लखनऊ। नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) के एनआरबी रिवाइवल केस में गिरफ्तार एडवोकेट अजय सिंघल, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता विशाल सिंह और छात्र-मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता प्रियांशु कश्यप समेत राजनीतिक बंदियों की रिहाई और उनके जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकारों पर राज्य द्वारा किए जा रहे हमलों के सवाल पर आज प्रेस क्लब, लखनऊ में एक जनसभा आयोजित की गई।
सभा में कार्यकर्ताओं, वकीलों, छात्रों, शिक्षाविदों और नागरिक समाज के सदस्यों ने भाग लिया। वक्ताओं ने राजनीतिक बंदियों की तत्काल रिहाई की मांग की और असहमति की आवाज़ उठाने वालों के खिलाफ जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग को समाप्त करने की मांग की।
सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज भारत की जेलों में बड़ी संख्या में ऐसे राजनीतिक बंदी हैं जिन्हें सरकार की नीतियों का विरोध करने और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने के कारण जेल में रखा गया है। उन्होंने कहा कि इस तरह की गिरफ्तारियों और लंबे समय तक की जा रही कैद का पैमाना भारतीय राज्य के बढ़ते दमनकारी चरित्र को दर्शाता है। वक्ताओं ने राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए जन अभियानों, आंदोलनों और लोकतांत्रिक संघर्षों को तेज करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
विशेष रूप से एनआईए के नॉर्दर्न रीजनल ब्यूरो (NRB) रिवाइवल केस का मुद्दा उठाया गया, जिसमें उत्तर भारत के कई राज्यों में कार्यकर्ताओं के खिलाफ छापेमारी, पूछताछ और गिरफ्तारियां की गई हैं। वक्ताओं ने इस मामले में गिरफ्तार एडवोकेट अजय कुमार सिंघल, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता विशाल सिंह और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र एवं लेबर राइट्स एक्टिविस्ट प्रियांशु कश्यप की तत्काल रिहाई की मांग की।
वक्ताओं ने कहा कि यह मामला लखनऊ में दर्ज है और गिरफ्तार लोगों को लखनऊ में रखा गया है। इसलिए उनकी रिहाई के लिए लखनऊ में आंदोलन और अभियान को विशेष रूप से तेज करने की आवश्यकता है।
प्रशांत भूषण ने व्यापक जन लामबंदी का आह्वान किया
सभा की अध्यक्षता कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि इस मामले में उन्हीं लोगों को निशाना बनाया जा रहा है जो असमानता के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं और सामाजिक एवं आर्थिक मुद्दों पर लोगों को संगठित करने का प्रयास कर रहे हैं।
भूषण ने आरोप लगाया कि प्रमुख जांच एजेंसियां सरकार के निर्देश पर काम कर रही हैं और लंबे समय तक जेल में रखकर कार्यकर्ताओं के जीवन और उनके करियर को बर्बाद किया जा रहा है।
उन्होंने नागरिक स्वतंत्रताओं की पर्याप्त रक्षा न कर पाने के लिए न्यायपालिका की भी आलोचना की और कहा कि राज्य के दमन का विरोध करने के लिए व्यापक जन लामबंदी और लोकतांत्रिक आंदोलनों को मजबूत करना आवश्यक है।
‘छापेमारी और गिरफ्तारियों के सिलसिले को समाप्त किया जाए’
कमिटी अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन के दीपक कुमार ने कहा कि एनआईए लखनऊ ने जून 2023 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के नॉर्दर्न रीजनल ब्यूरो के कथित रिवाइवल से संबंधित एक एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें सात लोगों को नामजद किया गया था।
उन्होंने कहा कि इसके बाद से एनआईए द्वारा 50 से अधिक लोगों के संबंध में छापेमारी और पूछताछ की जा चुकी है। इस मामले में अब तक तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है—हरियाणा के विस्थापन विरोधी एक्टिविस्ट और अधिवक्ता अजय कुमार सिंघल, दिल्ली के डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता विशाल सिंह, तथा बस्तर निवासी और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र प्रियांशु कश्यप।
कुमार ने कहा कि एनआईए की छापेमारी, पूछताछ और गिरफ्तारियों का सिलसिला लगातार जारी है तथा तीनों गिरफ्तार लोगों का सामाजिक सक्रियता और जन आंदोलनों से लंबा जुड़ाव रहा है।
उन्होंने हिरासत में विशाल सिंह की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कुमार के अनुसार, जेल में उनकी हालत गंभीर हो गई थी और लगातार प्रयासों के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया जा सका। उन्होंने कहा कि विशाल सिंह इस समय केजीएमयू में गंभीर हालत में इलाज करा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि विशाल सिंह आम लोगों की समस्याओं और उनके संघर्षों पर डॉक्यूमेंट्री बनाते रहे हैं। इनमें कोविड-19 महामारी के दौरान मजदूरों की स्थिति पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री भी शामिल है।
