एक बिल्ली आँखें बंद करके दूध पीती है और सोचती है कि दुनिया उसे देख नहीं रही है।
— एक संस्कृत सुभाषित
[एक सदी बीत गयी जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से हिन्दुओं के संगठन (इसके बजाए इसे ‘हिन्दू पुरुषों‘ का संगठन कहना वाजिब होगा क्योंकि इसमें हिन्दू महिलाओं को प्रवेश नहीं मिल सकता) की नींव पड़ी, जब नागपुर में डॉक्टर हेडगेवार, उनके राजनीतिक मार्गदर्शक डॉ बी एस मुंजे और विनायक दामोदर सावरकर के भाई बाबाराव सावरकर तथा अन्य दो सहयोगियों ने संघ की स्थापना की। पिछले ही साल उसके निर्माण की सदी मनाई गयी थी।
आज संघ अपनी कामयाबी के उरूज़ पर कहा जा सकता है, जबकि उसके आनुषंगिक संगठन भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सत्ता की बागडोर है, और उसके अन्य सहयोगी जमातों के कारिंदे देश के अग्रणी संस्थाओं को नियंत्रित कर रहे हैं; हालाँकि यह भी उतना ही सही है कि उसके निर्माण, उसके संचालन और उसकी भूमिका को लेकर वह हमेशा विवादों में रहा है।
पिछले दिनों कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खड़़गे ने आरएसएस के पंजीकरण, उसके द्वारा किये जा रहे अकूत धनसंग्रह और उसके हिसाब किताब के जब बात उठायी, तब ये सवाल फिर ज़िंदा हो गए।
शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रमों में संघ के प्रभाव में लाये जा रहे बदलावों के बारे में अक्सर बात होती है, मगर इसी क़िस्म की कवायद में संघ अपने अतीत को लेकर भी सक्रिय है – यह बात ज़्यादा लोग नहीं जानते।]
“किसी के सिर पर एक सनक सवार है…”
(“Somebody has a bee in his bonnet..”)
ताजमहल या तेजो महालय?
अपनी दिवगंत पत्नी मुमताज़ महल की याद में मुग़ल सम्राट शाहजहाँ (1592 – 1666) द्वारा बनाया मकबरा / समाधि – जो इंडो-स्लामिक मुग़ल स्थापत्य कला की मिसाल समझा जाता है और दुनिया भर के यात्रियों के बीच ज़बरदस्त आकर्षण के केंद्र में रहता आया है, उसे लेकर एक बहस हिंदुत्व खेमे द्वारा बीते कई दशकों से चलायी जा रही है, जिसका ज़ोर यह साबित करने पर है कि वह मक़बरा नहीं बल्कि शिव मंदिर है अर्थात तेजो महालय है।
हालाँकि आला अदालत से लेकर इतिहासकारों द्वारा इस मनगढ़ंत को बार बार ख़ारिज किया जाता रहा है, लेकिन हिंदुत्ववादी ताक़तें अपनी संकीर्ण सियासत को आगे बढ़ाने के लिए समय-समय पर उसे उछालती रहती हैं।
याद रहे कि भारतीय सेना से सेवानिवृत्त पीएन ओक द्वारा सम्भवतः साठ के दशक में इसे पहले उठाया गया था। अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में गठित एनडीए के पहले कार्यकाल (वर्ष 2000) के दौरान उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें ताजमहल का इतिहास बदलकर यह घोषित करने की माँग की गई थी कि उसका निर्माण एक हिंदू राजा ने कराया था।
संभवतः उस समय का अनुकूल राजनीतिक वातावरण उन्हें और अधिक वैधता प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर रहा था, लेकिन वे दुर्भाग्यवश ग़लत साबित हुए। सर्वोच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की खंडपीठ ने इस ‘भ्रामक’ याचिका को इन टिप्पणियों के साथ खारिज कर दिया: ‘किसी के सिर पर एक सनक सवार है, इसलिए यह याचिका दायर की गई है।’
यह रेखांकित करने योग्य है कि ऐसे झटकों ने इस सज्जन को भारत के ‘वास्तविक इतिहास’ को फिर से लिखने और उसका प्रचार करने के अपने ‘मिशन’ से नहीं रोका, जिसमें वे 1960 के दशक से लगे हुए थे। मराठी जानने वाला कोई भी व्यक्ति इसकी पुष्टि कर सकता है कि उनके लेख वहाँ की मराठी पत्रिकाओं में तब से प्रकाशित होने लगे थे, जब हिंदुत्व वर्चस्ववादी आंदोलन अभी हाशिए पर था।
