ईरान जंग : साम्राज्यवाद-पूँजीवाद से टकराता मज़हब!-2

जंग में लाल शियावाद : इस्लाम की प्रगतिशील भूमिका!

विश्व में 50 से 53 मुस्लिम बाहुल्य देश हैं। लेकिन, ईरान पूरी तरह से धर्मतन्त्र शासित देश है, जिसमें अंतिम निर्णय का अधिकार अली यानी सर्वोच्च धार्मिक नेता के पास होता है। यद्यपि, विधिवत सरकार, राष्ट्रपति, संसद और सेना प्रधान होते हैं। लेकिन, राष्ट्र की शिखर कमान अली के पास ही होती है। मसलन, ईरान को एटम बम बनाना चाहिए या नहीं, इसका अंतिम फैसला अली मुज्तबा खुमैनी (सुप्रीम लीडर) लेंगे।

सारांश यह है कि धार्मिक नेतृत्व के अधीन ईरान राज्य विश्व के सर्व शक्तिशाली पूंजीवादी देश अमेरिका से सशस्त्र टक्कर ले रहा है। प्रायः धार्मिक नेतृत्व राजसत्ताओं के साथ मिल कर चलता है; वैटिकन के पोप कभी भी अमेरिका और पश्चिम के पूंजीवादी देशों से टकराना नहीं चाहेंगे। दूसरी तरफ, ईरान और उसके आला धार्मिक नेता डोनाल्ड ट्रंप के समक्ष समर्पण के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। ईरान के खिलाफ ट्रंप की धमकियां और हमले बढ़ते ही जा रहे हैं। लेकिन, ईरान झुकने के लिए तैयार नहीं है।

इस दृष्टि से, इस्लाम धर्म का एक शिया समुदाय क्रांतिकारी भूमिका निभा रहा है। इसके विपरीत, पूंजीवादी और सामंतशाही सुन्नी देश अमेरिका और उसके मित्र देशों के समक्ष नतमस्तक हैं; सऊदी अरब, मिस्र, यूनाइटेड अरबअमीरात, जार्डन जैसे देशों की दोस्ती इजरायल के साथ है। ईरान के धार्मिक नेतृत्व ने अमेरिका के एकल ध्रुवीय शक्ति तंत्र में सुराख कर दिया है। इसके साथ ही नई विश्व व्यवस्था के निर्माण का मार्ग भी दिखला दिया है।

अब बहु ध्रुवीय शक्ति व्यवस्था तेज़ी से उभरेगी, पश्चिम एशिया के देशों में अमेरिकी वर्चस्व पहला जैसा नहीं रहेगा क्योंकि वहां मौज़ूद अमेरिकी सैन्य छावनियों के कारण इन देशों को ईरानी हमलों को झेलना पड़ रहा है। हमलों के कारण इन देशों में भारी तबाही हो रही है। ईरान समर्थक हुती विद्रोहियों के निशाने पर सऊदी अरब है। हुती विद्रोही उसके तेल टैंकरों पर हमला कर रहे हैं। उनका जल मार्ग रोक रहे हैं।

दूसरी ओर सुन्नी समुदाय का धार्मिक नेतृत्व शांत और समझौतावादी बना हुआ है। सुन्नी समुदाय प्रधान देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने बने हुए हैं। इन देशों में से किसी में भी अमेरिका से पंगा लेना का साहस नहीं है, क्योंकि पूँजीवाद का दास धर्म-मज़हब  बन गया है।

ईरान के धार्मिक नेतृत्व ने राज्य को पूंजीवाद के दास में तब्दील होने से रोका हुआ  है। यही वजह है कि हज़ार कोशिशों के बावजूद  ट्रम्प और नेतन्याहू की जंगखोर+सौदागर जोड़ी ईरान में तख़्ता-पलट करवाने में अभी तक निराशाजनक रूप से नाकाम रही है। इस कुत्सित जोड़ी को उम्मीद थी कि 28 फरवरी के हमले के बाद ही ईरान में मज़हबी नेतृत्व की सत्ता का खात्मा हो जायेगा और विशुद्ध आधुनिक पूंजीवादी व अमेरिकापरस्त निज़ाम क़ायम हो जायेगा।

