3 अगस्त 2026 को दिल्ली के एक ट्रायल कोर्ट ने भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह को छह महिला पहलवानों द्वारा दायर यौन उत्पीड़न मामले में भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 354, 354ए और 506(I) के तहत लगाये गये आरोपों से बरी कर दिया। डबल्यूएफ़आई के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर को भी उनके ख़िलाफ़ लगाये गए शेष आरोप से बरी कर दिया गया। अदालत के अनुसार अभियोजन पक्ष अपने मामले को सन्देह से परे साबित करने में विफल रहा।
यह नतीजा अपने आप में निराला नहीं है। यदि अभियोजन पक्ष के सबूत सन्देहास्पद हैं तो आपराधिक अदालतों को आरोपी को बरी करना पड़ेगा। जिस बात की अधिक बारीकी से पड़ताल करने की ज़रूरत है वह यह है कि अमुक फैसला इस मुक़ाम तक पहुँचा कैसे।
अब तक का मामला
इल्ज़ाम शुरुआती तौर पर जनवरी 2023 में लगाये गये थे, जब भारत के कुछ सबसे प्रतिष्ठित पहलवानों—जिनमें विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया शामिल थे—ने जन्तर-मन्तर पर विरोध प्रदर्शन किया था जिस दौरान उन्होंने सिंह पर कई सालों से जूनियर पहलवानों का प्रशिक्षण शिविरों, प्रतियोगिताओं और महासंघ से जुड़े आयोजनों के दौरान यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया था। छः बार भाजपा की ओर से सांसद रह चुके सिंह ने इन सभी आरोपों से इनकार किया था और पहलवानों को चुनौती दी कि वे अदालत में इन्हें साबित करके दिखाएँ।
महीनों तक चले विरोध-प्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जाकर दिल्ली पुलिस ने अप्रैल 2023 में सिंह के ख़िलाफ़ दो अलग-अलग प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की—एक वयस्क शिकायतकर्ताओं के मामले में भारतीय दण्ड संहिता के तहत, और दूसरी सातवीं, नाबालिग शिकायतकर्ता के मामले में पॉक्सो अधिनियम के तहत। पॉक्सो मामले में कभी सुनवाई शुरू ही नहीं हो सकी: बाद में नाबालिग शिकायतकर्ता ने अपने आरोप वापस ले लिए, पुलिस ने क्लोज़र रिपोर्ट दाख़िल कर दी, और मई 2025 में यह मामला औपचारिक तौर पर बन्द कर दिया गया।
छह वयस्क शिकायतकर्ताओं द्वारा दर्ज कराया गया आईपीसी का मामला ही सुनवाई की मंज़िल तक पहुँचा। जून 2023 में आरोपपत्र दाख़िल किया गया और मई 2024 में एक मजिस्ट्रेट ने सिंह के ख़िलाफ़ आईपीसी की धाराओं 354, 354ए, 354डी और 506 के तहत आरोप तय करने का आदेश दिया। यह मुक़दमा दो वर्षों से अधिक समय तक चला और इसकी कुछ कार्यवाही बन्द कमरे में हुई। अन्ततः अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्वनी पंवार ने 3 अगस्त को सिंह को बरी करने का फैसला सुनाया।
दो शिकायतकर्ता अदालत के सामने यह कहते हुए अपने बयान से मुकर गये कि वे “मजबूर” या “दबाव में” थे। फैसले में इस तथ्य पर काफ़ी ज़ोर दिया गया और यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला “झूठा और मनगढ़ंत व सामूहिक तौर पर तैयार किया गया” प्रतीत होता है जिसे अदालत ने “राजनीतिक रूप से प्रेरित” “गहरी साज़िश” क़रार दिया। दूसरी ओर, सिंह ने फैसले को अपने पक्ष में प्रमाण बताया और कहा कि उन्हें बरी करते समय न्यायपालिका ने “सम्मान” शब्द का इस्तेमाल किया था।
ग़ौरतलब यह है कि 239 पृष्ठों के इस फैसले में अदालत इस नतीजे तक कैसे पहुँची। पूरे फैसले के दौरान अदालत ने तारीखों और जगहों में विसंगतियों, आरोपी के साथ लगातार सम्पर्क, तत्काल प्रतिरोध या प्रतिक्रिया के अभाव, तस्वीरों और शिकायतकर्ताओं के आसपास के लोगों के व्यवहार को बार-बार कथित घटनाएँ घटित नहीं होने के सबूत के तौर पर देखा।
