प्रधानमंत्री के लाल किले के प्राचीर से 15 अगस्त, 2026 के संबोधन ने उनके जानने-समझने वालों को निराश नहीं किया होगा, चाहे उनके समर्थक हों या विरोधी। प्रधानमंत्री को जानने-समझने वाले जानते हैं कि उनका हर भाषण चुनावी होता है। भारत के प्रधानमंत्री चुनावी संबोधन के लिए जाने जाते हैं, यही कारण है कि प्रधानमंत्री मंच देखते ही चुनावी माहौल में खो जाते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का भाषण 2014 के बाद की उपलब्धियों तक सीमित रहा और इसने उन लोगों को निराश नहीं किया होगा, जो भारत को 2014 के बाद ‘आजाद भारत’ या ‘नया भारत’ कहते हैं। मोदी जी ने उत्तर-पूर्व राज्यों या उत्तर भारत के राज्यों पर कुछ नहीं बोला, क्योंकि जलते हुए मणिपुर से लेकर लद्दाख राज्य की मांग कर रहे लोगों पर फायरिंग की बात सामने आ जाती, तो मोदी जी पहली बार इससे बचते हुए नजर आए।
नरेंद्र मोदी के आलोचकों ने तो उनके कई उपनाम रखे हैं, लेकिन एक और नाम होना चाहिए—नामकरण करने वाला। क्योंकि चुनावी रैली से लेकर संसद तक में ‘पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड’, ‘दीदी ओ दीदी’, ‘कांग्रेस की विधवा’, ‘कपड़े से पहचानने वाले’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘आंदोलनजीवी’ जैसे नामकरण करने का श्रेय पहले से प्रधानमंत्री ले चुके हैं। इसी तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री से लेकर कई विपक्षी नेताओं, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अर्बन नक्सल की श्रेणी में डाला जा चुका है।
अभी तक लाल किला से नामकरण बचा हुआ था, लेकिन उन्होंने 15 अगस्त को उस रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया और एक नया नाम लाए—‘दिमागी नक्सल’। अखबारों में छपा, पहली बार लाल किले से गूंजा ‘वंदेमातरम्’। मैं कहना चाहता हूं कि लाल किले के प्राचीर से ‘नामकरण’ किया गया। आरएसएस-भाजपा समर्थित वक्ता टीवी डिबेट में तर्क रखने वालों को ‘दिमागी नक्सल’ कहकर संबोधित करना शुरू करेंगे।
एक तरफ लाल किले से प्रधानमंत्री ‘दिमागी नक्सल’ से सावधान कर रहे थे और उनको पहचान कर आइसोलेट करने की बात कर रहे थे। छात्रसाल स्टेडियम में दिल्ली की मुख्यमंत्री ने युवाओं से अर्बन नक्सल से सतर्क रहने की बात कही। आरएसएस-भाजपा समर्थित प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री यह नहीं बता रहे हैं कि ‘दिमागी नक्सल – अर्बन नक्सल’ कौन हैं? वे अपने विरोध की हर आवाज को इसी नाम से जानना चाहते हैं।
वे इशारों-इशारों में जंतर-मंतर से लेकर बिहार-झारखण्ड-पंजाब-मुंबई में छात्रों और बेरोजगार युवाओं के आक्रोश को कहना चाहते हैं। वे कहना चाहते हैं हैदराबाद के नेशनल एकेडमी ऑफ़ लीगल स्टडीज़ एंड रिसर्च (नालसार ) के छात्रों को, जिन्होंने ‘महामहिम’ के हाथों से डिग्री लेने से मना कर दिया। वे ऐसे व्यक्ति के चीफ गेस्ट होने पर सवाल खड़े कर रहे हैं, जो पुलिस ज्यादतियों का वीडियो नहीं देखना चाहता और लोगों को न्याय से मुंह मोड़ लेना चाहता है।
वह उस 18 साल के छात्र को, जो कहता है—‘‘दिस इज आवर कंट्री एंड वी आर रीक्लेमिंग…’’। वह उन युवाओं को कहना चाहते हैं, जिनके हाथों में पोस्टर था—मोदी जी, ‘‘चाय बेचो – देश मत बेचो’’।
