नई दिल्ली। साहित्य और कलाओं से विचारहीनता की माँग के दौर में छात्र आंदोलन के चित्रकार ध्यान खींचते हैं। दिल्ली के प्रतिष्ठित ‘कॉलेज ऑफ आर्ट’ से निकले ये युवा आर्टिस्ट जंतर-मंतर के घटनाक्रम के बीच ब्रश से प्रतिरोध दर्ज कर रहे हैं।
बुधवार शाम आंदोलन के मुख्य मंच से दूर जंतर-मंतर के मुख्य द्वार के पास काम में जुटे युवा चित्रकारों के समूह से संक्षिप्त बातचीत का मौक़ा मिला। सफ़ेद चार्ट पर क्लैट स्कैच और कुछ रंगों से बनाए गए चित्र को अंतिम टच दे रहे युवक ने अपना परिचय तिलक मार्ग स्थित ‘कॉलेज ऑफ आर्ट्स’ के पास आउट के रूप में दिया। उसके सहयोगी दीक्षांत जो ख़ुद इसी स्कूल से निकले हैं, ने इस सवाल पर कि क्या वे लोग किसी ख़ास कला-आंदोलन या किसी संगठन से जुड़े रहे हैं, कहा, नहीं। उन्होंने कहा कि परेशान छात्रों के प्रति एकजुटता की भावना उन्हें और उनके दोस्तों को यहाँ खींच लाई।
कला एक सामाजिक ज़िम्मेदारी है और वह समाज की हलचलों से ही निखरती है। कला अभिव्यक्ति का माध्यम है और जो हमारे आस-पास हो रहा है, वह हमारे भीतर जो भाव पैदा करता है, वह चित्रों में आएगा ही। यहाँ जो चित्र बनाए जा रहे हैं, उनकी प्रेरणा यहाँ की गतिविधियाँ ही हैं। लाठीचार्ज हुआ, ख़ून बिखरा, इतना कुछ तहस-नहस हुआ, उसे इस पेंटिंग में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यहाँ हमारे किसी भी चित्र या पोस्टर का श्रेय किसी एक आर्टिस्ट को नहीं है। यह सामूहिक काम है। एक-दूसरे के साथ भावनात्मक व बौद्धिक साझेदारी से विकसित। शीर्षक पूछने पर पहले उन्होंने चित्र को शीर्षकविहीन बताया। बाद में साथी कलाकार जोगेंद्र सिंह से सलाह करके उन्होंने कहा कि इसे ‘केयोस’ कहा जा सकता है।

जोगेन्द्र सिंह के मुताबिक, उन्होंने ‘स्कूल ऑफ आर्ट्स’ से मास्टर्स की पढ़ाई की है। वे जिस चित्र पर काम कर रहे थे, उसमें कंकाल-खोपड़ियों में कमल खिला रहे थे। मैंने पूछा कि क्या यह राजनीतिक कला है, उन्होंने कहा कि जो देश में हो रहा है, यह वही है, लाशों पर खिला कमल। यह पूछने पर कि उनकी प्रेरणा कौन कलाकार रहे हैं, जोगेंद्र सिंह ने कहा कि आर्ट एक पावरफुल माध्यम है। आर्टिस्ट उसे व्यक्त करने के अपने तरीक़े तय करते हैं। सबके सोचने की क्षमताएं अलग हैं और व्यक्त करने की भी। हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि हमारे कंसर्न कला के माध्यम से जनता के बीच जाएं। जनता से हासिल कला को जनता को लौटाने के से अंदाज़ में बात कर रहे इस आर्टिस्ट ने माना कि आम लोग पॉपुलर मीडिया से ज़्यादा प्रभावित होते हैं और इस तरह की कलाएं उन तक सीधे कम पहुँचती हैं। उन्होंने कहा कि छात्रों के ज़रिए उनकी कला के सरोकार दूर तक असर पैदा करें, उनकी यही कोशिश है।
भारत में प्रदर्शनकारी कलाओं के इलीट व आधुनिक प्रारूपों में सर्वहारा के प्रतिरोध के उदाहरण कम मिलते हैं तो इस लिहाज़ से उनके आदर्श चित्रकार कौन हैं? इस सवाल पर एक युवा चित्रकार ने पूछा कि क्या आप अवनींद्रनाथ टैगोर को जानते हैं। मैंने हाँ कहा तो इस चित्रकार ने कहा कि उनकी ‘भारत माता’ पेंटिंग पॉलिटिकल विरोध की ही पेंटिंग तो थी, अंग्रेजों के ख़िलाफ़। मैंने कहा, सांस्कृतिक रूप से प्रतिरोध की पेंटिंग थी, कहा नहीं जा सकता। एक युवा चित्रकार ने राजा रवि वर्मा का नाम लिया, उनके देवी देवताओं के चित्रों पर ज़ोर देते हुए। इस युवक ने अपना नाम डेविड बताया। मुझे थोड़ी हैरानी भी हुई। जाहिर है, अलग-अलग समझ के और अलग अलग प्रेरणाओं के इन चित्रकारों में कॉमन समानता इस आंदोलन से जुड़ाव थी।
अपने साथियों मोहन और विजेंद्र के साथ काम में जुटे चित्रकार साहिल मेहरा ने कहा कि उनकी समझ के पीछे उनकी फैमिली की चेतना का भी योगदान है। मैंने कई चित्रकारों से पूछा कि क्या उन्हें डर नहीं लगता तो उन्होंने कहा कि डर तो लगता है लेकिन कलाकार ऐसे हालात में अभिव्यक्ति से कैसे बच सकता है।