यह भी भूलना नहीं चाहिए कि आप उसे संकीर्णतावादी चिंतन का नतीजा कहें या सांप्रदायिक विचारों का प्रभाव, लेकिन ओक के ‘विचित्र दावों’ की भी पढ़े-लिखों के एक हिस्से में स्वीकार्यता थी।
यद्यपि पीएन ओक के सभी दावे—जैसे कि ‘ईसाई धर्म और इस्लाम दोनों हिंदू धर्म से निकले हैं’, या ‘ताजमहल की तरह कैथोलिक वेटिकन, काबा और वेस्टमिंस्टर ऐबी भी कभी शिव के हिंदू मंदिर थे’, या ‘वेटिकन मूलतः एक वैदिक रचना थी जिसे वाटिका कहा जाता था और पोप का पद भी मूलतः एक वैदिक पुरोहित परंपरा थी’, अथवा भारत में इस्लामी वास्तुकला के उनके पूर्णतः निषेध—मुख्यधारा में स्वीकार नहीं किए गए, बल्कि अकादमिक जगत में अस्वीकार कर दिए गए; फिर भी उन्हें हिंदुत्व दक्षिणपंथ में लोकप्रिय समर्थन मिला, जिसने 1980 और 1990 के दशक में नई गति पकड़ी थी।[1]
हिंदुत्व के दायरों के भीतर भी कुछ असहमति के स्वर थे, जिन्होंने ओक की लोकप्रियता को हिंदू कार्यकर्ताओं के बीच ‘घोर अपरिपक्वता’ का संकेत बताया, लेकिन ऐसे स्वर अल्पमत में थे।
बेल्जियम के ओरिएंटलिस्ट और इंडोलॉजिस्ट कोएनराड एल्स्ट ( Koenraad Elst )—जो हिंदुत्व के प्रति सहानुभूति रखते हैं—उनमें से एक थे। एनआरआई/पीआईओ समुदायों में ओक की ‘स्थायी लोकप्रियता’ का उल्लेख करते हुए और ताजमहल, लाल किला तथा विक्रमादित्य से संबंधित ओक के विभिन्न ‘ऐतिहासिक और भाषाई सिद्धांतों’ का खंडन करते हुए उन्होंने ज़ोर देकर कहा:
समकालीन हिंदू कार्यकर्ताओं के बीच पीएन ओक के सिद्धांतों की लोकप्रियता घोर अपरिपक्वता का संकेत है। यह भारतीय इतिहास में धार्मिक संघर्ष के तथ्यों को लेकर भ्रम के साथ–साथ आत्ममुग्ध लालच और बाहरी लोगों द्वारा निर्मित हर प्रकार की मूल्यवान वस्तु पर हास्यास्पद स्वामित्व का दावा करने की विकृत इच्छा को दर्शाती है (मानो हिंदू धर्म की वास्तविक उपलब्धियाँ गर्व करने के लिए पर्याप्त न हों)।
जैसा कि अपेक्षित था, इस आलोचना के बावजूद पीएन ओक या उनके विचारों की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। यदि गहराई से देखा जाए, तो मुस्लिम शासकों द्वारा निर्मित स्मारकों और इमारतों के बारे में हिंदुत्व समर्थकों के अनेक दावों की जड़ें ओक के लेखन में मिलती हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ताजमहल का नाम बदलने संबंधी ओक की याचिका ख़ारिज किए जाने के काफी समय बाद भी, हिंदुत्व परिवार के एक प्रमुख नेता—जो कभी संसद सदस्य भी रह चुके थे—ने इसी ‘सिद्धांत’ को दोहराया।
यह भी याद किया जा सकता है कि जब प्रो. वाई सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया (2015), तो उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि वे बीआईएसएस (भारतीय इतिहास संकलन समिति) से जुड़े थे, जो स्वयं ओक द्वारा स्थापित संगठन था।
पीएन ओक [ 1917 -2007 ] का लगभग दो दशक पहले निधन हो चुका है, लेकिन हिंदुत्व वर्चस्ववादी शक्तियों का “आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों द्वारा तैयार भारत के इतिहास के पक्षपाती और विकृत संस्करणों” को ‘सुधारने’ का उत्साह अब हास्यास्पद स्तर तक पहुँच गया है। स्थिति यह है कि वे ‘हर मस्जिद में शिवलिंग’ खोजने पर आमादा हैं, जैसा कि कुछ समय पहले उनके संघ के सुप्रीमो ने रेखांकित किया था।
हमें यह उपदेश भी दिया जा रहा है कि यह ‘आक्रमणकारी मानसिकता भारत के लिए एक खतरा है।’
इतिहास का पुनर्लेखन: अपने घर से ही शुरुआत?