यह आंदोलन जिसने धर्म और जाति, जेंडर की उस पहचान को पाट दिया, जिसको बीजेपी की राजनीति बढ़ावा दे रही थी। यहां बुर्के वाली लड़की हो या जालीदार टोपी वाला पुरुष, नीले गमछे वाला हो या लाल सलाम, स्कूली ड्रेस में हो या आधुनिक ड्रेस में—कोई किसी पहचान का हो, सब एक साथ थे। सब एक-दूसरे के जज्बात और हौसले को बढ़ा रहे थे।
इसलिए यह आंदोलन केवल छात्रों तक सीमित नहीं होकर समरसता बढ़ा रहा था, जहां सबकी पहचान आंदोलनकारी की थी। यही बात आरएसएस समर्थित बीजेपी जैसी दक्षिणपंथी पार्टियों के राजनीति के खिलाफ है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले एक दशक में फार्च्यून 500 कंपनियों में से 50 कंपनियां भारत की हों, यह हमारा लक्ष्य क्यों न होना चाहिए। लेकिन इन कंपनियों में खून-पसीना लगाने वाले मजदूरों/कर्मचारियों पर कुछ नहीं बोलते हैं।
वे अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं—‘‘आज युद्ध सीमा के अंदर कहीं रिफाइनरी में जाकर के, कहीं बैंकिंग सेक्टर को जाकर के, कहीं डाटा सेंटर को जाकर के, एक प्रकार से लड़ाई का नया रूप इंफ्रास्ट्रक्चर तोड़े जा रहे हैं, फैक्ट्रियां तोड़ी जा रही हैं।’’ प्रधानमंत्री का यह बयान जनवरी से जून तक विभिन्न शहरों में हुए मजदूर आंदोलनों के संदर्भ में देखा जा सकता है जहां वे ख़ुद को जिंदा रखने के लिए वेतन वृद्धि की मांग कर रहे थे।
क्या प्रधानमंत्री चाहते हैं कि कंपनियों की पूंजी बढ़े, लेकिन मजदूर अपनी स्थिति में सुधार की मांग न करे? वह उसी तरह जिंदा रहे, जिस तरह से उसके बाप-दादा जिंदा थे? इसी बात को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री अपने संबोधन में बताती है कि भारत को ढाई मोर्चे—दो मोर्चे देश के बाहर और आधा मोर्चा देश के भीतर—पर युद्ध का सामना करना पड़ रहा है। आज कर्मचारियों-मजदूरों की आजीविका का आंदोलन देश के प्रधानमंत्री को युद्ध जैसा क्यों दिखता है?
प्रधानमंत्री ने लाल किले से अपने 12 सालों का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए कई डाटा सामने रखा। डाटा पर हमारी जानकारी अधूरी है, इसलिए थोड़ी आंखों देखी और व्यवहारिक बातें प्रधानमंत्री जी से करना चाहते हैं।
प्रधानमंत्री कहते हैं—‘‘हर साल औसतन 15 गुना ज्यादा तेजी से हमने नल से जल कनेक्शन दिए। हर साल औसतन छह गुनी रफ्तार से लोगों को गैस कनेक्शन दिए।’’ प्रधानमंत्री जी, हो सकता है आपका आंकड़ा सही हो, लेकिन जब हम देखते हैं कि आपसे 15-20 किमी दूरी पर लोगों को जल के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ती है, वे घंटों मोटर चला-चला कर अपना समय बर्बाद करते हैं।
मैं एक सप्ताह पहले दिल्ली के अगर-नगर (नांगलोई) इलाके में था, जहां चार दिन बाद पानी आता है। वह भी एक से डेढ़ घंटा गंदा पानी होता है और 15-20 मिनट साफ पानी आता है, जिसमें लोग 400-500 लीटर पानी भर पाते हैं। मोदी जी, 500 लीटर पानी में कोई परिवार चार दिन रह सकता है? आपने जल कनेक्शन देने की रफ्तार 15 गुना बढ़ाई है, उसमें पानी भी आता है कि नहीं?
कनेक्शन देकर कंपनियों का माल तो बिक्री हो गई, लेकिन लोगों के पैसे के साथ-साथ समय भी बर्बाद हो रहा है। यह आपसे कुछ दूरी की दिल्ली की कहानी है। बाकी जगह तो हम देख ही रहे हैं कि किस तरह गंदा पानी पीकर लोगों की जान गई। आपकी गैस कनेक्शन देने की रफ्तार भी सही हो सकती है, लेकिन ईरान युद्ध के समय 400-500 रुपये किलो गैस खरीदने वाले मजदूरों का इससे कोई लाभ हुआ?
