दिल्ली: ‘द हाउसहोल्डर’ फ़िल्म का एक अहम ‘किरदार’  

नई दिल्ली। अज़ान के साथ होती सुबह, घरों से निकलता चूल्हों का हल्का धुआं और छत पर सो रहे अपने पति ( शशि कपूर) को जगाती पत्नी ( लीना नायडू)।  बैकग्राउंड में एक ग्रैंड मस्जिद जो पूरी फ़िल्म में ख़ुद ही एक किरदार लग रही थी। कोई रंग नहीं सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट। क़रीब 60-65 साल पहले दिल्ली कुछ ऐसी दिखती थी ! मर्चेंट-आइवरी प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी पहली फ़िल्म ‘द हाउसहोल्डर’ में दिल्ली की घटा ( घाटा) मस्जिद को देखकर मैं ख़ुद को दरियागंज जाने से रोक ना पाई। 

बारिश ने घटा मस्जिद की ख़ूबसूरती बढ़ा दी 

बारिश में ये मस्जिद और भी ख़ूबसूरत लग रही थी। लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर के बने तीन गुंबद वाली ये भव्य मस्जिद लग रहा था बारिश में वुज़ू बनाकर अपनी पाकीज़गी कायम कर रही हो। बारिश ने इसे और निखार दिया था। मस्जिद को हर एंगल से देखने की तमन्ना में मैंने ख़ुद को पूरी तरह से भिगा लिया लेकिन आंखें थीं कि इस मस्जिद से हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं। और इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत थी कि ये इतने भीड़-भाड़ वाले इलाक़े के क़रीब होकर भी सुकून का समंदर लग रही थी। अगर किसी का शोर था भी तो वे थे परिंदे। और शायद, यही वजह रही होगी कि ‘द हाउसहोल्डर’ फ़िल्म के लिए इस जगह को चुना गया। 

घाटा मस्जिद

घटा मस्जिद : ऐतिहासिक घटनाओं का ख़ज़ाना 

18 वीं सदी की इस मस्जिद का निर्माण औरंगज़ेब की चहेती बेटी ज़ीनत-उन-निस्सा ने करवाया था। इसलिए इसका नाम भी ज़ीनत-उल-मसाजिद है। हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि इसके गुंबद बारिश में घटाओं जैसे दिखते हैं इसलिए इसे घटा मस्जिद कहा जाता है। वहीं दूसरी तरफ इतिहासकारों का कहना है कि चूंकि ये मस्जिद किसी ज़माने में यमुना नदी के क़रीब थी और यहां ख़ैराती घाट था तो इसलिए इसे घाटा मस्जिद कहा जाता है जो आगे चलकर घटा मस्जिद हो गया। 

ये कहानी दिल्ली की है 

बहरहाल यहां नाम में कुछ नहीं रखा क्योंकि ये कहानी दिल्ली की है। हालांकि ये बात सच लगती है कि क़रीब ही यमुना नदी के होने की वजह से इस मस्जिद को ऊंचे चबूतरे नुमा प्लेटफॉर्म पर बनाया गया है। वैसे तो इस ऐतिहासिक मस्जिद की दीवारों में इतिहास की तहें बिछी पड़ी हैं। 18 वीं सदी से लेकर 1857 के विद्रोह तक इस मस्जिद ने बहुत कुछ देखा और सहा है। साथ ही इसे बनवाने वाली ख़ुद ज़ीनत-उन-निस्सा अपने-आप में एक अलग से कही जाने वाली कहानी की किरदार हैं लेकिन उन पर फिर कभी कहा जाएगा।  

दिल्ली एक किरदार के रूप में !

लौटते हैं फ़िल्म ‘द हाउसहोल्डर’ और उसके बहुत से सशक्त और शानदार किरदारों पर। फ़िल्म में नौजवान शशि कपूर और ख़ूबसूरत लीना नायडू के अलावा दुर्गा खोटे भी हैं। ज़्यादातर फ़िल्म इन तीनों के ईद-गिर्द ही घूमती है लेकिन इनके अलावा भी कोई था जो बहुत ख़ामोशी से अपनी भूमिका निभा रहा था, और ये थी 60 के दशक की दिल्ली ।

