Tuesday, August 9, 2022

हम भूमिपुत्र स्वयं अपने इतिहास के कर्ता हैं

ज़रूर पढ़े

(प्रधानमंत्री मोदी के नाम एक भूमिपुत्र का खुला ख़त)

लिखतुम भूमिपुत्र, पढ़तुम प्रधानमंत्री मोदी,
नमस्कार, आदाब, सत् श्री अकाल

थोड़े लिखे को तुम ज्यादा ही समझना। ‘आप’ के बजाय ‘तुम’ कहकर संबोधित इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि दिल में रंजिश हो तो आदमी ‘आप’ से ‘तुम’ और ‘तुम’ से ‘तू’ पर उतर ही आता है।

तुम्हारे मन की बात तो हमने सुन भी ली, देख भी ली और जान भी ली। अब तो अपने ‘मन की बात’ सामने बैठा कर कहने दिल्ली आए थे तो पता चला कि तुम दिल्ली ही छोड़ के भाग गए, इसलिए ख़त लिखने को मजबूर हैं। सबसे पहले तो तुम्हें हम अपना परिचय दे दें कि हम हैं कौन?

सिंधु नदी के तट पर हम भूमिपुत्रों के उस बुजुर्ग का वो पहला क्षण, जब उसने इस धरती पर पहला बीज बोया था, तब से लेकर उस क्षण तक जब हम दिल्ली के सिंधु बॉर्डर पर पहुंचे हैं, उस सिंधु तट से इस सिंधु बॉर्डर तक हमने बड़ी लंबी यात्रा तय की है। हमें जानने के लिए हमारी यात्रा को जानना तुम्हारे लिए बहुत जरूरी है।

तो सुनो, जैसे भी थे घने बालों वाले झबरैले शरीर और नुकीले कानों वाले वो हमारे बलशाली पूर्वज, बेशक उनकी कद-काठी की वजह से चलने पर धमक दूर तक जाती होगी, लेकिन उनका इस धरती पर पहला संकट ही अपने अस्तित्व का संकट था। सबसे पहले उन्होंने घात लगा कर झुंड में हमला करने वाले हिंस्र पशुओं से ही सीखा था, मिलजुल कर समाज में एकजुट रहना, अपना बचाव और हमला करना। अकेला मनुष्य इतने शक्तिशाली बाघ का मुक़ाबला नहीं कर सकता था, सो ‘सामाजिक एकजुटता में बचाव’ की समझ से ही उसने पाया था अपने वजूद के बचाव का रास्ता।

हम भूमिपुत्र उस एक खास क्षण की एक अद्भुत फिल्मसाज़ रिडले स्कॉट की निगाह से कल्पना करते और याद करते हैं फिल्म ‘ग्लैडिएटर’ में गुलाम बना लिए गए भूमिपुत्र-सेनापति मैक्सिमस का वह संवाद: “अगर हम एक साथ रहे तो बच जाएंगे। हमारी एकजुटता हमारे अस्तित्व को बचाएगी। एक हो जाओ… एक साथ, एक साथ।” यह सिर्फ संवाद ही नहीं है, बल्कि एक मंत्र है जो हमें अपने बुज़ुर्गों की याद दिलाता है। आदिविद्रोही स्पार्टाकस की याद तो दिलाता ही है और साथ में यह भी याद दिलाता है कि हरेक युग में मनुष्य के लिए हिंसक व्यवस्था से अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए यह ‘एकजुटता’ का यह जादुई मंत्र कितना कारामद साबित होता रहा है। और जब-जब एकजुटता में दरार आई है हम मारे गए हैं।

अब के एकजुटता का यही मंत्र लेकर हम पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और अन्य राज्यों से यहां दिल्ली के सिंधु बॉर्डर पहुंचे हैं।

तुम्हारे फरमाबरदार तड़ीपार सेनापति ने तुम्हारा संदेश भिजवाया है कि पहले बुराड़ी मैदान पहुंचो, फ़िर बात होगी तो एक बात याद दिला दें कि तुम लोकतंत्र में देश के सेवक हो, देश के मालिक नहीं। दूसरा तुम्हें हम बता दें कि शिकार के तौर-तरीकों से हम अच्छी तरह से वाक़िफ़ हैं और हम घिरने नहीं, घेरने आए हैं।

