राम के नाम पर वोट और चंदे की लूट के साथ ही अब मंदिर पर कब्जे के लगे आरोप  

अयोध्या से उठे नए आरोपों ने राम मंदिर ट्रस्ट और भाजपा की नैतिक साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस राम मंदिर को करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक और राष्ट्र के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बताया गया था, अब उसी मंदिर से जुड़े ट्रस्ट पर चंदे में गड़बड़ी, कथित भ्रष्टाचार और मंदिर की संपत्ति पर अवैध कब्ज़े जैसे आरोप लग रहे हैं।

विपक्ष इन घटनाओं को भाजपा की “राम राजनीति” का सबसे बड़ा विरोधाभास बता रहा है, जबकि ट्रस्ट की ओर से इन नए आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ट्रस्ट की चुप्पी से देश की आम जनता भी परेशान है और देश को लग रहा है कि बीजेपी ने भावना के साथ खेल कर भगवान को भी लूट लिया।

आम लोगों के बीच अब यह धारणा बलवती होती जा रही है कि बीजेपी और संघ के भीतर पाखंडी लोगों की कमी नहीं है और बीजेपी और संघ के लोग अगर ऐसे ही पाखंडियों को लेकर समाज सेवा का ढोंग रचती है तो अब भगवान ही इसका न्याय करेंगे। अयोध्या की आम  जनता के साथ ही साधु संत समाज मंदिर में हुए खेल से मर्माहत हैं। उनके मुख से बस यही निकल रहा है कि जो राम का नहीं हुआ वह किसका होगा?

साधू समाज को अब इस बात का भी धक्का लगा है कि जिस ब्राह्मण समाज को सनातन धर्म को अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी होती है वह भी इस मंदिर चोरी में शामिल है। घोर कलयुग आ गया है। 

अब राम मंदिर परिसर से सटे सदियों पुराने राम निवास मंदिर के पंच प्रमुख हरि शंकर सफारी वाला ने समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय और उनके सहयोगियों पर मंदिर पर अवैध कब्जा करने का आरोप लगाया है। सफारी वाला का दावा है कि फर्जी दस्तावेज तैयार कर मंदिर की संपत्ति को हड़पने की साजिश रची गई और उनकी शिकायतों पर प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की।

उनके अनुसार राम निवास मंदिर कोई निजी संपत्ति नहीं, बल्कि एक पंचायती मंदिर है, जिसका संचालन पंच समिति करती है। समिति ने केवल पूजा-पाठ के लिए एक पुजारी नियुक्त किया था। सफारी वाला का आरोप है कि चंपत राय और उनके सहयोगियों ने उसी पुजारी और उसके रिश्तेदारों के माध्यम से करीब 5.80 करोड़ रुपये का फर्जी संपत्ति समझौता तैयार किया, जबकि कानूनन मंदिर की संपत्ति खरीदी या बेची नहीं जा सकती।

उनका कहना है कि लगभग 60 लाख रुपये बैंकिंग माध्यम से पुजारी और उसके परिजनों को दिए गए ताकि इस कथित सौदे को वैध दिखाया जा सके।

सफारी वाला ने यह भी आरोप लगाया है  कि समिति के सदस्यों को करोड़ों रुपये का लालच देकर मंदिर सौंपने का दबाव बनाया गया, लेकिन समिति ने साफ कह दिया कि वह मंदिर की मालिक नहीं है और न ही उसे बेचने का अधिकार रखती है। उनका दावा है कि करीब 50 करोड़ रुपये मूल्य की इस संपत्ति पर पिछले पांच वर्षों से कथित कब्जा बना हुआ है और इस दौरान श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए लाखों रुपये के चढ़ावे का भी कोई हिसाब समिति को नहीं दिया गया।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और स्थानीय प्रशासन सहित सभी संबंधित अधिकारियों को शिकायत भेजी गई, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि अगर आरोप सही हैं तो यह केवल संपत्ति विवाद नहीं बल्कि आस्था से जुड़ा गंभीर मामला है।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब राम मंदिर दान घोटाले की जांच पहले से ही चर्चा में है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार कर चुका है, जिनमें चंपत राय का चालक भी शामिल है। दान में मिली रकम के कथित गबन के आरोप सामने आने के बाद चंपत राय ने ट्रस्ट के महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया था। सूत्रों के अनुसार उन्होंने अपने करीबी लोगों से कहा कि जिन लोगों पर उन्होंने भरोसा किया, उन्हीं ने उन्हें धोखा दिया और अब वह इस “कलंक” के साथ सेवा जारी नहीं रखना चाहते।