कहानी रूथ प्रावर झाबवाला ( Ruth Prawer Jhabvala)  के उपन्यास ‘द हाउसहोल्डर’ ( The Householder) पर आधारित है और इसकी पटकथा  ( महज़ 10 के भीतर) भी उन्होंने ही लिखी थी। मूल रूप से इंग्लिश में बनी क़रीब एक घंटा 41-42 मिनट की ये फ़िल्म आज के मुताबिक़ लो बजट लग सकती है। लेकिन, उस वक़्त इसे बनाने में इस्माइल मर्चेंट और जेम्स आइवरी को आर्थिक मशक़्क़त करनी पड़ी थी। 

फ़िल्म की कहानी प्रेम सागर ( शशि कपूर ) के नए-नए गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने को लेकर है, जहां वे अपनी नई-नवेली बेहद ख़ूबसूरत पत्नी इंदू ( लीना नायडू ) के साथ जीवन शुरू कर रहा था। ये कहानी उस मध्यम वर्गीय संसार की जद्दोजहद भी कहती है जहां इंसान संतुलन बनाने की मशीन बनता चला जाता है। फ़िल्म में प्रेम सागर ( शशि कपूर ) पर्सनल और प्रोफेशनल दोनों ही फ्रंट में घिरा दिखता है, वो समझ नहीं पाता कि जीवन की असली ख़ुशी क्या है और किसमें है। बहुत ही सादा इंसान प्रेम, हर किसी को ख़ुश रखने की कोशिश में लगा रहा है, लेकिन, एक वक़्त ऐसा आता है कि जब वे ये सब करते हुए थक जाता है और जीवन का असली मतलब तलाशने के लिए बेचैन हो उठता है। 

फ़िल्म की कहानी के साथ चलती दिल्ली 

फ़िल्म में दिखाया गया है कि मध्यम वर्गीय परिवार में एक अकेले कमाने वाले के लिए घर चलाना कितना चुनौतियों से भरा होता है, साथ ही प्रेम के लिए अरेंज मैरिज में अपनी नई साथी के साथ तालमेल बिठा कर जीवन की डगर पर आगे बढ़ना खट्टे-मीठे अनुभवों की दिनचर्या सा बन गया जिसमें वो जी-जान लगा रहता है । और फ़िल्म में उसके इस सफ़र में वो जहां भी जाता है चाहे वो उसकी नौकरी की जगह हो या फिर शादी-समारोह या दोस्त-यारों से मिलने-जुलने की जगह, हर कहीं बैकग्राउंड में दिल्ली भी साथ-साथ चलती रहती है। 

घटा मस्जिद और दिल्ली की बरसाती 

फ़िल्म के पहले सीन में दिखाई दी घाटा( घटा ) मस्जिद प्रेम सागर और इंदू के बरसाती ( दिल्ली में छत पर बने घर को कहा जाता है ) घर में अक्सर दिखती रहती है। कभी वो यहां बैठकर बातें करते दिखते हैं तो कभी लड़ते-झगड़ते। 

दिल्ली और उसकी हवेलियां

फ़िल्म में सागर और इंदू को एक शादी में शामिल होने के लिए मेहरौली जाने का न्योता मिलता है। जैसे ही इंदू को ख़बर मिलती है कि उसे बाहर जाने और बस में बैठने का मौक़ा मिलेगा वो उत्साहित हो जाती है, दोनों दिल्ली में चलने वाले आम ट्रांसपोर्ट का हिस्सा बस में सवार होकर मेहरौली निकल जाते हैं। रास्ते में जैसे ही इंदू बस से उतरती है तो उसकी चप्पल टूट जाती है, एक साधारण पति की तरह प्रेम, पत्थर उठा कर चप्पल को ठीक करने का जुगाड़ लगा लेता है। और यहां एक बार फिर बैकग्राउंड में दिखती है लोदी कालीन ऐतिहासिक इमारत, और साथ ही दिखती है, खुली और ख़ाली दिल्ली। 

शादी समारोह के दौरान दिखती हैं मेहराबदार दरवाज़ों वाली पुरानी हवेलियां, छज्जे, और सबसे अहम चौड़े-चौड़े रास्ते, वहीं जिस घर में शादी है वहां की छत से दिखाई देती है दूर-दूर तक फैली घने पेड़ों वाली मेहरौली( पर ये लोकेशन कहां है, कहना मुश्किल लगता है )  

