Tuesday, November 29, 2022

सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की पदयात्रा

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जनसरोकार से जुड़े मुद्दों के लिए झंडा या बैनर उठाना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए हिम्मत व समझदारी की जरूरत पड़ती है। बनारस में कबीर की जन्मस्थली लहरतारा से बुद्ध की उपदेश स्थली सारनाथ तक आयोजित 125 किलोमीटर की यात्रा में एक दिन मैं भी शामिल हुआ था।

28 अक्टूबर को लहरतारा से शुरू हुई पदयात्रा 30 को दोपहर में सेवापुरी ब्लाक के राने- खदरामपुर गांव में पहुंची थी। पदयात्रा का तीसरा दिन था। लगभग 45 किमी की दूरी तय करके पदयात्री यहां पहुंचे थे। ग्रामीण उन्हें देसी गुड़ के साथ पानी पिलाने में जुटे थे। घर का बना गुड़, जिसे शहरी कभी-कभी अपनी मिठाई का स्वाद बदलने के लिए खाते हैं।

राने एक छोटा गांव है। आबादी कम है लेकिन पदयात्रियों का स्वागत करने में महिलाएं सबसे आगे थीं। पदयात्री थके थे, पेड़ की छाया में वह विश्राम कर रहे थे। रविवार को दोपहर जब मैं इस गांव में पहुंचा तो संवाद का कार्यक्रम चल रहा था। वक्ता यह बता रहे थे कि इस यात्रा का क्या उद्देश्य है। गांव में व्याप्त जातिवाद, धार्मिक कट्टरता, छुआछूत आदि कुरीतियों से बचकर रहने की सलाह दे रहे थे।

पदयात्री गांव में पहुंचते ही सबसे पहले अपनी यात्रा के उद्देश्य के बारे में बातचीत करते हैं। छोटे नाटकों के माध्यम से उन्हें अपनी बातें समझाते हैं। प्रेरणा कला मंच के युवक लगातार अपने नाटकों का उनके बीच मंचन करते हैं जो ग्रामीणों के लिए आकर्षण का केंद्र है। सोशल मीडिया पर भी वे सक्रिय हैं। खबरों के लिए सिर्फ अखबारों के ही मोहताज नहीं हैं। अपनी बात फेसबुक या वीडियो के माध्यम से लगातार रखते हैं। खबरों को दबाना अब मुख्यधारा के मीडिया के लिए मुश्किल हो गया है। पदयात्रा करना अपने में संवाद का एक माध्यम है।

राने गांव में संवाद के दौरान पत्रकार अपर्णा ने महिलाओं को खुद आगे आकर अपनी बात रखने का सुझाव दिया। आयोजकों से भी उन्होंने अपील की कि महिलाओं को मंच साझा करने के लिए प्रोत्साहित करें। इस यात्रा का आयोजन ‘साझा संस्कृति मंच’ ने किया है। पदयात्री गांव में रुकते हैं जो भी ग्रामीणों के पास है, उससे वह उनका स्वागत करते हैं। गांव में अतिथि का स्वागत करना हमारी पुरानी परम्परा है। कुछ पदयात्रियों के पैर में छाले पड़ गए हैं।

घर का चावल-आटा और खेत की सब्जी का स्वाद ही कुछ अलग होता है। राने गांव के लोग सब्जी की खूब खेती करते हैं। पदयात्रियों के दोपहर के भोजन की व्यवस्था राने गांव में ही की गई थी। चावल, दाल, सब्जी व सलाद।।! खाना अच्छा बना था। सबने इसकी तारीफ की। सामूहिक भोजन बनने पर उसका स्वाद ही कुछ अलग हो जाता है। लंगर।।! यानी सामूहिक भोज की गांवों में प्राचीन परम्परा है। बिरादरी को भात खिलाने के अपने निहितार्थ हैं।

भोजन के बाद यहां कुछ देर पदयात्री विश्राम किए, उसके बाद करधना गांव के लिए रवाना हुए जो यहां से लगभग सात किलोमीटर दूर है। वहीं तीसरे दिन उनके रात्रि विश्राम व खाने की व्यवस्था की गई थी। करधना गांव में पदयात्रा के पहुंचने से कुछ पहले ही मैं वहां पहुंच गया था। यहां प्रेरणा कला मंच के कलाकार अपने नाटक की तैयारी कर रहे थे। वहां एक चारपाई पर मैं बैठा था, तभी एक वृद्ध सज्जन जिनकी उम्र लगभग 80 साल थी, आकर मेरे पास बैठ गए।

बातचीत की शुरुआत उन्होंने ही की। कहा- आप अकेले बैठे थे, इसलिए आ गया। फिर पूछे कहां के रहने वाले हैं ? मैंने कहा- बनारस शहर से आया हूं। वहां कहां रहते हैं ? बताया कि भोजूबीर में। वह सब कुछ मेरे बारे में जान लेना चाहते थे। शाम हो रही थी और सूरज की रोशनी मद्धिम हो रही थी। ग्रामीणों की आदत होती है, वह बहुत सलीके से आपके बारे में जानना चाहते हैं।