फाइन आर्ट के इस समूह से आगे बढ़ने पर भी युवाओं के हाथों में स्लोगन वाले पोस्टर नज़र आते रहे, कंप्यूटर से निकाले गए पोस्टर्स भी। अपना नाम राहुल बता रहे एक युवक के मुताबिक, वह नीट एग्जाम में हुई धांधली से प्रभावित हुए अपने भतीजे आयुष के कारण आंदोलन में शामिल होने रोहतक से यहाँ आए हैं। यह कहने पर कि इस आंदोलन के बावजूद बसों में आम लोग इस आंदोलन के विरोध में बोलते मिल जा रहे हैं, राहुल ने कहा कि लोगों के मन में धर्म के नाम पर नैरेटिव सेट कर दिया गया है और हर बात को वे इसी आधार पर समझा लिए जाते हैं। राहुल ने इस बात से इंकार किया कि वे किसी छात्र संगठन से जुड़े हुए हैं। नॉर्थ ईस्ट की दिल्ली में पढ़ रहीं कुछ स्टूडेंट्स भी पोस्टरों के दिखाई ज़रिए अपनी बातें प्रदर्शित करती हुई दिखाई दीं।
सरकार के प्रति गुस्सा और नाराज़गी जंतर-मंतर पर मौजूद शांति से बात रख रहे युवाओं का भी प्रमुख भाव था। इनसे अलग अपनी बोली बानी में दिल्ली के ही लग रहे कुछ युवा पेन से काग़ज़ पर लिखी इबारतें लहरा रहे थे। इनमें गालियों का इस्तेमाल था। इस बारे में तर्क करने या इस भाषा पर सवाल करने पर कुछ युवा नाराज़ हो जा रहे थे। उस युवक की कंप्यूटर से ही प्रिंट कर निकाली गईं तस्वीरें भी इन प्रदर्शनकारियों के हाथों में थी जो सांसद मार्च के दिन पुलिस के साथ सादे कपड़ों में था। इस पोस्टर को पुतले की तरह जलाया भी गया।
माहौल में एक तनाव उभर रहा था। फोर्स अपनी बेरिकेडिंग के पास से युवाओं को दूर रहने के लिए कहने लगी थी और एक कोने में कुछ धुआँ भी किया गया था जिसे लेकर आशंका की स्थिति थी। इस बीच युवाओं के स्थानीय लग रहे समूहों में भगदड़ और आपसी खींचतान के दृश्य भी पैदा होते रहे। ऐसे मौक़े पर मुख्य मंच से बाहर की इन हलचलों को समझने एड्रेस करने वाला कोई नहीं था।

पुलिस बैरिकेडिंग के पास मिलीं कुछ महिला अधिवक्ताओं के मुताबिक, वे मानवाधिकार हनन की घटनाओं को दर्ज करने के लिए जंतर-मंतर पर हैं। इनमें से एक ने अपना नाम चेतना बताया। एडवोकेट चेतना ने कहा कि युवाओं में आक्रोश है। लोकतांत्रिक संस्थाओं ने निराश किया है और दमन किया जा रहा है तो आक्रोश स्वाभाविक है। संसद मार्च वाले दिन लाठीचार्ज के दौरान एक एक बच्चे पर कई कई पुलिस वाले टूट पड़ रहे थे। सरकार एक जेनुइन व मामूली मांग पर इस तरह दमन से रिस्पॉन्ड कर रही है।
मुख्य मंच की तरफ़ जा कर आंदोलन के प्रमुख नेताओं से बात कर पाना मेरे लिए नामुमकिन था। वहाँ से निकल कर गलियों से होता हुआ मैं हनुमान मंदिर के पास पहुंचा। आसपास के मेट्रो गेट बंद होने के कारण यहाँ आम शामों के मुक़ाबले सन्नाटा था। जिस दुकान से मैंने पानी ख़रीदा, उसकी मालिक जानना चाहती थी कि क्या मैं जंतर-मंतर होकर आया हूँ।
मैं रिपोर्टर हूँ, मेरे ऐसा कहने पर वह बहस की मुद्रा में यह जानने पर आमादा होने लगी कि मैं क्या सोचता हूँ, हालांकि वह मुझसे कुछ जानने के बजाय यह बताने में ही लगी रही कि इस तरह के आन्दोलन का कोई मतलब नहीं है और यह सब ‘राजनीति’ है। बस में भी यही स्थिति थी। भीड़ नहीं थी और मध्यवर्गीय यात्रियों में से कुछ पॉपुलर मीडिया की सामग्री को तथ्य की तरह पेश कर रहे थे कि किस तरह कांग्रेस के दौर के पेपर लीक के मामलों पर कोई नहीं बोलता था लेकिन अब मामूली बात को मोदी जी के ख़िलाफ़ राजनीति करने का मुद्दा बनाया जा रहा है।
इन लोगों का कहना था कि कांग्रेस के समय में कभी कोई आंदोलन नहीं किया गया था। किसी ने विरोध किया और अन्ना आंदोलन का ज़िक्र किया तो एक पैटर्न की तरह बात धर्म तक पहुंच गई। साफ़ है कि सरकार के समर्थक सार्वजनिक जगहों पर ज़्यादा मुखर होते हैं। एक बात यह कि धरना स्थल पर ‘गोदी मीडिया’ का जितना भी विरोध हो, आम लोगों का बड़ा तबका इस ‘मेनस्ट्रीम’ के मीडिया में जो दिखाया जा रहा है, उस को समझता है।
(धीरेश सैनी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)