हे राम ! तुम्हारे नाम पर क्या-क्या हो रहा है?

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की रकम में से करोड़ों रुपये की चोरी का मामला सामने आया है। पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि यह चोरी पांच-सात करोड़ रुपये की है। लेकिन अब कहा जा रहा है कि यह चोरी 200 करोड़ रुपये से ज्यादा की भी हो सकती है। इस मामले में अभी तक दो करोड़ का कैश बरामद भी किया जा चुका है। फिलहाल एसआईटी बना दी गई है। पर सच शायद ही बाहर आये।

कुछ दिन पहले चढ़ावे की गिनती करने वाली टीम में एक नया कर्मचारी शामिल हुआ था। सात जून को नोटों की गिनती करते हुए उसने एक गड्डी छिपा ली। उसकी यह हरकत सीसीटीवी में रिकॉर्ड हो गई। पूछताछ होने पर उसने चढ़ावे की रकम में हो रही चोरी से जुड़ी कई बातें बताईं। नौ जून को यह मामला सार्वजनिक हो गया। 

मंदिर संचालन के लिए 15 सदस्यों का एक ट्रस्ट बना है। लेकिन मंदिर परिसर की व्यवस्था संभालने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी महासचिव चंपत राय की मानी जाती है। चंपत राय अयोध्या के कारसेवक पुरम में रहते हैं। नौ जून को मामला सार्वजनिक होने के बावजूद इन्होंने बाकी ट्रस्टियों को इसकी जानकारी नहीं दी। न ही इसकी जानकारी पुलिस को दी गई।

इस चोरी का मुख्य आरोपी रमा शंकर उर्फ टिन्नू को बताया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि यह टिन्नू चंपत राय का करीबी है। मंदिर परिसर की कई व्यवस्थाएं चंपत राय के कहने पर यह देखता है। धर्म सेना के संस्थापक संतोष दुबे कहते हैं कि यह टिन्नू परमहंस जी का ड्राइवर था। पहले इसका वेतन 2200 रुपये था। फिर बढ़कर तीन हजार रुपये हो गया। 2022 में इसका वेतन बढ़ाकर 22 हजार रुपये कर दिया गया। 

श्रीराम मंदिर के पूर्व लेखाकार महिपाल सिंह ने दावा किया कि चढ़ावा चोरी का मामला नया नहीं है। यह 2020-21 से ही चल रहा है। उनका कहना है कि 2021 में उन्होंने खुद चोरी पकड़ी थी। इसकी शिकायत उन्होंने महासचिव चंपत राय और व्यवस्थापक गोपाल राव से की थी। लेकिन चोरों के खिलाफ तो कोई कार्रवाई नहीं हुई बल्कि खुद उन्हें ड्यूटी से हटा दिया गया। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी करके कहा है कि नोटों की गिनती के दौरान बॉक्स में दस नोटों की गड्डी दिखाई गई। उन्हें जब गड़बड़ी की आशंका हुई तो उन्होंने बॉक्स चेक किया। उसमें 13 गड्डियां मिलीं। 

धर्म सेना के संस्थापक संतोष दुबे कहते हैं कि ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोग अपने रिश्तेदारों और करीबियों के साथ मिलकर अयोध्या को लूट रहे हैं। जो काम किसी जमाने में मुहम्मद गोरी, बाबर और अंग्रेज नहीं कर सके वह काम अब ट्रस्ट के लोग कर रहे हैं। वे सीधे-सीधे चंपत राय पर आरोप लगाते हैं। कहते हैं – चंपत राय की कमाई का जरिया क्या है ? वे वाई श्रेणी की सुरक्षा में रहते हैं, महंगी फॉरचूनर गाड़ी से चलते हैं, बड़े मकान में रहते हैं।

यह सब पैसा कहां से आता है ? वह मुख्य आरोपी टिन्नू पर भी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि यह पहले महंत परमहंस जी का ड्राइवर था। तीन हजार रुपये इसकी तनख्वाह थी। अब बहुत बढ़ी होगी तो भी 25-30 हजार रुपये से ज्यादा नहीं होगी। लेकिन यह व्यक्ति भी महंगी गाड़ी में चलता है, इसके कई बड़े नामी और बेनामी मकान हैं। आखिर यह सब कहां से हुआ है ?

21 मार्च, 2026 को ट्रस्ट की बैठक हुई थी। उसमें 1 अप्रैल, 2025 से 28 फरवरी 2026 तक के आय-व्यय का रिकॉर्ड पेश किया गया था। इसमें बताया गया कि इस दौरान भक्तों ने 82-85 करोड़ रुपए का दान दिया लेकिन दान पेटियों में सिर्फ 54 करोड़ ही मिले। बाकी करीब 28-31 करोड़ कहां गये ? बैठक में चढ़ावे में आये गहनों का कोई जिक्र नहीं किया गया। जबकि भारी मात्रा में गहने चढ़ाये जाते हैं। 

