केंद्र सरकार की जनसांख्यिकीय परिवर्तन सम्बंधी समिति राज्यों से विभिन्न प्रकार के आँकड़ों का ‘धर्मवार’ विवरण माँग रही है। जिसमें लोगों के जन्म, मतदाता व वाहन-पंजीकरण, विद्यालयों में प्रवेश, संपत्ति के लेन-देन, आधार और राशन कार्ड पंजीकरण में असामान्य वृद्धि आदि शामिल हैं।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 15 अगस्त, 2025 को ‘उच्च-स्तरीय जनसांख्यिकी मिशन’ बनाने की घोषणा करने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 11 सितंबर, 2025 को इसे मंजूरी दे दी गई थी। इसके साढ़े आठ महीने बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर की अध्यक्षता में 26 मई, 2026 को ‘जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर उच्च-स्तरीय समिति’ का गठन किया। जिसने मीडिया रिपोर्टों के अनुसार राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों से पिछले 15 वर्षों का ‘धर्मवार’ आँकड़ा माँगा है।
इस पर अनेक राज्य सरकारों ने कहा है कि उनके विभाग ऐसा ‘धर्मवार’ डेटा नियमित रूप से रखते ही नहीं हैं। विशेष रूप से आधार के मामले में यूआईडीएआई स्वयं कहता है कि उसके डेटाबेस में धर्म, जाति, समुदाय, आय, स्वास्थ्य आदि की जानकारी नहीं रखी जाती।
सरकार को इसकी जरूरत नहीं होनी चाहिए थी कि वह नागरिकों की समानता के संवैधानिक सिद्धांत के ठीक उलट लोगों के धार्मिक आधार पर पहचान का दस्तावेजीकरण की व्यवस्था बनाए।
जनसंख्या को धार्मिक/वंशगत पहचान के आधार पर वर्गीकृत करना नाज़ी शासन की याद दिलाता है। जबकि भारतीय संविधान राज्य को धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है। अनुच्छेद 15(1) में यह स्पष्ट है। अनुच्छेद 16(2) सरकारी रोजगार में भी धर्म और नस्ल आदि के आधार पर भेदभाव रोकता है।
साथ ही अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है और संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष लोकताँत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करता है।
संविधान में सरकार को धर्म सम्बंधी कोई आँकड़ा एकत्र करने से रोकने का निर्देश नहीं है। सरकार जनगणना या अन्य वैध प्रशासनिक व कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए कुछ सामाजिक-धार्मिक आँकड़े एकत्र कर सकती है। उदाहरण के लिए भारत की जनगणना में धार्मिक समुदायों की जनसंख्या के आँकड़े लंबे समय से प्रकाशित होते रहे हैं। 2027 की जनगणना में जाति की गणना भी शामिल करने का निर्णय लिया गया है।
लेकिन अगर सत्ताधारी वर्ग का मुस्लिमों को इंगित करके लोगों को उनके कपड़ों से पहचानने का आह्वान, श्मसान-कब्रिस्तान, 80-20, बँटोगे तो कटोगे आदि बातों के अलावा मुसलमानों के प्रति खुलेआम घृणा आधारित विद्वेषपूर्ण व्यवहार, हिंसा और दमनकारी होना, विभिन्न राज्यों में बड़े-बड़े डिटेंशन सेंटरों का निर्माण, एसआईआर प्रक्रिया में मुस्लिम बहुल इलाकों में मतदाता सूची से अधिकतर लोगों के नाम काट देना और अब धार्मिक आधार पर डाटा एकत्रीकरण इन सभी बिंदुओं को जोड़कर देखने से सरकार की मंशा साफ़ ज़ाहिर होती है।
सरकारी/मीडिया अभिलेखों में असम, दिल्ली, कर्नाटक, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, गुजरात, तमिलनाडु आदि में विभिन्न प्रकार के डिटेंशन/होल्डिंग स्थानों का निर्माण किया गया है।
2019 के गृह मंत्रालय के मॉडल डिटेंशन सेंटर/होल्डिंग सेंटर/कैंप मैनुअल के अनुसार राज्यों को ऐसे केंद्र बनाने के निर्देश दिए गए थे। डिटेंशन सेंटर सामान्य जेल से अलग व्यवस्था के रूप में परिकल्पित किए गए हैं और इनमें भोजन, आवास, स्वास्थ्य तथा स्वच्छता जैसी मूल सुविधाएँ होनी चाहिए।
नाजी शासन की तरह भारत सरकार भी इनकी कुल संख्या का केंद्रीय आँकड़ा नहीं रखती। इसीलिए “भारत में कितने डिटेंशन सेंटर हैं”—इसका आधिकारिक अखिल भारतीय आँकड़ा नहीं मिलता।
इनका मूल उद्देश्य ऐसे विदेशी नागरिकों को रखना है जिनका भारत में रहना वैध नहीं है और जिन्हें देश से बाहर भेजे जाने की प्रक्रिया पूरी होने तक अलग रखा जाना है।
असम इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है; जहाँ 2019 में छह डिटेंशन सेंटर थे—गोलपाड़ा, कोकराझार, सिलचर, डिब्रूगढ़, जोरहाट और तेजपुर—और इनमें विदेशी घोषित किए गए लोगों को रखा जाता था।
बाद में असम के माटिया (गोलपाड़ा) में लगभग 3,000 लोगों की क्षमता वाला अलग केंद्र बनाया गया। 2025 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सरकार ने बताया कि वहाँ 270 लोग रखे गए थे। इनमें दो अलग श्रेणियाँ थीं—कुछ विदेशी नागरिक अपनी सजा पूरी करने के बाद निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे थे और कुछ लोगों को विदेशी न्यायाधिकरणों ने विदेशी घोषित किया था।
एसआईआर प्रक्रिया द्वारा असंवैधानिक तरीके से लोगों के सामने अपना ‘वैध मतदाता’ होना साबित करने की चुनौती ही पेश नहीं की गई है बल्कि इसके जरिए उनकी नागरिकता छीनने और उन्हें डिटेंशन सेंटरों में रखने का भी इंतजाम किया गया है।
नाज़ी शासन ने भी 1935 के न्यूरैम्बर्ग नस्लीय कानूनों के जरिए जन्म, बपतिस्मा, यहूदी समुदाय के अभिलेख और कब्रों जैसे दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। बाद में इसी वर्गीकरण के आधार पर यहूदियों सहित अन्य समूहों को नागरिक अधिकारों से वंचित करने और व्यवस्थित उत्पीड़न करने का ढाँचा बनाया गया।
जर्मन नाज़ी शासन की कार्यप्रणाली के संदर्भ में इस ‘धर्मवार’ सर्वेक्षण से सरकार व सत्ताधारी वर्ग का इरादा साफ है कि वह यह सब क्यों कर रहा है।
हालाँकि यह सच है कि संवैधानिक समस्या तब पैदा होगी जब किसी व्यक्ति के धर्म, नस्ल या जाति के आधार पर उसके साथ ऐसा भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाए जिसे संविधान और कानून अनुमति नहीं देते।
(फोटो प्रतीकात्मक : पीआईबी)
(श्याम सिंह रावत वरिष्ठ लेखक-पत्रकार हैं।)