सत्यजीत रे ने आर्ट पीस बना दिया फ़िल्म को

फ़िल्म के कई सीन कलात्मक फ्रेम में गढ़े दिखते हैं, साथ ही कई शॉर्ट कोई आर्ट पीस जैसे बन पड़े हैं और जिसके पीछे वजह लगती है फ़िल्म के साथ अप्रत्यक्ष रूप से सत्यजीत रे का जुड़ना। दरअसल, असीम छाबड़ा की किताब ‘ शशि कपूर- द हाउसहोल्डर, द स्टार’ में ज़िक्र मिलता है कि कोलकाता की यात्रा के दौरान जेम्स ( आइवरी ) की सत्यजीत रे से मुलाकात हुई थी। ये भी कहा जाता है कि सत्यजीत रे ने अपने सिनेमेटोग्राफर सुब्रत मित्रा से उनका परिचय करवाया था। साथ ही अपने कैमरामैन को भी उन्हें उधार दे दिया था। ( जिनका काम फ़िल्म में साफ़ नज़र आता है )  वहीं जब जेम्स और इस्माइल ने उन्हें फ़िल्म का रफ़ कट दिखाया तो उन्होंने ( सत्यजीत रे) अपने संपादक दुलाल दत्ता के साथ फ़िल्म को री-एडिट किया। 

ऐसा लगता है मर्चेंट-आइवरी प्रोडक्शंस पर सत्यजीत रे का असर आगे बनने वाली फिल्मों में भी दिखा जैसे ‘ शेक्सपियरवाला’, ‘बॉम्बे टॉकी’ और ‘हीट एंड डस्ट’ । 

बात करें ‘द हाउसहोल्डर’ में दिखने वाली दिल्ली की तो इसमें कहीं मेहरौली का खुला आसमान दिखता है। तो कहीं लाल क़िले और सलीमगढ़ के क़िले को जोड़ने वाले पुल के नीचे प्रेम सागर ( शशि कपूर ) अपने दोस्त के साथ चहलक़दमी करते दिखते हैं, आज यहां से दिल्ली की रिंग रोड गुज़रती है। फ़िल्म भले ही ब्लैक एंड व्हाइट है लेकिन जंतर-मंतर इसमें कमाल का दिखा। वहीं इसके बाहर से गुज़रती सड़क पर घने पेड़ बहुत सुकून देने वाले लगते हैं । एक सीन में साइकिल से घर लौटते प्रेम और उनका दोस्त जिस धूल उड़ाती कच्ची सड़क पर चलते दिखते हैं उसे देखकर यक़ीन करना मुश्किल हो जाता है कि क्या कभी दिल्ली ऐसी भी दिखती थी। फ़िल्म में जगह-जगह दिखती लोदी और मुग़ल दौर की इमारतों के अलावा औपनिवेशिक दौर का बंगला भी अपनी कहानी कहता दिखता है।  

एक कमरे के घर में पर्दा लगा कर पार्टिशन का तरीक़ा गुजरे दौर की ज़िन्दगी बयां करती है, आज की तारीख़ में ये देखना ही अजीब सा लगता है कि दिल्ली जैसे महानगर में कभी घरों में चूल्हों पर भी खाना बनता था। और उसकी गलियों में मेहमान टांगे से उतरते थे और कभी किराए के तौर पर एक रुपये चार आना देना लगता था जैसे किसी ने जेब पर डकैती डाल दी हो। ये फ़िल्म दिल्ली के मशहूर उन बैंड वालों की भी याद दिलाती है जिसका हिस्सा कभी शहनाई भी हुआ करती थी। 

फ़िल्म दरियागंज से मेहरौली और संजय वन ( यक़ीनन पर दावा नहीं कर सकती ) तक जाती है, जहां प्रेम सागर जीवन का अर्थ समझने के लिए एक आध्यात्मिक गुरु के पास पहुंचता है, प्रेम को गृहस्थ जीवन के कर्तव्य समझ आते ही उसका जीवन भी सुखी हो जाता है। और फ़िल्म का एक सुखद अंत होता है। 

दरियागंज में घाटा ( घटा ) मस्जिद की जिस बरसाती में इस फ़िल्म की शूटिंग हुई थी आज वहां आज दमकल और नवभारत टाइम्स का कोई ऑफिस दिखा।  

जामा मस्जिद

( दिल्ली की एक ख़ूबसूरत शाम ) 

