Friday, December 2, 2022

बिहार को पुलिस स्टेट में तब्दील करने की कोशिश: माले

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पटना। पटना के छज्जूबाग में भाकपा-माले के द्वारा आयोजित संवाददाता सम्मेलन में माले राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो के सदस्य धीरेन्द्र झा तथा पार्टी के वरिष्ठ नेता केडी यादव जानकारी दी कि ‘बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक, 2021’ नाम से बिहार सरकार विधानसभा में एक विधेयक ला रही है। राज्य के विकास की जरूरत और हवाई अड्डा, मेट्रो आदि प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के नाम पर यह लाया जा रहा है। बिहार सैन्य पुलिस (बीएमपी) को इस विधेयक के जरिए पुनर्गठित करने की योजना है।

इस विधेयक के जरिए गठित होने वाले पुलिस बल को कोर्ट के आदेश के बिना ही कहीं भी छापेमारी करने और महज संदेह के आधार पर गिरफ्तारी करने का अधिकार होगा। इस पुलिस बल के किसी गलत कार्रवाई के खिलाफ कोर्ट को भी संज्ञान लेने का अधिकार नहीं होगा। इसके लिए कोर्ट को सरकार से अनुमति लेनी होगी। स्थापित नियम है कि 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार व्यक्ति की सूचना कोर्ट को दी जाती है। विधेयक में इसकी कोई चर्चा नहीं है।

इस बिहार विशेष सशस्त्र अधिनियम, 2021 की धारा 7, में पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी की शक्ति मिल जाएगी। कोई भी विशेष सशस्त्र पुलिस अधिकारी, किसी विनिर्दिष्ट प्रतिष्ठान की सुरक्षा की जवाबदेही होने पर बिना वारंट और बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है।

धारा 8, के तहत बिना वारंट के तलाशी लेने और धारा 9, में यह बात उल्लखित है कि कोई विशेष सशस्त्र पुलिस अधिकारी, अनावश्यक विलंब के बिना, गिरफ्तार व्यक्ति को किसी पुलिस अधिकारी को सौंप देगा या पुलिस अधिकारी की अनुपस्थिति में, ऐसे गिरफ्तार व्यक्ति को, गिरफ्तार के प्रसंग से संबंधित परिस्थितियों के प्रतिवेदन के साथ, निकटतम पुलिस स्टेशन तक ले जाएगा या भिजवाएगा। धारा 15 में उल्लिखित है कि किसी भी अपराध का संज्ञान कोई भी न्यायालय नहीं ले सकता है। संज्ञान लेने के लिए न्यायालय को सरकार से अनुमति लेने की जरूरत होगी।

यह संवैधानिक न्याय प्रणाली का खुलेआम उल्लंघन है और संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था को पुलिस राज में बदलने की फ़ासीवादी साजिश है। इसी तरह का कानून उत्तर प्रदेश सहित भाजपा शासित कुछ अन्य राज्यों में लाया गया है। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश इसी कानून की आड़ में आज पुलिस एनकाउंटर राज में बदल गया है। विरोध के हर लोकतांत्रिक आवाज को दबाने में इसका इस्तेमाल हो रहा है। बिहार में भी भाजपा-जदयू की इस नई सरकार ने विरोध की आवाज दबाने के कई आदेश जारी कर चुकी है। सबसे पहले सोशल मीडिया पर विरोध को दबाने का आदेश जारी किया गया और  दूसरे आदेश में आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरी व ठेका से वंचित करने का फरमान जारी किया गया। और अब ‘बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक’ लाया जा रहा है।

भाजपा सरकार की जनविरोधी नीतियों व कदमों से पैदा हो रहे विक्षोभ को दबाने की यह फ़ासीवादी साज़िश है। विधानसभा में भारी विरोध के कारण 19 मार्च को सरकार इसे सदन के पटल पर नहीं रख पाई। अब 23 मार्च को इसे सदन के पटल पर रखने की कोशिश की जाएगी। पूरा विपक्ष इसके खिलाफ संगठित है। इसके खिलाफ हम तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं-न्यायप्रिय नागरिकों से भी अपील करते हैं कि इस घोर लोकतांत्रिक विधेयक के खिलाफ एकजुट हों और इसे कानून की शक्ल नहीं लेने दें।

22 मार्च को इसके खिलाफ भाकपा (माले) पूरे बिहार में राज्य व्यापी विरोध दिवस में इसकी प्रतियां जलायेगी और प्रखंड स्तर पर मार्च, सभा आदि का आयोजन करेगी। 23 मार्च को भगत सिंह की शहादत दिवस पर होनेवाले कार्यक्रम में भी इसका विरोध किये जाने का आहवान किया गया हैं।

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