एक ग़लत देश, एक ग़लत साल और दो चश्मदीद
पहली शिकायतकर्ता का उदाहरण लें, जिन्हें वीपी के नाम से नामजद किया गया है। उनका आरोप है कि 2016 में मंगोलिया में भारतीय दल के साथ भोजन करते समय सिंह ने उनके साथ छेड़छाड़ की थी। अदालत में दो गवाहों ने उनके इस बयान की पुष्टि की थी और फैसले में भी इस पुष्टि को दर्ज किया गया है। लेकिन सरकार द्वारा नियुक्त निगरानी समिति के समक्ष दिये गये उनके पहले के बयान में उन्होंने मंगोलिया, 2016 के बजाय तुर्की, 2015 का उल्लेख किया था।
उन्होंने अदालत में सफाई दी कि उनसे अनजाने में ग़लत देश और साल लिख दिया गया था और बाद में उन्होंने इस ग़लती को सुधार लिया था।
अदालत ने इसे मामले के लिए घातक माना। उसने स्थान को सही-सही याद न रख पाने को “असामान्य आचरण” बताया और माना कि यह विरोधाभास “अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक” था।
यह नतीजा असहज रूप से गवाहों की गवाही में विसंगतियों के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के ख़ुद के नज़रिये के ख़िलाफ़ है। स्टेट ऑफ़ यूपी बनाम एमके एंथनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि साक्ष्य का मूल्यांकन समग्र रूप से किया जाना चाहिए और ऐसी विसंगतियाँ के आधार पर जो मामले के बुनियादी तथ्य को प्रभावित नहीं करतीं, गवाही को अविश्वसनीय नहीं बना दिया जाना चाहिए।
भोगींभाई भरवाड़ा हिरजीभाई बनाम स्टेट ऑफ़ गुजरात (1983) मामले में अदालत ने इससे भी आगे बढ़कर आगाह किया था कि तारीख, स्थान या अन्य गौण विवरणों में छोटी-मोटी ग़लतियों को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए, ख़ासकर तब जब हमले का बुनियादी विवरण सुसंगत बना हुआ हो, क्योंकि तनावरत स्थिति में सामान्य मानवीय स्मृति सटीकता से काम नहीं करती।
इसका अर्थ यह नहीं है कि ग़लत स्थान का ब्योरा हमेशा उपेक्षणीय है। कभी-कभी यह निर्णायक होता है। लेकिन अदालत के सामने सवाल यह होना चाहिए कि यह विसंगति आख़िर किस चीज़ का खण्डन करती है। यहाँ, देश और साल का विवरण पहले दर्ज किये गये ग़ैर-न्यायिक कागज़ात में ग़लत थे; लेकिन आरोप की तो दो स्वतंत्र चश्मदीद गवाहों ने अदालती कार्यवाही के दौरान ताईद की थी।
“समझ से बिलकुल परे”
इस फैसले में सबसे हैरान करने वाले तर्क हैं कि शिकायतकर्ताओं ने तथाकथित घटनाओं के उपरान्त क्या किया।
अदालत ने बार-बार यह सवाल किया कि यदि सिंह ने उनका यौन उत्पीड़न किया था तो महिलाओं ने क्यों उनके साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बरक़रार रखा था। वे पारिवारिक समारोहों और शादियों की तस्वीरों की ओर इशारा करते हैं। वे यह भी कुबूल करते हैं कि शिकायतकर्ता सिंह के भय से, जो उस वक़्त डबल्यूएफ़आई के अध्यक्ष पद पर थे और उनका करियर बर्बाद कर सकते थे,
इतने सालों तक चुप्पी साधे रहे। लेकिन साथ ही वह कुछ और भी कहते हैं: कि यह “बिलकुल समझ से परे” है कि उन्होंने उनके साथ सालों बाद तक सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध कैसे बरक़रार रखे।
फैसले के अनुच्छेद 73 के अनुसार :