प्रधानमंत्री कहते हैं कि—‘‘हमने करीब 10,000 से अधिक अटल टिंकरिंग लैब छोटे-छोटे बच्चों के हवाले कर दी है।’’ प्रधानमंत्री जी, आपके आंकड़े पर मैं सवाल नहीं उठा रहा हूं। बस आपको यह बताना चाह रहा हूं कि जिस समय आप यह बोल रहे थे, उसी समय मप्र के छतरपुर के महाराजपुर क्षेत्र के टटम गांव में सड़क, पुल और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं की मांग को लेकर स्कूली बच्चे और ग्रामीण अपने विधायक कामाख्या प्रताप सिंह से मिलने के लिए 40 किलोमीटर पैदल चलकर रात को पहुंचे।
15 अगस्त को ही मप्र के वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री ने संवाददाताओं से स्कूली बच्चों के घेराव की बात बताई। चंदला विधानसभा क्षेत्र के बस्राही स्थित शासकीय माध्यमिक विद्यालय के छात्रों ने मंत्री दिलीप अहिरवार का रास्ता रोककर स्कूल तक समतल सड़क, बिजली आपूर्ति और अन्य बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं बताईं।
14 अगस्त को लखनऊ में जयप्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय के छात्रों ने घटिया भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं की बहाली और शिक्षकों की कमी को लेकर चक्का जाम किया, जिसमें समाज कल्याण मंत्री भी फंस गए। उन्होंने गाड़ी से उतरकर छात्रों की बातों को सुना और समस्या हल करने का आश्वासन दिया। यह खबर तो जरूर आप तक पहुंची होगी, क्योंकि यह एक दिन पहले की ही तो बात थी और आप भूले भी नहीं होंगे।
इसी तरह एक महीने के अंदर उत्तर प्रदेश के फतेहपुर, प्रयागराज, सुल्तानपुर, हमीरपुर, अमेठी; बिहार के गया; राजस्थान के अलवर, बारां, बाड़मेर, जालौर; महाराष्ट्र के पालघर, बीड, धाराशिव; मध्यप्रदेश के छतरपुर, सिरोंज, उज्जैन में स्कूली बच्चों ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किया है। इन सभी प्रदर्शनों में मुख्य मांगों में टीचर की कमी, बिजली आपूर्ति का नहीं होना, साफ पानी, छात्रावास, भोजन और सड़क की मांगें प्रमुख रही हैं।आप एक तरफ 10 हजार लैब की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ छात्र बेसिक जरूरतों की राह देख रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने घोषणा की—‘‘मिडिल क्लास परिवारों की हम चिंता करते हुए हजारों-करोड़ रुपए का उनका खर्च है, वो भी बचे, बेटे भी अपने आस-पास रह सकें, उनकी देखभाल हो सके, परिवार पर आर्थिक बोझ न आए और इसलिए हमने युवाओं के लिए विभिन्न परीक्षाओं की फ्री ऑनलाइन कोचिंग हमने करने का निर्णय किया है। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है, हमारे पास उत्तम टैलेंट है, टीचर्स हैं…..।’’
प्रधानमंत्री जी, मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं कि दिल्ली के अंदर जेजे कॉलोनी, बवाना के एच ब्लॉक में नगर निगम का तीन मंजिला स्कूल करीब 7 साल से बना हुआ है। उसमें अभी आपके टैलेंट टीचर्स भी आने लगे हैं, लेकिन उस स्कूल में किसी छात्र का दाखिला नहीं है। शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी द्वारा राज्यसभा में जानकारी दी है की एक लाख से ज्यादा स्कूल (सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और प्राइवेट सभी स्कूल शामिल हैं) सिर्फ एक टीचर के भरोसे चल रहे हैं।
प्रधानमंत्री जी, आप कोचिंग को बढ़ावा क्यों दे रहे हैं, ये किसके हित में है? स्कूलों में सभी विषय के टीचर हों, वे समय से आएं और बच्चों को सही से पढ़ाएं, कोर्स पूरा कराएं, बच्चों को ट्यूशन की जरूरत क्यों है? कोटा से लेकर दिल्ली, पटना तक सभी के कोचिंग सेंटरों की आपके पास जानकारी जरूर होगी।
प्रधानमंत्री जी ने एक और जानकारी साझा की, जिस पर मुझे संदेह है। वे बताते हैं—‘‘पिछले 5-7 दशक में सिर्फ 25 करोड़, हमने एक दशक के भीतर-भीतर 100 करोड़ देशवासियों को सोशल सिक्योरिटी का कवच दिया है।’’ अगर हम प्रधानमंत्री के कथन को सही मान लें तो देश के 89 प्रतिशत लोगों को सरकार सोशल सिक्योरिटी दे रही है और भारत की करीब 15 प्रतिशत जनता ऐसी है, जिसको सोशल सिक्योरिटी की जरूरत नहीं है, वो अपना खर्च वहन कर सकती है। क्या भारत की 100 प्रतिशत जनता चिंता मुक्त सोशल सिक्योरिटी में जी रही है?
