Tuesday, November 29, 2022

Exclusive: पीएम मोदी की काशी में मोरबी जैसे हादसे को दावत दे सकता है 134 साल  पुराना राजघाट ब्रिज!

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वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के गृह जनपद को जोड़ने वाले डफरिन ब्रिज (राजघाट पुल/मालवीय पुल) की मियाद कब की खत्म हो चुकी है। खतरे से अनजान लाखों लोग रोजाना जान हथेली पर रखकर आवागमन करते हैं। इस जर्जर और दशकों से उपेक्षित ब्रिज के विकल्प के लिए तेजी से प्रयास होते नहीं दिख रहे हैं। राजघाट पुल बिहार, बंगाल, झारखण्ड और मध्य प्रदेश को बनारस से जोड़ता है। चंदौली, मिर्जापुर, सोनभद्र जैसे जिलों से आने का यह प्रमुख मार्ग भी है। रोजाना इस ब्रिज से वाहनों के साथ लाखों लोगों का आवागमन होता है, तो वहीं, अप-डाउन 60 मालगाड़ी और तकरीबन सौ की संख्या में यात्री ट्रेनें बेहद धीमी गति से गुजारी जाती है। पुल की खस्ता हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बहुत कम दिनों के अंतराल पर ब्रिज के किसी न किसी हिस्से में ठोंक-पीट होती रहती है। एक अक्टूबर 1887 को यह ब्रिज रेल आवागमन के लिए खोला गया। यह ब्रिज 134 साल की आयु पूरी कर चुका है।

 21 नवंबर 2022, दिन सोमवार को भी ब्रिज के रेल की पटरियों की मजदूर और रेलकर्मी ढीले नट-बोल्ट कसने में जुटे हुए थे। ब्रिज के नीचे भीड़ लगी हुई थी। मालूम करने पर लोगों ने बताया कि ब्रिज पर जाली नहीं लगे होने की वजह से एक ऑटो चालक ने गंगा में कूदकर आत्महत्या कर ली है। चालक का शव अभी नहीं मिल पाया है, जिसकी गंगा में तलाश की जा रही है।  

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मोदी के गृह राज्य गुजरात में चंद दिनों पहले मरम्मत के बाद भी मोरबी का केबल ब्रिज रात में ध्वस्त हुए अधिक दिन भी नहीं बीते हैं। 150 साल पुराने मोरबी केबल ब्रिज टूटने से 134 से अधिक लोगों के मौत गई। चौंकाने वाली बात यह है कि मोदी के गृह राज्य के बाद संसदीय क्षेत्र में मालवीय पुल की पैचिंग और बाइंडिंग कर रेलवे और पीडब्ल्यूडी विभाग अपने जिम्मेदारियों से इतिश्री कर लेता है। डबल डेकर इस पुल से नीचे रेलगाड़ी के लिए पटरियां बिछी हैं और ऊपर हल्के वाहनों व राहगीरों के आवागमन के लिए सड़क बनाई गई है। पूर्वोत्तर भारत को जोड़ने वाले राजघाट पुल की लंबाई 1048.5 मीटर है,  जिम्मेदारों के उदासीनता के चलते अब धीरे धीरे जर्जर हो रहा है। राजीव सिंह का कहना है कि “अब तक इस पुराने पुल को परित्यक्त कर नया पुल बना लिया जाना चाहिए था, लेकिन जनता की असुविधाओं की फ़िक्र भला किसे है ? बूढ़े और जर्जर हो चुके राजघाट पुल का कब क्या हो जाए. यह किसी को नहीं मालूम।” मालवीय पुल की देखरेख नॉर्दन रेलवे के जिम्मे है। 

सनद रहे कि लोकसभा में 03 अगस्त 2017 में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि देश के विभिन्न हिस्सों में 100 से अधिक पुल क्षतिग्रस्त होने की कगार पर हैं। इन पुलों पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। ऑडिट में यह बात सामने आई कि 100 से अधिक पुलों की हालत खस्ता है। ये पुल किसी भी वक्त क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। ऐसे में इन पुलों पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। जर्जर ब्रिज का मुद्दा उठने के से बनारस, चंदौली, मिर्जापुर, सोनभद्र और बिहार समेत लाखों लोगों को लगा की जल्द ही राजघाट पर नया ब्रिज मिलेगा। लेकिन मिली तो सिर्फ मायूसी ! 

राजघाट ब्रिज के पूर्वी का हिस्सा चंदौली जनपद में जाकर सड़क पर खुलता और दूसरा वाराणसी में है। इसमें सात मुख्य और नौ अन्य स्पैन हैं। सुरक्षा, भारी वाहन, रेत, ईंट, गिट्टी और भीड़-भाड़ पर नजर रखने के लिए राजघाट ब्रिज के दोनों सिरों पर पुलिस चौकियां बनी हुई है। बावजूद इसके सवारी ढोने वाले अवैध वाहन, मिनी बस, भारी वाहन, पिकअप, डाला, ट्रैक्टर और रात के अंधेरे में अवैध वसूली के लालच में वाहनों को पास कराया जाता है। देश में जर्जर ब्रिजों की स्थिति का मुद्दा समय-समय पर कई बार उठाया गया है, लेकिन मंत्रालयों की उदासीनता और अफसरों की लाल फीताशाही की वजह से स्वयं प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में मोरबी ब्रिज हादसों में 134 से अधिक बेकसूर नागरिकों की मौत हो जाती है।