हम भूले नहीं हैं, उस दौर में ‘शिकार करो’ या ‘शिकार बन जाओ’ के बीच ही कहीं जीवन था, आज भी है। फ़र्क़ सिर्फ इतना है, तब हिंसक पशुओं से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते थे, आज हिंसक शासकों से लड़ रहे हैं। हमने ताउम्र बाहरी हमलावरों से भी लोहा लिया है अब हम घर में आ घुसे हमलावरों से भी लड़ने के लिए बाध्य हैं। हम शिकार बन जाने के लिए पैदा नहीं हुए हैं।

हम भारत के भूमिपुत्र तुम्हें याद दिला दें कि इस धरती पर हमने ही सबसे पहले ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बुनियाद रखी थी। कृषि एक मुख्य विकास था, जो सभ्यताओं के उदय का कारण बना। मानव सभ्यता के विकास में कृषि की अमूल्य भूमिका रही है। एक सयाने रेमंड विलियम की मानें तो कृषि से ही संस्कृति का जन्म होता है। कृषि ने ही हमें संस्कारित बनाया। प्रारंभिक खेती, पशुपालन और शिकार की प्रक्रिया प्रकृति द्वारा नियंत्रित होती रही, जिसमें संघर्ष था, मानवीयता थी और त्याग की भावना थी। मानव का अस्तित्व ही कृषि और शिकार पर टिका रहा। तपती धूप, कड़ाके की ठंड तथा मूसलाधार बारिश में काल से निरंतर होड़ लेते हुए हम भूमिपुत्र अपनी इस साधना में जुटे रहे। प्रकृति के विरुद्ध उसमें कुछ भी नहीं था।

नवपाषाणकालीन संस्कृति की एक विशिष्टता यह भी रही कि उसी दौर में हम भूमिपुत्रों ने अपने घर बनाने शुरू कर दिए थे। मिट्टी या धूप में सुखाई मिट्टी की ईंटों के हमारे सबसे पुराने घर हमें जेरिचो और जरमो में मिलते हैं, जिसको बनाने में हमने मिट्टी और पत्थर इस्तेमाल किया था। यही वह दौर था जब कृषि के विकास के चलते बड़ी मात्रा में हो रहे खाद्यान्नों के उत्पादन के चलते भंडारण की समस्या उठ खड़ी हुई तो भंडारण के लिए ही नहीं बल्कि खाना पकाने के लिए भी बड़े बर्तनों की जरूरत पड़ने लगी थी। तब तक चाक ईजाद नहीं हुआ था, लेकिन मिट्टी के बरतन बनाने और पकाने के लिए हम भूमिपुत्रों ने विज्ञान की मदद लेना शुरू कर दिया था। जिस बर्तन में तुम रोज खाते हो प्रधानमंत्री मोदी, उसमें सबसे पहली थाप हमारे बुज़ुर्गों के हाथों की ही लगी थी।

जो लोग तन ढकने के लिए खाल, छाल और फ़र पर पूरी तरह से निर्भर थे, उनके लिए कताई, बुनाई और बर्तन बनाने का श्रेय पूरी तरह से हमारी औरतों को जाता है। बुनाई स्पष्ट रूप से टोकरी बनाने का एक और अनुकूलन है, और उनमें पैटर्न-नमूने के बारे में सोचना पड़ता है, क्योंकि बुनाई में उत्पादित पैटर्न-नमूने के रूप और शामिल धागे की संख्या ज्यामिति और अंकगणित के आधार पर होती है। उनके उत्पादन में पैटर्न-नमूने अनिवार्य रूप से एक ज्यामितीय प्रकृति के होते हैं, जिससे आकृति और संख्या के बीच संबंधों की गहरी समझ का होना जरूरी होता है। तुम लखटकिया मशीनी सूट पहनते हो तुम नहीं समझोगे, यह समझ सिर्फ हमारी औरतों के पास है।