“यह आरोप समझ आता है कि चूँकि ए1 उस वक़्त डबल्यूएफ़आई के अध्यक्ष पद पर थे, इसलिए अगर उनके विरुद्ध शिकायत की गयी होती, तो वे उनके करियर को बर्बाद कर सकते थे, हालाँकि, यह बात समझ से परे है कि वर्षों तक उनके साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध क्यों बने रहे।
पीड़िताओं ने शिकायत नहीं की; उन्होंने ऐसा न करने के लिए अपना स्पष्टीकरण दिया, लेकिन जो लोग कथित घटनाओं के चश्मदीद बने, उनमें से हरेक या तो स्तब्ध था, परेशान था, अथवा पीड़िताओं के लिए दुखी था फिर भी, कथित कृत्यों के लिए ए1 के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए आगे आने की हिम्मत किसी को नहीं हुई? चूँकि किसी ने भी ए1 के कथित कृत्यों के सम्बन्ध में कोई औपचारिक शिकायत नहीं की या उनका प्रतिकार नहीं किया, इसलिए इसकी बड़ी सम्भावना है कि कथित कृत्य वास्तव में घटित ही न हुए हों।”
यही वह दृष्टिकोण है जिसके प्रति सर्वोच्च न्यायालय ने पहले भी ट्रायल कोर्ट्स को आगाह किया है। अपर्णा भट्ट बनाम मध्यप्रदेश सरकार मामले में न्यायालय ने चेताया था कि यौन अपराधों से सम्बन्धित मामलों में न्यायिक विवेचना इस प्रकार की रूढ़िबद्ध धारणाओं से प्रस्थान नहीं करनी चाहिए कि एक महिला को “कैसे” व्यवहार करना चाहिए।
इसी उसूल को हिमाचल प्रदेश सरकार बनाम प्रेम सिंह (2009) और पंजाब सरकार बनाम गुरमीत सिंह (1996) मामलों में भी सुदृढ़ किया गया, इन दोनों निर्णयों में यह माना गया कि शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी, सामाजिक शिष्टाचार या हमले के बाद पीड़िता का असामान्य व्यवहार जैसी बातों का मूल्यांकन किसी कठोर और तय मानदण्ड के आधार पर नहीं किया जा सकता, तब जब मामले में सदमा और जटिल सामाजिक-आर्थिक निर्भरता जैसे कारक शामिल हों।
निर्णय में यह स्वीकार किया गया है कि सिंह के पद के कारण पहलवानों को अपने करियर का ख़तरा हो सकता था, लेकिन फिर उसी कारण के बावजूद सिंह के साथ उनके लगातार सम्पर्क को समझ से परे माना गया। जबकि इन दोनों बातों में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। कोई व्यक्ति किसी से भयभीत रह सकता है और तब भी उसके साथ सम्पर्क बनाए रख सकता है, यहाँ तक कि सार्वजनिक समारोहों में उसके साथ मुस्कुराते हुए तस्वीरें भी खिंचवा सकता है, ख़ासकर तब, जब उसकी आजीविका पूरी तरह उस संस्था पर निर्भर हो जिसका संचालन वही व्यक्ति करता हो।
यही तर्क जकार्ता की एक तस्वीर के सन्दर्भ में भी सामने आता है। न्यायालय ने दर्ज किया है कि तस्वीर में एक जश्न का मौक़ा क़ैद है और यह कि उसमें शिकायतकर्ता असहज नहीं दिख रही है। लेकिन एक तस्वीर सेकण्ड के केवल एक छोटे से हिस्से को दर्ज करती है। वह यह स्थापित नहीं कर सकती कि कैमरे का शटर क्लिक होने से पहले या उसके बाद माहौल कैसा था। न ही यह इस सम्भावना को ख़ारिज करती है कि भीड़भाड़ वाले खेल परिसर में शिकायतकर्ता के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक सम्पर्क हुआ था या नहीं।
दो मुकर चुके गवाह, और चार जो क़ायम रहे
छह शिकायतकर्ताओं में से दो, जिन्हें पी और एसपी करके नामजद किया गया है, गवाही के दौरान अपने बयान से मुकर गये या उसके महत्वपूर्ण हिस्सों को वापस ले लिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इससे अभियोजन पक्ष को नुकसान पहुँचा। लेकिन खुज्जी बनाम मध्य प्रदेश सरकार के तहत, किसी गवाह के मुकर जाने से अभियोजन का पूरा मामला ख़ुद-ब-ख़ुद ख़त्म नहीं हो जाता। गवाही के वे हिस्से, जो परीक्षण के बाद विश्वसनीय पाये जाते हैं, तब भी साक्ष्य के रूप में अहमियत रखते हैं।
