Friday, October 7, 2022

बंगाल नरसंहार: आखिर हुसैन की गिरफ्तारी के लिए क्यों करना पड़ा सीएम ममता के आदेश का इंतजार?

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बंगाल के रामपुरहाट के बोगतुई गांव में दस लोगों को जलाकर मार डाला गया। उनमें एक बच्चा और छह महिलाएं भी शामिल हैं। इस नरसंहार की चर्चा राज्य में ही नहीं पूरे देश में हो रही है। इसकी जांच सीबीआई को सौंपते हुए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा था कि इस घटना ने पूरे समाज की चेतना को झकझोर कर रख दिया है। इतना ही नहीं पिछले एक माह के अंदर दो पार्षदों की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। इन दिनों बंगाल खूनी हिंसा के दौर से गुजर रहा है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आरोप लगा रही हैं कि यह घटना पश्चिम बंगाल सरकार को बदनाम करने की साजिश का नतीजा है। दूसरी तरफ विपक्ष आरोप लगा रहा है कि यह घटना तृणमूल के अंदर लूट के लिए चल रहे खूनी संघर्ष का परिणाम है। इसे समझने के लिए इस खूनी संघर्ष के खलनायक अनारूल हुसैन की गिरफ्तारी पर पहले चर्चा करते हैं। जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी रामपुरहाट के दौरे पर गईं और अनारूल की गिरफ्तारी का निर्देश दिया तो पुलिस ने उन्हें एक घंटे के अंदर गिरफ्तार कर लिया। उनके खिलाफ आरोप लगाया गया है कि उन्होंने इस घटना की साजिश रची थी। तो फिर सवाल उठता है कि उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को मुख्यमंत्री का आदेश मिलने तक का इंतजार क्यों करना पड़ा। इसका जवाब यह है कि वह तृणमूल कांग्रेस के एक ब्लॉक के अध्यक्ष हैं।

जिस भादू की बम मारकर हत्या किए जाने के विरोध में यह नरसंहार किया गया वह भी तृणमूल कांग्रेस का ही था। तो फिर विपक्ष ने साजिश कैसे रची। यहां तो रहबर और रहजन दोनों एक ही हैं। तभी तो अनारूल हुसैन को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस मुख्यमंत्री का निर्देश मिलने का इंतजार कर रही थी। बंगाल के डीजीपी ने तो किसी तरह की जांच होने से पहले ही कह दिया था कि इसमें कोई राजनीतिक कारण नहीं है। इसके पीछे पारिवारिक रंजिश है। बीरभूम जिला के बाहुबली नेता और तृणमूल कांग्रेस के जिला अध्यक्ष अणुव्रत मंडल ने तो कह दिया कि शार्ट सर्किट के कारण यह आग लगी थी। अलबत्ता उन्होंने यह नहीं बताया कि शार्ट सर्किट के कारण एक साथ आठ मकानों में आग कैसे लगी। इस हत्याकांड के पीछे एक और कहानी छुपी हुई है। वह यह कि आठ लोगों की हत्या करने के बाद उनके शवों को एक मकान में रखकर एक साथ जलाया गया था।

इस नरसंहार की असली वजह को तलाश करने के लिए हमें अनारूल हुसैन के पिछले और मौजूदा जीवन पर एक नजर डालनी पड़ेगी। करीब छह साल पहले वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे। उन दिनों वे राजमिस्त्री का काम करते थे और मिट्टी के मकान में रहते थे। आज उनके पास शानदार बंगला है आई फोन है और महंगी गाड़ियां हैं। उनका कोई अपना निजी कारोबार नहीं है। बीरभूम जिले में अवैध बालू और पत्थरों के खनन के कारण ही यह दौलत हासिल हुई है। हुसैन इस मामले में भादू के सहयोगी थे। दूसरी तरफ सोनू से का गुट इस अवैध कारोबार पर कब्जा करना चाहता था। यह कयास लगाया जा रहा है कि इसी गुट ने भादू की हत्या कर दी। पिछले साल इसी रंजिश के कारण भादू के बड़े भाई की हत्या कर दी गई थी।

