Saturday, October 1, 2022

स्पेशल रिपोर्ट: दरक रहे उत्तराखंड के पहाड़ों का संदेश सुनो

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28 फरवरी, 2022 को जब जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की छठी रिपोर्ट जारी की जा रही थी, जिसमें पिघलते ग्लेशियरों और पहाड़ों में बढ़ते भूस्खलन की घटनाओं पर कई अध्याय हैं, उसी समय उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग जिले के सारी गांव में भूस्खलन की एक अप्रत्याशित घटना हुई। पूरे उत्तराखंड में उस दिन मौसम साफ था। दो दिन पहले बारिश हुई थी, लेकिन बहुत मामूली। सुबह के 8 बजे रहे थे। रुद्रप्रयाग जिले की अलकनन्दा घाटी में स्थित सारी ग्राम पंचायत के झालीमठ गांव के लोग भी अपने रोजमर्रा के कामों में जुट गये थे।

अचानक इस गांव के 22 घरों में रहने वाले लोगों को लगा कि कुछ हलचल हो रही है। लोग कुछ समझ पाते इससे पहले ही कुछ दूर रहने वाले लोगों ने भागो-भागो, पहाड़ खिसक रहा है का शोर मचाना शुरू कर दिया। जो जहां था, वहीं से भागा। कुछ ही मिनट में गांव के नीचे का पूरा पहाड़ करीब आधा दर्जन घरों के साथ जमींदोज हो गया। गनीमत यह रही कि पहाड़ खिसकने से पहले सभी लोग घरों को छोड़कर सुरक्षित जगह पहुंच गये थे। हालांकि 22 में से 18 घर बच गये थे, लेकिन ये घर अब रहने लायक नहीं रह गये हैं। फिलहाल इन घरों को खाली कर दिया गया है और प्रशासन ने इनमें रहने वाले परिवारों को प्राइमरी स्कूल और कुछ अन्य जगहों पर ठहराया है।

रुद्रप्रयाग के सारी गांव में भूस्खलन

पिछले कुछ समय से पहाड़ों में लगातार इस तरह की अप्रत्याशित घटनाएं घट रही हैं। 28 फरवरी को झालीमठ में हुई इस घटना से ठीक एक वर्ष और 3 हफ्ते पहले चमोली जिले की नीती घाटी में भी एक ऐसी घटना घटी थी, जिसकी कभी किसी ने कल्पना नहीं की थी। 7 फरवरी, 2021 का दिन था। दो दिन पहले नीती घाटी में हल्की बर्फबारी हुई थी और अब मौसम पूरी तरह से साफ था। सुबह करीब 10 बजे अचानक नंदादेवी बफर जोन ग्लेशियर से निकलने वाली ऋषिगंगा में उफान आ गया। भारी मात्रा में मोरेन के मलबे के साथ प्रचंड रूप ले चुकी ऋषिगंगा का पहला निशाना बना रैणी गांव में बना एनटीपीसी का पावर हाउस। घटना के वक्त दर्जनों लोग पावर हाउस में काम कर रहे थे। सभी ऋषिगंगा की प्रचंड लहरों में समा गये। ऋषिगंगा का कोप कई जिन्दगियां लीलने के बाद भी खत्म नहीं हुआ और धौलीगंगा के साथ मिलकर करीब 5 किमी आगे तपोवन में निर्माणाधीन एनटीपीसी की जल विद्युत परियोजना को पूरी तरह तबाह कर दिया। यहां सैकड़ों मजदूर दफन हो गये।

17 अक्टूबर, 2021 को उत्तराखंड में एक बार फिर अप्रत्याशित बारिश हुई थी। यह बारिश मानसून विदा होने के बाद हुई और बारिश के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ गई। इस बारिश ने भी पूरे राज्य और खासकर कुमाऊं मंडल के जिलों में भारी तबाही मचाई। कई लोगों की मौत हुई।

28 फरवरी की सुबह रुद्रप्रयाग जिले के सारी गांव में हुए भूस्खलन में सबसे बड़ी राहत यह रही है कि कोई जनहानि नहीं हुई। घटना सुबह 8 बजे के करीब हुई। लेकिन, यदि कुछ घंटे पहले यह सब होता तो बहुत बड़ा नुकसान हो सकता था। जो घर पूरी तरह टूटे हैं, उनमें करीब 10-12 लोग रहते थे। पूरे झालीमठ तोक में 22 घरों में करीब 60 लोग रह रहे थे। फिलहाल किसी की समझ में नहीं आ रहा है कि बिना बारिश और बिना किसी भूकंप के झटके के ऐसा क्या हो गया कि अचानक पूरा पहाड़ दरक गया। स्थानीय लोग इसकी अलग-अलग वजह मान रहे हैं।

