देश की वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं वैदेशिक परिस्थितियां पल पल बदल रही हैं, चिंतनीय पहलू यह है कि इनमें नकारात्मक बदलावों का पुट अधिक है अर्थात सरकार की नाकामियां और षड्यंत्र ज्यादा उभर कर सामने आ रहे हैं। राष्ट्रवादी और मजबूत सरकार का दंभ भरने वाली सत्ता उपरोक्त सभी मुद्दों पर नकारेपन का नित नया रिकॉर्ड बना रही है।
2024 के लोकसभा चुनावों में ‘अबकी बार 400 पार’ के नारे के साथ हैट्रिक सरकार का दावा करने वालों को देश के मतदाताओं ने 240 सीटों पर ही समेटकर संविधान को नवजीवन प्रदान किया था, जिसे सत्ता पक्ष की ओर से बदलने की लगातार बयानबाजी होती रही थी।
इस अप्रत्याशित जनमत से हतप्रभ संघ परिवार ने सत्ता पर कब्जे को अक्षुण रखने केंद्रीय चुनाव आयोग, केंद्रीय एजेंसियों, चुनावी रिश्वतों के सहारे एक एक कर हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, आसाम, पश्चिम बंगाल की विधानसभाओं पर कब्जा किया। इनकी सत्ता की हवस के समक्ष चुनावी परिदृश्य से राजनीतिक शुचिता, निष्पक्ष चुनाव बीते दौर की बातें हो गई।
जून 2024 चुनावों में 240 सीटों पर सिमटने का जख्म झेलने वाली भाजपा ने सत्ता में आते ही अपनी स्थाई पकड़ हेतु कुचक्र शुरू कर चुनाव आयोग के सहयोग से पक्षपाती एसआईआर के माध्यम से राज्यों में अकल्पनीय बहुमतों के साथ सरकारें बनाई, उपरोक्त राज्यों के चुनावी परिणाम इन तथ्यों की पुष्टि करते हैं। संघ परिवार की रणनीति एकदम साफ है कि पहले लोकतंत्र को पंगु बनाया जाए फिर संविधान को बदला जाए।
इसी थ्योरी के तहत यह सुनिश्चित किया गया कि पहले राज्यों में सुनामी बहुमत से राज्यसभा में दो तिहाई आंकड़े पुख़्ता कर लिया जाए, फिर लोकसभा के विपक्षी सांसदों,दलों को अपनी पालतू मीडिया के मार्फत बदनाम किया जाए तत्पश्चात अपने प्रपंचों तथा प्रलोभनों से उन्हें अपने पाले में किया जाए, इतने पर भी कोई कसर रहे तो जांच एजेंसियों के दुरूपयोग से, संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए उन्हें अपनी वॉशिंग मशीन में डाल दिया जाए।
अपने तीन चरणों के इन्हीं उपक्रमों से ही 293 सांसदों के समर्थन वाली एनडीए सरकार सीधे दो तिहाई बहुमत वाली सरकार बन गई, राज्यसभा में भी उसके पास दो तिहाई बहुमत हो गया है।
अब इसी दलतोडू बहुमत के दम पर यह अहंकारी सरकार आत्ममुग्ध तथा निरंकुश हो चली है। उसे देश की बुनियादी समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है, उसे देश की आर्थिक व्यवस्था का मतलब फ़क़त अपने चहेते उद्योगपतियों के हवाले सारे संसाधन करना ही समझ आता है। उसकी विदेश नीति की समझ यही है कि देश के हितों की अनदेखी कर केवल मोदी जी की व्यक्तिगत ब्रांडिंग ही कामयाब विदेश नीति है। भारत की सदियों प्राचीन सामाजिक व्यवस्था जिसमें सभी वर्गों का समावेश रहा, जिसे गंगा जमुनी तहजीब भी कहा जाता है, इनके लिए उसका आशय 80-20 की विभाजक नीति है।
अब जब कोई सरकार किसी जहरीली विचारधारा से ओतप्रोत होकर पक्षपाती सत्ता संचालित करेगी तो देश और समाज में वही अराजक स्थिति निर्मित होगी जो अब दिखने लगी है।
