प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को समाज सरोकारी और बेहतर हिंदुस्तान की इच्छा रखने वाले नागरिकों और जवाबदेह व जिम्मेदार सरकार के लिए आंदोलन करने वाले नौजवानों के लिए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया है। इससे पहले भी प्रधानमंत्री, भारतीय जनता पार्टी के नेतागण समेत तमाम सत्ता शीर्ष पर बैठे हुए लोगों ने आंदोलनजीवी, अर्बन नक्सल, टुकड़े-टुकड़े गैंग, खान मार्केट गिरोह, झोलाछाप आदि शब्दों से समाज सरोकारी लोगों को नवाज़ा है।
दरअसल सरकार की पूरी मंशा समाज सरोकारी लोगों के बेहतर हिंदुस्तान निर्माण स्वर को बदनाम कर समाज से अलगाव में डालने और दमन व उत्पीड़न कर दबा देने की रही है।
सच्चाई इसके विपरीत है भारतीय इतिहास परंपरा में असहमति के स्वर विकास के प्रमुख कारक रहे हैं। भारतीय परंपरा में चाहे वह वैदिक हो, लोकायत हो या श्रमण हो इस असहमति के स्वरों के समन्वय से ही एक विविधता पूर्ण भारतीय जनमानस का निर्माण हुआ है। समाज में सुधार और बेहतरी के लिए भी समाज सरोकारी लोगों के प्रयासों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
इतिहास का भी अवलोकन करें तो देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने, कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने, मजदूरों के जीवन की बेहतरी के लिए काम के घंटे 8 समेत सामाजिक सुरक्षा उपाय करने, जमींदारी उन्मूलन की बात हो या आज के दौर में मनरेगा, सूचना अधिकार कानून, वनाधिकार कानून, खाद्य सुरक्षा कानून जैसे जन उपयोगी कानून का निर्माण हो यह सब कुछ उदाहरण है जो जन आंदोलन की ताकतों द्वारा ही संभव किये गए है।
वास्तव में नई पीढ़ी के छात्र नौजवान और समाज सरोकारी नागरिक देश के लिए समस्या नहीं है बल्कि वे समस्याओं का समाधान पेश करते रहे हैं।
पिछले 12 सालों से मोदी सरकार ने जिस तरह से गंध मचाई हुई है और सारी संस्थाओं को चौपट करके रख दिया है, उससें लोग बेहद परेशान है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के 10 जिलों की 9 अगस्त से 9 सूत्रीय एजेंडा पर मिर्जापुर से शुरू हुई रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान की यात्रा में भदोही, जौनपुर, आजमगढ़, मऊ में शामिल होकर हमने देखा कि सरकारी दावों के विपरीत जमीनी स्तर पर हालत बहुत बदतर है।
विकास के दावों के विपरीत गांवों के इलाकों में रातभर बिजली का अता-पता नहीं था। सरकारी स्वास्थ्य केंद्र खस्ता हाल है, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों तक में स्वीकृत पदों के सापेक्ष विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति और न्यूनतम जांच की भी सुविधा नहीं है, वे रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टरों के अभाव में पैरा मेडिकल स्टाफ द्वारा चलाए जा रहे है। प्राथमिक विद्यालय में टीचरों का बेहद अभाव है और संरचनात्मक सुविधा नदारद है। आमतौर पर गांव और कस्बों की सड़के बेहद खराब हैं।
मडियाहू के जमालापुर में आकस्मिक सेवा के फायर सबस्टेशन तक की सड़क जर्जर है। पीतल के बर्तन, कालीन, साड़ी, हैण्डलूम व पावरलूम, इत्र आदि विश्व प्रसिद्ध परम्परागत लधु-कुटीर उद्योग गहरे संकट का सामना कर रहे हैं। लोग महंगाई, बेरोजगारी से तंग है और बुलडोजर जैसी गैरकानूनी सरकारी जुल्म ज्यादती के खिलाफ आक्रोश में है। हमने जिला और तहसीलों की कचहरियों में देखा कि बौद्धिक तबका जंतर-मंतर छात्र आंदोलन में बच्चों को पैलेटगन और कील लगी लाठियों से मारने की कर्रवाई से गहरे गुस्से में है।