यहां था ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट

सारी गांव के अध्यापक कुंवर सिंह बिष्ट कहते हैं कि गांव के ठीक नीचे गदेरा है। लगता है बरसात में गांव के नीचे कटान हुआ था और अब अचानक यह घटना हो गई। वे यह भी कहते हैं यहां कच्ची भुरभुरी मिट्टी है। लोगों ने अब घरों के बाहर पिट बनाये हैं। इनसे लगातार रिसता पानी भी इस घटना का कारण हो सकता है। मीना बासकंडी का घर घटनास्थल से करीब 1 किमी दूर है। वे कहती हैं कि गांव के नीचे जो गदेरा बहता है, उसमें लगातार अवैध रूप से रेत-बजरी का खनन हो रहा है। मीना बासकंडी के अनुसार इस गदेरे में सरकारी स्तर पर खनन का पट्टा आवंटित नहीं है, लेकिन आस पास के गांव के लोग अपने घर आदि बनाने के लिए इसी गदेरे से रेत-बजरी ले जाते हैं। कहीं न कहीं यह खनन भी इस घटना के लिए जिम्मेदार हो सकता है।

राज्य आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केन्द्र के अधिशासी निदेशक डॉ. पीयूष रमोला कहते हैं कि तुरंत यह कहना संभव नहीं है कि इस घटना का कारण क्या है। वे कहते हैं कि यह घटना अप्रत्याशित तो है, लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि राज्य में पहले भी ऐसी घटनाएं होती रही हैं। वे कहते हैं कि सितंबर 2003 में मानसून की विदाई के बाद उत्तरकाशी में वरुणावत पर्वत लगातार दरकता रहा था। बाद में दरकने वाली जगह का ट्रीटमेंट किया गया। वे 2005 में टिहरी जिले के रमोलसारी में हुए भूस्खलन की भी याद दिलाते हैं, जो मानसून आने से पहले हुआ था। 2013 में केदारनाथ और अन्य क्षेत्रों में हुई तबाही को इस मामले में अप्रत्याशित माना जाता है कि मानसून सामान्य समय से कई दिन पहले पहाड़ों में पहुंच गया था। पिछले वर्ष 7 फरवरी को चमोली जिले में ऋषिगंगा और धौली में आये जल प्रलय को अप्रत्याशित प्राकृतिक घटना के रूप में चिन्हित किया जाता है।

जोशीमठ में पड़ी दरार की चौड़ाई नापता एक सरकारी कर्मचारी।

उत्तराखंड वानिकी और औद्यानिकी विश्वविद्यालय के भू-वैज्ञानिक डॉ. एसपी सती कहते हैं कि उन्होंने इस घटना के कारणों को जानने का प्रयास किया, लेकिन पता चला है कि इस पूरे क्षेत्र का आज तक कभी भूगर्भिक सर्वेक्षण नहीं किया गया है। वे कहते हैं कि उत्तराखंड एक संवेदनशील राज्य है, इसलिए यह जरूरी है कि हर गांव का भूगर्भिक सर्वेक्षण किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि गांव पूरी तरह सुरक्षित है।

भूवैज्ञानिक और पर्यावरणविद् लगातार मांग उठाते रहे हैं कि पहाड़ों में जो भी परियोजनाएं बनाई जाएं, परियोजना वाले पूरे क्षेत्र का भूगर्भिक सर्वेक्षण अवश्य किया जाए। लेकिन,  28 फरवरी, 2022 के भूस्खलन से प्रभावित क्षेत्र का भूगर्भिक सर्वेक्षण न होना इस बात का सबूत है कि परियोजनाओं वाले क्षेत्रों में इस तरह का कोई सर्वेक्षण नहीं किया जा रहा है। दरअसल प्रभावित गांव सारी के ठीक सामने दो बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं। इनमें एक चारधाम सड़क परियोजना है, जिसे ऑल वेदर रोड नाम देकर चौड़ा करने का काम चल रहा है और दूसरी महत्वपूर्ण परियोजना ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन है, जिसके लिए टनल बनाने का काम लगातार चल रहा है।

सारी गांव अलकनन्दा नदी के दाहिनी ओर नदी से कुछ किमी ऊपर है। गांव के ठीक सामने चमोली जिले का गौचर नगर है। गौचर से बदरीनाथ हाईवे गुजरता है, जिसे ऑलवेदर रोड के नाम पर चौड़ा किया जा रहा है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन के लिए यहां सुरंग भी बनाई जा रही है। गौचर में रेलवे का भूमिगत स्टेशन भी बनाना है, बताया जा रहा है यहां दोहरी सुरंग बनाई जा रही है। इस रेलवे लाइन के निर्माण में टनल बनाने के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल किये जाने का लगातार आरोप लगाये जाते रहे हैं। निर्माणाधीन रेल लाइन के आसपास के गांवों के लोग लगातार जमीन कांपने की शिकायत कर रहे हैं। जमीन धंसने और घरों में दरारें आने संबंधी शिकायतें भी लगातार संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जा रही हैं।

इन परिस्थितियों के बीच निर्माणाधीन रेलवे लाइन से कुछ ही किमी दूर स्थित सारी गांव में हुई भूस्खलन की घटना को टनल बनाने में कथित रूप से इस्तेमाल किये जा रहे विस्फोटकों के संदर्भ में अवश्य देखा जाना चाहिए। यह आशंका सिर्फ इस बिना पर खारिज नहीं की जा सकती कि प्रभावित गांव अलकनन्दा नदी के दूसरी तरफ है, जबकि रेलवे लाइन दूसरी तरफ बन रही है।