इतिहास के पुनर्लेखन की यह मुहिम स्वयं आरएसएस के अपने इतिहास को भी अछूता नहीं छोड़ पाई है।
इस प्रयास की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति हमारे सामने डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (1888–1940), आरएसएस के संस्थापक सदस्य और उसके प्रथम सर्वोच्च नेता, की नई छवि के रूप में दिखाई देती है।
उन्हें अब ‘जन्मजात देशभक्त’, ‘भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले महान क्रांतिकारियों में से एक’, ‘समाज सुधारक’, ‘आधुनिक भारत के निर्माता’ आदि-आदि कहा जा रहा है। यह इस तथ्य की पूरी तरह उपेक्षा करता है कि अपने पूरे जीवन में उन्होंने अपना ध्यान हिंदू एकता के निर्माण, भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने पर दिया। वे औपनिवेशिक विरोधी आंदोलन के दौरान जेल अवश्य गए थे, लेकिन आरएसएस के सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के सदस्य के रूप में।
आज़ादी के पहले संघ का इतिहास इस बात की गवाही देता है कि उन्होंने अपने गुरु बीएस मुंजे (जो हिन्दू महासभा से सम्बद्ध थे), बाबाराव सावरकर आदि के साथ मिलकर जिस ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘ की स्थापना की थी (1925), उसने कभी भी अपने कार्यकर्ताओं को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में शामिल होने का आह्वान नहीं किया।
अनेक मोनोग्राफ, पुस्तकें और पहले प्रकाशित ग्रंथों के संशोधित संस्करण—जो हिंदुत्व के प्रति सहानुभूति रखने वाले लेखकों द्वारा लिखे गए हैं—भी प्रकाशित हुए हैं, जो उनकी इस नई छवि पर ज़ोर देने का प्रयास करते हैं। वे उनके उथल-पुथल भरे जीवन के कई असुविधाजनक पहलुओं को मिटा देते हैं या उन पर रणनीतिक चुप्पी साध लेते हैं।
इसी श्रृंखला में नवीनतम उदाहरण यह है कि उन्हें महाराष्ट्र के पुसद में आयोजित “जंगल सत्याग्रह” का नेता बताया जा रहा है, जिसे कांग्रेस के नेतृत्व वाले सविनय अवज्ञा आंदोलन के एक हिस्से के रूप में आयोजित किया गया था।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि आरएसएस के अंदर इतिहास के ‘पुनर्लेखन’ का सिलसिला अपने ‘परिवार’ से ही शुरू होता दिखता है।
ऐसी अधिकांश जीवनियाँ मुख्य रूप से डॉ. हेडगेवार को ही आरएसएस की स्थापना का श्रेय देती हैं [2], तथा सुविधाजनक ढंग से इस तथ्य को भुला देती हैं कि जिस बैठक में (जो विजयादशमी के दिन नागपुर में आयोजित हुई थी) ऐसे संगठन की स्थापना का निर्णय लिया गया था, उसमें डॉ. बीएस मूंजे, डॉ. एलवी परांजपे, डॉ. बीबी थालकर और बाबूराव सावरकर—विनायक दामोदर सावरकर के भाई भी उपस्थित थे, और ये सभी हिंदू महासभा से जुड़े हुए थे।[3]
यह समझना कठिन नहीं है कि महासभा के इन नेताओं का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता, क्योंकि वर्तमान आरएसएस नेतृत्व को आशंका है कि इससे हेडगेवार को अन्य सभी से ऊपर एक महान नेता के रूप में प्रस्तुत करने के उनके प्रयास प्रभावित होंगे।
डॉ. बीएस मूंजे हेडगेवार के मार्गदर्शक/patron थे। उन्हीं के प्रयासों से हेडगेवार को कलकत्ता में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त हुई। याद रहे, मुंजे स्वयं इटली जाकर मुसोलिनी से मिले थे ताकि वहाँ के प्रयोगों से सीख सकें, जिन्हें उन्होंने स्वयं कहा था कि यहाँ “हमारी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)” में लागू किया जाएगा।
पितृसंगठन और उसके प्रमुख नेताओं की छवि को नया रूप देने की यह प्रक्रिया काफी समय से चल रही है, लेकिन नरेंद्र मोदी—जो स्वयं संगठन के प्रचारक रहे हैं—के नेतृत्व में भाजपा के एक दशक से अधिक पहले सत्ता में आने के बाद इसे एक नई गति मिली है।
( जारी ..)
(सुभाष गाताडे लेखक और एक्टिविस्ट हैं।)