इस बच्चे को समझाएं कैसे?

दिल तो बच्चा है जी…। कहने का मतलब यह कि इसे बचपना करने की पूरी छूट है। लेकिन बचपने से तो जीवन नहीं चलता, ना ही दुनिया एक सीमा से आगे उसे स्वीकार करती है। फिर क्या किया जाए? यही कि उस बच्चे को हद में रखा जाए। बच्चा हमारा है तो उसे लाड़-प्यार-दुलार से रखना हमारा काम है। उसकी नई-नई फरमाइशों को पूरा करने, उसकी शैतानियों को बर्दाश्त करने की जिम्मेदारी हमारी है। लेकिन जब वह पड़ोसी के घर जाकर भी वैसी ही हरकतें करने लगता है तो उसे समझाया जाता है कि बेटा यह घर नहीं है।

बस सवाल यही है कि बच्चे को यानी अपने मन को यह समझाया कैसे जाए कि अपने घर की सीमा कहां खत्म होती है और किस बिंदु के बाद उसकी नादानियां नाकाबिले बर्दाश्त हो जाती हैं। बच्चा अगर अपनी हदें समझ गया तो उसकी नादानियां, शैतानियां और नटखटपन- ये सब जीने का आनंद कई गुना बढ़ा देते हैं।

लेकिन बच्चा समय पर यह बात नहीं समझा कि उसकी या उसके माता-पिता के सामर्थ्य की सीमा है, कि वे उसकी सारी इच्छाएं पूरी नहीं कर सकते, तो वह नए-नए सिरदर्द पैदा करता रहता है। शुरू में सिर्फ हमारे लिए और फिर स्कूल-कॉलेज, आसपड़ोस की दुनिया, समाज और कानून व्यवस्था के लिए भी।

ठीक यही स्थिति हमारे दिल यानी मन की है। शांत पड़ा रहा तो घर या कमरे के अंदर भी सुकून महसूस कर सकता है, लेकिन इधर-उधर चौकड़ियां भरने लगा तो फिर चांद-तारे ही नहीं सितारों के पार का जहां भी उसके लिए कम पड़ता है। पूरी दुनिया की धन-दौलत उसके कदमों में डाल दें तब भी वह संतुष्ट हो जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं।

फिर किया क्या जाए? मैं भी इसी सवाल से जूझ रहा हूं। कोई बना-बनाया जवाब तो है नहीं इसका किसी के पास। फिर रास्ता यही है कि नए-नए प्रयोग करके देखते रहा जाए। अभी तक के मेरे प्रयोगों का सबक यह है कि इसे सचमुच बच्चा मान लिया जाए। बच्चे को प्रशिक्षित करने का सबसे अच्छा तरीका यह होता है कि उसके साथ निरंतर संवाद किया जाए।

उसे बच्चे की तरह नहीं बल्कि एक वयस्क की तरह ट्रीट किया जाए, उसके सवालों, संदेहों, सलाहों को हंसी में उड़ाने के बजाय उस पर गंभीरता से बात की जाए, इनके अलग-अलग पहलुओं की ओर उसका ध्यान खींचा जाए।

एक और ट्रिक यह है कि उसे कुछ ऐसे मामलों में उलझाए रखा जाए जो रचनात्मक हों, जो उसकी शक्ति-सामर्थ्य तो बढ़ाएं ही माहौल में भी पॉजिटिविटी लाएं। मसलन पेट्स खऱीद कर घर न भी लाएं तो आसपास के छोटे-छोटे जीव-जंतुओं, पक्षियों-गिलहरियों और पेड़-पौधों का ध्यान रखने की आदत डाल सकते हैं। मकसद यह सुनिश्चित करना है कि मन अपनी नई-नई जरूरतों के संधान में ही न लगा रहे।

कुछ साल पहले का मेरा अनुभव शायद बात को थोड़ा और साफ कर देगा। हम दोनों पति-पत्नी तब अपनी नई-नई जरूरतों से परेशान रहते थे। बेटी के स्कूल का फी भर देना ही काफी नहीं है। वह ऊंची क्लास में पहुंच गई है, अब उसके लिए ट्यूशन भी लगाना होगा… टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन तो ठीक है, लेकिन एक बड़ा डिनर टेबल जरूरी हो गया है… मगर उसके लिए यह घर छोटा है, रखेंगे कहां… एक बड़ा घर लेने के बारे में सोचना होगा…।

ऐसी तमाम बातें हम डिस्कस करते रहते। फिर एक दिन ऐसा हुआ कि पत्नी ने बताया, ‘मैं पास के सनातन मंदिर वाले क्लीनिक में गई थी। डॉक्टर तो अच्छे हैं, लेकिन वहां के इंतजाम देखने वाला कोई नहीं। वहां लोग कह रहे थे आप अगर थोड़ा वक्त निकाल कर आ जाया करें कुछ देर के लिए तो अच्छा होगा। सोचती हूं दे दिया करूं सेवा। वैसे भी घर में बैठी ही रहती हूं…।’

और दस दिन के अंदर हमारी जिंदगी बदल गई। रोज दर्जनों मरीजों की परेशानियों, उनकी समस्याओं से गुजरना उनके लिए एकदम अलग अनुभव था। हमारे पास डिस्कस करने को अब सिर्फ अपनी जरूरतें नहीं, ऐसे तमाम लोगों के सुख-दुख, उनकी परेशानियां भी थीं, जिनके समाने अपनी जरूरतें, अपने जीवन की कमियां कुछ खास नहीं लगती थीं।

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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