही सामने आई है। लेकिन इसके नाम पर हत्या की संख्या इससे ज्यादा है। हाजत में अभी तक 166 लोगों की मौत की बात सामने आई है। पुलिस टॉर्चर पर अपनी बात रखते हुए अकेला ने कहा कि झारखंड भर से पुलिस द्वारा दी जा रही है यातनाएं काफी क्रूर है।

प्राकृतिक संसाधनों के लूट और मानव तस्करी व विस्थापन विकास के सवाल पर अपनी बात रखते हुए बीबी चौधरी ने कहा कि झारखंड बनने के बाद विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों की लूट बढ़ गई है। आम अवाम परेशान है।

वहीं संवैधानिक संस्थानों के चेक एंड बैलेंस की नीति की असफलता पर चिंता जताते हुए अधिवक्ता जयंत पांडे ने कहा कि संवैधानिक संस्थानों का खत्म होना लोकतंत्र के कमजोर होने की निशानी है। ऐसे में जरूरत है संवैधानिक संस्थाओं की हिफ़ाजत के लिए एकजुट होना।

वनाधिकार एवं पर्यावरण सुरक्षा विषय पर अपनी बात रखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता मिथिलेश ने सभी को एकजुट होकर आवाज बुलंद करने की जरूरत बताया।

जनहित में बने कानूनों की अनदेखी व कानूनों के उल्लंघन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अधिवक्ता शैलेश पोद्दार ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कानूनों का उल्लंघन होना संविधान का उल्लंघन है।

तीसरे सत्र में बिहार से आए पीयूसीएल के उपाध्यक्ष अवधेश व टीएस के प्रोफेसर पुष्पेंद्र ने झारखंड के नवनिर्वाचित कार्यकारिणी समिति को शपथ दिलाया। वहीं अरविंद अविनाश ने राज्य का प्रतिवेदन रखा जिसे चर्चा के बाद पारित किया गया। इसमें विभिन्न मुद्दों पर किए गए कार्यों व मुद्दों की चर्चा की गई। चर्चा के दौरान जिन मुद्दों पर विमर्श किया गया उन मुद्दों में प्रमुख रहे झारखंड में भूख से होने वाली मौत, मुठभेड़ के नाम पर होने वाली हत्या, पुलिसिया दमन, मानव तस्करी, मॉब लिंचिंग, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, संवैधानिक संस्थानों का अप्रासंगिक होते जाना, विचाराधीन कैदियों की दुर्दशा, दमनकारी कानूनों का दुरुपयोग, जनहित में बने कानूनों की अनदेखी, वनाधिकार कानून, पांचवीं अनुसूची और पैसा जैसे मुद्दे शामिल थे। विस्तृत चर्चा के बाद सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए गए और भविष्य के कार्यक्रम और रणनीति निर्धारित किया गया।

चर्चा के बाद पीयूसीएल झारखंड ने दो वर्षों के लिए संगठन की प्राथमिकताएं व कार्ययोजना को निर्धारित किया। जिसमें कहा गया कि पूरे झारखंड में पहाड़ों, जंगलों, नदियों से बालू के दोहन के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों की लूट से हो रही ecological destruction के कारण जलवायु परिवर्तन के  नकारात्मक प्रभाव पूरे झारखंड में दिख रहे हैं। पत्थर की खदानें और अन्य अवैध खदानें पर्यावरण के अनकहे विनाश का कारण बन रही हैं। उन क्षेत्रों में सदियों से रह रहे समुदायों को विस्थापन के लिए मजबूर कर रहे हैं, जो अपनी आजीविका के लिए यहां के जंगल, ज़मीन पर निर्भर हैं।

इस समस्या के बाबत प्रत्येक इकाई से निम्नलिखित विंदुओं पर खदानों का अध्ययन करने का अनुरोध किया गया –

1. मौजूद खदानों और खानों की संख्या को सूचीबद्ध करना। क्या चल रहे खदानों में कंपनियों द्वारा प्राप्त लीज में लीज के लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करती हैं? खदानों के स्थान, मुआवजे, पारिस्थितिक प्रावधानों का अनुपालन कम्पनियां या लीज धारक कर रहे हैं?