समाज में हो रहा, यह बदलाव सभी जगह एक समान नहीं था। एशिया में हम भूमिपुत्रों को बहुत सारे ऐसे पशु मिल गए थे, जिन्हें पालतू बनाया जा सकता था और उन्हें बाड़े में रखकर उनकी नस्ल बढ़ाई जा सकती थी। कई सबसे उन्नत कबीलों ने पशु पालन और पशु प्रजनन को अपना मुख्य पेशा बना लिया। हमारे पशु पालक कबीले हमारे हलवाहे कबीलों से अलग हो गए। यह सुलह-सफाई से हुआ पहला बड़ा सामाजिक श्रम-विभाजन था। यह सत्ताधारी शक्तियों द्वारा थोपा गया वर्ण विभाजन नहीं था। यह तुम नहीं समझोगे।

धन-दौलत तेजी से बढ़ रही थी, पर यह अलग-अलग भूमिपुत्रों की धन-दौलत थी। बुनाई, धातुकर्म और दूसरी दस्तकारियों का, हर एक का अपना अलग विशिष्ट रूप होता जा रहा था, और उनके मालों में अधिकाधिक सफाई, खूबसूरती और विविधता आती जा रही थी। खेती से अब न केवल अनाज, दालें और फल मिलते थे, बल्कि तेल और शराब भी मिलती थी। तब हमने तेल निकालने और शराब बनाने की कला सीख ली थी। अब कोई एक व्यक्ति इतने भिन्न प्रकार के काम नहीं कर सकता था; इसलिए अब दूसरा बड़ा श्रम विभाजन हुआ, दस्तकारियां खेती से अलग हो गईं।

भारत के पंजाब में और गंगा नदी के क्षेत्रों में तथा ओक्सस और जक्सार्टिस नदियों के पानी से खूब हरे-भरे, आज से कहीं ज्यादा हरे-भरे घास के मैदानों में रहने वाले हम भूमिपुत्रों को और फ़रात तथा दजला नदियों के किनारे रहने वाले सामी लोगों को एक ऐसी संपदा मिल गयी थी, जिसकी केवल ऊपरी देख-रेख और अत्यंत साधारण निगरानी करने से ही काम चल जाता था। यह संपदा दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती जाती थी और इससे उन्हें दूध तथा मांस के रूप में अत्यधिक स्वास्थ्यकर भोजन मिल जाता था। आहार प्राप्त करने के सब पुराने तरीके अब पीछे छूट गए। शिकार करना, जो पहले जीवन के लिए आवश्यक था, अब शौक की चीज़ बन गया।

तब हम भूमिपुत्रों ने वन्य जीवन से निकल कर सभ्य जीवन में कदम रख दिया था।

सराय नाहरराय और महादाहा से चूल्हे का साक्ष्य भी प्राप्त हुआ है, जिसमें हड्डियां जली हुई अवस्था में प्राप्त हुई हैं। यह हड्डियां गाय की भी हो सकती हैं, क्योंकि तब तक समाज को ‘आर्यपुत्रों’ ने हिंदू-मुसलमान और ब्राह्मण-दलित में नहीं बांटा था, न ही गाय इतनी पूज्य हुई थी। अलबत्ता यहां काकेशस प्रजाति और प्रोटो-नोर्डिक नस्ल के लोग रहते थे। यह स्पष्ट हो गया है कि 9000-4800 ईसा पूर्व के दौरान भोजन को आग में पकाने की शुरुआत यहीं से हुई थी। सराय नाहरराय से एक ही क्रम में आठ चूल्हों की प्राप्ति हुई है, जिससे सामूहिक जीवन पद्धति का भी संकेत मिलता है।

