हिंदू संस्कृति की दुहाई देने वाली भाजपा सरकार में भी पूर्व की पूंजीवादी सरकारों की तरह ही देश भर में प्रेम संबंधों, विवाहों और हरियाणा में सगोत्री अंतर्जातीय के कारण हत्याओं का सिलसिला जारी है।
चुनावी मजबूरी है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इस पर कुछ नहीं बोलना चाहती है। हां कुछ वामपंथी पार्टियां जरूर मजबूरी में कुछ खानापूरी के रूप में इसका विरोध प्रदर्शन करके इतिश्री कर लेती हैं (वोट किसे नहीं चाहिए)! ऐसी तैसी सिद्धांतों की।
2014 के बाद से तो ऐसी हत्याओं में और भी तेजी आ रही है।
ऐतिहासिक भौतिकवाद के आधार पर अगर हम भारतीय धर्म संस्कृति की छानबीन करें तो सर्वप्रथम बुद्ध फिर शंकराचार्य आदि ने भी जातीय भेद को नकारा था।
भगवान शंकर ने परीक्षा लेने हेतु चांडाल वेश बदलकर सुबह स्नान करके आते आदि शंकराचार्य के रास्ते पर आकर उनसे जानबूझकर टकराकर उनकी परीक्षा ली थी।
धार्मिक ग्रंथ बताते हैं कि आदि शंकराचार्य के चांडाल को भला बुरा कहने पर चांडाल वेशधारी शंकर भगवान ने आदि शंकराचार्य के अद्वैत ज्ञान पर सवाल उठा दिया था और आदि शंकराचार्य को अपनी भूल का एहसास करवाया था।
संत रविदास ने एक रानी के स्वर्णजनित कंगन को अपनी चमड़े की कठोती से निकालकर मनुष्य के जातीय भेद पर कड़ा प्रहार किया था। तब से तो एक कहावत ही चल निकली ” मन चंगा तो कठोती में गंगा।”
विद्रोही भक्त कवि कबीर ने भी जाति प्रथा के विरुद्ध कठोर संघर्ष किया था।
ये भी कहा कि — ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।
भगवान कृष्ण ने निम्न जाति के माने जाने वाले विदुर के घर भोजन किया था तो शबरी के जूठे बेर राम ने खाए।
प्रेम के सर्वोच्च रूप माने जाने वाले कृष्ण राधा प्रसंग में प्रेम की महिमा को जगतगुरु कृष्ण ने स्थापित किया था।
राधा उनकी पत्नी तो नहीं थी। गोपियाँ भी नहीं। प्रेम संबंध के कारण ही कृष्ण ने अर्जुन का रथ हांका।
और न जाने पिछले कई दशकों से पूरे भारत खासकर हरियाणा राज्य में प्रेम संगोत्री विवाह करने वालों को भाई बहन मानते हुए खापों द्वारा उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी।
अगर उत्तराखंड की बात की जाए तो 39 वर्षीय दलित युवक जगदीश को सितंबर 2022 में उच्च जाति की लड़की से प्रेम विवाह रचाने पर मात्र विवाह के 11 दिन बाद ही मौत के घाट उधार दिया गया।
यह अल्मोड़ा जिले में हुआ जो कभी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम महासचिव कामरेड पूरन चंद्र जोशी का जिला रहा है।
गढ़वाल मंडल मानो कुमाऊँ मंडल से पीछे न रह जाए तो ठीक उसी समय सितंबर माह में ही अंकिता भंडारी हत्याकांड हुआ। जिसमें भाजपा नेता के बेटे पुलकित आर्य के रिसोर्ट में अंकिता भंडारी को एक रात के लिए दस हजार देने का घृणित प्रस्ताव नवफासीवादी भाजपा सरकार के दर्जा राज्य मंत्री के बेटे ने दिया। कहा जाता है कि उसका मित्र पुष्पदीप भी निम्न जाति से था।
तो अंकिता भंडारी को क्यों बख्शा जाना था।
कामरेड रजनीपाम दत्त ने अपनी पुस्तक सामाजिक क्रांति और फासीवाद में आजादी से पहले ही मोदी जी के जर्मनी, इटली आदर्श फासिस्ट नेताओं को औरतबाज बताया था।
अंकिता भंडारी केस में खुद हरिद्वार की ही भाजपा नेत्री ने भाजपा के बड़े नेताओ का अंकिता भंडारी केस में नाम लिया।
अंकिता भंडारी केस को लड़ने वाले पत्रकार आशुतोष नेगी को 2 करोड़ ऑफर किया गया। सीएम धामी ने उनसे मिलकर खुद अपनी मजबूरी का रोना रोया था। उनके हाथ दबाते हुए, गिड़गिड़ाते हुए।
जून 2026 में अब गढ़वाल मंडल के टिहरी जिले में एक कक्षा 12 के 18 वर्ष के दलित युवक को भी मौत के घाट उतार दिया गया है। उसका मित्र गंभीर रूप से घायल है।
और हमारी न्यायपालिका भी मरणासन्न है नहीं तो कुछ हिलती डुलती नजर आती। और तो और दलित संगठन भी मरणासन्न हैं।
(डॉ उमेश चंदोला का लेख)