क्या संचालित खदानें आवासों, विद्यालयों, पूजा स्थलों, जलाशयों से निर्धारित दूरी पर संचालित हैं? आस-पास के लोगों के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर क्या प्रभाव है?

उपरोक्त बिंदुओं पर सर्वे कर जानकारी संकलित करना। प्राप्त जानकारी के बाद कमियों व प्रभावों के निराकरण के लिए कदम उठाना। जरूरत के अनुसार कानून का सहारा लेना।

2. झारखंड में हिरासत में होने वाली मौतों की संख्या में 40% की वृद्धि हुई है। पुलिस हिरासत में प्रताड़ना की भी लगातार खबरें आती रही हैं। पीयूसीएल की इकाइयां हिरासत में हुई मौतों के मामले में स्वत: संज्ञान लेती हैं। हालांकि, हमारी जांच अक्सर अधूरी रहती है या वांछित परिणाम नहीं दे पाती हैं। हाजत में मौत के प्रावधानों के अनुसार न्यायिक जांच के लिए आवश्यक कदम उठाना। इस हेतु अपनी इकाइयों के लिए आवश्यक कार्यप्रणाली व ज़रूरी जानकारी उपलब्ध कराना ताकि इस कार्य को सहूलियत पूर्वक सम्पन्न कराया जा सके।

3. राज्य पीयूसीएल ने उन विचाराधीन कैदियों की मदद करने का फैसला किया था, जो जेलों के अंदर कानूनी सहायता के अभाव में लंबे समय से बंद हैं। न तो उनके परिवार और न ही किसी संगठन ने अब तक मदद की है, ऐसे कैदियों की एक बड़ी संख्या है। विचाराधीन कैदियों की संख्या कुल कैदियों की 70 प्रतिशत है। इस संदर्भ में रांची में राज्य पीयूसीएल ने झालसा के अध्यक्ष/सचिव, आईजी जेल और मुख्य सचिव को पत्र लिखकर पीयूसीएल और उसके सहयोगियों को नियमों का पालन करते हुए जेल में प्रवेश करने की अनुमति देने की मांग की है, ताकि ऐसे विचाराधीन कैदियों को चिन्हित कर उनकी मदद की जा सके। अभी तक इन एजेंसियों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, इसलिए सभी इकाइयां संबंधित जेल अधीक्षकों और जिले के अन्य अधिकारियों को विचाराधीन कैदियों से मिलने और कैदियों को मदद देने के लिए कदम उठायेंगी।

4. सभी इकाइयां मानवाधिकार व नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता जागृत करने हेतु सम्पर्क अभियान, कार्यक्रम आयोजित करेंगी। इसके लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों व अन्य स्थानों पर कार्यशाला आयोजित करेंगी।

प्रस्ताव जो पारित किए गए।

  1. झारखंड पीयूसीएल मांग करती है कि पुलिस प्रशासन झारखंड में हिरासत में होने वाली मौतों को पूरी तरह खत्म करने के लिए गंभीर कदम उठाए। पीयूसीएल कार्यकर्ताओं या पुलिस की बर्बरता के पीड़ितों द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से होने वाले आंदोलनों को विफल करने के प्रतिशोध पूर्ण उद्देश्य के लिए सीआरपीसी 353 के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हैं, यह कानूनों का दुरुपयोग है। पुलिस अक्सर झूठे मामलों में दमन करती है या असहमति को दबाने के लिए झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल में डाल देती है। सरकार से हम मांग करते हैं कि इस मामले पर ठोस कार्रवाई हो। ऐसे कई मामले आते हैं जिसमें कि सालों तक जेल में रहने के बाद वे निर्दोष घोषित होते हैं लेकिन फंसाकर जेल में डालने वाले पर कोई कार्रवाई नहीं होती।