हम भूमिपुत्रों का शवाधान का तरीका मध्यपाषाण काल को विशिष्ट पहचान देता है। उस काल में पूरे भारत में भूमिपुत्र पत्थर के ताबूतों में शवों को दफनाते थे और दफनाने की विधि का संस्कृति के रूप में उद्भव नहीं हुआ था, इसलिए कहीं एकल तो कहीं सामूहिक और युगल शवाधानों के साक्ष्य लंघनाज, सराय नाहरराय, लखेड़िया और महादाहा से प्राप्त हुए हैं। स्पष्ट है कि किसी को भी हरिद्वार जाकर स्वर्ग का वीज़ा लगवाने की जरूरत नहीं पड़ती थी।

बहरहाल सिंधु घाटी की सभ्यता के उस कालखंड में हम भूमिपुत्र नगर निर्माण के उन्नत स्तर के बावजूद उस समय सिंधु घाटी में अधिकांश आबादी देहाती बस्तियों में रहती थी और उनका मुख्य उद्यम कृषि ही था। हड़प्पाई लोग गेहूं, जौ, तिल और फलियों की काश्त से परिचित थे। कपास की खेती होती थी और चरखे के साथ-साथ सूती कपड़े भी बनते थे। हड़प्पाई महत्वपूर्ण कृषि उपकरण इस्तेमाल करते थे और पशुपालन भी करते थे। हाथी, ऊंट, घोड़ा और गधा पालतू बना लिए गए थे और इनसे ढोआई और यातायात-साधन का काम लिया जाता था।

तांबे और कांसे के औज़ार, बर्तन, हथियार और अन्य वस्तुएं बनाने लगे थे। उस योग में धातुओं के गलाई, ढलाई और गढ़ाई की प्रविधियों का इतना प्रचलन हो चुका था कि मोम-सांचा विधि से हड़प्पाई मूर्तियां भी बनाने लगे थे। सिंधु घाटी में सत्ता पुरोहितों के हाथ में थी और जिनका सारी ज़मीन पर कब्ज़ा था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस दौर में भूमिपुत्र कितने खुशहाल रहे होंगे। जितनी जोत ली कम-अज़-कम उतनी ज़मीन को जो भूमिपुत्र अब तक अपनी निजी संपत्ति समझते आए थे अब उनकी नहीं रह गई थी।

किसी का कुछ छिन जाए तो बगावत पे उतर आता है।

इतिहास में थोड़ा और करीब आ जाएं तो पता चलता है कि जिस पहले भूमिपुत्र विद्रोह का अधिक विस्तार के साथ वर्णन हमें मिलता है वह 1419 में हम भूमिपुत्रों के अगुआ सारंग खां के नेतृत्व में हुआ था, जिसे सुल्तानों के चारक ‘बेअक्स रिआया’ और ‘जाहिलों का बलवा’ बताते रहे। सामंतों ने उसके खिलाफ अपनी फौजें भेजीं। पंजाब में सरहंद के निकट लड़ाई में हारने के बाद सारंग खां भाग कर पहाड़ों में चला गया, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता भूमिपुत्र फिर उसके आसपास गोलबंद होना शुरू हो गए। आखिर दिल्ली के सुल्तान की सेना ही इस भूमिपुत्रों के विद्रोह को दबा पाई। सारंग खां पकड़ा गया और उसे जान से मार डाला गया।

मुगल काल में ऐसा ही बगावत का एक और शानदार उदाहरण भूमिपुत्र अब्दुल्ला भट्टी का है, जिसे लोग प्यार से ‘दुल्ला भट्टी’ कहकर बुलाते हैं। दुल्ले की याद में पंजाब में लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है और दुल्ले के गीत गाकर बच्चे उसे आज भी याद करते हैं। इतिहासकारों ने इस बात को कभी तरजीह नहीं दी कि दुल्ला आज भी सारे पंजाब का लोकनायक क्यों है? हिंदू, सिख और मुसलमान सभी उसे इतना प्यार क्यों करते हैं? खैर, बंटवारे की सियासत के पैरोकार हो, तुम नहीं समझोगे। सच तो यह है कि समझकर भी समझना नहीं चाहोगे।