ये फ़िल्म दिल्ली वालों के लिए एक ट्रीट है 

बहरहाल, ये फ़िल्म आज की तारीख़ में देखना हर किसी के लिए अलग अनुभव हो सकता है, लेकिन एक दिल्ली वाले के लिए ये एक सुखद अनुभव है। ये फ़िल्म उन लोगों के लिए एक ट्रीट है जिन्होंने दिल्ली की ख़ुली सड़कों पर ख़ाली-ख़ाली डीटीसी बसों में सफ़र किया होगा,  जो ये जानते होंगे कि कभी दिल्ली में भी डबल डेकर बसें दौड़ती थीं, आज जिन सड़कों पर ट्रैफिक जाम में फंस कर लोगों की उम्र का एक हिस्सा ख़त्म हो रहा है, उन्हीं सड़कों पर घंटे या आधे घंटे के अंतराल पर इक्का-दुक्का कार ही फर्राटा भरती दिखती थी। 

हमारे आस-पास जो कुछ घट रहा होता है उसकी झलक अक्सर फ़िल्मों में दिखाई देती है, लेकिन मौजूदा दौर में ये स्पेस ख़ाली दिखता है, जिन्हें प्रोपगैंडा पर बन रही फ़िल्मों से भरा जा रहा है, आज फ़िल्म का मतलब क्या है समझ से परे है, मैंने आख़िरी बार सिनेमा हॉल में जाकर कौन सी फ़िल्म देखी थी याद ही नहीं आ रहा। 

मैं सोचती हूं आज जब मैं 60-70 के दशक की फ़िल्म देखती हूं तो दिल ख़ुश हो जाता है, लेकिन मौजूदा दौर की ये फ़िल्में जब आज की जनरेशन अपनी ढलती उम्र में देखेगी तो क्या सोचेगी? 

क्या अब भी उपन्यासों पर बनती हैं फ़िल्में ? 

बेशक, सिनेमा कला का हिस्सा है, वो कलात्मक अभिव्यक्ति होती हैं, लेकिन अभी सिनेमा के नाम पर जो परोसा जा रहा है उसका कला से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं लगता। आर्ट समाज को एक आकृति देता है पर अभी सिनेमा एक भीड़ तैयार करने का काम कर रहा है। आख़िर अब उपन्यासों पर आधारित फ़िल्में क्यों नहीं बनती दिख रहीं ज़ाहिर सी बात है शायद वैसा लिखा ही नहीं जा रहा हो, तो सवाल उठता है आख़िर वैसा क्यों नहीं लिखा जा रहा ? क्या लिखने पर पाबंदी है? जवाब आप को ख़ुद मिल जाएगा।  

जब अज़ान की आवाज़ से नहीं थी दिक़्क़त 

फ़िल्मों में बढ़ती एक समुदाय के लिए नफ़रत, एक एजेंडा बन गई है। फ़िल्म  ‘द हाउसहोल्डर’  में मस्जिद से सटा एक हिन्दू परिवार अज़ान के साथ सुबह नींद से जागता है और ये उसकी ज़िन्दगी का हिस्सा है बिल्कुल नॉर्मल सा। दिल्ली बदल गई है, जी हां, हर लिहाज़ से, मुस्लिम नामों पर रखे रास्तों के नाम बदल दिए गए हैं, मुस्लिम, मुग़ल और उर्दू अब एक समुदाय के साथ जोड़ दिए गए हैं जो अब सिर्फ सिनेमा में नफ़रत के लिए परोसे के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि आज ज़्यादातर बन रही प्रोपेगेंडा फिल्मों में अज़ान, मुस्लिम पहचान और नाम एक समुदाय को महज़ टारगेट करने के लिए किया जाता है। 

जिस तरह से इस फ़िल्म में दिल्ली को दिखाया गया है, वैसी झलक आख़िरी बार किस फ़िल्म में दिखी थी याद नहीं आता। ( हालांकि कुछ अपवाद हो सकते हैं )  इसके साथ ही ये एक इत्तेफाक था कि ‘द हाउसहोल्डर’ 1963 में जुलाई के महीने में ही भारत ( बंबई) में रिलीज हुई थी और कई दफ़ा देखने के बावजूद मैंने इसे एक बार फिर देख डाला। 

फ़िल्म ‘द हाउसहोल्डर’ एक परिवार की कहानी कहती है, लेकिन अनजाने में उसने 60 के दशक की दिल्ली की कहानी भी कह डाली, उस दिल्ली को देखकर एहसास होता है कि हमने इसकी क्या हालत कर डाली है। दिल्ली पर कभी  मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था –

I asked my soul: What is Delhi ?

She replied: The world is the body and Delhi its Life.

(नाज़मा खान स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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