वाराणसी लोकसभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी को कड़ी टक्कर देने वाले कांग्रेस पार्टी के तात्कालिक उम्मीदवार व उत्तर प्रदेश के प्रांतीय अध्यक्ष अजय राय “जनचौक” से कहते हैं कि “राजघाट पुल बहुत जर्जर स्थिति में है। कभी भी बड़ी घटना हो सकती है। यह सरकार और बीजेपी वाले लोगों का जनता से कोई सरोकार नहीं है। ये झूठ, जुमलों और आंकड़ों में उलझाने वालों के गिरोह से अधिक कुछ नहीं हैं। राजघाट ब्रिज से भारत का एक बड़ा हिस्सा जुड़ता है। चाहे वह मालगाड़ी, रेल यात्रा, सड़क परिवहन और लोकल रोजाना लाखों लोगों का आवागमन हो। मियाद ख़त्म हो जाने के बाद भी नए ब्रिज बनाए जाने के लिए सरकार या जिम्मेदार प्राथमिकता से काम नहीं कर रहे हैं। ठीक तो मोरबी का ब्रिज भी था, उसका क्या हश्र हुआ…किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। बनारस में सिर्फ दिखावटी और इवेंट मैनेजमेंट का काम हो रहा है। काशी की जनता से झूठे वादे करना बंद किया जाए। बनारस को नया पुल और रोजगार की जरूरत है।”   

राजघाट के अंग्रेजों के ज़माने के लाइट हॉउस पर चुने गए सूचना पट्ट में ब्रिज का उल्लेख इस प्रकार है- गंगा पर बना यह पुल एक अक्टूबर 1887 में पहली बार इनॉग्रेट हुआ था। तब यह केवल रेलवे के आवागमन के लिए था। बाद में इसे पैदल और वाहनों के लिए खोला गया। डफरिन ब्रिज के नाम से इतिहास के पन्नों में दर्ज़ इस पुल का नाम आज़ादी के बाद 5 दिसंबर 1947 को बदल कर मालवीय पुल कर दिया गया। इस ब्रिज को अवध और रूहेलखंड रेल कंपनी के इंजीनियरों ने मिलकर बनाया था। 

राजीव सिंह आगे कहते हैं कि “रोजाना वाहन ओवर स्पीड दौड़ाएं जाते हैं। पुल पर नशे में गाड़ी चलाने वालों को चेक करने का कोई इंतजाम नहीं है। कई बार हादसे भी हुए हैं। सवा सौ साल से भी पुराने पुल की रेलिंग जर्जर हो चुकी है। वाहनों के धक्के से पुल और लिंक रोड की रेलिंग जगह-जगह टूटी पड़ी है। बूढ़े हो चुके पुल पर बड़े या भारी वाहनों का बेरोक-टोक आना-जाना लगातार जारी है। जिम्मेदार को चाहिए कि मोरबी जैसे हादसों से सबक लें और बनारस व लोकल जनपदों के नागरिकों की सुरक्षा के लिए ठोस उपाय करें। साथ ही फाइलों से नए ब्रिज को जल्द से जल्द जमीन पर उतरा जाए। लंबे समय से जनता के हित की अनदेखी देश और समाज के लिए अच्छी बात नहीं है।”

काशी रेलवे स्टेशन के स्टेशन अधीक्षक कमलेश सिंह यहां 2003 से तैनात हैं। वे बताते हैं कि “इनदिनों रूटीन वर्क के लिहाज से स्लीपर और चैनल को दुरुस्त करने का काम किया जा रहा है। इस पुल की जांच हुई थी। इसके पिलर आदि की स्थित अच्छी स्थिति में हैं। हमलोग मरम्मत करके ट्रेनों दौड़ा रहे हैं। नए डीपीआर की खबर मिली है। लेकिन जबतक उस काम को ख़त्म करके हमें हैंडओवर नहीं किया जाएगा। तब तक उसके बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध करा पाना मुश्किल है।” नॉर्दन रेलवे के कैंट रेलवे स्टेशन के डायरेक्टर गौरव दीक्षित मालवीय ब्रिज के एक्सपायरी होने की बात स्वीकारते हुए बताते हैं कि “पुल की मियाद पूरी हो चुकी है, लेकिन जांच में सामने आया है सुरक्षा की दृष्टि से पुल मजबूत है। सभी पुलों की नियमित पैचिंग और बाइंडिंग होती है। पुल की लगातार मॉनिटरिंग की जाती है।” 

एक्टिविस्ट वैभव कुमार त्रिपाठी कहते हैं कि “जनता की मूलभूत सुविधाओं में शुमार पुल, चिकित्सा, खाद और रोजगार आदि की लगातार अनदेखी समाज और राष्ट्र के लिए घातक साबित हो सकती है। राजघाट पुल बहुत पुराना और उत्तर भारत को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ने के लिहाज से काफी महत्त्व का है। राजघाट पुल के सापेक्ष नए डीपीआर पर तेजी से काम करने की आवश्यकता है। ऐसा न हो कि मियाद पूरी कर चुका राजघाट पुल प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का अगला मोरबी हादसा बन जाए।”

(वाराणसी से पीके मौर्य की रिपोर्ट।)

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