वैसे भी यह शासित भूमिपुत्रों का इतिहास है शासकों का इतिहास नहीं। शासित भूमिपुत्रों का इतिहास पढ़ा होता तो ऐसे नहीं हो जाते जो तुम आज हो। अपनी भूमि और आज़ादी के लिए कुर्बान हो जाने वाले अब्दुल्ला भट्टी के दादा सांदल और पिता फरीद भी बादशाह अकबर के खिलाफ थे और उन्हें बादशाह ने मरवा कर उनकी लाशें लाहौर के किले के मुख्य द्वार पर टंगवा दी थीं। तब अपने पिता और दादा की छेड़ी हुई जंग की बागडोर अब्दुल्ला भट्टी ने अपने हाथ में ले ली थी।

अब्दुल्ला भट्टी लाहौर से दिल्ली को जाती अकबर की डालियां (रसद) लूट लेता था और उसके सैनिकों को मार देता था। लूट का सारा माल वह मुफ़लिसों में बांट देता था और गरीब बच्चियों की शादियां करवाता था। तंग आकर एक बार अकबर ने अपने सेनापति मिर्ज़ा निज़ामदीन के साथ सैनिकों का भारी दल अब्दुल्ला भट्टी को मार गिराने के लिए भेजा।

अब्दुल्ला भट्टी ने न सिर्फ उसकी सेना को मार गिराया बल्कि मिर्ज़ा निज़ामदीन का सिर काट कर बादशाह अकबर को भिजवा दिया और संदेश भी क्या भिजवाया, ‘या तो हमारा देश छोड़ के चला जा या कुछ दिनों तक अपने तख़्त की फिक्र कर’। दुल्ले के दल में हिंदू, सिख और मुसलमान सभी थे, क्योंकि भूमिपुत्र योद्धाओं के बर्तन कभी अलग नहीं होते। अब्दुल्ला भट्टी सबका लाडला था, आज भी है। पंजाबी भूमिपुत्रों के दिलों से दो नाम रहती दुनिया तक कोई नहीं मिटा सकता, एक शहीद भगत सिंह दूसरा दुल्ला भट्टी।

खेतिहर सामाजिक-आर्थिक अर्थव्यवस्था के इस अंतर्विरोध ने अनगिनत भूमिपुत्र आंदोलनों और संघर्षों को जन्म दिया है। 1857 की स्वतंत्रता की पहली लड़ाई में भूमिपुत्रों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की थी। मिसाल के तौर पर रोहनात गांव में जो हरियाणा के हिसार ज़िले के हांसी शहर से कुछ मील की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है, भूमिपुत्रों ने सभी ब्रिटिश अधिकारियों का पीछा कर उनका कत्ल करने के साथ ही हिसार जेल तोड़ कर अपने भूमिपुत्र कैदियों को छुड़ा लिया था।

गांव वालों से बदला लेने के लिए ब्रिटिश सेना की टुकड़ी ने रोहनात गांव को तबाह कर दिया। अंधाधुंध दागे गए गोलों से लगभग 100 भूमिपुत्र मारे गए। पकड़े गए कुछ भूमिपुत्रों को गांव की सरहद पर पुराने बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गई। पकड़े गए कुछ भूमिपुत्रों को हिसार ले जा कर खुले आम बर्बर तरीके से एक बड़े रोड-रोलर के नीचे कुचल दिया गया था, ताकि भविष्य में ये बागियों के लिए सबक बने। हमें रोकने के लिए सड़कों पर वही रोड-रोलर खड़े करने वाले तुम्हारे मनोहर लाल खट्टर ने इतिहास से सबक लिया होता और भूमिपुत्रों के प्रति जरा सा भी आदर भाव होता तो खट्टर वह नहीं करता जो उसने किया।

1817 में ओडिशा में हुए पाइका विद्रोह ने पूर्वी भारत में ब्रिटिश राज की जड़ें हिला दी थीं। गुजरात के खानदेश में जमींदारों के खिलाफ़ हुए भील भूमिपुत्रों के सशस्त्र विद्रोह, 1855-56 के बीच बिहार, बंगाल और उड़ीसा में संथाल भूमिपुत्रों ने हथियार उठाए। फिर 1836 और 1896 में मालाबार के इलाके में मोपला किसानों ने बगावत की। 1860 में बिहार और बंगाल के नील भूमिपुत्रों ने विद्रोह किया। 1873 में पबना (सिराजगंज, बंगाल) में भूमिपुत्रों ने और 1875 में पुणे में मराठा भूमिपुत्रों ने संघर्ष किया।

उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक में आदिवासी-भूमिपुत्रों के मुंडा और संथाल विद्रोह हुए। इन बड़े-बड़े आंदोलनों के अलावा अध्येताओं ने ऐसे अपेक्षाकृत छोटे 77 भूमिपुत्र आंदोलनों की सूची भी बनाई है, जिनके तहत समय-समय पर हजारों भूमिपुत्रों की गोलबंदी हुई। यह तमाम भूमिपुत्र संघर्ष भारतीय इतिहासकारों के भी विमर्श से बाहर रहे, क्योंकि अंग्रेजों ने इन्हें ‘लुटेरे’, ‘बेअक्स रिआया’ और ‘जाहिलों का बलवा’ ही कहा था। उसी तर्ज़ पर अब तुम्हारा यह खट्टर हमें ‘असामाजिक तत्व’ बता रहा है।

1926 में सहजानन्द सरस्वती के नेतृत्व में शुरू हुआ भूमिपुत्र आंदोलन, जिसमें हजारों भूमिपुत्रों के साथ महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भी लाठियां खाईं, सिर फुड़वाया और जेल गए। फिर तेभागा और तेलंगाना का सशस्त्र भूमिपुत्र संघर्ष जो 1946 में शुरू हुआ था, 1951 में ख़त्म हुआ। पहले ग़ुलाम भारत के निज़ाम ने निरंकुशता के जौहर दिखाए अब आज़ाद भारत में प्रधानमंत्री बने बैठे तुम और तुम्हारे फरमाबरदार ज़ुल्म ढा रहे हैं। तब लुटेरे बाहर के थे अब लुटेरे शहीद भगत सिंह के शब्दों में कहें तो अपने ही देश के ‘भूरे अंग्रेज़’ अंबानी-अदानी हैं और हमारे कुछ भाइयों का यह भी कहना है कि बुरा नहीं मानना, तुम उनकी दलाली कर रहे हो। बुरा तो लगता है सुनने में पर क्या करें तुम्हारी हरकतें ही ऐसी हैं।

देश में पिछले कई सालों से हमारे भूमिपुत्र भाई आत्महत्याएं कर रहे हैं। तकरीबन हर आधे घंटे पर एक भूमिपुत्र देश के किसी न किसी कोने में जान दे देता है। अगर भूमिपुत्र की पत्नी आत्महत्या करती है तो उसकी गिनती भूमिपुत्र में नहीं होती, क्योंकि तुम और तुम्हारी सरकार है कि महिला को कृषक मानती ही नहीं। वैसे बुरा नहीं मानना पर यह लानत वाली बात है कि नहीं?

तुम्हारी सरकार के अपने आंकड़ों के मुताबिक देश भर के करीब नौ करोड़ भूमिपुत्र परिवारों में 51.9 प्रतिशत के ऊपर किसी न किसी रूप में क़र्ज़ है। हरेक भूमिपुत्र परिवार के ऊपर तकरीबन 50 हजार रुपये का क़र्ज़ है। क़र्ज़ बढ़ता जा रहा है और बंपर फसल होने पर भी लागत मूल्य नहीं मिलने की वजह से भूमिपुत्र अपने उत्पाद सड़कों पर फेंक रहे हैं। भूमिपुत्र संगठन हर भाषण में क़र्ज़ माफी की ‘मांग’ करते हैं। तुम और तुम्हारे तमाम नेता अपने हर भाषण में क़र्ज़ माफी का ‘दावा’ करते हैं। इस ‘मांग’ और ‘दावे’ के बीच से फांसी का फंदा अगर हट ही नहीं रहा तो तुम इसके लिए जवाबदेह हो, प्रधानमंत्री मोदी। वैसे बुरा नहीं मानना पर यह लानत वाली बात है कि नहीं?

