राजधानी एक्सप्रेस में मिली वह मीठी गंध

उनका रहना दिल्ली के पंजाबी बाग में है। टेलर हैं पेशे से। मेरा उनसे कभी मिलना नहीं हुआ है। बस उनके नेक विचार और उदार जज्बात की गंध मिली है एक बार राजधानी एक्सप्रेस में, मुंबई से दिल्ली की यात्रा के दौरान।

यात्रा में वह नहीं थे। उनकी बेटी थी, जिसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था। वह मेरे लिए उसी तरह से एक अनजान सहयात्री थी, जैसा कि मैं उसके लिए या साथ यात्रा कर रहे बाकी यात्रियों के लिए था। लेकिन आप जानते हैं कि यात्रा लंबी हो और लोग बिल्कुल ही बेरुखे न हों तो तात्कालिक ही सही, पर एक रिश्ता बन जाता है यात्रियों के बीच। इस रिश्ते की शुरुआत अमूमन ऐसे ही किसी वाक्य से होती है कि, कहां तक चल रहे हैं आप? यही सवाल मुझसे उस युवक ने किया जो मेरे ठीक सामने वाली सीट पर बैठा था।

‘आखिरी स्टेशन निजामुद्दीन तक।’ जवाब के बाद मेरी आंखों में तैरते सवाल को पढ़कर उसने कहा, ‘मैं तो ग्वालियर तक ही जा रहा हूं।’ ‘अच्छा,’ मैं आश्वस्त हुआ।

तभी वह लड़की आई। साथ में एक युवक था, जो उसके सामान को सीट के नीचे एडजस्ट करने लगा। पता नहीं क्यों, पर सामान को सीट के नीचे रखने में ताकत उसने जरूरत से थोड़ी ज्यादा लगाई। तत्काल लड़की ने कुछ झिझक और मुस्कान के साथ उसे टोका, ‘आराम से।‘ हमारे चेहरे पर आई हलकी सी असहजता को उसने भांप लिया था। सामान सेट कर युवक उतर गया।

धीरे-धीरे ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी। अब सारे यात्री सेट्ल दिख रहे थे। लड़की कोई किताब पढ़ रही थी, बगल में बैठे सज्जन मोबाइल देख रहे थे। ग्वालियर जा रहे उस युवक की दिलचस्पी शायद बातचीत में थी। उसने मेरी ओर देखते हुए सवाल किया, अंकल जी आपका नाम क्या है?

‘क्यों’ दोस्ताना मुस्कान के साथ मैंने पूछा।

‘ऐसे ही’।

‘प्रणव’ मैंने जानबूझकर सिर्फ पहला नाम बताया।

अपेक्षा के अनुरूप उसने पूछा, ‘पूरा नाम क्या लिखते हैं?’

‘प्रणव प्रियदर्शी’ उसके चेहरे की उलझन दूर नहीं हुई। ‘प्रियदर्शी… कभी सुना नहीं यह सरनेम।’

‘नाम तो जो मां-बाप रख देते हैं, वह रह जाता है। मेरे माता-पिता ने यही नाम रखा।’

बात को स्पष्ट करने के इरादे से वह बोला, ‘आपने शर्मा सरनेम सुना होगा… हम लोग शर्मा ही हैं।’

‘हां, ब्राह्मण होते हैं शर्मा’, मैंने कह दिया ताकि वह समझ जाए कि उसका ब्राह्मण होना नोट कर लिया गया है। उसके चेहरे पर आए संतुष्टि के भाव ने बता भी दिया कि मेरा संदेश उस तक पहुंच गया है।

अपनी किताब में डूबी वह लड़की हमारी बातचीत को सुन और समझ रही है, इसका अहसास कई घंटे बाद हुआ, जब अलग-अलग सिरों से चलने वाली हलकी-फुलकी बातचीत ने हमारे आपसी परिचय को कुछ गाढ़ा बना दिया था। मैंने यह जरूर देख लिया था इस बीच कि लड़की के हाथ में जॉर्ज ऑरवेल की ‘एनिमल फॉर्म’ थी। स्वाभाविक ही, मुझे उससे कुछ रोचक और बेहतर बातचीत की उम्मीद बंध गई थी।

