Monday, August 8, 2022

सच बोलने के गुनहगार संजीव भट!

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गोधरा कांड के तुरंत बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मुख्यमंत्री आवास पर गुजरात के उच्च पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की एक महत्वपूर्ण मीटिंग की थी। उस मीटिंग में उन्होंने कहा था कि ‘आप लोग हिन्दुओं को मुसलमानों के खिलाफ अपना गुस्सा निकालने दें, हिन्दू प्रतिक्रिया में आड़े न आएं, अब मुसलमानों को सबक सिखाने की जरूरत है, दंगों के दौरान आप लोग कृपा करके ‘निष्क्रिय’ रहें’।

गुजरात के ही बीजेपी के एक नेता और उत्तर प्रदेश के पिछले दिनों बीजेपी प्रभारी रहे गोर्धन झड़पिया ने गुजरात के एक युवा नेता व वहां के गृहमंत्री रहे हरेन पंड्या हत्याकांड के बाद कहा था कि ‘मोदी न तो कभी भूलते हैं और न ही किसी को माफ करते हैं, एक नेता के लिए इतने समय तक बदला लेने में लगे रहना अच्छी बात नहीं होती, मैं यह नहीं कह रहा कि मोदी ने हरेन पंड्या की हत्या करवाई है, लेकिन यह भी सच है कि बीजेपी के भीतर अगर कोई मोदी के खिलाफ मुंह खोलता है तो वह निश्चित रूप से या तो राजनैतिक रूप से या शारीरिक रूप से खत्म कर दिया जाता है।’ संदिग्ध परिस्थितियों में कुछ अज्ञात बदमाशों द्वारा मारे गए गुजरात के इस उभरते नेता हरेन पंड्या ने भी गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करने की हिमाकत कर दी थी। वास्तव में मोदी जी हरेन पंड्या के एलिस ब्रिज चुनाव क्षेत्र से खुद चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन हरेन पंड्या ने यह कहकर मोदी से अदावत पाल लिया कि ‘मुझे बीजेपी के किसी युवा नेता के लिए यह सीट खाली करने को कहा जाए तो मैं कर दूँगा, लेकिन इस आदमी के लिए नहीं करूंगा।’ हरेन पंड्या यहीं नहीं रुके जब मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व बीजेपी के अन्य संगठनों के संभावित फोन कॉल्स से बचने के लिए एक अस्पताल में जाकर भर्ती हो गये, तब वहां जाकर भी मोदी को धमकी दे आए। और यही उनकी  हत्या का कारण भी बना। हरेन पंड्या के पिता ने तो खुलकर कहा था कि मेरे पुत्र की हत्या  नरेन्द्र मोदी ने ही करवायी है।

हरेन पंड्या की तरह गुजरात कैडर के सन् 1988 बैच के आईपीएस अधिकारी संजीव भट भी साफ और सच बोलने की अपनी आदतों के कारण सन् 2002 में गुजरात दंगों के दौरान मोदी की असलियत की पोल खोलकर मोदी से अदावत करने वाले दूसरे शख्स हैं, जिन्हें आज जेल की सींखचों के पीछे अपना जीवन गुजारना पड़ रहा है और अभी पिछले दिनों उन्हें अपनी ड्यूटी को कर्तव्यपरायणता और कर्मठता से करने की सजा के तौर पर आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई जा चुकी है!

वर्ष 1990 में इस देश में सांप्रादायिक वैमस्यता का विष बीज बोने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने जैसे ही अपनी रथयात्रा निकाली उसी दौरान ही जमजोधपुर नामक स्थान पर भीषण सांप्रादायिक दंगे भड़क उठे। उस समय  संजीव भट जामनगर में ट्रेनी एडिशनल सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस के पद पर तैनात थे। दंगे के शमन के लिए उस समय वहां की स्थानीय पुलिस द्वारा 150 दंगाइयों को हिरासत में लिया गया। उन दंगाइयों में हिन्दू विश्व परिषद का एक सदस्य प्रभुदास वैष्णानी भी पकड़ा गया था। पुलिस हिरासत से छूटने के 12 दिन बाद उसकी स्वाभाविक मौत हो गयी थी। लेकिन इस मामले में 8 पुलिस वालों पर कथित टॉर्चर का आरोप लगा कर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया था। इन्हीं में संजीव भट का भी नाम शामिल था।

वर्ष 2002 के 27 फरवरी को गुजरात के गोधरा स्टेशन पर अयोध्या की तरफ से आने वाली साबमती एक्सप्रेस अपने 1700 तीर्थयात्रियों को लिए हुए,जो अयोध्या से चढ़े थे सुबह के ठीक 7 बजकर 43 मिनट पर पहुँची। कुछ देर रुकने के पश्चात जब यह ट्रेन स्टेशन के बाद सिग्नल पर पहुँची, तभी चेनपुलिंग करके उसको रोक लिया गया, अचानक एक उन्मादी भीड़ आई और इस ट्रेन की एक बोगी  में कथित तौर पर आग लगा दी,जिससे 59 हिन्दू कारसेवकों की जलकर दर्दनाक मौत हो गई, इस घटना से सांप्रादायिक तनाव इतना बढ़ा कि पूरे गुजरात में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे, समाचार पत्रों के अनुसार इस भयानक दंगे में 790 मुसलमानों तथा 254 हिन्दुओं को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ही थे। गोधरा में ट्रेन में आग लगाने का सारा दोष मुसलमानों पर मढ़ दिया गया, लेकिन सुप्रीमकोर्ट के सेवानिवृत्त जज उमेश चन्द्र बनर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दृढ़ता और स्पष्टता से कहा कि ‘कोच में आग सुनियोजित ढंग से अंदर से ही लगाई गई थी।