इन लोगों को सबक सिखाने के लिए यह नरसंहार किया गया। आरोप है कि अनारुल हुसैन के कारण ही पुलिस मौके पर नहीं पहुंची और लोगों को मछली की तरह आग में भूना जाता रहा। दरअसल पश्चिम बंगाल में जिलों की प्राकृतिक संपदा के अवैध कारोबार करने का सिलसिला बरसों से चला आ रहा है। कुछ जिलों में बालू और पत्थर का कारोबार है। आसनसोल में कोयला के अवैध खनन का कारोबार है। बांग्लादेश सीमा से सटे जिलों में गौ तस्करी का कारोबार है। इन अवैध कारोबारों पर कब्जा करने के लिए खून खराबा होता ही रहता है। इस बार नरसंहार के कारण यह एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं करने का फैसला लिया है। पिछले माह खरदा नगर पालिका के नवनिर्वाचित पार्षद अनुपम दत्ता की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई।

सीआईडी इसकी जांच कर रही है। यह भी आरोप है कि वह प्रमोटर की राह में रोड़ा बने हुए थे इसीलिए किराए के हत्यारे से उनकी हत्या करा दी गई। इस नगर पालिका में तृणमूल के अलावा किसी और दल का कोई पार्षद नहीं चुना गया है। जाहिर है कि यहाँ भी आपस का ही मामला है। उनकी पत्नी कुछ बातें सिर्फ मुख्यमंत्री को ही बताना चाहती हैं। पर अभी तक न वो बता पाई हैं और न ही मुख्यमंत्री सुन पाई हैं। झालदा नगर पालिका के नवनिर्वाचित कांग्रेसी पार्षद तपन कुंदे की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्होंने बोर्ड बनने में तृणमूल की मदद करने से इंकार कर दिया था।

इस आरोप में पुलिस ने उनके भतीजे दीपक कुंदे को गिरफ्तार किया है जो उनके खिलाफ तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार थे। यहां भी पुलिस की भूमिका शक से परे नहीं है। मालदा के हरिशचंद्रपुर में तृणमूल कांग्रेस के एक ग्राम प्रधान को हाईकोर्ट के दखल के बाद अदालत में आत्मसमर्पण करना पड़ा है। उनके खिलाफ बाढ़ की राहत राशि में से 76 लाख रुपए की हेराफेरी करने का आरोप है। करीब दो माह पहले हावड़ा में पुलिस वालों ने आधी रात के बाद अनीश खान की हत्या कर दी थी। उसे उसके मकान से सड़क पर फेंक दिया गया था। इसकी भी सीबीआई जांच की मांग की जा रही है।

यह तो ग्रामीण क्षेत्रों का हाल है और शहरों में तृणमूल कांग्रेस के गुर्गों ने एक नए अंदाज में वसूली का काम शुरू किया है। इसे सिंडिकेट नाम दिया गया है। यानी अगर आप शहर में कोई मकान बनाते हैं तो उसके लिए सारा सरो सामान सिंडिकेट से लेना पड़ेगा। आप गुणवत्ता की जांच नहीं कर सकते हैं। कीमत वे तय करेंगे और खरीदना आपकी मजबूरी होगी। अगर आप कोई नया फ्लैट या मकान खरीदते हैं तो उस मकान की कीमत के अनुपात में आपको दादा लोगों को एक मोटी रकम देनी पड़ेगी। इस सिंडिकेट पर कब्जा करने के लिए अक्सर खून खराबा होता रहता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सैकड़ों बार कह चुकी हैं कि सिंडिकेट को बंद करना पड़ेगा,पर यह बदस्तूर फलता फूलता जा रहा है। इसकी कीमत आम लोगों को चुकाना पड़ रहा है।
(कोलकाता से वरिष्ठ पत्रकार जेके सिंह की रिपोर्ट।)

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