Monday, October 3, 2022

उत्तराखण्ड में 94 हजार फौजी वोट पलट सकते हैं चुनावी बाजी

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उत्तराखण्ड विधानसभा के चुनाव में सत्ता विरोधी और हिन्दूवादी मोदी लहर के बीच हुई जबरदस्त टक्कर के कारण प्रत्याशियों की हार-जीत का अंतर कम होने की संभावना के चलते इस बार पड़े 53 लाख से अधिक मतों पर महज 94 हजार फौजी मतदाताओं के पोस्टल वोट भारी पड़ सकते हैं। यह केवल आशंका नहीं बल्कि ऐसा कमाल वर्ष 2008 के पौड़ी गढ़वाल संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में हो चुका है। उस समय भी ईवीएम ने कांग्रेस प्रत्याशी को जिता दिया था, मगर डाक से आये कुछ हजार फौजी मतों ने कांग्रेस की जीत को हार में तब्दील कर दिया था। इस समय पौड़ी जैसे जिले की प्रत्येक सीट पर औसतन 2,688 फौजी मतदाता हैं, जो कि 2008 के लोकसभा उपचुनाव की तरह जीत को हार में और हार को जीत में बदल सकते हैं।

उत्तराखण्ड में डाक के जरिये आने वाले फौजी मतपत्र 2008 में हुये पौड़ी गढ़वाल संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में नतीजों को उलट-पुलट कर चुके हैं। उस समय कांग्रेस प्रत्याशी सतपाल महाराज ईवीएम से निकले मतों की गणना में 98 मतों से जीत गये थे। लेकिन बाद में जब डाक मतों की गिनती शुरू हुयी तो भाजपा प्रत्याशी जनरल तेजपाल सिंह रावत को एकमुश्त 5,595 डाक मत मिल गये। जबकि महाराज को केवल 991 ही फौजी डाक मत मिले। इस तरह जनरल तेजपाल सिंह रावत को मिले मतों की संख्या 2,29,632 हो गयी जबकि सतपाल महाराज को मिले मतों की संख्या 2,25,126 तक ही पहुंच सकी, और जनरल रावत फौजी मतों की बदौलत विजयी घोषित कर दिए गये।

उस समय राज्य में भुवन चन्द्र खण्डूरी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ही थी और डाक से आने वाले फौजी मतों को कोटद्वार से पौड़ी लाने की अभूतपूर्व व्यवस्था की गयी थी। अगर ऐसी व्यवस्था न होती और देर तक आने वाले मत न गिने जाते तो परिणाम कुछ भी हो सकते थे। उस समय इन मतों पर काफी विवाद भी हुआ था और कांग्रेस ने निर्वाचन आयोग पहुंच कर फौजी मतदाताओं के बदले उनके परिजनों को प्रॉक्सी मतदान करने की व्यवस्था की मांग की थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया था। लेकिन इस समय प्राक्सी मतदान की व्यवस्था नहीं है।

वर्तमान में प्रदेश में कुल 81,72,173 सामान्य मतदाता और 94,471 सर्विस मतदाता हैं। जिनमें राज्य से बाहर सेवारत तीनों सेनाओं के सैनिकों के अलावा असम रायफल, आइटीबीपी, बीएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, एनएसजी, बीआरओ और सीआइएसएफ आदि के कार्मिक शामिल हैं। इनमें 100 के करीब वे लोग भी हैं जो कि विदेशों में कार्यरत हैं, जिनमें विदेश सेवा के अधिकारी/कर्मचारी भी शामिल हैं। इन सर्विस मतदाताओं में भी गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊं रेजिमेंट के जवानों और अधिकारियों की संख्या 50 हजार से अधिक है। गढ़वाल राइफल्स की 21 रेगुलर बटालियनों के अलावा 1 गढ़वाल स्काउट्स, 3 बटालियनें राष्ट्रीय राइफल्स की तथा 2 बटालियनें टेरिटोरियल आर्मी की हैं। इसी तरह कुमाऊं रेजिमेंट की  20 रेगुलर बटालियनों के अलावा नगा रेजिमेंट, 1 मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री और कुमाऊं स्काउट भी हैं।

