Wednesday, August 17, 2022

पिछले साल 2 अप्रैल को “भारत बंद” के दौरान मारे गए आंदोलनकारियों को लोगों ने दी श्रद्धांजलि

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एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलितों के 2 अप्रैल 2018 को हुए ऐतिहासिक भारत बंद के एक साल पूरा होने पर ‘सामाजिक न्याय आंदोलन,बिहार’के भागलपुर इकाई के तत्वावधान में हुई एक बैठक में बंद के दौरान मारे गए आंदोलनकारियों को शहीद करार देते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी।

 बताते चलें कि 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि एससी-एसटी अधिनियम के तहत पब्लिक सर्वेंट की गिरफ्तारी, एपॉयंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती है। आम लोगों को भी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की मंजूरी के बाद ही इस मामले में गिरफ्तार किया जा सकता है।

पहले इस कानून के तहत इसका उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को शिकायत के आधार पर तुरंत गिरफ्तार कर लिये जाने का प्रावधान था।

दलित समुदाय इस फैसले से आहत हुआ। उसके मुताबिक ये एक तरह से कानून को लचीला बनाने की कोशिश थी और उसे डर था कि दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ेंगी और उन्हें जैसे मर्जी धमकाया जाएगा। मानवाधिकार संगठनों और कई गैर बीजेपी दलों ने भी इस फैसले की आलोचना की थी और सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाए थे। खुद बीजेपी के भीतर से दलित नेताओं ने फैसले के खिलाफ एक सुर में आपत्ति जताई थी। क्योंकि उन्हें अपने वोट बैंक में गिरावट के खतरे का डर था।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ दलितों द्वारा 2 अप्रैल 2018 भारत बंद की घोषणा की गयी और बंद अभूतपूर्व रहा। इस ऐतिहासिक भारत बंद में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर तमाम दलित संगठन एक साथ सड़कों पर उतरे। वहीं आंदोलन को कई संगठनों का भी समर्थन मिला। बंद के दौरान हिंसक घटनाएं भी हुईं और इन घटनाओं 13 आंदोलनकारी मारे गए।

2 अप्रैल 2019 को आहुत ‘सामाजिक न्याय आंदोलन’ की बैठक में 2 अप्रैल 2018 के ऐतिहासिक भारत बंद में शहीद आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि दिए जाने के बाद कई प्रस्ताव लाए गए। जिसमें कहा गया कि बहुजन समाज की ओर से सामाजिक न्याय के एजेंडा को लोकसभा चुनाव-2019 में पेश किया जाएगा, चलेगा अभियान!

बैठक में सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार की कोर कमेटी सदस्य रिंकु यादव ने कहा कि 2 अप्रैल 2018 के भारत बंद में मारे गए बहुजन आंदोलनकारियों के मामलों में न्याय का गला घोंटा जा रहा है। हत्यारों को छूट मिली हुई है। आज भी कई आंदोलनकारी रासुका के तहत उत्तर प्रदेश के जेलों में बंद हैं। हज़ारों आंदोलनकारियों पर देश के विभिन्न हिस्सों में लादे गए झूठे मुकदमे की वापसी का सवाल बना हुआ है।

रामानंद पासवान और अंजनी विशु ने कहा कि 2 अप्रैल 2018 भारत बंद में मारे गए दलितों के मामलों में न्याय ,मुआवजा और आंदोलनकारियों की रिहाई व लादे गए झूठे मुकदमों की वापसी के सवालों पर लोकसभा चुनाव में राजनीतिक पार्टियां अपना स्टैंड स्पष्ट करें।

शंकर बिंद और अशोक कुमार गौतम ने कहा कि बहुजन समाज को जरूर ही वोट डालने से पहले इन सवालों पर उम्मीदवारों से उनका स्टैंड पूछना चाहिए।

बैठक में सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार की राज्य कोर कमिटी द्वारा तय मुद्दों और चुनाव के दरम्यान अभियान चलाने के फैसले और अभियान की रुप—रेखा पर भी चर्चा की गई।

जिसमें ‘सवर्ण आरक्षण को रद्द करने’, ‘अतिपिछड़ों-पिछड़ों का आरक्षण 52% करने’,’निजी क्षेत्र व न्यायपालिका में आरक्षण लागू करने’, ‘बैकलॉग भरने की गारंटी के साथ तमाम सरकारी रिक्तियों को भरने’, ‘जाति आधारित जनगणना कराने’, ‘अतिपिछड़ों के लिए उत्पीड़न निवारण कानून बनाने’, ‘एससी-एसटी व ईबीसी के लिए विधानपरिषद व राज्यसभा में सीट आरक्षित करने’, ‘ईबीसी के लिए विधानसभा व लोकसभा की सीटें आरक्षित करने’, ‘जल-जंगल-जमीन के कॉरपोरेट लूट पर रोक लगाने और बहुजनों को भूमि अधिकार देने’, ‘सबको एकसमान शिक्षा-चिकित्सा की गारंटी देने’ , ‘सफाईकर्मियों को स्थायी नौकरी देने’, ‘दलित मुसलमान-ईसाई को एससी सूची में शामिल करने’, ‘निजीकरण पर रोक लगाने’ सहित अन्य मुद्दों पर 14 अप्रैल – डॉ भीमराव अंबेडकर जयंती तक पूरे जिला में संपर्क अभियान चलाना तय हुआ।

बैठक में तय हुआ कि इन मुद्दों पर बहुजन- समाज को गोलबंद कर राजनीतिक पार्टियों व उम्मीदवारों से उनका इस मामले पर स्टैंड पूछा जाएगा।

चुनाव में बहुजन समाज महज वोटर बनकर नहीं रहेगा। बल्कि चुनाव में भी सामाजिक न्याय के एजेंडा पर अपनी सामाजिक -राजनीतिक दावेदारी को बुलंद करना जारी रखेगा।

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