Wednesday, August 10, 2022

ग्राउंड रिपोर्ट : नाम, नमक और निशान पाने के लिए तप रहे बनारसी नौजवानों के उम्मीदों पर अग्निवीर स्कीम ने फेरा पानी 

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वाराणसी। यूपी और बिहार में आज भी किसान और मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चे किशोरावस्था में कदम रखते ही पैरों के टखने और घुटने मिलाने लगते हैं। ताकि भारतीय सेनाओं के अन्य विंग में भर्ती होने के लिए तैयारियों का आगाज कर सकें। बनारस, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, सोनभद्र, भभुआ समेत कई जिलों के ये नौजवान इतने जिद्दी होते हैं कि शौक और रुतबे की खातिर आखिरी विकल्प तक ग्राउंड को अपना हमसफ़र चुन लेते हैं। समाज में नाम, तिरंगे और राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अशोक के निशान पर मर-मिटने की कस्मे रोजाना दोनों वक्त शाम-सुबह ग्राउंड में खाते हैं। भारतीय सेना समेत अन्य विंगों में भर्ती के बाद सेवा पूरी कर लौट आए तो किस्मत वरना तिरंगे में लिपटे आए तो वीरगति। लेकिन फिलवक्त, यूपी-बिहार के पचासों जिलों के लाखों नौजवान अग्निवीर स्कीम को क्यों सिरे से ख़ारिज कर रहे हैं ? जवाबों की पड़ताल करती एक रिपोर्ट।     

बनारस का रौनियार ग्राउंड (पूर्वोत्तर रेलवे ग्राउंड).

30 जून दिन गुरुवार,

सुबह का वक्त,

कलाई घड़ी में 5.30 बज रहे हैं। 

ग्राउंड पर बना रेस ट्रैक। कई स्थानों पर पानी में डूब हुआ है। हाल के दो दिनों में बनारस में पहले दिन यानी मंगलवार को 63 और दूसरे दिन बुधवार को 103 एमएम की बारिश से शहर पानी-पानी हो गया था। चार-पांच लड़के आते हैं और सीढ़ियों पर बैठ जाते हैं। कुछ वार्मअप करने लगते हैं, शेष युवक रेसिंग ड्रेस पहनकर रोड पर दौड़ने के लिए चले जाते हैं। जनचौक की टीम उनके वापस आने का इंतजार करने लगी। इस दौरान ग्राउंड की सीढ़ियों पर वार्मअप करते मिले ग्राउंड के सीनियर रेसर और स्पोर्ट कोटे से भारतीय सेना में जाने की तैयारी में जुटे मिथुन कन्नौजिया। मिथुन ने जब से होश संभाला है, तब से ग्राउंड को अपना दोस्त बना लिया है। सुबह के समय अपने लिए पसीना बहाते हैं, वहीं, शाम को सेना में जाने की तैयारी करने वाले नए साथियों को ट्रेंड करते हैं। ग्राउंड से फुर्सत होने पर अपनी कराटे एकेडमी में बच्चों को ताइक्वांडों की ट्रेनिंग भी देते हैं। इससे भी समय बचने पर अपने पिता के लॉड्री वाले बिजनेस में हाथ बंटाते हैं। अग्निवीर स्कीम के विरोध के बाद मिथुन के घरों के आसपास पुलिस का पहरा बढ़ा दिया गया है। 

मिथुन कन्नौजिया

सुबह-सुबह की स्वास्थ्य वर्धक ठंडी बयार में बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता है। जनचौक का सवाल – अग्निवीर स्कीम क्या है, प्रतियोगियों में नाराजगी या ख़ुशी क्यों है ?

मिथुन – जैसे सवाल को अनसुना करते हुए, इग्नोर कर जाते हैं।

सवाल – खामोशी लोकतंत्र को कमजोर करती है, जबकि संविधान अपनी बात को खुलकर रखने की पूरी आजादी देता है।

मिथुन – आप उन बच्चों का इंतजार कर लीजिये, मेरे ओपिनियन को आप लिख नहीं सकते हैं।

जनचौक – आप अग्निवीर स्कीम को लेकर बेबाक टिप्पणी कीजिये, हम छापेंगे।

मन को हल्का करते हुए मिथुन थोड़ा मुखर होकर बोल पड़ते हैं – इंडियन आर्मी हम लोगों का हौसला है। जूनून है या कह लीजिये पागलपन था।

जनचौक – अग्निवीर स्कीम भी तो आपको बतौर सैनिक चार साल देश सेवा का मौका देती है ?