संजीव भट के अनुसार गोधराकांड के तुरंत बाद उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र मोदी ने अपने मुख्यमंत्री आवास पर जो मीटिंग बुलाई थी, उसमें वहां के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक के चक्रवर्ती और शहर के पुलिस कमिश्नर पीसी पांडे भी सम्मिलित हुए थे। मोदी सहित भारतीय जनता पार्टी,बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद आदि सभी यह चाहते थे कि हिन्दू-मुस्लिम समाज में तनाव बढ़ाने के लिए एक दिन की एक अवैध आम हड़ताल कराई जाए, जिसमें गोधरा में जलकर मरे हिन्दू तीर्थयात्रियों के जले हुए शव उनके अंतिम संस्कार से पूर्व खुली ट्रकों में रखकर पूरे अहमदाबाद शहर में घुमाया जाए, लेकिन इस बैठक में सम्मिलित ये दोनों बड़े उच्च अधिकारी क्रमशः तत्कालीन पुलिस महानिदेशक के चक्रवर्ती और शहर के पुलिस कमिश्नर श्री पीसी पांडे मोदी की बात से बिल्कुल असहमत थे, लेकिन मोदी इस बात पर अड़े रहे। अंततः मोदी ही विजयी हुए और खुली ट्रकों में गोधरा में हिन्दू तीर्थयात्रियों के जले हुए शव उनके अंतिम संस्कार से पूर्व खुली ट्रकों में रखकर पूरे अहमदाबाद शहर में घुमाया गया। इसका नतीजा यह रहा कि अहमदाबाद सहित पूरा गुजरात फिर से सांप्रादायिक दंगों में कई दिनों तक बुरी तरह जलता रहा, जिसमें हजारों लोगों को बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया गया, जिसमें तीन चौथाई वहां के मुसलमान थे। इसीलिए इस कर्मठ, ईमानदारऔर कर्तव्य परायण अफसर  संजीव भट ने इन दंगों को ‘राज्य प्रायोजित दंगा’ कहा था।

भट्ट ने गुजरात दंगों की जाँच करने वाली एसआईटी पर दंगों के पीछे की सच्चाई को छिपाने का आरोप लगाते हुए यह भी आरोप लगाया है कि एसआईटी के एक सदस्य ने गुजरात के अतिरिक्त महाधिवक्ता तुषार मेहता के माध्यम से मोदी सरकार को दंगों से सम्बंधित जानकारी लीक की। भट्ट ने यह भी बताया कि गुजरात दंगों की निष्पक्ष जांच के लिए बनाए गए नानावटी आयोग में वे अपना बयान दर्ज कराना चाह रहे थे, लेकिन उनको इसका मौका जानबूझ कर नहीं दिया गया, क्योंकि इस देश के लोग गुजरात दंगों की सच्चाई जान जाते। गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड में अन्य 68 लोगों के साथ मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जाकिया जाफरी ने भारतीय सुप्रीमकोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में यह खुलकर बताया है कि गुजरात दंगों के वक्त वहां के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी व गुजरात राज्य के प्रशासनिक अधिकारी दंगाइयों को उकसाने में सीधे-सीधे संलिप्त थे और वे दंगाइयों के खिलाफ जानबूझकर अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहे थे।

कथित भारतीय न्याय तंत्र की विद्रूपता इससे ज्यादा और क्या हो सकती है कि गुजरात राज्य में इतने बड़े राज्य प्रायोजित दंगे, मानव हत्याओं और तांडव के बावजूद इस दंगे के असली सूत्रधार माने जाने वाले गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 13 अक्टूबर 2015 को सुप्रीमकोर्ट के दो जजों क्रमशः अरुण मिश्रा और एचएल दत्तू की पीठ ने क्लीन चिट दे दी। आप को बता दें कि ये दोनों जज अपनी नस्लवादी और जातिगत वैमनस्यता भरे निर्णयों को देने के लिए खूब बदनाम रहे हैं। दोनों जजों ने उल्टा भट्ट जैसे ईमानदार अफसर के बारे में कहा कि उनका एसआईटी के खिलाफ आरोप बिल्कुल झूठा है। 

उक्तवर्णित यथार्थपरक तथ्यों से यह शीशे की तरह साफ हो जाता है कि गुजरात के दंगे सुनियोजित ढंग से करवाए गए या वे भीषण दंगे राज्य प्रायोजित ही थे जिसके मुखिया वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ही थे। संजीव भट को जबर्दस्ती फँसाया गया है,क्योंकि यह सत्यपरक और ईमानदार व्यक्ति तत्कालीन मुख्यमंत्री के राह में  रोड़े बनकर चट्टान की तरह खड़ा रहा।

(निर्मल कुमार शर्मा लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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