जंतर मंतर प्रदर्शन और अनशन के दौरान जेन-जी के बयानों और पोस्टरों में सरकार और उसके पदाधिकारियों के लिए गालियां थीं। आंदोलन के समर्थकों और वरिष्ठ लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिशें भी कीं। कुछ युवा मान गए तो कुछ ने कहा अंकल अब ऐसे ही चलेगा। हमारी पीढ़ी इसी भाषा में अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करेगी। जाहिर सी बात है कि जेन-जी के लोग कई बार इसी भाषा में आपस में भी बात करते हैं।
अगर आप ने ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म देखी हो तो उसमें ‘जहांपनाह तुसी तोहफा कुबूल हो’ –का दृश्य किसी को अश्लील लग सकता है। लेकिन हॉस्टलों में रैगिंग के दौरान इस तरह के दृश्य आम हुआ करते थे। स्टैंडअप कमेडी में आजकल अगर गाली न आए तो कमेडी का मजा नहीं आता। तो क्या गाली का सारा ठीकरा इसी पीढ़ी के मत्थे फोड़ा जा सकता है? क्या ऐसा कोई प्रमाण है कि इससे पहले की पीढ़ियां गालियां नहीं देती थीं?
अपने जीवन के साथ ही हर किसी चीज को हंसी मजाक में उड़ा देने वाले एक गंभीर लेखक शारदा पाठक कहा करते थे कि ‘मार साले को’ वाली गाली तो महाभारत से आई है। क्योंकि वहां सब एक दूसरे के रिश्तेदार थे और आपस में ही कट मर रहे थे। शायद भारतीय संस्कृति की इसी परंपरा का पालन करते हुए हमारे गृहमंत्री लोकसभा में कई बार इस तरह की अभिव्यक्ति दे चुके हैं। उनके कई मंत्री तो सदन के बाहर सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान ऐसी अभिव्यक्ति दे चुके हैं।
एक सांसद तो पिछले सदन में अल्पसंख्यक वर्ग के एक सांसद के लिए गाली शब्द का प्रयोग कर चुके हैं। एक बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री बहुत कुछ कहते हुए कैमरे पर पकड़े जा चुके हैं। इसलिए गालियों पर पौराणिक अधिकार तो संघ परिवार से निकले और आजकल देश की सत्ता पर काबिज राजनेताओं का है जिसे उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को बड़े पैमाने पर बांट कर डिजिटल मीडिया पर सक्रिय कर रखा है।
स्वाती चतुर्वेदी ने तो इस पर किताब ही लिख डाली है—’आई एम ए ट्रालः इनसाइड सीक्रेट आर्मी आफ बीजेपी डिजिटल आर्मी।’ स्वाती चतुर्वेदी अपनी इस पुस्तक में यही साबित करती हैं कि भाजपा की डिजिटल सेना किस प्रकार महिला पत्रकारों, राजनेताओं और लेखकों को भाजपा के समर्थक अश्लील टिप्पणियों से नवाजती है और प्रशासन पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाड़ती।
इसलिए जंतर मंतर पर अपने देश के प्रमुख नेताओं को गाली देना गैर-कानूनी और अनुचित है लेकिन वे गालियां नफरत की नहीं थीं। वे गालियां गुस्से की थीं। उन गालियों के पीछे जाति और धर्म कोई कारण नहीं था। उनके पीछे विशुद्ध कारण फासीवाद की विचारधारा को निशाने पर लेना था और नेता के अहंकार को लक्ष्य करना था।
जाहिर है कि यह गालियां मोहब्बत वाली तो कतई नहीं थीं। अगर यह कहा जाए कि गालियां देकर युवाओं ने अपने आंदोलन को भाषा के स्तर पर जरूर हिंसक बनाया लेकिन शारीरिक रूप से वह अहिंसक ही रहा। वह आंदोलन बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसा नहीं हो पाया। यह कोई छोटी बात नहीं कि युवाओं ने अपनी ओर से कोई हिंसा नहीं की और महीने भर से अधिक समय तक आंदोलन चलाया और 20 जुलाई को तो उनके आंदोलन में भागीदारी करने वालों की संख्या चार पांच लाख तक पहुंच गई बताई जाती है।
गालियों की जड़ में लैंगिक, जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई, आर्थिक अंतर बड़ी वजह है और सबसे बड़ी वजह तो यौनिक इच्छाएं और कुंठाएं होती हैं। दुनिया की शायद ही कोई सभ्यता और समाज हो जहां पर गालियां न होती हों। आप लाख पाबंदी लगा लीजिए लेकिन वे गालियां पूरी तरह से समाप्त नहीं होने वाली हैं। इन गालियों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है।
एक है मोहब्बत की गालियां और दूसरी हैं नफरत की गालियां। इस बारे में एक रोचक किस्सा याद आ रहा है। कृष्ण बिहारी मिश्र ने जब ‘कल्पतरु की उत्सवलीला’ शीर्षक से रामकृष्ण परमहंस की जीवनी लिखी तो ज्ञानपीठ ने कहा कि इससे गालियां निकाल दीजिए। बल्कि पहले पेज की शुरुआत ही गाली से हो रही थी। इसे तो कम से कम ठीक कर दीजिए। लेकिन कृष्ण बिहारी जी ने साफ मना कर दिया।
उनका कहना था कि जब ठाकुर जी ऐसे ही बोलते थे तो वे कौन होते हैं उसे हटाने और बदलने वाले। श्रीमागो ने लिखा है कि वे विवेकानंद को अधिकार भावना के तहत गाली दे दिया करते थे।
