Friday, December 2, 2022

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बचपन में ही हो गया था छुआछूत से मोहभंग

मेरा बचपन पूर्व-आधुनिक, ग्रामीण, वर्णाश्रमी, सामंती परिवेश में बीता, हल्की-फुल्की दरारों के बावजूद वर्णाश्रम प्रणाली व्यवहार में थी। सभी पारंपरिक, खासकर ग्रामीण, समाजों में पारस्परिक सहयोग की सामूहिकता की संस्थाएं होती थीं। हमारे गांव में भी पारस्परिक सहयोग और...

17 साल के अपहृत एक बच्चे का राजधानी दिल्ली में रेस्क्यू ऑपरेशन!

तारीख 13 नवम्बर 2021 दिन शनिवार को मेरा दोस्त महेश फोन करता है और कहता है कि उसके भैया मनोज अपने गाँव के एक 17 साल के बच्चे विष्णु को खूंटी में अपने किराये के मकान में साथ रखकर अपने स्कूल में पढ़ाते थे, जो 11 तारीख से गायब है। मनोज पेशे से शिक्षक हैं और झारखंड मेंस्थित बंधगांव हाई स्कूल पढ़ाते हैं। मैं सुनकर कुछ हेल्पलाइन, कुछ लोगों का संपर्क भेजा और निश्चिंत हो गया। लेकिन अचानक 16 नवम्बर को पता चला कि मनोज जी और विष्णु के पिताजी कोलकाता रवाना हो चुके हैं विष्णु को ढूंढने के लिए। क्योंकि विष्णु ने 12 नवम्बर को किसी नम्बर से फोन किया था और कहा था कि “हमअपने दोस्त के साथ कोलकाता घूमने आ गये हैं …………..” और भी कुछ कहा होगा उसने लेकिन ये जानकारी मुझे नहीं है। 3 दिनों तक मनोज और विष्णु के पिताजी ने हावड़ा रेलवे स्टेशन, हावड़ा ब्रिज के इर्द गिर्द उसे ढूंढा। इस दौरान खूंटी थाने में गुमशुदगी का मामला भी दर्ज करा दिया गया था।विष्णु ने किसी अनजान व्यक्ति के फोन से कॉल किया था, फिर वो गायब हो गया। कोलकाता जाने के बाद मनोज ने उस अनजान व्यक्ति से मिलने की कोशिश की लेकिन वो व्यक्ति कहीं और जा चुका था । 3 दिन थक हार कर हर संभव ढूंढने की कोशिश की, हावड़ा के थाने में रिपोर्ट भी दर्ज किया उन लोगों ने लेकिन कुछ नहीं हुआ। तभी 16 नवम्बर को उन्हें बच्चा एक नंबर से कॉल करता है और कहता है कि “भैया दिल्ली फंसाकर ले आया हमको, एक फैक्ट्री है बहुत बड़ी,  और जबर्दस्ती काम करवारहा है, काम नहीं करने से गाली दे रहा है…” मनोज बात करते हुए समझाया कि “तुम चुपचाप काम करो हम ढूंढ (ट्रेस करके) लेंगे, तुम रूम से कैसे निकले और कौन ले गया तुमको….” विष्णु ने उत्तर देते हुए कहा कि “अरे वही एक दोस्त बुलाया था, यही ये अविनाश, हम लोग के स्कूल का नहीं रोलाडिह का अविनाश, खाना ही बनाये थे, खाकर टाटा पहुंच गए फिर कोलकाता और फिर दिल्ली, एक ठो आदमी बोला हमको कि हम टाटा जायेंगे, फिर हम उसके साथ आये और हमकोयहां फंसा दिया.. अविनाश जो है वो कोलकाता से भाग गया।” मनोज ने समझाते हुए कहा कि, “सुरक्षित रहना, खाना खा के स्वस्थ रहना, हम ढूंढ के निकाल लेंगे ” और मनोज ने कॉल और फोन नंबर की जानकारी खूंटी पुलिस को दे दी, पुलिस ने ट्रेस करके बताया कि कॉल दिल्ली के द्वारका, सेक्टर - 11 के किसी इलाके से आया है। तुरंत ये जानकारी मुझे दी गयी। मैं टीचर ट्रेनिंग कोर्स बीएड दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से कर रहा हूँ, टीचिंग प्रैक्टिस क्लास की तैयारी में लगा हुआ था। जैसे ही मुझे ये जानकारी मिली मैंने तुरंत चाइल्ड लाइन और दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स