एक हज़ार दिन। इतिहास के पैमाने पर यह बहुत लंबा समय नहीं लगता, लेकिन यदि हर दिन बमों की गड़गड़ाहट, भूख, विस्थापन, अपनों की मौत और भविष्य के लगातार ध्वस्त होते जाने का पर्याय बन जाए, तो एक हज़ार दिन किसी पूरी पीढ़ी का जीवन निगल सकते हैं। गज़ा आज इसी त्रासदी का नाम है।
हाल में जारी आँकड़ों के अनुसार, सात अक्टूबर 2023 से शुरू हुए युद्ध के एक हज़ार दिनों में हजारों बच्चों सहित बड़ी संख्या में फ़िलिस्तीनी नागरिक मारे गए हैं। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, यूनिसेफ, यूएन वीमेन और अनेक अंतरराष्ट्रीय मानवीय संगठनों ने लगातार चेतावनी दी है कि गज़ा के बच्चे अभूतपूर्व मानवीय संकट का सामना कर रहे हैं।
दूसरी ओर, इज़राइल का कहना है कि उसका सैन्य अभियान हमास के विरुद्ध है, जिसने सात अक्टूबर 2023 को इज़राइल पर हमला कर लगभग 1,200 लोगों की हत्या की और अनेक लोगों को बंधक बना लिया था। लेकिन युद्ध की वैधता और युद्ध के संचालन के तरीके दो अलग-अलग प्रश्न हैं। आज पूरी दुनिया दूसरे प्रश्न पर अधिक चिंतित दिखाई देती है।
यदि किसी संघर्ष में बच्चों की मृत्यु सामान्य समाचार बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि सभ्यता कहीं गहरे संकट में है। युद्धों में नागरिकों की मृत्यु दुर्भाग्यपूर्ण मानी जाती रही है, किंतु जब अस्पताल, स्कूल, शरण शिविर और राहत केंद्र भी सुरक्षित न रहें, तब यह केवल सैन्य संघर्ष नहीं रह जाता; यह मानवता की बुनियादी नैतिकता की परीक्षा बन जाता है।
सबसे अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि हजारों बच्चे या तो मारे गए, या गंभीर रूप से घायल हुए, या अनाथ हो गए। अनेक बच्चों के हाथ-पैर काटने पड़े। चिकित्सकों के अनुसार कई ऑपरेशन पर्याप्त एनेस्थीसिया के बिना किए गए। इन बच्चों ने बचपन नहीं देखा; उन्होंने केवल विस्फोट, धूल, भूख और मृत्यु देखी है। किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूँजी उसके बच्चे होते हैं। यदि एक पूरी पीढ़ी शारीरिक और मानसिक आघात के साथ बड़ी होगी, तो उसका प्रभाव दशकों तक बना रहेगा।
युद्ध केवल शरीरों को नहीं मारता, वह स्मृतियों, सपनों और विश्वास को भी नष्ट कर देता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार हिंसा देखने वाले बच्चों में अवसाद, भय, असुरक्षा और हिंसा के प्रति असामान्य संवेदनहीनता विकसित हो सकती है। गज़ा के अनेक बच्चों ने कहा है कि उन्हें लगता है कि वे किसी भी क्षण मर सकते हैं। इससे बड़ा मानवीय विफलता का प्रमाण और क्या हो सकता है?