वास्तव में देशी-विदेशी कारपोरेट की सेवा में लगी सरकार ने कल्याणकारी राज्य की संविधान में दी हुई भूमिका से अपने हाथ खींच लिए हैं। संविधान की प्रस्तावना ही व्यक्ति की गरिमा और न्याय की बात करती है। मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों में सरकार के दायित्व को चिन्हित करते हुए हर नागरिक के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की बात है।
यह तभी संभव है जब सरकार रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन और भूमिहीनों को आवास की सुविधा दे। इसके उलट सरकार की नीतियों ने छात्रों, नौजवानों, मेहनतकशों, किसानों, एससी, एसटी, अति पिछड़े हिन्दु-मुसलमान, महिलाओं जैसे हाशिए पर मौजूद तबकों को विकास के लाभ से बहिष्कृत कर दिया है।
सरकार का रोजगार देने का वादा जुमला बनकर रह गया। डाउन साइजिंग के कारण सरकारी पदों को खत्म किया गया। सरकारी विभागों व सार्वजनिक संस्थानों में देश में लगभग एक करोड़ पद खाली है। लेकिन भर्तियां आमतौर पर रुकी हुई है और जो कुछ निकलती भी हैं वह पेपर लीक और भ्रष्टाचार की हवाले हो जाती है। इन सबसे छात्रों में गहरा अवसाद है और आत्महत्याओं की घटनाएं बढ़ी है।
अमेरिका के आगे निर्लज्ज समर्पण ने उद्योग घंधों की बंदी और उसमें कार्यरत श्रमिकों की छटंनी को काफी तेज कर दिया है। देश से पूंजी का पलायन हो रहा है। तकनीक के इस युग में भी हमारा विज्ञान और तकनीक पर बजट का महज 0.25 प्रतिशत खर्च हो रहा है। इसरो जैसे उच्च शोद्य व वैज्ञानिक संस्थानों से लोगों के इस्तीफा देने की खबरें है। हमारा कर्ज हमारी जीडीपी के बराबर हो गया है और बजट का बहुत बड़ा भाग हम कर्ज के ब्याज की अदायगी में गंवा रहे है।
लोगों की क्रयशक्ति घटती जा रही है और यात्रा में हमने यह भी देखा कि बाजारों में व्यापारी मंदी का शिकार हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो देश बड़े आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। इसे हल करने की जगह आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी पूरे समाज को विभाजन, हिंसा और धृणा की राजनीति में ले जाने में लगे हुए है।
इतिहास के इस मौके पर देश की नई पीढ़ी और सरोकारी नागरिको ने एक बार फिर समाधान पेश किया है। उनका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 39 में दिए पूंजी और संसाधनों के सकेंद्रण के राज्य द्वारा अनुकरणीय नीति निर्देशक तत्व को सरकार लागू करे। सरकार जबावदेह व जिम्मेदार बने और संवैधानिक दायित्वों का निर्वाहन करते हुए हर नागरिक के गरिमापूर्ण जीवन को सुनिश्चित करें।
वे साफ तौर कह रहें हैं कि देश में संसाधनों की कमी नहीं है, यदि देश के कारपोरेट व सुपर रिच की संपत्ति पर मात्र दो प्रतिशत टैक्स लगा दिया जाए, जापान और यूरोप के तमाम देशों की तरह भारत में भी इन पर विरासत कर लगाया जाए और कॉरपोरेट टैक्स को पुनः 35 प्रतिशत किया जाए तथा काली पूंजी की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित किया जाए तो बजट के आकार को बढ़ाया जा सकता है।
और जनकल्याण पर ज्यादा खर्च कर लोगों को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, ओल्ड ऐज पेंशन, भरपेट भोजन और आवास के संवैधानिक अधिकार की गारंटी की जा सकती है। मोदी सरकार को बदनाम करने की जगह नई पीढ़ी की उठ रही इस आवाज को सुनने की जरूरत है।
(लेखक ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तर प्रदेश के महासचिव हैं।)