‘एक्टिविज्म को अपराध बनाया जा रहा है’
चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स फॉर सोसाइटी (एसएफएस) से जुड़े छात्र संदीप ने एडवोकेट अजय कुमार सिंघल के बारे में बात रखी।
उन्होंने कहा कि सिंघल कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में अपने छात्र जीवन से ही जनवादी विचारों और जन संघर्षों से जुड़े रहे हैं। इसके बाद उन्होंने मलिन बस्तियों के निवासियों और आदिवासियों के विस्थापन के खिलाफ अभियानों में भाग लिया तथा संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े किसान आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
संदीप ने कहा कि इसी सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता को इस मामले के माध्यम से अपराध की तरह पेश किया जा रहा है।
एसएफएसकी सदस्य गुरकीरत ने कहा कि लखनऊ केस का पैटर्न वैसा ही है जैसा एक्टिविस्टों ने भीमा कोरेगांव मामले में देखा था। उन्होंने सरकार की ओर से नक्सलवाद के खतरे को लेकर अपनाए जा रहे रुख की आलोचना की और कहा कि “राष्ट्रीय सुरक्षा” की अवधारणा का इस्तेमाल तेजी से शासक वर्ग के हितों की सुरक्षा के लिए किया जा रहा है।
प्रियांशु कश्यप के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि बस्तर में पले-बढ़े होने के कारण उन्होंने वहां के दर्द और परिस्थितियों को प्रत्यक्ष रूप से देखा और महसूस किया था। दिल्ली विश्वविद्यालय आने के बाद उन्होंने उन परिस्थितियों के संरचनात्मक कारणों को समझने का प्रयास किया और छात्र एवं मजदूर आंदोलनों से जुड़े।
गुरकीरत के अनुसार, उनके राजनीतिक विचारों और सामाजिक सक्रियता के कारण वे सरकारी एजेंसियों की निगाह में आए और अंततः एनआईए द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए।
‘ये तीन गिरफ्तारियां केवल एक बड़े पैटर्न की झलक हैं’
लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा ने कहा कि ये तीन गिरफ्तारियां केवल एक बहुत बड़े पैटर्न का छोटा हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा कि देशभर में राजनीतिक एक्टिविस्टों के खिलाफ अनेक मामले दर्ज किए गए हैं और सैकड़ों लोगों को जेल में रखा गया है।
वर्मा ने विशाल सिंह की स्वास्थ्य स्थिति पर भी बात की और कहा कि नागरिक समाज के समूहों ने उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने उनके चिकित्सा उपचार के संबंध में आश्वासन दिया था और बताया कि विशाल सिंह इस समय KGMU में गंभीर स्थिति में उपचाराधीन हैं।
उन्होंने एक्टिविस्टों के खिलाफ राज्य की एजेंसियों के इस्तेमाल से जुड़े व्यापक सवालों के उदाहरण के रूप में भीमा कोरेगांव मामले का भी उल्लेख किया।
‘एजेंसियों का इस्तेमाल मामले गढ़ने के लिए किया जा रहा है’
वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद शोएब ने सरकारी जांच एजेंसियों के कामकाज की आलोचना की और आरोप लगाया कि सरकार पर आरएसएस का निर्णायक प्रभाव है।
उन्होंने कहा कि असहमति रखने वालों को तेजी से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को अक्सर आतंकवादी और सरकार का विरोध करने वाले हिंदुओं को नक्सलवादी के रूप में पेश किया जाता है।
शोएब ने आरोप लगाया कि एटीएस और एनआईए जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल केवल सबूत इकट्ठा करने के लिए नहीं, बल्कि उनके शब्दों में, सबूत बनाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने आतंकवाद से जुड़े मामलों में मुसलमानों को कथित रूप से झूठे मामलों में फंसाए जाने के मुद्दे पर भी विस्तार से बात की।
उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए लोगों से एकजुट होने और बढ़ते दमन का प्रतिरोध करने का आह्वान किया।
सभा की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने की और संचालन भगत सिंह स्टूडेंट्स मोर्चा के देवेंद्र आज़ाद ने किया। सभा में सैकड़ों लोग शामिल हुए।
सभा का संयुक्त आयोजन आइसा, भगत सिंह स्टूडेंट्स मोर्चा, कम्युनिस्ट फ्रंट, फॉरवर्ड ब्लॉक, सामाजिक न्याय मोर्चा, सोशलिस्ट पार्टी और रिहाई मंच द्वारा किया गया।
आयोजकों ने निम्नलिखित मांगें उठाईं:
-एडवोकेट अजय कुमार सिंघल, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता विशाल सिंह और छात्र-लेबर राइट्स एक्टिविस्ट प्रियांशु कश्यप की तत्काल रिहाई की जाए।
-एनएआई के एनआरबी रिवाइवल केस में एक्टिविस्टों के खिलाफ छापेमारी, पूछताछ और गिरफ्तारियों का सिलसिला समाप्त किया जाए।
-जीवन, स्वतंत्रता, असहमति और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
-राजनीतिक एक्टिविस्टों की कैद और कथित उत्पीड़न के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया जाए।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)