2. दंडाधिकारियों द्वारा सीआरपीसी की धारा 167 के यांत्रिक ढंग से उपयोग की पीयूसीएल निंदा करता है। स्वविवेक का उचित इस्तेमाल किए बिना और नियमानुसार 24 घंटों में पुलिस द्वारा किए गए अनुसंधान के अवलोकन किए बिना शत-प्रतिशत मामलों में आरोपियों को जेल भेज देना क़ानून का दुरुपयोग और मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है। झारखंड पीयूसीएल सभी मजिस्ट्रेटों से अपील करता है कि आरोपियों को न्यायिक या पुलिस हिरासत में भेजने से पहले अच्छी तरह से विचार कर, कानूनी प्रावधानों को पूरा कराना सुनिश्चित करें।

3. झारखंड पीयूसीएल विशेष रूप से राज्य सरकार और न्यायिक प्रणाली से उन कैदियों की रिहाई में तेजी लाने की अपील करता है, जिन्होंने अपनी सजा की आधी या पूरी अवधि जेल में काट ली है। यह पुरजोर मांग करता है कि विचाराधीन कैदियों के मामलों, विशेष रूप से जिनके पास अदालती आवश्यकताओं के संबंध में अपने मामलों की पैरवी करने के लिए सक्षम रिश्तेदार नहीं हैं, के मामलों में तेजी लाई जाए।

4. झारखंड पीयूसीएल जंगलों में रहने वाले कमजोर आदिवासी समुदाय, जो सदियों से खेती कर रहे हैं, वनाधिकार कानून के आलोक में जमीन के पट्टे के लिए दिए आवेदनों पर सुनवाई का इंतज़ार कर रहे हैं, वन विभाग व पुलिस की बढ़ती बर्बरता पर नाराजगी व्यक्त करता है। वन विभाग विशेष रूप से पीवीटीजी के अन्तर्गत आने वाले कोरवा, परहिया जैसे आदिम जनजातीय समुदाय का दमन कर रहे हैं, जो पिछले दिनों गढ़वा के रंका प्रखंड अंतर्गत तहत लुकुमबार में हुआ था। वनाधिकार कानून के कार्यान्वयन के क्रम में लम्बित मामलों को पूरा हुए बिना वनाश्रितों पर दमनात्मक कार्रवाई बंद हो।

इस क्रम में अतिक्रमण के नाम पर झूठे मामले दर्ज कर, परिवार के पालन-पोषण करने वालों को कैद करती है, खेती बर्बाद करती है और दुर्व्यवहार करती है।

वन विभाग वनाश्रितों के घरों के चारों ओर खाइयां खोदता है ताकि उनकी आजीविका के विकल्पों को नष्ट किया जा सके और उन्हें तोड़ा जा सके।

पुलिस संरक्षण के तहत, वन विभाग एफआरए के तहत पट्टा के आवेदकों द्वारा खेती की जाने वाली भूमि में जबर्दस्ती पेड़ लगाते हैं।

डीएफओ द्वारा एफआरए अधिनियमों का घोर उल्लंघन किया जाता है। वे लोगों को उनकी आजीविका से वंचित करते हैं। ऐसी घटनाएं पूरे राज्य में हो रही हैं।

मानवाधिकार आयोग भी पीड़ितों से जवाब नहीं मांगता बल्कि डीएफओ की रिपोर्ट पर ही भरोसा करता है, जिनके खिलाफ वास्तव में शिकायतें हैं।

वन विभाग को एफआरए के लिखित नियमों और निहित भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और जंगल को समुदाय की संपत्ति मानते हुए वन में रहने वाले पीवीटीजी और अन्य लोगों को एफआरए के तहत उनका पट्टा प्राप्त करने में मदद करनी चाहिए। अतः हम सरकार से मांग करते हैं कि वनाधिकार का भावना अनुसार कार्यान्वयन सुनिश्चित हो।

5. झारखंड पीयूसीएल यूएपीए और अन्य काले कानूनों का शिक्षकों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और प्रबुद्ध नागरिकों के खिलाफ बेतहाशा दुरुपयोग की कड़ी निंदा करता है। वह इन क़ानूनों को निरस्त करने की माँग करता है, साथ ही इन क़ानूनों के तहत सालों से बिना सुनवाई के क़ैद सामाजिक कार्यकर्ताओं के अविलंब रिहाई की माँग करता है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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