फिर उन्होंने खुद ही कहा कि आपकी बिरादरी के लोग भी यहां काफी रहते हैं। यह बात उन्होंने दो-तीन बार कही। बिरादरी।।! मैं नहीं समझ पाया कि बिरादरी से उनका क्या मतलब था ? फिर कुछ अपने बारे में बताने लगे। मैं उनकी बातें ध्यान से सुन रहा था। कहा- मुझे चार माह पहले हवा (लकवा) मार दिया था, जिससे मुंह टेढ़ा हो गया। फिर उस घटना के बारे में विस्तार से बताने लगे। सुबह का समय था, “मैदान” से आया था। बरामदे में बैठकर दातुन कर रहा था। तभी लड़के आकर कहे कि बाबा आपका मुंह टेढ़ा क्यों हो गया है ? कहे कि मेरा मुंह टेढ़ा हो गया था और कब हुआ मुझे पता ही नहीं चला। यहां यह जानना जरूरी है कि मैदान मतलब लैटरिन जाना होता है। गंवई भाषा में कहें तो झाड़ा फिरना और उसी दौरान उन्हें हवा लग गई, मुंह टेढ़ा हो गया।

padyatra

उन्होंने कहा कि डॉक्टर को लड़कों ने दिखाया। इलाज हुआ और अब ठीक हैं। हालांकि उनका मुंह टेढ़ा ही था। चलने में उन्हें तकलीफ थी। डंडा के सहारे चल रहे थे। 2-3 बूढ़ों को यहां मैंने देखा सब लंगड़ा रहे थे। मेरे साथ आठ-दस लोग थे। जिस घर के सामने नाटक के लिए मंच सजाया जा रहा था, वहां किसी ने भी पानी पीने के लिए नहीं पूछा। यह मुझे अजीब लगा। गांवों में अक्सर ऐसा नहीं होता है। किसी के भी दरवाजे पर कोई अजनबी पहुंच जाए तो लोग उसे पानी पिलाते हैं।

अब मुझे समझ में आया कि वह “बिरादरी” की चर्चा क्यों कर रहे थे ? मेरी दाढ़ी बढ़ी थी। इससे मेरे बारे में उन्हें गलतफहमी हो गई थी। कुछ लोग कपड़े से भी लोगों की जाति व धर्म की पहचान कर लेते हैं। जबकि ऐसा अंदाजा लगाना हमेशा सच नहीं होता। दरअसल सेवापुरी ब्लाक का करधना गांव पिछले दिनों दो समुदायों के बीच विवाद के कारण चर्चा में आया था। यह गांव अपना चरित्र बदल रहा है। कस्बा की तरह हो गया है। सड़क के किनारे अच्छा-खासा बाजार विकसित हो रहा है। जब गांव बाजार बनेगा तो उसका चरित्र बदलना स्वाभाविक है।

अंधेरा गहराने लगा था और पदयात्री भी राने गांव से सात किलोमीटर की दूरी तय करके करधना में पहुंच गए थे। जब यात्री पहुंचे, उसी समय बिजली नहीं थी। चारों तरफ अंधेरा था। पदयात्रियों का जुलूस नारे लगाते हुए उस स्थान पर पहुंचा जहां नाटक के मंचन के लिए मंच बनाया गया था। प्रेरणा कला मंच के फादर आनंद ने नाटक शुरू होने से पहले साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के महत्व पर प्रकाश डाला। प्रेमचंद की हिंदू-मुस्लिम कहानी पर आधारित नाटक के बारे में भी उन्होंने बताया।

जिस समय फादर आनंद अपनी बात कह रहे थे, तभी बिजली चली गई। अंधेरा! फिर आ गई। पांच मिनट बाद पुन: बिजली गई और आई। फादर बोलना शुरू किए और फिर बिजली चली गई। दो मिनट बाद पुन: आ गई। नाटक शुरू हुआ। कलाकार मंच पर थे। दर्शकों में सबसे अधिक महिलाएं और बच्चे थे। पुरूष पीछे नीम के पेड़ के नीचे खड़े थे। नाटक शुरू होते ही बिजली चली गई। बच्चे शोर करने लगे। 4-5 बार बिजली आई और गई। आयोजकों का पसीना छूटने लगा। फिर बिजली आई और नाटक शुरू हुआ।

प्रेरणा कला मंच द्वारा प्रस्तुत “अमानत” नाटक का निर्देशन मुकेश झंझरवाला ने किया था। चौधरी की मुख्य भूमिका में उनका अभिनय बेजोड़ रहा। सभी कलाकारों का अभिनय प्रभावशाली और दर्शकों को अंत तक बांधे रहा। सबसे अधिक बच्चे खुश थे। नाटकों के माध्यम से अपनी बात दर्शकों तक ले जाना आज भी एक सशक्त माध्यम है। दर्शकों से संवाद करने का इससे बेहतरीन कोई और ज़रिया नहीं है। गांव बदल रहा है। लोगों की सोच बदल रही है। बाजारीकरण की संस्कृति अब गांव की चौखट पर भी दस्तक देने लगी है। इससे कैसे बचा जाए, यह विमर्श का बड़ा मुद्दा है। गांव बचेगा तभी हमारी संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी।

(सुरेश प्रताप वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल वाराणसी में रहते हैं।)

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