सत्ता के विगत 11 वर्ष तो इनकी हनक से इनके मन माफिक ही रहे जिसमें इन्होंने संविधान से परे जाकर अनेक कृत्यों को अंजाम दिया। हर उन विवादित मुद्दों को पिटारे से बाहर निकाला जिससे देश और समाज में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हो, जिसमें हम धारा 370 में परिवर्तन कर अनुच्छेद 35ए को हटाना, सीएए-एनआरसी पर बखेड़ा खड़ा कर दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे, यूसीसी पर विद्वेषपूर्ण तेजी से बढ़ना, एसआईआर के जरिए मुस्लिमों के नाम मतदाता सूचियों से हटवाना को शामिल कर समझ सकते हैं।
इसमें अच्छी खासी सफलता हासिल कर इन्होंने बहुसंख्यक वर्ग में भी भेद करने की प्रक्रिया को अंजाम दिया। जिसमें किसान आंदोलन को बदनाम करने से लेकर, महिला खिलाड़ियों के शोषण के खिलाफ आंदोलन को बेरहमी से कुचलने, समाज के कमज़ोर तबकों की बच्चियों के शोषण पर लुंजपुंज कार्यवाहियां शामिल हैं।
इसके अलावा गलत तरीके से जीएसटी लागू कर छोटे उद्योगपतियों, व्यापारियों के लिए दुश्वारियां पैदा करना, नई भर्तियों के प्रति उदासीनता बरत बेरोजगारों के हितों पर कुठाराघात करना, परीक्षा प्रणाली में इरादतन खामियां पैदा कर युवाओं की प्रतिभाओं के साथ अन्याय करना सेना भर्ती में बदलाव कर उसे राष्ट्रसेवा की भावना से व्यावसायिक सोच में बदलने की कवायद, वैज्ञानिकों की जायज जरूरतों पर आँख मूंदकर उनमें अपनी सेवा के प्रति विरक्ति पैदा करना भी शामिल है।
प्रतिभा संपन्न खिलाड़ियों के स्थान पर सिफारिश वाले कम प्रतिभाओं को मौका देना, राजनीति में अपने दल से ज्यादातर उन दागदार, कम शिक्षित, नफ़रती चेहरों को मौका देना जो समाज के लिए कतई आदर्श नहीं हो सकते बल्कि अत्यधिक हानिकारक हैं। ऐसी ही सारी कवायदें कर इन्होंने सत्ता पर अपनी मज़बूत पकड़ को अंजाम दिया।
बदलाव प्रकृति का कठोर तथा अकाट्य नियम है। जो अहंकारी सरकार सारे साधनों, संसाधनों से परिपूर्ण हो, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी अनरजिस्टर्ड एनजीओ का अटूट साथ हो, जिसे विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का तमगा हो, जिसने अधिकांश विपक्षी दलों को तोड़कर अपने में आत्मसात कर लिया हो, जिसने सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को तोड़ने, कमज़ोर करने, बदनाम करने, देश की प्रत्येक समस्याओं का जिम्मेदार ठहराकर एकदलीय और विपक्षहीन सरकार चलाने का लुत्फ उठा रही हो, उसकी कोई भी जवाबदेही न जनता के प्रति और न ही संसद के प्रति थी।
उस सरकार के लड़खड़ाने के संकेत पिछले वर्ष पहलगाम हमले, ऑपरेशन सिंदूर, अमेरिका के समक्ष घुटने टेकने की शर्मनाक कवायद, देश की गरिमा और संप्रभुता को ताक पर रखते हुए अमेरिका से ट्रेड डील, अपने सदाबहार मित्र देश रूस से अमेरिकी दबाववश दूरियां लाना, कठिन समय के हमारे भरोसेमंद पश्चिम एशियाई देशों की भावनाओं को दरकिनार कर इजरायल से अनावश्यक नजदीकियां, प्रत्येक घरेलू मोर्चे पर अनवरत विफलता से मिलने लग गए थे।
