Friday, August 12, 2022

मुख्य चुनाव आयुक्त और प्रधानमंत्री की मीटिंग को लेकर राजनीतिक हलके में बवाल

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नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ पीएमओ की बैठक को लेकर राजनीतिक हलके में बवाल खड़ा हो गया है। विपक्ष ने इस मसले को गंभीरता से लिया है और उसने सरकार और आयोग दोनों से सवाल पूछे हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्र और दो चुनाव आयुक्त, राजीव कुमार और अनूप चंद्र पांडे, 16 नवंबर को प्रधान मंत्री कार्यालय द्वारा बुलायी गयी इस ऑनलाइन “बातचीत” में शामिल होने के बाद कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि इन परिस्थितियों में कैसे माना जाए कि आगामी चुनाव निष्पक्ष होंगे।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आने वाले चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुये कहा, “वे (पीएमओ) ऐसा नहीं कह सकते। चुनाव आयोग को स्वतंत्र होना चाहिए। यह एक स्वतंत्र निकाय है। वे चुनाव आयोग को कैसे बुला सकते हैं? फिर हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि चुनाव निष्पक्ष होंगे? पांच राज्यों में चुनाव आ रहे हैं, और हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले सभी चुनावों में हमें न्याय मिलेगा”?

खड़गे ने आगे कहा कि “यह सरकार हर संस्था की स्वतंत्रता को नष्ट कर रही है। उन्होंने सीबीआई, सीवीसी को नष्ट कर दिया है। कांग्रेस सांसद ने यह भी कहा कि प्रोटोकॉल के अनुसार अधिकारी किसी मुद्दे पर राय लेने के लिए चुनाव आयोग के पास जा सकते हैं, लेकिन दूसरे तरीके से नहीं। कई बार, हम भी गए हैं। हमने ईवीएम या चुनाव में समस्याओं के बारे में बताया है। आप किसी संस्थान को नीचा नहीं दिखा सकते”।

सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने जो कुछ भी हुआ उसे “अत्याचार” कहा है। और ट्वीट किया, “पीएमओ एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण को कैसे बुला सकता है? इससे भी बुरी बात यह है कि चुनाव आयोग इतना लापरवाह है। वह कैसे उपस्थित हो सकता है? ? चुनाव आयोग की तटस्थता और निष्पक्षता पर”।

सीपीएम के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा कि, भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। इससे पहले भी हम ऐसे उदाहरण देख चुके हैं जहां चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से समझौता किया गया था और सरकार ने चुनाव आयोग के साथ छेड़छाड़ की थी। यह बहुत स्पष्ट है कि यह सरकार इस देश में सभी संस्थानों, विशेष रूप से चुनाव आयोग को अपंग करने पर आमादा है, जिसका इस देश के चुनावों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।

डीएमके नेता तिरुचि शिवा ने कहा, “हम लंबे समय से जोर दे रहे हैं कि संवैधानिक प्राधिकरण, स्वतंत्र स्वायत्त निकाय, कभी भी सरकार के दबाव में नहीं आने चाहिए। उन्हें संदेह से ऊपर होना चाहिए। यही कारण है कि उन्हें ये सारे अधिकार दिए गए हैं। यह सरकार सत्ता में आने के बाद इन सभी संस्थाओं का इस्तेमाल अपनी सनक के लिए कर रही है। भविष्य में क्या होने वाला है यह हमारे सामने एक बड़ा सवाल है। जो चीजें विकसित हो रही हैं, जिस तरह से विधेयकों को पारित किया जा रहा है, जो बाद में विपक्ष की आवाज को कुचलने के लिए उनके हाथों में हथियार बन गए यह अच्छा संकेत नहीं है।”

राजद सांसद मनोज कुमार झा ने कहा है कि – सदमा लेकिन अब कोई आश्चर्य नहीं… आरआईपी #संवैधानिक स्वामित्व।

क्या यह सही है

गौरतलब है कि चुनाव आयोग में इन पदों पर आसीन लोग कार्यपालिका से थोड़ी दूरी ही बनाकर रखते हैं जिससे कि उनकी संवैधानिक गरिमा बनी रहे और किसी तरह का दबाव न बनाया जा सके।

पीएमओ के साथ होने वाली बैठक के लिए कानून मंत्रालय की तरफ से मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र भेजा गया था। पत्र की भाषा पर नाखुश होने के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त बैठक में शामिल हुए।

चुनाव आयुक्त को नोटिस की भाषा में भेजा क़ानून मंत्रालय ने पत्र

कानून मंत्रालय से लेटर जारी होने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) सुशील चंद्र और दो अन्य चुनाव आयुक्तों राजीव कुमार व अनूप चंद्र को पीएमओ के अधिकारियों के साथ बैठक में शामिल होना पड़ा। सीईसी को इस तरह बैठक बुलाना पसंद नहीं आया फिर भी ये तीनों वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग में शामिल हुए। कुछ दिन पहले ही चुनाव आयोग को कानून मंत्रालय के अधिकारी की तरफ से एक पत्र मिला जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा एक बैठक करने वाले हैं जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त का मौजूद रहना भी ज़रूरी है।

सूत्रों का कहना है कि पत्र में लिखी गई भाषा सीईसी को पसंद नहीं आई। भाषा ऐसे थी जैसे कि किसी को समन भेजा जा रहा है। इससे पहले भी इस तरह की दो बैठकें हो चुकी थीं लेकिन इनमें चुनाव आयोग के अधिकारी शामिल नहीं हुए थे। मुख्य चुनाव आयुक्त को शामिल होने के लिए इस तरह नहीं कहा गया था।

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने 16 नवंबर को प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के साथ सीईसी और दो चुनाव आयुक्तों की बातचीत के मद्देनजर “चुनाव आयोग के औचित्य और स्वायत्तता और संस्थानों की स्वतंत्रता” पर चर्चा करने के लिए लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव नोटिस दिया है।

(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)

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