मिथुन ग्राउंड पर इशारा करके युवाओं की जर्सी से टकपते पसीने की बूदों को दिखाते हुए एग्रेसिव हो जाते हैं और बोलना शुरू करते हैं तो एक के बाद एक कई सवाल हवा में दाग देते हैं-

अग्निवीर नाम कैसे आया ?

इंडियन आर्मी ब्रैंड है।

इंडियन आर्मी कहते हुए सीना चौड़ा हो जाता है ।

ये कैसा नाम है अग्निवीर। मनुवादी नाम अग्निवीर। सिर्फ कामचोरों और नक्कारों को भा रही यह स्कीम।

क्या हम लोग वीर नहीं हैं? क्या सेना में भर्ती जवान वीर नहीं हैं?

क्या सेना वाले जवान जान नहीं देते हैं?

सेना पैसा कमाने का जरिया है ?

जो कश्मीर में हैं, लद्दाख में हैं, सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात हैं ,उनसे पूछिए, जान हथेली पर रखकर ड्यूटी करते हैं। इस समाज में ऐसे कितने लोग हैं, जो परिवार से हजारों मील दूर और हजारों मीटर बर्फ की चोटियों पर बगैर धूप और हवा के सिर्फ एक लबादे और राइफल के साथ महीनों जिंदगी से जंग कर गुजारना चाहेंगे? इसके पैसे भी दिए जाएंगे। यकीं मानिये कई नाम सुनकर ही भाग खड़े होंगे। मुझे तो अग्निवीर स्कीम के जरिये कार्पोरेट्स के लिए सस्ते और कुशल गार्ड तैयार किए जाने का षड्यंत्र मालूम पड़ता है। दूसरी बात, अग्निवीर क्या हैं, सैनिकों का ये कैसा नाम है ? तीसरी नजर से देखेंगे तो पाएंगे कि अब आरआरएस की कुटिल चाल सेना को भी बर्बाद करने पर तुल गई है। इंडिया में राजनीति के बाद अब फौजों में भी मनुवाद की दस्तक हो चुकी है।

रमाकांत

डिफेंस के तीनों विंग में सैनिक, हवलदार, कमांडो, फ्लाइंग ऑफिसर, कर्नल, कमोडोर, पेटी अफसर, कैप्टन, वारेंट ऑफिसर, सब लेंटिलेंट, कॉर्पोरल, एयरक्राफ्ट मैन समेत कई जोश बढ़ाने और वीरगति को पाने वाले सम्मान जनक पद हैं। मनुवाद के चाशनी में डूबी हालिया स्कीम में जवान चार साल में ही रिटायर होकर पूंजीपतियों के कल-कारखानों की सुरक्षा करेंगे। बात-बात पर उनकी धौंस सुनेंगे। जब से अग्निवीर स्कीम आयी है- तब से पचास से अधिक प्रतियोगी युवा ग्राउंड पर नहीं दिख रहे हैं। जो आ रहे हैं, उनकी भी विवशता है कि वे करें भी तो क्या? अपनी पीड़ा कहें भी तो किससे? टीवी और अखबार को जनता, युवा, बेजरोगरी, महंगाई, गरीबी, विज्ञान, समाज आदि सरोकारी विषयों से तौबा किये लगभग दशकों हो रहे हैं। अग्निस्कीम का विरोध भी हुआ, लेकिन उसे सुनियोजित तरीके से हिंसा के हवाले कर लाखों-लाख नौजवानों की आवाज को दबा दिया गया। हम लोगों के घरों के आसपास पुलिस का पहरा बढ़ा दिया गया है। 

रोहित मौर्य और मद्धू

चार साल में क्या होगा ?

एक अच्छा सैनिक बनने के लिए कम से कम पांच साल का समय तो चाहिए होगा। अग्निवीर के चार साल सेवाकाल में छह से अधिक महीने अवकाश में, करीब नौ महीने ट्रेनिंग में और शेष लगभग दो साल सेवा में। जबकि मेरा साथ रौनियार ग्राउंड पर प्रैक्टिस करने वाला मेरा दोस्त साल 2018 में सेना में भर्ती हुआ, अभी बीकानेर में तैनात है। वह बताया कि अब जाकर उसको युद्ध की ट्रेनिंग दी जानी है। ऐसे कितने सैनिक हैं, जो सिर्फ जनरल ड्यूटी करते हैं। अग्रिम मोर्चे पर लड़ने के लिए युद्ध प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके बाद वह पूर्ण रूपेण सोल्जर बन पाते हैं। यहां अग्निवीर में तो चार साल में भर्ती और विदाई भी है। मिथुन आगे कहते हैं ‘1600 मीटर की रेस मारेंगे तो कलेजा हिल जाता है। सांस उफनने लगती है और छाती इंजन की भांति धौंकने लगती है। यह जुनून सिर्फ इंडियन आर्मी के लगाव और समर्पण को लेकर आता है। यहीं से शुरू होती है सेना में जाने की असली व कठोर ट्रेनिंग। इधर जब से अग्निवीर स्कीम लांच हुई है। तब से यह हौसला नौजवानों का जाता रहा है।