किसी भी जागरूक सरकार को इन गंभीर संकेतों से अपने में सुधार की जरूरत महसूस हो जाती पर इस सरकार को नहीं क्योंकि यह सत्ता सारी समस्याओं का हल अपने ही नागरिकों को धर्म की अफीम खिलाकर धार्मिक ध्रुवीकरण, बुलडोज़र कार्यवाही, पांच किलो राशन वितरण, योजनाओं के नाम पर नकदी वितरण जैसे कृत्रिम उपक्रमों को ही समझती है। इनमें समस्याओं के मूल पर जाकर उसे जड़ से हल करने की समझ कतई नहीं है।
तानाशाही प्रवृत्ति से ओतप्रोत सत्ता को यह मुगालता रहता है कि यह सारी व्यवस्था उनके लिए चिर स्थाई है और वह आजीवन सत्ता में बने रहेंगे, यही मूल समस्या इस सरकार के साथ भी है। अपने ही नागरिकों को कई भागों में विभाजित कर बड़े वर्ग को राष्ट्रवाद, हिंदू राष्ट्र, विश्वगुरु जैसे जुमलों से बहलाए रख, दूसरे वर्ग को सरकारी योजनाओं में लाभ देने के खेल में उलझाए रख, तीसरे वर्ग अल्पसंख्यको को अधिकतम योजनाओं से महरूम रख, मुख्य धारा से बाहर कर अपनी सत्ता संचालन निर्बाध गति से इस समय तक जारी रखी।
फरवरी 26 में पश्चिम एशिया में ईरान तथा अमेरिका इजरायल युद्ध से स्थिति के समय इस सरकार के हाथ से चीज़ें फिसलने लगीं क्योंकि सरकार ईरान की बजाय अमेरिका तथा इजरायल के पक्ष में खड़ी दिखी जिससे उसे निर्बाध गति से कच्चे तेल, एलपीजी गैस की आपूर्ति नहीं होने हालात बिगड़ने लगे। शेयर बाजार में आम निवेशकों के पैसे डूबने लगे, विदेशी निवेशक अपने पैसे निकाल कर दूसरे बाजारों में ले गए, डॉलर के मुकाबले रुपए की ऐतिहासिक गिरावट ने देश की अर्थव्यवस्था को बेहद कमजोर कर दिया। महंगाई अपने शबाब पर पहुंच गई।
जून 26 में अयोध्या के प्रभु श्री राम के मंदिर में चढ़ावा चोरी ने देशवासियों की धार्मिक भावनाओं को गहरी और न भूलने वाली चोट दी। इस कुकृत्य ने विदेशों में भी देश की खूब छीछालेदारी कराई। हिंदू आस्था के सबसे अहम केंद्र राम मंदिर में शुरू से अनियमितता, गबन, लूट, फ़रेब का खेल जारी था।
शुरुआत शिलान्यास से हुई जहां मोदी जी को सारा श्रेय देने की कवायद के चलते आवश्यक धार्मिक कर्मकांडों की अनदेखी की गई, फिर मंदिर निर्माण हेतु मिले दान में चोरी की गई, तत्पश्चात जमीन खरीदी में लूटपाट हुई, आगे मंदिर निर्माण में कमीशनखोरी हुई, इसके साथ ही फिर मोदी जी की जय जयकार हेतु एवं भाजपा को चुनावी लाभ दिलाने हेतु 22 जनवरी 24 को अपूर्ण मंदिर की ही प्राण प्रतिष्ठा करा दी गई, जिसका चारों शंकराचार्यों तथा कई बड़े धार्मिक जानकारों ने खुलकर विरोध किया था और इसे धर्मसम्मत नहीं माना था।
अब जून 26 में धर्मद्रोहियों ने आम आस्थावान रामभक्तों के चढ़ाये दानों पर ही डाका डाल दिया। इससे लोगों में भयंकर रोष फैला पर सुप्रीम कोर्ट के कहने पर केंद्र सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट की शुरुआती चुप्पी, प्रधानमंत्री मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह की खामोशी ने संघ के बड़े खेल को उजागर कर दिया। लीपापोती हेतु यूपी सरकार ने बिना एफआईआर के ही एसआईटी गठित कर दी।
जिसमें संघ से जुड़े चंपत राय बंसल संस्थापक महासचिव, गोविंद देव गिरी कोषाध्यक्ष, गोपाल राव नागरकट्टे प्रशासक, एवं सुभाष श्रीवास्तव दान गणना कक्ष प्रभारी एवं पीएम मोदी के विश्वस्त नृपेन्द्र मिश्रा मंदिर निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टी को बचाते हुए 08 छोटी मछलियों जो उन्हीं बड़े लोगों के मुंहलगे हैं, को गिरफ्तार करने की नौटंकी कर भक्तों की आँखों में धूल झोंकी गई है। इस मुद्दे ने भी मोदी सरकार की मुसीबतें बढ़ा दी हैं।