प्रधानमंत्री जी ने महिला आरक्षण पर कहा कि—‘‘हमारी माताओं-बहनों को 33 प्रतिशत विधानसभा और लोकसभा में उनको प्रतिनिधित्व मिले, वह भारत की नीति गढ़ करके अंदर अपना योगदान दें। मैं सभी राजनीतिक दलों से फिर से आग्रह करता हूं, आइए महिला आरक्षण लागू करके महिला सम्मान में आप भी जुड़िए… लेकिन मेरी माताओं-बहनों को हक दीजिए।’’
प्रधानमंत्री जी, 20 और 21 सितम्बर, 2023 को लोकसभा, राज्यसभा में सर्वसम्मति से 106वां संविधान संशोधन कर ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पास हो चुका है। इस पर 28 सितम्बर को राष्ट्रपति महोदया का भी हस्ताक्षर हो चुका है। महिलाओं को उनके अधिकार देने से किसने रोका है?
आपको याद दिलाना चाहता हूं 28 मई 2023 की घटना, जिस दिन नए संसद भवन के सामने आप दंडवत हो रहे थे, उसी दिन एक किलोमीटर की दूरी पर भारत का तिरंगा उठाकर पोडियम पर खड़ी होने वाली महिला पहलवानों को सड़क पर घसीटा गया था। 20 जुलाई 2026 को आपसे एक किलोमीटर दूर प्रदर्शनकारी महिलाओं के कपड़े फाड़े गए, चांटे मारे गए, उनके पीछे डंडा डाला गया। आपने भी वह तस्वीर जरूर देखी होगी लेकिन आप ने एक शब्द बोलना उचित नहीं समझा।
प्रधानमंत्री कहते हैं—‘‘भारत का वाइब्रेंट लोकतंत्र है, भारत का मजबूत न्याय तंत्र है और हम सबको दिशा देने वाला भारत का संविधान है।’’
भारत के लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाले संसद भवन से दो किमी दूरी पर सरदार पटेल विद्यालय है, जहां प्रसिद्ध शिक्षाविद् जोया हसन को 14 अगस्त को ‘बहुलवाद’ पर बात रखनी थी, लेकिन विश्व हिंदू परिषद के 15-20 कार्यकर्ताओं ने उनके कार्यक्रम को नहीं होने दिया।
जेएनयू में उमर खालिद की पुस्तक पर 10 अगस्त को वार्तालाप के लिए ऑडिटोरियम बुक था, उसको जेएनयू प्रशासन ने रद्द कर दिया। इसी तरह के कई कार्यक्रम दिल्ली विश्वविद्यालय में रोकने पड़े। प्रधानमंत्री जी, क्या आप इसको वाइब्रेंट लोकतंत्र कह सकते हैं? संविधान हर व्यक्ति को बोलने-लिखने, पहनने, रहने, खाने, प्रेम करने की आजादी देता है लेकिन इसी देश पर बोलने और लिखने पर पाबन्दी लग चुकी है उनका नामकरण किया जाता है।
प्रेम करने वालों को धर्म अलग हो तो ‘लव जेहाद’ कह दिया जाता है। हाँ, आपने ही तो पहनावे पर कहा था की कपड़े से पहचानो! आप किस संविधान की बात कह रहे हैं?
अंत में प्रधानमंत्री जी ने सभी विचारों को घालमेल करते हुए कहा कि—‘‘भारत का सपना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने देखा था, बाबा साहब आंबेडकर ने देखा था, पंडित नेहरू ने देखा था, सरदार पटेल, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु ने देखा था, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देखा था, भगवान बिरसा मुंडा ने देखा था, ज्योतिबा फुले ने देखा था, उन सब से प्रेरणा लेकर के हम आगे बढ़े।’’ हम सभी जानते हैं कि इन महापुरुषों के विचारों में जमीन-आसमान का अंतर था। सभी के लिए आजाद भारत की रूपरेखा अलग-अलग थी।
प्रधानमंत्री जी से बस इतना कहना चाहता हूं कि यह वैसा ही है, जैसे किसान आंदोलन करें तो खालिस्तानी, पाकिस्तानी, चाइनीज एजेंट। मजदूर आंदोलन करे तो बाहरी और आपकी भाषण से अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध की संज्ञा आ रही है। युवा आंदोलन करे तो भटके हुए, दिमागी नक्सल, टुकड़े-टुकड़े गैंग। महिलाओं के लिए आपकी ट्रोल आर्मी की भाषा तो आप जानते ही होंगे और 20 जुलाई, 26 के दिन भी महिलाओं के साथ होने वाले सलूक को आपने देखा ही होगा।
आपके लिए सभी विचार एक जैसे हैं। वैसे ही अपने हक-अधिकारों की बात कहने वाले भी एक जैसे दिखते हैं और वे देशद्रोही की श्रेणी में खड़े कर दिए जाते हैं। लोकतंत्र में नामकरण की नहीं जवाबदेही की राजनीति होती है। अलग-अलग मांगों और विचारों वाले समूहों को एक ही राजनीतिक लेबल में बदल देना और ‘नामकरण’ की राजनीति मोदी सरकार कर रही है।
(सुनील कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)