पर कॉल करके मामला दर्ज कराया। साथ ही 112 पर कॉल करके मामले को बताया, और तुरंत मुझे पीसीआर वालों का फोन आया कि आप कहाँ हैं, कहाँ चलना है? मैंने समझाया कि मैं सीधा सेक्टर 11 के नजदीकी थाने पर आके मिलता हूँ और मामला बताता हूँ। तभी एएसआई कीर्ति का कॉल आया और उन्होंने समझाया कि आप खुद उसलोकेशन को ढूंढने का प्रयास करें, वगैरह - वगैरह… मैंने सीधा जवाब दिया कि मैं आकर मिलता हूँ । मैं DCP ऑफिस पहुंचा जो सेक्टर 11 मेट्रो स्टेशन से 1.5 किलोमीटर दूर स्थित है, वहां पहुंचने पर पता चला कि जो भी होगा वह द्वारका साउथ थाने से होगा, वैसे भी ASI कीर्ति से बात हुई थी तो मैं पैदल चल दिया, मैं 1 बजे द्वारका साउथ थाने पहुंचा, तभी पता चला कि ASI कीर्ति 4 बजे के करीबमिलेंगे । मैं बाहर वेट कर रहा था तभी मनोज का कॉल आया और उन्होंने कहा  कि “विष्णु के मैनेजर का कॉल आया है और वो कह रहा है कि बच्चा सेफ है, 17 साल के बच्चे से क्या काम करवाएं, आप कोई गार्जियन आकर ले जाइये”। इससे पहले जिससे सुबह कॉल आया था वो नम्बर स्विच ऑफ आनेलगा था । लेकिन 4 बजे के करीब यह कॉल आई तो उम्मीद की किरण नजर आई क्योंकि सुबह वाले नम्बर को कई लोगों ने प्रयास किया था।लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला था। मैंने उसके सुपरवाइजर से बात की और मिलने का प्रस्ताव रखा, उसने मुझे बुलाया और लोकेशन बताया कि “द्वारका, सेक्टर-11, अक्षरधाम अपार्टमेंट के बगल में एक पार्क की दीवार बन रही है वहीं पर आ जाइये”। मैं पहले से ही डरा हुआ था क्योंकि बच्चे ने बताया था कि उसे जबर्दस्ती उठा के लाया गया है और काम करवाया जा रहा है। मैंने सुपरवाइजर को कहा कि “ऐसा करिए कि बच्चे को किसी पब्लिक प्लेस जैसे मेट्रो स्टेशन के पास या कहीं और ले आइये”, तभी उसने कहा कि मैं बाहर नहीं जा सकता, साइट पर हमारा काम चल रहा है। तभी मैंने ये निर्णय लिया कि चलो चला जाए और मिला जाए, जो होगा देखा जाएगा। मैंने सारी जानकारी अपने दोस्त महेश को दे रखा था, जैसे - Whatsapp live लोकेशन, लोकेशन, अगल बगल की जानकारी आदि। मैं साइट पर पहुंचा तो देखा कि वहां पर जिला उद्यान (पब्लिक पार्क) है और उसके बगल में एक बड़े से मैदान पर बिल्डिंग निर्माण का कार्य चल रहा है और वह चारों ओर से लोहे की चादरों से ढका हुआ है, अन्दर जाने के लिए एक गेट है, जिसे किसी गेट कीपर ने खोला और मैं अन्दर गया। अन्दर जातेही सुपर वाइजर से मिला और अपना परिचय बताया कि मैं मनोज का भाई हूँ, विष्णु से मिलने आया हूं, वो मुझे अन्दर ले गया, अन्दर से मैं डरा हुआ था लेकिन बात मुस्कुरा के और आत्मविश्वास से कर रहा था, थोड़ा और अन्दर जाने पर 2 कारें खड़ी थीं और 2 लोग कुर्सी पर बैठे हुए थे, सुपरवाइजरउसे अपना साहब बता रहा था। उसने अपने साहब से बात की और बताया कि ये (यानि कि मैं) बच्चे से मिलने आए हैं, साहब ने मिलने की अनुमति दी। थोड़ी दूर आगे और गया तो देखा कि लोहे की चादरों के छोटे-छोटे रूम बने हुए थे जहाँ पर मजदूर रहते थे, एक बच्चा मुझे दिखा जो यही कोई 16-17 साल का लगा, वो विष्णु हीथा, क्योंकि मैंने उसका फोटो देखा था। जैसे ही बच्चा मुझे मिला वो मन ही मन