रौनियार ग्राउंड का रिकार्ड-

1600 मीटर, चार राउंड

टाइम – 4 मिनट 27 सेकेंड

         4 मिनट 28 सेकेंड। 

अवसर सिमित- जिम्मेदारी अधिक

चंदौली जिले के रनपुर ग्राउंड पर सेना भर्ती की तैयारी में जुटे युवा।

बनारस से लगायत चंदौली जनपद में रनपुर ग्राउंड में पसीना बहाने वाले दर्जनों युवक अग्निवीर स्कीम से नाराज हैं। सेना की कई भर्तियों में किस्मत आजमा चुके धीरेन्द्र विक्रम सिंह आज भी पूरी लगन और उत्साह से अपनी तैयारी को धार देने में जुटे हुए हैं। धीरेन्द्र बताते हैं कि ‘अग्निवीर स्कीम बहुत कम अवधि की है। इससे कम से कम 10 साल का तो होना ही चाहिए था। हमलोग या सेना के ज्यादातर युवा ग्रामीण और किसान पृष्ठभूमि से जुड़े होते हैं। इनके पास रोजगार के अवसर सीमित और परिवार की जिम्मेदारी अधिक होती है। सबकी नाराजगी तो है लेकिन कोई विकल्प भी नहीं है। ये भी बात सच है कि इन दिनों युवा ग्राउंड आने से कतरा और पहले की तरह जोश में नहीं रहते हैं। लेकिन, भाई-बहन की पढ़ाई-लिखाई और घर-परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति व स्वयं के खर्च के लिए कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा। लिहाजा, अपने जुनून को बरकरार रखते हुए छाती को ग्राउंड पर हंफा रहे हैं, ताकि अपने को जवाब दे सकूं कि मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी। इनकी बातों से टॉपर रनर संदीप, बाबू, अमरजीत और रमाकांत सहमत नजर आए।

सवालों को जवाब का इंतज़ार

चंदौली जनपद के सैयदराजा विधानसभा के नेशनल इंटर कॉलेज के ग्राउंड में सेना की रेस की तैयारी करने वाले रोहित मौर्य, आकाश साहनी, मद्धू, दीपू, फरहान अहमद, और अनुपम मौर्य समेत कई किशोर जो अभी-अभी 19-20 साल की अवस्था में प्रवेश किये हैं। इनमें से रोहित बताते हैं कि अब कौन जाएगा सालों-साल खून-पसीना बहाने ? जब चार साल बाद व्यापार ही करना है तो अभी से क्यों न करें ? देश सेवा का जुनून आज भी पहले की तरह ही बरकरार है, लेकिन क्या किया जाए, जब सेना को भी राजनीति का घुन लग जाए ?

जिनको कायदे से दौड़ने भी नहीं आता है, वे अग्निवीर के फायदे बता रहे हैं। आप समझ सकते हैं कि क्या स्थिति है ? साथ ही जिनके घर हर प्रकार के संसाधन मौजूद हैं और ऐसे घरों को गिनती के युवा अग्निवीर ज्वाइन करना चाहते हैं बतौर एडवेंचर। फिर चार साल बाद घर लौटकर परिवार के बिजनेस में लग जाएंगे। लेकिन, जिनका सपना ही था देश सेवा के साथ परिवार सामाजिक और आर्थिक उन्नति का था… ऐसे लोगों के कई सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है? आखिरी उम्मीद सरकार से थी उसने भी गोल कर दिया। 

ग्राउंड में दौड़ लगाते संदीप और बाबू।

हकीकत जान लीजिये

वाराणसी के रौनियार ग्राउंड में दौड़ लगाने वाले कई प्रतियोगी अग्निवीर स्कीम में चार साल बाद गार्ड बनने के अवसर वाले सवाल को उछलते ही इनके कान खड़े हो जाते हैं। एक साथ कई लोग अपनी नाराजगी भरी प्रतिक्रिया देने लगते हैं। साथ ही गार्ड बनना कोई नहीं स्वीकार करता है, अलबत्ता नेताओं और सेना अधिकारियों को खरी-खोटी भी सुनाने लगते हैं। मिथुन और राजभर बताते हैं कि पास में ही केंद्रीय कैंसर अस्पताल है।