नीट पेपर लीक मुद्दे पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और छात्रों की अन्य मांगों को लेकर 2० जून 26 को दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी ने धरना प्रदर्शन शुरू किया और जाने माने समाजसेवी सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठे जिन्हें 18 जुलाई को जबरन उठाकर सफदरजंग अस्पताल में दाखिल कर दिया जिन्हें अब मेदांता अस्पताल में शिफ्ट किया गया है। 20 जुलाई को इसी मुद्दे को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर जुटे युवाओं द्वारा संसद मार्च आह्वान ने इस मोदी सरकार को बैकफुट पर ला दिया। देश ने इस दिन बहुत अप्रिय स्थितियां देखी।
एक तरफ जहां छात्र छात्राओं पर बेरहमी से लाठी चार्ज, अश्रु गैस, कर उन्हें गिरफ्तार करना, दूसरी तरफ संसद के सारे गेट बंद कर सुरक्षा व्यवस्था ऐसी चाक चौबंद की गई जैसे कोई बड़ा आतंकी हमला होने वाला हो, तीसरी तरफ प्रधानमंत्री का वहां से मुंह छिपाकर निकल जाना। सारे विश्व ने भी इन सारी अप्रिय घटनाओं को करीब से देखा है और अपनी धारणाएं बनाई होंगी जो निकट भविष्य में सामने आएंगी।
इस मुद्दे पर विपक्ष संसद में चर्चा चाहता था पर स्पीकर ओम बिड़ला ने अपने तरफ से अनुमति न देकर सरकार से सलाह करने की बात कही जबकि सदन में चर्चा स्पीकर का विशेषाधिकार होता है न कि सरकार का। इसे लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपने सांसदों के साथ प्रधानमंत्री आवास तक पैदल मार्च निकाला और वहीं धरने पर बैठ गए। पार्टी अध्यक्ष खड़गे जी, सपा अध्यक्ष अखिलेश जी और प्रियंका गांधी भी शामिल थे, जिन्हें हिरासत में लेने के बाद रिहा कर दिया गया। उधर युवाओं का प्रदर्शन जारी है।
सरकार के लिए स्थितियां अनुकूल नहीं हैं। उसे सूझ ही नहीं रहा कि इससे बाहर कैसे निकला जाए, फिलहाल तो वहां किंकर्तव्यमूढ़ता की स्थिति है।
इतिहास गवाह है कि तानाशाह क्रूर, बेरहम, अहंकारी तथा आत्ममुग्ध होते हैं पर यह भी उतना ही सच है कि वह बेहद कायर, छोटे दिलवाले, डरपोक और पीठ दिखाने वाले होते हैं। आज स्वयं को छप्पन इंच के सीने वाला बतानेवाले मोदी जी किसी तरह से इन चौतरफा मुश्किलों से छुटकारा पाना चाहते हैं। अपने राजनीतिक कैरियर में पहली बार वो इतनी बुरी तरह से घिरे हुए हैं। यह सारी समस्याएं इनकी खुद की बुलायी गई हैं, क्योंकि न इनमें विषयों की गहरी समझ है और न ही इनके किसी भी सहयोगी के पास।
एक अकेला सब पर भारी कहने वाले मोदी वाकई अपनी आत्ममुग्धता, अपने घमंड, अपनी नासमझी के चलते सारे देश पर भारी पड़ रहे हैं।
देश पहले भी कई झंझावतों में फंसा पर विजनरी लीडरों ने हमेशा देश को मुश्किलों से उबार लिया था और नागरिकों पर कोई बड़ी मुसीबतें नहीं आने दी थी। आज मोदी जी के नेतृत्व में देश इनसे वही अपेक्षा नहीं कर सकता क्योंकि ये खुद असुरक्षा की भावना से ग्रसित हैं, ये मूलतः सत्ता की राजनीति करने वाले हैं और अपनी उस सत्ता को बनाए रखने हेतु किसी भी स्तर तक जा सकते हैं, बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री इनके ट्रैक रिकार्ड की पुष्टि की जा सकती है।
