मन का भरम, और मरम

मन रोज हजार बातें सुनता है। सैकड़ों नहीं तो दर्जनों बातें तो ऐसी जरूर होती हैं उनमें, जो किसी न किसी रूप में दर्ज हो जाएं। यानी मन में कहीं न कहीं जगह बन जाए उनके लिए। ये जगह स्थायी नहीं होती लेकिन कुछ देर के लिए उन बातों को ठौर तो मिल ही जाता है हमारे मन में। रोज ऐसी दर्जन-दो दर्जन बातें भी जमा होती रहें और उनमें कुछ लुप्त होती रहें थोड़े अंतराल में, तो भी यह नियमित आना-जाना मन को किसी व्यस्त रेलवे प्लैटफॉर्म जैसा बना देने के लिए काफी है।

चूंकि इन बातों का कोई एक स्वरूप या तर्क नहीं होता, इसलिए मन में इनके जमा होते रहने का भी कोई नियम नहीं होता। कोई तरतीब नहीं होती इनमें। स्वाभाविक है कि कुछ ही समय में हमारा मन असंगत और काफी हद तक निरर्थक बातों से भरा कबाड़खाना लगने लगता है। लाजिमी है कि ऐसे मन वाले हम जैसे तमाम लोग संदेह, उलझन और असमंजस से ग्रस्त रहें। हमारा असमंजस तब टूटता है जब किसी भी तरफ से कोई तेज लहर हम तक पहुंचती है।

कभी दाईं तरफ से किसी मजबूत नेता का उभार हुआ तो हम उसकी रौ में बह जाते हैं और कभी बाईं तरफ से घटनाओं के सिलसिले ने जोर पकड़ा तो उस तरफ हो लेते हैं। कभी किसी बूढ़े आदमी के अनशन या किसी जज की घटिया टिप्पणी ने ही भावनाओं का ज्वार खड़ा कर दिया तो वही भावनाएं हमारे अंदर भी हिलोरें मारने लगती हैं।

ऐसे पलों में हमारी सारी अनिश्चितता, हमारा सारा असमंजस गायब हो जाता है। हम बड़े से बड़ा फैसला करने और तत्काल उस पर अमल सुनिश्चित करने को न सिर्फ तैयार रहते हैं बल्कि उसे सफलता की सबसे बड़ी कसौटी मान लेते हैं। हालांकि यह स्थिति भी तभी तक रहती है जब तक भावनाओं की उस लहर का प्रभाव रहता है। लहर कमजोर पड़ते ही हमारा निश्चय भी कमजोर पड़ने लग जाता है।

इसी मन का प्रभाव कहिए कि रोजमर्रा की हमारी जिंदगी में भी हमारे फैसलों का कोई एक पैटर्न नहीं होता। एक दिन हम बच्चे को बुरी तरह डांटते हैं कि वह मन से पढ़ाई नहीं करता और नहीं पढ़ेगा तो फेल कर जाएगा। दूसरे दिन उसी बच्चे के अच्छे रिजल्ट पर खुश होते हुए हम उसके हाथों भगवान जी को सवा किलो लड्डू चढ़वाते हैं।

एक पल को हम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का जिक्र करते हुए पूरी पृथ्वी को परिवार मानने की अपनी संस्कृति पर गर्व जाहिर करते हैं और दूसरे ही पल बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ आग उगलने लगते हैं।

सुबह किसी फेमिनिस्ट से बहस करते हुए मैत्रेयी और गार्गी जैसी विदुषियों की मिसाल देते हैं और दावा करते हैं कि हमारे समाज में महिलाओं को, उचित ही, बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है, लेकिन शाम को लव जिहाद से चिंतित होकर सोच में पड़ जाते हैं कि हमारी बहू-बेटियों को बहला-फुसला कर गुमराह करने वालों से उन्हें कैसे बचाया जाए।

इन सबकी जड़ में हमारा बेतरतीब-सा, अस्त व्यस्त मन है, यह तो साफ है। लेकिन इस मन को व्यवस्थित कैसे करें यह कौन बताएगा? इसका राज भी कहीं मन के अंदर ही तो नहीं छुपा है।

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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