मशहूर कथाकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने जब अपनी प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ सरस्वती में छपने के लिए भेजी तो उसमें भी गालियां थीं। लेकिन हिंदी को सुधारने और संवारने का वीड़ा उठा चुके महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उन गालियों को संपादित कर दिया। हालांकि बाद में कुछ अन्य स्थानों पर वह कहानी जस की तस छपी तब पता चला कि वह गालियां जीवन की निस्सारता से उत्पन्न हुई थीं। बंकर में बैठे हुए सैनिक जिनके सामने मौत खड़ी है अपने मन का भय मिटाने के लिए और कर ही क्या सकते हैं।
इसी तरह ‘कासी का अस्सी’ में गालियों की भरमार है। जब इसके लेखक काशीनाथ सिंह से पूछा गया कि इतनी गालियां क्यों हैं आप के उपन्यास में तो उनका कहना था कि काशी की गालियां फकीर की गालियां हैं। हालांकि बनारस में होली के मौके पर होने वाले आयोजन को भाजपा सरकार ने बंद करा दिया है विशेषकर जब से नरेंद्र मोदी वहां से चुनाव जीते हैं।
समाजशास्त्री अमिता बाविस्कर की पुस्तक है—इन द बेली आफ द रिवर। उसमें भिलाला आदिवासी समाज के गायना का जिक्र है। उस गीत में जगत की उत्पत्ति के बारे में उनकी अपनी दृष्टि है। उसमें निरंतर संपुट के रूप में मां की गाली आती है। हालांकि आदिवासी समाज कथित रूप से सभ्य समाज की तरह से पुरुषसत्तात्मक नहीं होता। गालियां भारतीय समाज के रोमांटिक और मधुर रिश्तों का भी हिस्सा हैं।
कौन सा ऐसा विवाह होता है जहां पर गाली न गाई जाए। अगर न गाई जाएं तो कई बाराती नाराज हो जाते हैं। जीजा-साला, ननद- भौजाई, देवर भाभी ऐसे तमाम रिश्ते हैं जहां पर खूब हंसी मजाक चलता है जिसमें गालियां अंतर्निहित होती हैं। लेकिन कोई बुरा नहीं मानता।
होली पर होने वाले फाग और कबीर में गालियां हैं और ईश्वर, विशेष कर भगवान कृष्ण के इर्द गिर्द बुनी गई हैं। वे हमारी भक्ति और अध्यात्म की परंपरा का हिस्सा हैं। दरअसल यह प्रेम की गालियां हैं। इसलिए यह उन्हीं को अमर्यादित लग सकती हैं जो या तो किसी विचारधारा के वशीभूत हैं या फिर अपनी राजनीति के लिए हंसी मजाक से रहित एक नफरती समाज का निर्माण करना चाहते हैं।
गालियां वे भी देते हैं जो दूसरों पर गालियां देने का आरोप लगाते हैं। लेकिन वे नफरती गालियां देते हैं। क्योंकि उनके पास प्रेम करने का समय नहीं है या समझ नहीं है। उन्हें दूसरों को हीन बताना है और अपने को श्रेष्ठ बताना है वे इसलिए गालियां देते हैं। उन्हें एक आज्ञाकारी समाज बनाना है इसलिए वे गालियां देते हैं ताकि दूसरा खामोश होकर उनकी गालियां सुन सके। उनकी पुलिस गालियां देती है। थानों में तो गालियों का अखंड पाठ चलता रहता है। ताकि जनता थर थर कांपती रहे।
जो लोग सोचते हैं कि गालियां झुग्गी झोपड़ी और गरीब समाज की बपौती है वे गलत हैं। गालियां वास्तव में शासक समाज और वर्ग और उससे जुड़े व्यक्ति की पहचान है। वह उसके मालिक होने को प्रमाणित करने के लिए जरूरी हैं। यह गालियां एक प्रकार की सांस्कृतिक हिंसा के लिए आवश्यक हैं ताकि शारीरिक हिंसा की आवश्यकता न पड़े। लगता है राजनीतिक सत्ता और धनसत्ता को वैधता ही तब मिलती है जब वह इन सत्ताओं से रहित व्यक्ति या समाज के लिए गालियों का प्रयोग कर सके।
गालियां ‘मैं और तुम’ के अंतर को बढ़ाती हैं। क्योंकि ‘मैं और तुम’ कभी पास थे लेकिन अब मैं तुम्हारे पास नहीं आना चाहता। इसीलिए नफरती गालियों का निर्माण किया गया है।
लेकिन प्रेम की गालियां वर्ग, जाति, धर्म, क्षेत्र, लिंग और देश की दीवारों को तोड़ती हैं। और पाटती हैं ईश्वर और मनुष्य की खाइयों को।
गालियों को बदलने की जरूरत है। क्योंकि ज्यादातर गालियां स्त्रियों को नीचा दिखाने के लिए दी जाती हैं। इसीलिए कहा भी जाता है कि सारे स्त्री विमर्श का उद्देश्य अभिव्यक्ति का व्याकरण बदलना है। उसकी भाषा बदलना है। यही उद्देश्य जाति तोड़ने का भी है और यही सांप्रदायिक सद्भाव कायम करने का भी है। लेकिन सब कुछ बदल जाने के बावजूद प्रेम की गालियां रहेंगी।
नफरती गालियां मिटें यही सभ्यता की मांग है। लेकिन वह तभी मिटेगी जब ऊंच नीच और शासित और शासक का अंतर मिटे। अन्याय मिटे। अन्याय जब तक रहेगा तब तक गालियां रहेंगी।
(तस्वीर एआई की मदद से)
(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)