अमेरिका ने इराक़, सीरिया, वेनेज़ुएला, पाकिस्तान जैसे देशों में यही दास-कथा को दोहराया है। लेकिन, ईरान के अनुभव ने जोड़ी की रणनीति को ध्वस्त कर दिया। यद्यपि, धार्मिक नेतृत्व के विरुद्ध ईरानी युवा वर्ग में असंतोष रहा है और वह इससे छुटकारा पाना चाहता था। युवा वर्ग चाहता था: आज़ादी और उदार सरकार। लेकिन, अमेरिका+इजराइल के आक्रमण ने ईरान को एकजुट कर दिया। यही वजह थी कि दिवंगत सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की जनाज़े में करोड़ों ईरानी उमड़े और ‘बदला, बदला, बदला’ के नारे लगे। बदला का इशारा था ट्रम्प और नेतन्याहू का ख़ात्मा।

ट्रम्प को इस जन सैलाब की उम्मीद कतई नहीं थी। उन्हें उम्मीद थी कि ख़ामेनेई की मृत्यु से ईरान की जनता ख़ुश होगी और हमले का स्वागत करेगी, लेकिन युद्धोन्मादी जोड़ी का ख़्वाब अधूरा रह गया। एक वजह यह भी रही है कि सौदागरी मानस से भरी जोड़ी को   एशियाई सम्वेदनशीलता का ऐहसास कभी नहीं हो सकता। यह जोड़ी राष्ट्र के अस्तित्व को ‘सौदा या धंधा’ के रूप में देखती है, मनुष्य को ‘वस्तु मात्र’ मानती है।

इस जोड़ी ने ग़ज़ा में यही तो किया है; इजराइल की सेनाओं ने 70 हज़ार से अधिक लोगों की हत्या की, जिनमें 20 हज़ार से अधिक बच्चे शामिल हैं; एक लाख से अधिक ग़ज़ावासी हताहत हुए हैं। यह जोड़ी ग़ज़ावासियों के शवों पर सितारा पर्यटन स्थल का निर्माण करना चाहती है। ईरान के लिए भी जोड़ी यही ख़्वाब संजोए हुए है। लेकिन, अब तक गहरी निराशा ही हाथ लगी है, क्योंकि धार्मिक नेतृत्व ने अपने क्रांतिकारी चरित्र को सुरक्षित रखा हुआ है, उसका मनोबल ऊंचा है। नेतृत्व के पीछे जनता लामबंद है। 

वह अब निज़ाम से ‘अणु बम’ बनाने की मांग कर रही है,  जोड़ी के जंगी मंसूबों को शिकस्त देने के लिए कह रही है। वास्तव में, धार्मिक नेतृत्व की क्रांतिकारी नैतिक शक्ति से ईरानी सेना व जनता समृद्ध है.. इसे समझने की ज़रुरत है। 

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। विधिवत संविधान के प्रावधानों से बंधा हुआ है। लेकिन, 2014 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ+भाजपा सरकार ने सुनियोजित ढंग से राज्य की संस्थाओं का ‘हिंदुत्ववादीकरण’ और संविधान का हाशियाकरण करने की लगातार कोशिशें की हैं।

विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी पर ट्रम्प अमेरिका के समक्ष सपर्पण करने के आरोप लगाए जा रहे हैं; ट्रम्प के आदेशों को माना जा रहा है; ट्रम्प द्वारा निर्धारित देशों से पेट्रोल खरीदा जाता है; अमेरिका के साथ असुंतलित ‘ट्रेड डील’ करने के लिए दबाव डाला जाता है; राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत-पाक युद्ध रुकवाने का बार-बार दावा किया जाता है; ट्रम्प प्रधानमंत्री मोदी को रह-रह कर अपमानित करते और राजनैतिक करियर को तबाह करने की धमकी देते हैं; देश की सम्प्रभुता का निर्बलीकरण किया जा रहा है।  