मंदिर परिसर के 15 मंदिरों में कुल 44 दान पात्र रखे गये हैं। इसके अलावा ट्रस्ट के दो कार्यालयों में भी दान की राशि जमा की जाती है। सूत्रों के मुताबिक कैश की गिनती दो सुरक्षा गार्डों और करीब आठ सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में की जाती है। नोटों की गिनती में 40 बैंक कर्मचारी और पांच मंदिर ट्रस्ट के अधिकृत प्रतिनिधि लगे हुए हैं। करीब आठ-नौ करोड़ रुपये का चढ़ावा हर महीने आता है। यानी औसतन 26-30 लाख रुपये रोज। 30 लाख रुपयों की ही रोजाना गणना की जाती है। बाकी बचे नोटों को किसी बॉक्स में रखकर सील बंद कर दिया जाता है। उनकी गिनती आगे की जाती है। नोटों की छंटनी के लिए दो ऑटोमेटिक मशीनें लगी हुई हैं।

बाहर के रहने वालों को भले अब पता चला हो कि चढ़ावे की चोरी की जा रही है लेकिन अयोध्या में रहने वाले लोग इस हकीकत से पहले से ही भली भांति परिचित हैं। उनका कहना है कि यह सब तो 1949 से ही हो रहा है। 22-23 दिसंबर 1949 को बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखे जाने के बाद से ही चढ़ावे के रूप में अकूत धन आना शुरू हो गया था। और इस रकम को हासिल करने के लिए लड़ाई भी तभी से शुरू हो गई।

दो पत्रकारों कृष्णा झा और धीरेंद्र झा ने एक पुस्तक लिखी है- “ अयोध्या की वह स्याह रात “। उन्होंने उस पुस्तक में लिखा है कि 1949-50 में हिंदू महासभा की अयोध्या रणनीति और स्थानीय स्तर पर योजनाएं लड़खड़ाने या विफल होने का एक कारण यह भी था कि उसका ध्यान बाबरी मस्जिद से हटकर चंदे व चढ़ावे के बंटवारे की ओर जाने लगा। पुस्तक के अनुसार बाबरी मस्जिद से मूर्ति हटाने के फैसले के खिलाफ स्टे मिल जाने के बाद हिंदू महासभा की ओर से श्रीराम जन्म भूमि सेवा समिति बनाई गई।

उसमें अयोध्या के कई जाने-माने बैरागी शामिल हुए। लेकिन जल्दी ही वह समिति पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह (महासचिव ), गोपाल सिंह विशारद (सह सचिव) और रामचंद्र दास परमहंस ( प्रचार प्रभारी ) के कब्जे में चली गई। और जल्दी ही इन तीनों के बीच चढ़ावे की रकम को लेकर विवाद शुरू हो गया। रामचंद्र दास परमहंस और गुरुदत्त सिंह को यह शिकायत थी कि गोपाल सिंह विशारद सब कुछ अपने जिम्मे ले रहे हैं। तब रामचंद्र दास परमहंस ने गोपाल सिंह विशारद पर गबन के कई बार आरोप भी लगाए। 

1984 में श्रीराम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन, राम जानकी रथ यात्रा, बजरंग दल की स्थापना और लखनऊ से अयोध्या कूच जैसे कदमों के जरिये विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण की कमान अपने हाथ में ले ली। उस दौरान संग्रहीत धन पर हक को लेकर विहिप और अयोध्या के साधु संतों के बीच कई बार गंभीर तनाव हुआ। 2002 में बहुप्रचारित शिलादान कार्यक्रम को लेकर विहिप के समझौतावादी रवैये से नाराज होकर तब रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष रामचंद्र दास परमहंस ने यहां तक कहा कि मंदिर निर्माण का आंदोलन मुख्य रूप से संतों का है।

उन्होंने यह मांग भी की कि विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर निर्माण के नाम पर देश-विदेश से जो बड़ी मात्रा में चंदा वसूला है उसका श्रद्धालुओं के सामने पारदर्शी हिसाब रखा जाए। 2015 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने विहिप और राम जन्म भूमि न्यास पर मंदिर निर्माण के नाम पर मिले चंदे में से 1400 करोड़ रुपये से अधिक की नकदी और शिलापूजन के दौरान मिली क्विंटलों सोने की ईंटें हड़प लेने का आरोप लगाया। धर्म सेना के संस्थापक संतोष दुबे ने तो सोने और हीरे-जवाहरातों से जड़ीं साढ़े बारह सौ ईंटों की चोरी का आरोप सीधे चंपत राय पर लगाया है। उनका कहना है कि उन्होंने इन ईंटों को बेच दिया। इसकी शिकायत भी परमहंस जी से की गई थी।

राम नाम का जाप लोग इस संसार रूपी भवसागर से तरने के लिए करते हैं। राम को अपनी रचना रामचरित मानस के जरिये जन-जन तक पहुंचाने वाले तुलसीदास तो और भी आगे चले जाते हैं। वे कहते हैं कि “ अर्थ न धर्म न काम रुचि, गति न चहौं निर्वाण, जनम-जनम सियराम पद यह वरदान न आन “। यानी अर्थ, धर्म, काम यहां तक कि मोक्ष भी नहीं चाहिए। बस आपके ( भगवान राम ) चरणों में जनमों जनम हमारा अनुराग बना रहे यह वरदान दीजिए। लेकिन यहां राम के नाम पर अर्थ (धन) बटोरने में ही मंदिर के संचालक लग गये हैं। वो भी चोरी के जरिये।

(अमरेंद्र कुमार राय वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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