इस अस्पताल में दर्जन भर से अधिक भारतीय सेना से रिटायर जवान बतौर गार्ड नौकरी करते हैं। हम लोग अक्सर आते-जाते देखते हैं कि अस्पताल के डॉक्टर, अधिकारी, स्टाफ और इलाज के लिए आने वाले दबंग तीमारदार इन गार्डों से बदतमीजी से व्यवहार करते हैं। अपमानजनक व्यवहार करते और सम्मान देने में कोताही बरतते हैं। हम लोग पूछते हैं-उस्ताद आप डांटते क्यों नहीं? वे कहते हैं कि अब हम जवान नहीं एक प्राइवेट कंपनी के गार्ड हो गए हैं। अब बताइये चार साल बाद अडानी, महिंद्रा, अम्बानी, बिरला, मित्तल, पूंजीपतियों के खान-खदान, स्टील प्लांट और कारखाने की रखवाली व गुलामी के लिए विवश किया जाएगा। नहीं बनना ऐसा गार्ड। गार्ड वाले मसले पर कृष्णा, विशाल और आशीष भी भृकुटि तानते नजर आए।

धीरेंद्र विक्रम सिंह

इनका गुनाह क्या है ?

गाजीपुर जनपद के शुभम ने बीए तक की पढ़ाई कर रखी है और पांच साल से सेना भर्ती की तैयारी में जुटे हैं। बताते हैं कि अग्निवीर स्कीम क्या है, अब किसी को बताने की जरूरत नहीं रह गई है। गांव से लेकर शहरों तक में सभी कुछ मुद्दों को लेकर उपहास भी उड़ाते हैं। इसमें सरकारी वर चाहने वाली लड़कियां भी पीछे नहीं हैं। फिर भी सभी साथियों की नजर मंजिल पर है। मैंने पांच प्रयासों में दो बार क्वालीफाई कर लिया।

मेरे साथ हजारों युवाओं को मेडिकल टेस्ट और फिर ज्वाइनिंग लेटर का इंतजार था। इसी बीच हम लोगों के आखिरी उम्मीद पर अग्निवीर स्कीम बड़े मुसीबत के पहाड़ की तरह टूट पड़ा। हमें कोई रास्ता और कोई विकल्प नहीं सूझ रहा है। सेना ज्वाइन करने के आखिरी दौर तक पहुंचाना बच्चों का खेल नहीं है। फिर बड़े ही बेरहमी से हजारों नौजवानों को एक झटके में वापस ग्राउंड में पहुंचा दिया गया। आधा दर्जन से अधिक युवाओं को अपने साथ हुई नाइंसाफी का आक्रोश उनके चेहरे पर पढ़ा जा सकता है। इसमें आंनद शर्मा, अमित, वीरेश, कुंदन आदि शामिल हैं।   

अमरजीत

तीसरी नजर 

सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहने वाले एक्टिविस्ट हरिश्चंद्र बिन्द कहते हैं कि सरकार की मनमानी और बेसिर-पैर की नीतियों का नतीजा है कि लाखों-लाख नौजवान रनिंग ग्राउंड छोड़कर सड़कों पर अपना आक्रोश जता रहे थे। पुरानी भर्ती की प्रक्रिया में पेंडिंग हजारों नौजवानों के रोजगार को सरकार ने कैसे घोंट लिया? यह सभी देख रहे हैं। साम्प्रदायिकता की आंच में देश को गाहे-बगाहे झोंकने की विफल कोशिश जारी है, ताकि देश के नागरिकों के ज्वलंत सवालों के जवाब को गोल कर दिया जाए। मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ता लेनिन रघुवंशी भी भारतीय सेना की दुर्दशा से आहत हैं और कहते हैं कि बचे-खुचे मनुवाद और नव उदारवाद ने मिलकर कॉर्पोरेट फांसीवाद को बनाया है। बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर इनके शोषणकारी चेहरे को तभी पहचान रहे थे। कॉन्ट्रेक्चुअल बेस्ड नौकरियों के दो कारण हैं। पहले ऐसे युवाओं को चार साल में ट्रेंड कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। फिर इनको आजीविका की जरूरत पड़ेगी तो वह कॉर्पोरेट की प्राइवेट आर्मी बनने पर विवश हो जाएंगे। लिहाजा, कॉर्पोरेट फांसीवाद मजबूत करने का काम किया जा रहा है, जो देश को कमजोर करेगा। 

आखिरी सवाल

जनचौक – कब होंगे ग्राउंड गुलज़ार ?

रौनियार ग्राउंड के नौजवान – लंबी खामोशी को तोड़ते हुए- आने वाले दिनों में मौसम साफ रहा तो 10 से 15 युवक बढ़ सकते हैं। लेकिन पहले की तरह ग्राउंड शायद ही चहके !

(बनारस से पत्रकार पीके मौर्य की रिपोर्ट।)

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