खिल खिला उठा था, मैं लगातार मनोज से कॉल पर था, वीडियो कॉल पर बात करायी। विष्णु के पिताजी से बात करायी, मनोज से बात करायी। उसके पिताजी जो 5 दिनों से लगातार हैरान-परेशान थे, फोन पर ही रोने लगे, उन दोनों को उम्मीद की किरण नजर आ गयी थी। इसी दौरान सुपरवाइजर ने बताना शुरू किया कि “इस बच्चे को किसी दलाल ने यहां के दलाल को बेचा है, यहां का जो दलाल है वो खरीद के लाया है, यहां पर बहुत ऐसे लोग हैं जो झारखण्ड, बंगाल से लाये गए हैं, ये बच्चा छोटा दिखा मुझे तो मैंने पूछा तो पता चला कि ये हिन्दू है, और यहां पर सारेलेबर मुसलमान हैं, जब इसके बारे में पता चला कि ये 17 साल का है तो हमने काम से हटा दिया और घर फोन लगाने को कहा, इसके गार्जियन को बुलाइये और ले जाइये।” “ये सा… दलाल ना जाने कहां से उठा उठा के लेबर ले आते हैं, कल आइये आपको उस दलाल से मिलाते हैं”। तभी मैं सुपरवाइजर से कहा कि मैं बच्चे से बात करता हूँ, उसने मुझे बात करने दी। मैं धीरे-धीरे पूछ रहा था कि यहाँ क्या किया जा रहा है, कैसे लाया गया? तभी एक आदमी आता है, जो एकदम मिट्टी से सना हुआ लगभग, जींस-शर्ट पहना हुआ ऐसे जैसे महीनों से नहीं नहाया धोया है, उसने पूछा “क्या हुआ, आप इसके गार्जियन हैं क्या? ये लड़का पढ़ने लिखने वाला कहाँ से आ गया, हम लोग खटने कमाने वाले हैं।” मैंने पूछा आप कौन हैं? तब उसने बताया कि, “ये बच्चा हमको बर्धमान (पश्चिम बंगाल) में मिला जहां से ठेकेदार और दलाल हम लोग को यहां लाया है, बोला कि काम मिलेगा दिल्ली में। लेकिन क्या बताएं भैया यहाँ बहुत खतरनाक स्थिति है, सा… ये लोग हम लोगों को यहां जानवर जैसा रखता है, खाने को ढंग से नहीं देता, कहता है गेट से बाहर कोई नहीं जाएगा, सोने का कोई ठीक ठिकाना नहीं है, पैसा भी नहीं देता है, इसलिए हम मुश्किल में पड़े हैं। सोच रहे हैं कि पुलिस को बुला कर इन लोगों को टाइट करेंगे”। मैंने और बात जानने कि कोशिश की और कहा कि “भैया इन लोगों ने काम दिया है तो क्या करियेगा”, फिर उसने कहा, “यहाँ पर सबको फंसा के लाया है और जबरदस्ती काम करा रहा है, बंगाल का दलाल अलग है, फिर यहां का अलग, उसके बाद ठेकेदार अलग, हम लोग किसको कहें, यहाँ परमॉल बना रहा हैं और हम लोग को फ्री फ़ोकट में खटवा (बहुत काम करवाना) रहा है, नहीं करने पर मारने की धमकी देता है”। नाम पूछने पर अपना नाम उसने राजू बताया और बताया कि वो भी बंगाल से है, वहाँ के और बाकी लोगों से पूछने पर पता चला कि ज्यादातर बंगाल से थे कोई मुर्शिदाबाद, तो कोई सीमांचल क्षेत्र से था । ये लगभग 20 मिनट का समय मैंने वहाँ गुजारा था, लेकिन उतने ही समय में ऐसी ऐसी जानकारी मिल रही थी कि मैं अन्दर ही अन्दर डरा हुआ था, उस दौरान लगातार फ़ोन पर अपने दोस्त के साथ। मैं सुरक्षित छोड़ कर बाहर आया, तभी मुझे लगा कि एक आदमी जो दलाल के गिरोह का है वो मुझे फॉलो कर रहा है तो मैं अक्षरधाम अपार्टमेंट की ओर बढ़ गया और कॉल करके मनोज को बताया कि आप जल्दी आइये। मनोज ने कहा कि वो खूंटी जाकर फिर रांची से आयेंगे अगले दिन, लेकिन मैंनेवहाँ के हालात और बातचीत के आधार पर कहा कि आप कोलकाता से सीधा दिल्ली आइये क्योंकि एक ने कहा था कि  “मुझे पहले दुसरे साइट पर रखा