हिमालयी क्षेत्र की नदियाँ केवल भारत की जल सुरक्षा का आधार नहीं हैं, बल्कि देश की भू-राजनीतिक और पर्यावरणीय संप्रभुता की रीढ़ भी हैं। पिछले कुछ वर्षों में हिमालय की कई सहायक नदियों के प्रवाह में कमी और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाओं को केवल जलवायु परिवर्तन मान लेना पूरी तस्वीर को स्पष्ट नहीं करता। इसके पीछे एक सोची-समझी वित्तीय और रणनीतिक प्रक्रिया कार्य कर रही है, जिसे अप्रत्यक्ष विदेशी फंडिंग और अनियोजित बुनियादी ढाँचा विकास से जोड़कर देखा जा रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और चीनी बीआरआइ रणनीति
1962 के युद्ध के बाद से ही तिब्बत और सीमावर्ती जलस्रोतों पर नियंत्रण को लेकर चिंताएं लगातार बनी रही हैं। ऐतिहासिक दस्तावेजों (जैसे हेंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट) में भी ब्रह्मपुत्र और सतलुज के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों के रणनीतिक महत्व का उल्लेख मिलता है।
2013 में जब चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की शुरुआत की, तो भारत ने संप्रभुता और पारदर्शिता की चिंताओं के कारण इसमें शामिल होने से आधिकारिक तौर पर इन्कार कर दिया। इसके बाद भारत की प्रत्यक्ष भागीदारी न होने पर चीन ने निजी क्षेत्र और परोक्ष वित्तीय माध्यमों के जरिए यहाँ की ढाँचागत परियोजनाओं में पूँजी प्रवाह का मार्ग अपनाया।
शैडो फाइनेंसिंग और शैल कंपनियों का तंत्र
इस व्यवस्था के तहत प्रत्यक्ष सरकारी निवेश के बजाय शैडो फाइनेंसिंग का तरीका उपयोग में लाया गया। इस चालाकी को मुख्यतः चार बिंदुओं के संदर्भ में देखा जा सकता है:
➤ वित्तीय संस्थानों द्वारा घेरेबंदी—इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल बैंक ऑफ़ चाइना और चाइना डेवलपमेंट बैंक जैसे संस्थानों द्वारा ऋण उपलब्ध कराना।
➤ शैल कंपनियाँ और ठेकेदार—कागजों पर भारतीय दिखने वाली लेकिन निदेशक मंडल स्तर पर विदेशी प्रतिनिधित्व या बैक-एंड सपोर्ट रखने वाली शैल कंपनियों के जरिए परियोजनाओं का क्रियान्वयन।
➤ उपकरण और मशीनरी—टर्बाइन, जनरेटर, कंक्रीट और तकनीकी आपूर्ति के बड़े हिस्से का आयात।
➤ वित्तीय देनदारी—8% से 12% तक की ब्याज दरों पर लंबी अवधि के ऋण, जिससे स्थानीय स्तर पर वित्तीय दबाव और ऋण पुनर्भुगतान का संकट खड़ा होता है।
➤हिमालयी जलविद्युत परियोजनाएं और पर्यावरणीय चिंताएं—उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्यों में बड़े पैमाने पर जलविद्युत परियोजनाओं की शुरुआत हुई है।
(क)- त्वरित स्वीकृतियाँ—दिवाँग बहुउद्देशीय परियोजना (अरुणाचल प्रदेश) जैसी बड़ी परियोजनाओं को बिना विस्तृत परामर्श या समय दिए तेजी से पर्यावरण मंजूरी दिए जाने पर आरटीआइ और स्वतंत्र रिपोर्टों ने सवाल उठाए हैं।
(ख)- प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता—अनियोजित सुरंग निर्माण, नदी तल में अत्यधिक उत्खनन और बाँधों की दोषपूर्ण संरचनात्मक बनावट ने संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर किया है। इस संदर्भ में आइआइटी रुड़की की तकनीकी रिपोर्ट-2024 का अध्ययन आवश्यक है जिसमें यह रेखाँकित किया गया है कि खराब इंजीनियरिंग ने आपदाओं के प्रभाव को 40% तक अधिक विनाशकारी बना दिया।
(ग)- राज्यों पर बढ़ता ऋण—हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा 2024 के बजट सत्र में कुछ जलविद्युत परियोजनाओं की ईएमआई चुकाने के लिए नया कर्ज लेने की बात स्वीकार की गई, जो स्थानीय स्तर पर ‘ऋण जाल’ के जोखिम को दर्शाती है।
तिब्बत में बाँध निर्माण और डाउनस्ट्रीम असर
चीन ने निकटवर्ती सीमा के उस पार तिब्बत में 11 से अधिक बड़े बाँधों का निर्माण करके ब्रह्मपुत्र, सतलुज और सिंधु के प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता प्राप्त कर ली है। अगस्त 2022 में मानसून के दौरान ब्रह्मपुत्र के जलस्तर में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की गई, जिस पर पारदर्शी डेटा साझा न होने से जल सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
डाउनस्ट्रीम में जल प्रवाह की कमी और ऊपरी हिस्से में अचानक पानी छोड़ने की क्षमता भविष्य में रणनीतिक दबाव का माध्यम बन सकती है।
भविष्य की चुनौतियाँ और निष्कर्ष—यदि इन अनियंत्रित निर्माण कार्यों और अपारदर्शी वित्तीय मॉडलों की समय रहते समीक्षा तथा वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, तो इसके निम्नलिखित दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं:
➤ जल संकट—2030 से 2034 तक पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और असम जैसे राज्यों में जलापूर्ति और कृषि पर गंभीर प्रभाव।
➤ संपत्ति हस्तांतरण का दबाव—ऋण न चुका पाने की स्थिति में महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा परिसंपत्तियों पर नियंत्रण का जोखिम।
➤ पारिस्थितिकी असंतुलन—हिमालय की सदानीरा नदियों का विखंडन, भूस्खलन व बाढ़ या सूखा जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति।
योजनाकारों को समझना होगा कि हिमालय केवल बिजली उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि हिमालयी उप-महाद्वीप की जलवायु का नियामक और इसकी जीवनदायिनी जल प्रणाली है। नदियों के संरक्षण, पर्यावरणीय ऑडिट की कड़ाई और ढाँचागत परियोजनाओं की वित्तीय पारदर्शिता को प्राथमिकता देना राष्ट्रीय सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता के लिए अनिवार्य है।
(फोटो प्रतीकात्मक)
(श्याम सिंह रावत वरिष्ठ लेखक-पत्रकार हैं।)