लेकिन इस उम्मीद को सहारा तब मिला, जब बातचीत के एक अन्य प्रसंग को आधार बनाते हुए उस लड़की ने कहा, ‘मैं देखती हूं, ज्यादातर लोग उन बातों को अपनी उपलब्धि मानने लगते हैं जो उनकी उपलब्धि है ही नहीं। जाति, धर्म, देश वगैरह को बनाने में या उसे चुनने में भी हमारा क्या योगदान रहा है? कुछ नहीं। फिर उस पर मैं कैसे और क्यों गर्व करूं। पैतृक संपत्ति पर भी गर्व करने का क्या आधार हो सकता है, लेकिन लोग करते हैं…।‘

25-30 साल के उस युवक की बातों के बरक्स 22-23 साल की उस लड़की की बातें हैरान कर रही थीं।

इससे पहले कि वह युवक इन बातों में अपना संदर्भ देख पाता, लड़की बोली, ‘मैं जब पिछले सप्ताह दिल्ली से आ रही थी मुंबई तो ट्रेन में एक अंकल जी मिले, वह बार-बार कह रहे थे, मेरे पास दो सौ एकड़ जमीन है। सोचिए ट्रेन में जा रहे किसी शख्स को इस बात से क्या मतलब हो सकता है कि आपके पास कितनी जमीन है। फिर भी आपने एक बार बता दिया ठीक है। लेकिन अगर आप बार-बार वही बात दोहरा रहे हैं तो आप शो-ऑफ कर रहे हैं।‘

‘और अगर आपको अपनी अहमियत जताने के लिए अपनी प्रॉपर्टी बतानी पड़ रही है, तो साफ है कि आपका अपने आप पर कोई यकीन नहीं’ मैंने जोड़ा।

‘हां, बिल्कुल। ऐसे लोग हालांकि मिलते रहते हैं, फिर भी वे अंकल कुछ ज्यादा ही अजीब थे। मैं जैपनीज सीख रही हूं, यह सुनकर भी वे उखड़ गए कि विदेशी भाषा क्यों सीखना, अपने देश में क्या कम चीजें हैं सीखने को। यह भी कह रहे थे कि मुंबई जैसी जगह में हाजी अली क्यों बना रखा है। बगल में उतना अच्छा मंदिर है, वहां जाओ। और तब तक तो मैंने उन्हें यह भी नहीं बताया था कि मैं मुस्लिम हूं।‘

‘सही बात है हिंदू, मुस्लिम या किसी भी धर्म का होने से क्या फर्क पड़ता है…’

‘वही तो। हम बचपन से मस्जिद ही नहीं मंदिरों में भी जाते रहे हैं। मेरे पापा कहते हैं कि हर धर्म में कुछ न कुछ अच्छा होता है। वे तो गीता भी पढ़ते हैं। लेकिन आजकल लोग हिंदू त्योहार और मुस्लिम त्योहार की बात करते हैं…’

‘त्योहार वैसे भी कल्चर का हिस्सा हैं। धर्म और कल्चर अलग-अलग चीजें हैं। धर्म हमारे अंदर का विश्वास है, लेकिन संस्कृति साझा होती है। इसलिए त्योहार तो सबके होते हैं…’

उसने मेरी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘जब मैं छोटी थी तो कंचक में मोहल्ले की आंटी लोग मुझे और मेरी बहन को उठा कर ले जाती थीं कन्या भोजन के लिए। इतना मजा आता था। लेकिन अब मेरे दोस्त लोग भी बात करते हैं कि गरबा में मुस्लिम का क्या काम, इसमें उनका क्या है। जब मैं कुछ कहती हूं तो वे कहते हैं शायद तुम मुस्लिम हो, इसलिए ज्यादा ऑफेंड हो रही हो। अरे भई इसमें हिंदू-मुस्लिम की बात ही नहीं है…’

बातचीत बहुत लंबी चली, ट्रेन का वह डब्बा उसकी बातों की सुगंध से भर उठा। क्या आप भी महसूस कर पा रहे हैं उस मीठी सी गंध को जिसकी उत्पत्ति पंजाबी बाग के उस टेलर की परवरिश में है?

(रेखाचित्र : प्रतीकात्मक। एआई की मदद से)

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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