हाल की बर्फबारी के बार कुछ और चौड़ी हो गईं जोशीमठ में दरारें

रुद्रप्रयाग के सामाजिक कार्यकर्ता मोहित डिमरी कहते हैं इस क्षेत्र में बार-बार जमीन में कंपन महसूस किये जाने की खबरें मिल रही हैं। वे आशंका जताते हैं कि ऐसा टनल निर्माण में विस्फोटकों के इस्तेमाल से हो रहा है। आसपास के कई गांवों में लोगों के घरों में आई दरारें वे खुद देखकर आये हैं। मोहित डिमरी कहते हैं कि इन विस्फोटों से अलकनन्दा के दोनों तरफ के पहाड़ कमजोर हो रहे हैं। ऐसे में सारी गांव की घटना का कारण कहीं न कहीं ये विस्फोट भी हैं।

संवेदनशील गांवों की पहचान हो

रुद्रप्रयाग जिले के सारी गांव का भूगर्भिक सर्वेक्षण न होना इस बात का भी संकेत है कि राज्य सरकार असुरक्षित हो चुके गांवों के प्रति संवेदनशील नहीं है। फिलहाल  राज्य सरकार ने ऐसे 352 गांवों की पहचान की है, जो संवेदनशील हैं और जिन्हें विस्थापित करना बेहद जरूरी है। इनमें से 51 गांवों को अति संवेदनशील माना गया है। इन गांवों को दूसरी जगहों पर विस्थापित करने की कवायद पिछले कई वर्षों से चल रही है।

राज्य सरकार ने हर वर्ष हर जिले में दो-दो गांवों को विस्थापित करने की भी योजना बनाई थी। इस योजना के तहत 3.25 लाख रुपये प्रति परिवार बजट तय किया गया था। लेकिन, कम बजट और जमीन न मिल पाने के कारण अब तक एक भी संवेदनशील गांव का विस्थापन नहीं किया जा सका है। राज्य सरकार ने 130 गांवों को ट्रीटमेंट के जरिये सुरक्षित करने की भी योजना बनाई है, लेकिन यह योजना भी पिछले कई वर्षों से धरातल पर नहीं उतर पाई है।

ये संख्या सिर्फ उन गांवों की है, जहां स्पष्ट रूप से खतरा मंडरा रहा है। सारी जैसे सैकड़ों और गांव हैं, जो असुरक्षित हैं, लेकिन पता नहीं चलता। भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण से ही यह बात सामने आ सकती है कि कितने गांव सुरक्षित हैं और कितने नहीं, लेकिन तमाम दावों के बावजूद राज्य सरकार इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है।

सरकार की ओर से की जाने वाली लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण चमोली जिले का जोशीमठ नगर है। जोशीमठ बदरीनाथ, हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी जाने वालों का प्रमुख पड़ाव है। पिछले कुछ समय से जोशीमठ लगातार धंस रहा है। यहां सड़कों, खाली जमीन और घरों पर दरारें पड़ रही हैं, जो लगातार चौड़ी होती जा रही हैं। जोशीमठ के सामाजिक कार्यकर्ता अतुल सती कहते हैं कि उन्होंने इस बारे में कई पत्र संबंधित अधिकारियों को भेजे हैं। वे पूरे क्षेत्र का भूगर्भीय सर्वेक्षण करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन, ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं हो रहा है। अतुल सती के अनुसार पिछले महीने जिला प्रशासन ने एक टीम जरूर भेजी थी, जो कुछ जगहों पर दरारों की चौड़ाई नाप कर चली गई। इसके अलावा कोई कदम नहीं उठाया गया है, जबकि स्थितियां लगातार गंभीर होती जा रही हैं।

अतुल सती जोशीमठ के मामले में 1976 में तत्कालीन गढ़वाल आयुक्त महेश चन्द्र मिश्रा की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि जोशीमठ के साथ ही पूरी नीती और माणा घाटी भी भूस्खलन के मामले में बेहद संवेदनशील है। इसके बावजूद यहां बड़ी-बड़ी परियोजनाएं खड़ी की गई हैं, जिनके बेहद गंभीर नतीजे निकट भविष्य में सामने आ सकते हैं। दरअसल मिश्रा समिति की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि जोशीमठ मोरेन पर बसा हुआ शहर है। ग्लेशियर पिघलने के बाद जो मलबा बच जाता है, वह मोरेन कहलाता है। रिपोर्ट कहती है कि इस क्षेत्र में कोई भी बड़ा निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। इसके बावजूद जोशीमठ के आस-पास के क्षेत्र में जल विद्युत परियोजनाएं बनाई गई हैं और कई निर्माणाधीन हैं। पिछले वर्ष 7 फरवरी के जल प्रलय की घटना में व्यापक रूप से जनहानि का कारण यही परियोजनाएं बनी थीं।

(उत्तराखंड से वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट की रिपोर्ट।)

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