इसके विपरीत ट्रायल कोर्ट ने दो शिकायतकर्ताओं के अपने बयानों से मुकर जाने से एक कहीं अधिक व्यापक निष्कर्ष निकाल लिया: कि पूरी संयुक्त शिकायत झूठी और मनगढ़ंत थी और राजनीतिक रूप से प्रेरित “गहरी साज़िश” का हिस्सा थी। ख़ुद न्यायाधीश के शब्दों में, बच गये सबूतों से यह प्रतीत होता था कि आरोप “सामूहिक रूप से लगाये गये झूठे और मनगढ़ंत” थे और यह “राजनीतिक रूप से प्रेरित” साज़िश प्रतीत होते हैं।
ऐसे व्यापक निष्कर्ष पर पहुँचने के इस क़दम की समीक्षा करते हुए कोई अपीलीय न्यायालय उचित रूप से यह सवाल कर सकता है कि दो गवाहों के मुकरने को किस तरह स्वतंत्र और वस्तुपरक उपादान के माध्यम से व्यवस्थित साज़िश से जोड़ा जा सकता है जिसमें बाक़ी चार गवाह भी शामिल हैं जो अपने बयान पर क़ायम रहे और जिनके विवरण शुरू से ही एक-दूसरे के समान भी नहीं थे। मंगोलिया से सम्बन्धित आरोप की, ग़ौर करें , दो स्वतंत्र चश्मदीद गवाहों ने पुष्टि की थी, जिनमें से कोई भी अपने बयान से नहीं मुकरे और न ही अपनी गवाही का एक भी शब्द वापस लिया।
इस मामले में निहित संवैधानिक सवाल
इस सबके पीछे एक व्यापक तनाव मौजूद है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354 के तहत ऐसे हमले या आपराधिक बल के प्रयोग को सिद्ध करना आवश्यक है, जिसका उद्देश्य किसी महिला की “लज्जा भंग” करना हो, या जिससे ऐसा होने की सम्भावना हो। भारतीय न्याय संहिता भी इसी प्रकार की शब्दावली को धारा 74 में आगे बढ़ाता है। इसी बीच, भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र—विशेष रूप से केएस पुट्टास्वामी बनाम भारत सरकार ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या को शारीरिक अखण्डता, व्यक्तिगत स्वायत्तता और अपने सम्बन्ध में निर्णय लेने की स्वतंत्रता के सन्दर्भ में आगे विकसित किया है।
इस आधार पर, ट्रायल कोर्ट का पूर्वाग्रह कि क्या शिकायतकर्ता “स्वाभाविक” आचरण कर रहे थे, क्या उन्होंने तुरन्त प्रतिकार किया, क्या आस-पास मौजूद लोगों ने कोई प्रतिक्रिया दी, या क्या वे तस्वीरों में सहज लग रहे थे, इन पहलुओं की गहन समीक्षा करनी की ज़रूरत है।
बरी किए जाने का मतलब है कि अभियोजन पक्ष उचित सन्देह से परे अपराध सिद्ध कर पाने में नाक़ाम रहा। चन्द्रप्पा बनाम कर्नाटक सरकार के अनुसार, अपीलीय न्यायालय ऐसे बरी किये जाने के आदेश में हस्तक्षेप करने को लेकर उचित रूप से सावधानी बरतते हैं, क्योंकि बरी किये जाने के साथ निर्दोषता की दोहरी धारणा जुड़ी होती है।
लेकिन रवि शर्मा बनाम दिल्ली सरकार (2022) यह स्पष्ट करता है कि जब ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों का मूल्यांकन क़ानूनी रूप से दोषयुक्त हो, अनुमानाधारित सामान्यीकरणों पर आधारित हो, या अभिलेख पर मौजूद महत्वपूर्ण पुष्टिकारक सबूतों की अनदेखी करता हो, तब अपीलीय न्यायालय का हस्तक्षेप उचित और ज़रूरी हो सकता है।
बृज भूषण फैसले से असल सवाल केवल यह खड़ा नहीं होता कि क्या सभी आरोप साबित हुये। बल्कि यह कि, विश्वसनीय क्या है यह तय करने में ट्रायल कोर्ट अपने सामने खड़े क़ानूनी सवाल का जवाब दे रहा था: सबूतों से क्या सिद्ध होता है? या उसने चुपचाप इस सवाल को पलटकर एक नया सवाल पेश कर दिया: क्या असल पीड़िता इस तरह पेश आती?
(हसी जैन का लेख न्यूज़लांड्री से साभार। अनुवाद वृषाली श्रुति। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)