145 करोड़ लोगों के देश के प्रधानमंत्री हैं नरेंद्र मोदी, जिसमें बहुमत है बहुसंख्यक समुदाय हिन्दू धर्मावलम्बियों का। क्या 145 करोड़ के भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री को 30 करोड़ के अमेरिका और 90 लाख के इजराइल के शासकों के सामने झुकना चाहिए? क्या भारत को अपने दूर के 9 करोड़ के पड़ोसी ईरान से सबक़ लेना नहीं चाहिए? जब भारत एक सम्प्रभुता संपन्न देश है, तब वह किसी भी देश से तेल-गैस खरीद सकता है।

वह अपनी शतों पर ‘ट्रेड डील’ कर सकता है. लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने बौने सिद्ध होते हैं। क्या इस सदी में बहु संख्यक हिन्दू धर्म के शिखर नेताओं को प्रगतिशील भूमिका निभानी नहीं चाहिए? क्या उन्हें देश के सत्ताधारियों पर नव साम्राज्यवादी अमेरिका व विस्तारवादी इजराइल की स्वेच्छाचारिताओं के विरुद्ध खड़ा होने के लिए दबाव डालना नहीं चाहिए?

जब धर्मगुरुओं को राजसत्ता से सभी प्रकार के लाभ चाहिए, तब उनका यह नैतिक कर्तव्य भी है कि वे संघ समर्थित मोदी+शाह सत्ता पर अपने मेरुदंड को सीधा रखने के लिए दबाव डालें। देश में सामाजिक व आर्थिक विषमता बढ़ती जा रही है। क्या समतावादी भारत के निर्माण में धार्मिक नेताओं को आगे नहीं आना चाहिए? यह विचित्र सुझाव है, हास्यास्पद लग सकता है। इससे मैं अवगत हूँ।

लेकिन, क्या 19 वीं सदी के अंतिम वर्षों में स्वामी विवेकानंद ने विषमतामुक्त समतावादी भारत का आह्वान किया नहीं था? (विस्तार से जानने के लिए हंसराज रहबर की पुस्तक ‘ योद्धा संन्यासी’ पढ़ी जानी  चाहिए)। ज़रुरत है देश की विभिन्न धार्मिक सत्ताएं एकताबद्ध हो कर निर्मम पूंजीवाद के खिलाफ आवाज़ उठायें। विषमताओं को समाप्त करने के लिए राजनैतिक नेतृत्व पर साझा दबाव डालें। मंदिर-मस्ज़िद के टंटे बंद करें।

चरम उपभोक्तावादी समय में धर्म को बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय की क्रांतिकारी भूमिका निभाने की ज़रुरत है। क्रांतिकारी भूमिका के प्रदर्शन के माध्यम से ही भविष्य में धर्म ने अपने अस्तित्व को सुरक्षित रख सकता है। ईरान में इस्लाम धर्म ने अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए पूंजीवादी-साम्राज्यवादी विरोधी क्रांतिकारी भूमिका को अपनाया है। वर्तमान समय में, धर्म की   यथास्थितिवादिता को तोड़ने के लिए ईरान के क्रांतिकारी धार्मिक नेतृत्व से काफी कुछ सीखा जा सकता है, जिसमें आध्यात्मिकता के साथ-साथ भौतिक प्रतिरोध की धाराएं भी प्रवाहित होती  हैं।  

यथास्थिति के विरुद्ध प्रतिरोध और प्रगतिशील प्रयोग से मानव सभ्यता की यात्रा को गति मिलती है। मुख़्तसर में, दिमाग़ी नक्सल जड़ता को तोड़ता है, और ‘सितारों से आगे जहाँ और भी हैं’ का मार्ग प्रशस्त करता है। 

(यह रामशरण जोशी के सोमवार, 16 अगस्त को प्रकाशित लेख का दूसरा और अंतिम भाग है।)

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