था यहाँ पर कल लाया है”। इस आधार पर मैंने जोर दिया कि तुरंत फ्लाइट बुक करके आइये और मैं शाम के 6.30 बजे उसी दिन की रात के 10 बजे का फ्लाइट बुक किया। अगली सुबह मैं, मनोज और अरविन्द (मेरे साथ रहता है) तीनों उस लोकेशन पर पहुंचे सोचा कि पुलिस को इन्फॉर्म करूं लेकिन फिर लगा कि पहले हमने जब इन्फॉर्म किया था तब औपचारिकता की बात आई थी कि झारखण्ड पुलिस का कोई साथ होना चाहिए, वगैरह-वगैरह। फिर हमने निर्णय लियाकि मैं और मनोज अन्दर जाएंगे और अरविन्द बाहर हमारे साथ फोन पर संपर्क में रहेगा, किसी ख़राब परिस्थिति में मदद लेगा, पुलिस को फोन करेगा। हम अन्दर गये सुपरवाइजर से मिले, वो फिर अन्दर जहाँ वो रहते थे लेकर गये, लगभग 10 लोग वहां दिखे और चर्चा शुरू हुई कि इस बच्चे का गार्जियन आ गया है, सुपरवाइजर ने एक दलाल को बुलाया और उसे जम कर गाली दी “यही मुंशी है जो बच्चा को उठा लाया है, ये पता नहीं कहां से लेबरको लाता है पता नहीं चलता (दलाल की ओर हाथ दिखाते हुए) कहां से उठा लाते हो बच्चों को, तुम लोग सा… काम बंद करवा दोगे………. और ना जाने ढेर सारी कितनी गालियाँ दी”। दलाल शारीरिक रूप से विकलांग था, चल नहीं पाता था। देखने में थोड़ा काला, मुंह में गुटखा दबाए हुए था। उसने सुपरवाइजर को बोला उसके भाई ने लाया है उसे। उन लोगों ने बच्चे का आधार कार्ड मांगा। तभी एक और 25 साल का लड़के को दिखा कर सुपरवाइजर ने कहा कि “ये भी एक लड़का है जो फंसा हुआ है और जाना चाहता है”, पूछने पर पता चला कि वो मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल) का है। मैंने मौके की नजाकत को समझते हुए कहा कि “भाई आप देख लीजिये, जो आपको लाया है उससेबात कर लीजिये”। दलाल अपनी बंगाली वाली हिंदी में हमें कह रहा था आपका बच्चा है तो ले जाइये, इसका कागज-पत्तर दिखा कर, अन्दर ही अन्दर मुझे गुस्सा आ रहा था लेकिन उनके बीच हम दो ही लोग थे बस। जो किसी बच्चे को बिना कागज पत्तर के, बिना किसी से पूछे खरीद कर लाया है, वो हमसे कह रहा किऐसे करो वैसे करो। हमने सबके फोटो लिए उस दौरान, हमने दलाल का नंबर लेने कि कोशिश की लेकिन वह नंबर नहीं दिया। तभी एक और दलाल का फोन आया जिसने बच्चे को बर्धमान से उठाया था, उसने मनोज से बात की। तभी एक लगभग 50-55 वर्ष के व्यक्ति से पूछा कि कहाँ से है वो? उसने बताया कि वो मालदा (बंगाल) से है। उसी वक्त मुर्शिदाबाद वाला लड़का मेरे पास आया और वो भी कहने लगा कि “भैया हमको भी ले चलिये, हमको नहीं रहना है यहाँ, काम करवा के कुछ पैसा नहीं देता, हमको ले चलिए” तभी दलाल कहता है कि “आप लोग अगर नहीं आते तो बच्चे को जाने नहीं देते” बगल से सुपरवाइजर ने दलाल को डांटना शुरू किया “सा… तुम कल बताया था कि कल पुलिस आई थी? ”। दलाल कहता है “कहाँ पुलिस आई थी?” सुपरवाइजर: झूठ मत बोलना, लंच के टाइम आई थी कि नहीं? तुमने किसी को बताया कि ये चोरी का बच्चा है? इस बच्चे पर पुलिस में कमप्लेन किया हुआ है, साहब ने कहा कि पुलिस क्यों आई थी?  