ऐसे में जब स्वयं में समझ की कमी हो, सहयोगी भी उस स्तर के न हों तो यकीनन इन चौतरफा समस्याओं का सकारत्मक हल निकलना असंभव है, निश्चित ही मुझे इस सत्ता से इनके नकारात्मक परिणामों की ही आशंका है।
मेरी अपनी समझ है कि अपने सबसे विकट राजनितिक परिस्थितियों में फंसे मोदी जी धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा लेकर मामले को ठंडा करने का प्रयास करेंगे पर इससे बात बिल्कुल नहीं बनेगी क्योंकि यह फौरी तौर पर युवाओं के गुस्से पर तथा विपक्ष की आक्रामकता पर पानी डालने का प्रयास मात्र होगा। मोदी जी का पूर्व रिकॉर्ड बताता है कि वह बेहद शातिर अंदाज से अपनी चालें चलते हैं।
वो पहले प्रधान के इस्तीफे से स्थिति पर काबू पाने के बाद अपने असल रूप में सामने आएंगे। उनके कुटिल बाणों में अनेक तीर हैं जिनका उपयोग वो निकट भविष्य में करेंगे। मेरे विचार से पहली चाल मध्यावधि चुनाव हो सकती है, दूसरी चाल देश में आपातकाल लगा सकते हैं और तीसरी चाल संविधान में आमूलचूल परिवर्तन कर सारी शक्तियां अपने में समाहित करने की चल सकते हैं।
इतना तय है कि वह सत्ता के बिना नहीं रह सकते और अपने कार्यकाल में किए अनैतिक कृत्यों का भी भान है जिसकी सजा उन्हें नई सरकार से मिलना अवश्यंभावी है, बस इसी डर से वो कोई भी देश के लिए अप्रिय पर अपने लिए सुरक्षित कदम उठा सकते हैं जो देश को बहुत भारी पड़ेंगे और उससे जल्द ही उबरना काफी चुनौतीपूर्ण होगा।
संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलना है। मोदी सरकार इसी सत्र में परिसीमन बिल को फिर से सदन से पास करवाने हेतु पहल करेगी अब उसके पास दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत के आंकड़ों का बंदोबस्त भी है। ऐसे में बिल पास होने पर लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 816 हो जाएगी उस पर भी ज्यादातर सीटें हिंदी पट्टी राज्यों में बढ़ेंगी जहां भाजपा काफी मज़बूत है तो वह तुरंत मध्यावधि चुनाव की तरफ बढ़ेगी।
सरकार अगर बिल को फिर से पास करवाने में विफल रहती है तो भी वह अपने सबसे मज़बूत गठबंधन अर्थात केंद्रीय चुनाव आयोग, केंद्रीय एजेंसियों, एवं चुनावी मैनेजमेंट के जरिए मध्यावधि चुनाव का ही रुख करेगी, क्योंकि एक तो मोदी जी को पहले कभी गठबंधन सरकार चलाने का दबाव नहीं रहा था अब इस नाज़ुक परिस्थिति में उनके अपने सहयोगी उनसे छिटक न जाएं या उन पर अन्य तरह के दबाव न बना लें इससे बेहतर वो मध्यावधि चुनाव का ही विकल्प अपनाएंगे।
दूसरी परिस्थिति यह है कि जिस तरह से राहुल गांधी ने उन्हें हर तरफ से घेर रखा है, तथ्यात्मक रूप से सवालों की बौछार कर सरकार को सड़क से संसद तक निरुत्तर किया हुआ है वह मोदी जी को काफी विचलित कर रहा है। कल राहुल जी के पीएम निवास के आगे धरना प्रदर्शन फिर उन्हें बर्बरता पूर्ण तरीके से हिरासत में लिए जाने के गिरफ्तारी से भी सरकार बैकफ़ुट पर है।