वैसे तुम ठहरे नपुंसक परजीवियों के संगठन आरआरएस के प्रचारक। नपुंसक (उत्पादकता के अर्थों में) इसलिए कि तुमने और तुम्हारे संगठन के लोगों ने देश के लिए तो कभी एक दाना भी पैदा नहीं किया और हम भूमिपुत्र मिट्टी के साथ मिट्टी होकर पूरे देश के लिए अनाज पैदा करते हैं। तुम और तुम्हारा संगठन आरआरएस, बीजेपी और अन्य तमाम टोटरू दल दूसरों के टुकड़ों और दान-पुन्न पर पलने वाले और धोखे से दूसरों का चुरा कर खाने वाले परजीवी हो, जो अपनी दान के स्रोत भी नहीं बताते, गुप्त रखते हो। यही ‘गोपनियता’ तुम्हारी नियत और तुम्हारी ईमानदारी को कटघरे में खड़ा करती है। वैसे बुरा नहीं मानना पर यह लानत वाली बात है कि नहीं?

नोटबंदी करके तुम जब जापान भाग गए थे तो तुमने कहा था, “मैं गुजराती हूं, व्यापार मेरे खून में है…।” अच्छे व्यापारी हो तुम! मां का सौदा करने ही निकल पड़े? तुम्हारे लिए यह भारत-भूमि व्यापार की वस्तु या धर्म के नाम पर सियासत करने के लिए ज़मीन का एक टुकड़ा हो सकती है, लेकिन हमारे लिए यह हमारी मां है और तुम क़ानूनों का सहारा लेकर इसे ही सरमायेदारों के हाथों में देना चाहते हो? अगर यह सच नहीं है और तुम हम भूमिपुत्रों के इतने ही हितैषी हो तो न्यूनतम समर्थन मूल्य के नीचे की जा रही खरीद को कानूनी अपराध क्यों नहीं घोषित कर देते?

करोगे नहीं, क्योंकि तुम जानते हो कि तुम क्या और किसके लिए कर रहे हो। तुम देश के लिए खतरा बन गए हो।

यह मैं नहीं सारी दुनिया कह रही है। अब के तो ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने भी कह दिया कि सैनिक विद्रोह के बजाय चुनाव जीत कर आए नेता लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा बन गए हैं। तुम्हारे पढ़े-लिखे सचिव ने तो तुम्हें पढ़कर सुनाया ही होगा कि ‘द इकोनॉमिस्ट’ के अनुसार विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी ने अदालतों और चुनाव आयोग सहित सभी संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है’।

तुम्हें शायद किसी ने बताया न हो लेकिन इसी को तानाशाही कहते हैं। बात तो यह भी सच है कि जब तानाशाहों को तानाशाह बनाने वाली ताकतें पीछे हट जाती हैं तो उनका हश्र बहुत बुरा होता है। इतिहास उठाके देख लो। वैसे बगावत पर अगर भूमिपुत्र उतर आएं तो हश्र उससे भी ज्यादा बुरा होता है। इतिहास उठाके देख लो। हमारा चेताना फ़र्ज़ था, आगे तुम्हारी मर्जी। 

हम तो आ गए दिल्ली के सिंधु बॉर्डर। हमारी सुन लो तो वा भला नहीं तो अब हम भूमिपुत्रों को तय करना है कि हमारा आगामी इतिहास क्या होगा?

अपनी बात खत्म करने से पहले तुम्हें भूमिपुत्र प्रश्न पर सबाल्टर्न इतिहास लेखक रणजीत गुहा की कही एक सयानी बात बताता हूं, अच्छा है गांठ बांध लो। रणजीत गुहा कहते हैं, “भूमिपुत्र इतिहास की विषयवस्तु नहीं, स्वयं अपने इतिहास के कर्ता हैं।”

नहीं समझे? जितनी जल्दी समझ जाओ अच्छा है। राम तुम्हें जल्द सद्बुद्धि दें,

भारत मां का
एक भूमिपुत्र

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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