इस पूरे संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पक्ष अंतरराष्ट्रीय कानून भी है। संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न निकायों और मानवाधिकार संगठनों ने इज़राइल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दक्षिण अफ्रीका द्वारा दायर मामला अभी विचाराधीन है। दूसरी ओर, इज़राइल इन आरोपों को अस्वीकार करते हुए कहता है कि वह आत्मरक्षा का अधिकार प्रयोग कर रहा है और नागरिकों को ढाल के रूप में इस्तेमाल करने के लिए हमास जिम्मेदार है।
अंतिम कानूनी निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया से ही आएगा, लेकिन तब तक भी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी पक्षों का दायित्व है।
दुखद यह भी है कि विश्व समुदाय इस युद्ध को रोकने में असफल दिखाई देता है। संयुक्त राष्ट्र बार-बार अपील करता है, लेकिन सुरक्षा परिषद महाशक्तियों की राजनीति में उलझ जाती है। अमेरिका, यूरोपीय देश, रूस, चीन और क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने-अपने रणनीतिक हितों के अनुसार प्रतिक्रिया देती हैं। परिणाम यह होता है कि युद्ध लंबा खिंचता जाता है और उसकी सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक चुकाते हैं।
आज का युद्ध केवल गोलियों से नहीं लड़ा जाता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, उपग्रह और अत्याधुनिक हथियारों ने युद्ध को तकनीकी रूप से अधिक सक्षम बनाया है, लेकिन नैतिक रूप से अधिक जटिल भी। यदि तकनीक मनुष्य की रक्षा के बजाय उसके विनाश का अधिक प्रभावी साधन बन जाए, तो प्रगति का अर्थ ही बदल जाता है।
इतिहास हमें बताता है कि हर युद्ध अपने पीछे गहरे घाव छोड़ता है। यूरोप ने दो विश्वयुद्धों के बाद शांति की आवश्यकता समझी। दक्षिण अफ्रीका ने रंगभेद के बाद मेल-मिलाप का मार्ग चुना। रवांडा ने नरसंहार के बाद पुनर्निर्माण का कठिन रास्ता अपनाया। प्रश्न यह है कि क्या पश्चिम एशिया भी कभी उस दिशा में बढ़ पाएगा, या हिंसा की यह श्रृंखला आने वाली पीढ़ियों तक चलती रहेगी?
यह भी स्मरण रखना होगा कि किसी भी संघर्ष में निर्दोष नागरिकों की पीड़ा का अर्थ किसी आतंकवादी संगठन के कृत्यों का समर्थन नहीं होता। हमास द्वारा सात अक्टूबर का हमला भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के विरुद्ध था और उसकी व्यापक निंदा हुई। उसी प्रकार यदि किसी सैन्य कार्रवाई में असंगत रूप से नागरिक हताहत होते हैं, तो उसकी भी निष्पक्ष जाँच और जवाबदेही आवश्यक है। न्याय चयनात्मक नहीं हो सकता; वह सभी पक्षों के लिए समान होना चाहिए।
गज़ा आज केवल एक भूभाग नहीं है; वह हमारे समय का नैतिक आईना बन गया है। वहाँ मलबे के नीचे दबे लोग, भूख से तड़पते बच्चे, उजड़े हुए परिवार और शिक्षा से वंचित एक पूरी पीढ़ी हमसे प्रश्न पूछ रही है कि क्या मानवाधिकार केवल दस्तावेज़ों में लिखे शब्द हैं, या उनका कोई वास्तविक अर्थ भी है?
एक चौदह वर्षीय फ़िलिस्तीनी बच्ची की इच्छा बहुत छोटी है—वह केवल पढ़ना चाहती है, प्रेम और शांति के साथ जीना चाहती है। यह इच्छा किसी राजनीतिक विचारधारा की नहीं, बल्कि हर बच्चे के सार्वभौमिक अधिकार की अभिव्यक्ति है। यदि दुनिया उसे भी पूरा नहीं कर सकती, तो हमारी सभ्यता की सारी उपलब्धियाँ अधूरी हैं।
एक हज़ार दिनों के बाद सबसे बड़ी आवश्यकता किसी एक पक्ष की जीत नहीं, बल्कि मनुष्यता की जीत है। युद्ध अंततः बातचीत की मेज़ पर ही समाप्त होते हैं; यदि ऐसा है, तो जितनी जल्दी यह स्वीकार कर लिया जाए, उतनी ही अधिक जिंदगियाँ बचाई जा सकती हैं। इतिहास यह नहीं पूछेगा कि किसके पास अधिक शक्तिशाली हथियार थे; वह यह पूछेगा कि जब बच्चे मर रहे थे, तब दुनिया क्या कर रही थी।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका ‘धरती’ के संपादक हैं।)