ऐसे में अगर देश का जेन ज़ी भी राहुल जी के साथ कदमताल करता है तो मोदी जी के लिए स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी जिस पर काबू पाने हेतु वह देश में आपातकाल के विकल्प को भी चुन सकते हैं, जो देश को अंततः बहुत भारी पड़ेगा।
मोदी सरकार के पास तीसरा विकल्प इसी संविधान में अपने मनमाफिक बदलाव का है। सत्ता पर अपनी पकड़ हेतु वह संविधान संशोधन के जरिए असीमित शक्तियां प्राप्त कर सकते हैं वो विपक्ष की आवाज़ पूरी तरह से बंद कर सकते हैं। सरकार के खिलाफ बोलने, लिखने वालों को जेल का प्रावधान, सरकार से इत्तेफाक नहीं रखने वाले सोशल मीडिया पर पूरी तरह से प्रतिबंध, अल्पसंख्यकों तथा दलित वर्ग पर और अधिक लगाम जैसे कृत्य अवश्य किए जाएंगे।
यह भी संभव है कि अमेरिका, रूस, चीन जैसे यहां भी राष्ट्रपति प्रणाली लागू कर दी जाए और मोदी जी निर्बाध सत्ता संचालन करें।
आज देश उस दौर में पहुंच गया है जहां इस नफरती विचारधारा और अहंकारी सरकार के खिलाफ सभी दल एकजुट होकर जनता के सहयोग से इसे सत्ता से बाहर करने का भगीरथ प्रयास कर अपने महान पूर्वजों द्वारा दिया गया समृद्ध समाज, सभी को बराबरी का अधिकार प्रदान करने वाला मजबूत संविधान की रक्षा करें, सनद रहे कि आपको और आपके कृत्यों पर इस देश की सुधि जनता और इतिहास दोनों की पैनी नजर है।
आपकी कोई भी चालाकी इस देश और उसके लोकतंत्र की पीठ पर खंजर भोंकने का कुकृत्य माना जाएगा और आप पीढ़ियों तक खलनायकों की सूची से बाहर नहीं निकल पाएंगे। निज स्वार्थ तथा राजनीतिक मजबूरी से स्वयं को बाहर निकालें, आपसे जिंदा जमीर की अपेक्षा है। कायर शासक मजबूती का केवल ढोंग करता है, उसके डर से बाहर निकल समाज और देश के प्रति अपनी जवाबदेही का निर्वहन करिए यही आपका कर्तव्य है।
इस संधि काल में हम आम जनता में भी खामोशी और तटस्थता की कोई जगह नहीं है। हमें अपने एक मार्ग का चुनाव करना ही पड़ेगा। एक तरफ इस सरकार के खिलाफ खड़े होकर उसकी तमाम गलत नीतियों का मुखर विरोध सड़क पर अहिंसात्मक रूप से करें और अपनी मानसिक दृढ़ता का परिचय देकर आने वाली पीढ़ी के रहनुमा बनें या इस सरकार की प्रत्येक नीतियों का आंख मूंदकर समर्थन कर अपनी मानसिक गुलामी का परिचय देकर आने वाली पीढ़ी के गुनहगार बनें।
हमें सर्वप्रथम अपने देश और समाज को ही प्राथमिकता देनी होगी। किसी विचारधारा या दल का तर्कपूर्ण समर्थन लोकतंत्र में बिल्कुल जायज है पर अविवेकपूर्ण समर्थन नाजायज है और इसकी कीमत आने वाली पीढ़ी चुकाएगी। अभी की खामोशी हमारे मुर्दा समाज की पहचान पर मुहर लगाएगी।
जागिए और इस सरकार की तानाशाही प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएं, देश भर की सड़कों पर अपने बेहतर भविष्य की अहिंसक लड़ाई लड़ रहे बच्चे हमारे अपने हैं, उन्हें सक्रिय होकर सही रास्ता दिखाइए, अंततः हम सभी भारतमाता के ही लाल हैं।
अंत में इस सरकार से यही अपेक्षा करते हैं कि वह अपनी सत्ता हेतु कोई भी अप्रिय कदम न उठाए जिससे हमारा लोकतंत्र और संविधान कमजोर होता हो। सरकार देशहित में आंदोलनरत छात्र छात्राओं से तथा विपक्षी दलों से विचार विमर्श कर सकारत्मक निर्णय पर पहुंचे, इसमें ही सभी की जीत है।
(परमजीत बॉबी सलूजा का लेख)