इसी बीच राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भाजपा, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल पर तीखा हमला बोला है । सोशल मीडिया मंच एक्स पर उन्होंने लिखा कि “राम के नाम पर वोट लेंगे और फिर राम को ही लूटेंगे। असली हिंदू ये क्या जानें, ये तो फर्जी हिंदू हैं।” सिब्बल ने आरोप लगाया कि जिन संगठनों ने राम मंदिर आंदोलन के नाम पर राजनीतिक लाभ लिया, अब उन्हीं पर मंदिर के चंदे में गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं।

विपक्ष लगातार यह भी आरोप लगा रहा है कि जांच केवल छोटे लोगों तक सीमित रखी जा रही है, जबकि प्रभावशाली और जिम्मेदार पदों पर रहे लोगों तक जांच की आंच नहीं पहुंच रही। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी ने निष्पक्ष तथा व्यापक जांच की मांग करते हुए कहा है कि यदि करोड़ों श्रद्धालुओं के दान में अनियमितता हुई है तो दोषियों की पहचान और जवाबदेही तय होना आवश्यक है।

हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि राम निवास मंदिर पर कब्ज़े और दान में कथित गबन से जुड़े आरोप अभी आरोप मात्र हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से न्यायिक या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। चंपत राय और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से राम निवास मंदिर संबंधी आरोपों पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं दान घोटाले की जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएंगे।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि अयोध्या, जिसे भाजपा ने अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक और वैचारिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया, अब वहीं से उठ रहे विवाद उसके लिए असहज स्थिति पैदा कर रहे हैं। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास और राम मंदिर आंदोलन की नैतिक विश्वसनीयता पर भी गहरा प्रश्नचिन्ह खड़ा करेगा।

उधर डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन से दान और चढ़ावे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। इसी दौरान कथित तौर पर मंदिर के कोष से अधिकतम धनराशि की हेराफेरी की गई। सूत्रों ने यह भी दावा किया है कि इस मामले में लवकुश मिश्रा और उनके बहनोई अनुकल्प मिश्रा कथित रूप से प्रमुख भूमिका में सामने आए हैं।

बताया जा रहा है कि मामले की जांच में मंदिर की दान व्यवस्था, नकदी संग्रह, लेखा-जोखा और बैंक में जमा की प्रक्रिया की बारीकी से पड़ताल की जा रही है। जांच एजेंसियां यह जानने का प्रयास कर रही हैं कि कथित अनियमितताएं किस स्तर पर हुईं, कितनी राशि प्रभावित हुई और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही।

सूत्रों के अनुसार, महाकुंभ के दौरान मंदिर में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे, जिससे नकद दान और अन्य चढ़ावे में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई। जांचकर्ताओं का मानना है कि इसी असाधारण भीड़ और दान की मात्रा का कथित तौर पर लाभ उठाकर वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि जांच के दौरान कई दस्तावेजों, वित्तीय अभिलेखों और संबंधित कर्मचारियों के बयानों का मिलान किया जा रहा है। 

इस घटनाक्रम ने मंदिर प्रशासन की वित्तीय पारदर्शिता और दान प्रबंधन प्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर दान की निगरानी, डिजिटल रिकॉर्डिंग और नियमित ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की कथित अनियमितताओं की संभावना कम हो सके।

उल्लेखनीय है कि अयोध्या का राम मंदिर देश के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है और यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। विशेष धार्मिक आयोजनों और पर्वों के दौरान यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे समय में दान प्रबंधन की व्यवस्था भी अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

अब सभी की निगाहें जांच एजेंसियों की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला न केवल वित्तीय अनियमितता का गंभीर उदाहरण होगा, बल्कि धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी व्यापक बहस को जन्म दे सकता है। 

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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