चूंकि सेना धर्मनिरपेक्ष होने के साथ ही राजनीति निरपेक्ष भी होती है, इसलिये सेना में राजनीतिक गतिविधियों को बढ़ावा नहीं दिया जाता। सैनिकों पर उच्चाधिकारियों का प्रभाव होने कारण उनके पास जो डाक मतपत्र पहुंचते हैं, उन पर मतदान की निष्पक्षता पर सदैव सवाल उठते रहे हैं। निर्वाचन आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान के चाहे जितने भी दावे करे, मगर व्यवहार में सैनिक का मत अपने अधिकारियों के प्रभाव से मुक्त और गुप्त नहीं हो पाता। इस समय 80 से लेकर 90 प्रतिशत मत एक ही दल के प्रत्याशियों को मिलने की आशंका जताई जा रही है।

उत्तराखण्ड विधानसभा के 2007 के चुनाव में टिहरी जिले की नरेन्द्रनगर सीट पर यूकेडी के प्रत्याशी ओमगोपाल रावत ने कांग्रेस के सुबोध उनियाल को मात्र 4 मतों से पाराजित किया था। सन् 2017 के चुनाव में केदारनाथ सीट पर मनोज रावत से कुलदीप रावत 869 मतों से और लोहाघाट से पूरण सिंह फड़त्याल से कुशल सिंह 148 मतों से चुनाव हार गये थे। इसी प्रकार गंगोलीहाट से मीना गंगोला 805 मतों से, सोमेश्वर से रेखा आर्य 710 मतों से और जागेश्वर से गोविन्द सिंह कुंजवाल 399 मतों से चुनाव जीत सके थे।

इस तरह के बहुत करीबी मुकाबलों में अगर फौजी मतदान आशंकानुसार एकतरफा हुआ, तो समझा जा सकता है कि नतीजे क्या होंगे। वर्तमान में सर्वाधिक 16,130 डाक मतपत्र या सर्विस मतदाता पौड़ी जिले की 6 विधानसभा सीटों पर हैं। इस तरह एक सीट पर औसतन 2,688 सर्विस मतदाता किसी भी प्रत्याशी की किस्मत पलट सकते हैं। इसी तरह चमोली की प्रत्येक सीट पर औसतन 3,469, रुद्रप्रयाग की 2 सीटों में प्रत्येक पर 2,680, अल्मोड़ा की प्रत्येक सीट पर 1,227 और पिथौरागढ़ की प्रत्येक सीट पर औसतन 3,675 सर्विस मतदाता हैं।

इस चुनाव में 14 फरवरी को हुये मतदान में प्रदेश विधानसभा की कुल 70 सीटों में 81,72,173 में से 53,42,462 मतदाताओं ने अपनी पसन्द की अगली सरकार के चयन के लिये अपने मताधिकार का प्रयोग किया। जो डाक मतपत्र 10 मार्च को मतगणना शुरू तक मत गणनास्थल तक पहुंच जायेंगे उन्हें गिनती में शामिल कर लिया जायेगा। चूंकि डाक मतपत्रों के लौटने के लिये एक माह का पर्याप्त समय मिल गया है, इसलिये उम्मीद की जा सकती है कि कुल 94,471 डाक मतपत्रों में से अधिकांश मतपत्र सरहदों से वापस गिनती के लिये आ जायेंगे।

इस तरह देखा जाय तो 70 सीटों में से प्रत्येक सीट पर औसतन 1 हजार से अधिक सर्विस मतदाता आते हैं, जो कि चुनाव परिणामों उलटने की क्षमता रखते हैं। अगर सत्ताधारी भाजपा को एकमुश्त मतदान की कांग्रेस की आशंका सही निकली, तो भाजपा आसानी से दुबारा सत्ता में लौट सकती है। वैसे भी पिछले चुनावों में भी सर्विस मतदताओं का झुकाव भाजपा की ओर देखा गया है। “’युद्ध और प्यास में सब कुछ जायज’’ वाली सदियों पुराने उपन्यासकार जॉन लिलि द्वारा गढ़ी गयी कहावत में “राजनीति’’ भी जोड़ कर इस कहावत का नवीनीकरण कर इसकी उम्र को सदियों आगे खिसकाना संभव बना दिया गया है।

(जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

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