सुपरवाइजर ने फिर हमें कहा कि : “ऐसा करो कि तुम ठेकेदार का नंबर लो, वो तुम्हें बंगाल के दलाल का डिटेल देगा और वो दलाल बच्चे का लोकल आदमी जो उठा के बहला फुसला कर लाया था उसका नंबर देगा”। तभी एक ने कहा कि : ये अपने आप नहीं आते, किसी दलाल के द्वारा लाये जाते हैं। तभी दूसरे व्यक्ति ने कहा कि: ये दोस्त के चक्कर में आ गया, वहाँ के दलाल ने उसको कुछ रुपया भी दिया होगा, वहाँ तो उसको बताया नहीं होगा कि कहाँ ले जाया जा रहा है। तभी एक तीसरे व्यक्ति ने कहा कि “खैर हुआ कि आप लोग ढूंढ लिए नहीं तो बच्चे को कोई मार के फेंक भी देता”। सुपर वाइजर कहता है “ये बच्चा जाना चाह रहा है तुम लोग जाने नहीं दे रहे, अगर सुसाइड कर लेगा तो क्या करोगे? ”। तभी दलाल मजदूरों से कहता है कि “गार्जियन आ गया है हम भेज देगा तुम लोग जाओ, कुछ पैसा देके हम भेज देगा ”। सुपरवाइजर डांटते हुए कहता है कि “तुम लोग पहले क्यों नहीं इसके घर में संपर्क किए?”, तभी दलाल टोकते हुए कहता है कि “अभी संपर्क तो हुआ ना”। इस बीच उन लोगों ने हमें और बच्चे को खाने के लिए पूछा लेकिन हमने मन कर दिया। उसी समय मुर्शिदाबाद जाने वाला लड़का भी आया जिसका नाम रफीकुल था, हमने उससे पूछा कि पैसे हैं जाने के लिए? उसने अपना पर्स देखा और 50 रूपये दिखाया, फिर सुपर वाइजर ने दलाल से कहा कि “ये लड़का तो 3 दिन काम किया है, इसका 3 दिन का हाजिरी का पैसा दो, घर चलाजायेगा”। तभी रफीकुल अपने सामान का बैग लेने गया, उसे दलाल के गैंग का दोस्त पकड़ के एक तमाचा जड़ दिया और कहा कि अगर गए तो मार दूंगा, लेकिन हम लोग के रहने के कारण रफीकुल हमारे पास आकर गिड़गिड़ाने लगा कि भैया ले चलिए हमको। नहीं तो ये लोग मार देंगे। जब बात आई पैसे देने की विष्णु और रफीकुल को तो वो दलाल का गैंग का लड़का कहने लगा कि “मैंने इन दोनों को 5 हजार और 6 हजार में खरीद कर लाया है वो कौन देगा?” और अपने बीच में झगड़ने लगा, हमें डर लग रहा था लेकिन सुपरवाइजर ने डांट कर शांत किया, हमने कहा कि रफीकुलको कुछ पैसे दे दो ताकि ये अपने घर चला जाएगा बाकी विष्णु का हम देख लेंगे। दोनों ने 3-3 दिन काम किया था, पूरे के पूरे  12-12 घंटे रोज, सुबह के 8 बजे से रात के 9 बजे तक। उसके एवज में उन्होंने बताया कि “खाने में दिन रात सिर्फ चावल और आलू सोयाबीन की सब्जी खिलाते थे जानवरों की तरह, एक दिन सिर्फ दाल दिया था, कुछ बोलने पर मारता था और धमकी देता था कि मार के फेंक देंगे, इसलिए हम डर से कुछ नहीं बोलते थे।” फोटो: सबसे दाहिने (आसमानी रंग के शर्ट में मुख्य दलाल)। बाएं में हाथ उठाये हुए - सुपरवाइजर जिसने काफी मदद की, लेकिन उनके आड़े हाथ सब कुछ हो रहा। दलाल ने 200 रुपया दिया रफीकुल को, और बगल में दलाल का दोस्त लड़का गुस्से में घूर रहा था। वहां से हम लोग निकले, गेट पर एक हट्टा कट्टा आदमी डेली रजिस्टर पर सिग्नेचर करवाया और कहा कि आप लोग सिग्नेचर कर दिए हैं। अब पुलिस आएगी या आप लोग कम्प्लेन करेंगे तो हमारीजिम्मेवारी नहीं होगी और न ही हमें कुछ होगा। पीछे से एक व्यक्ति और साथ में आ रहा था और कुछ दूर तक आया भी बाद में पता चला कि वो दलाल के गिरोह का था और पहले सबको धमकाया भी था, वह एक बच्चा दिखा जिसकी उम्र 17-18 रही होगी, उससे बात करने के लिए मैंने उससे बीड़ीमाँगा और पूछा कहाँ से हो तुम? उसने कहा - यूपी से हैं। सीधा हम लोग मेट्रो स्टेशन गए ताकि और कुछ ना हो, उसके बाद रफीकुल और विष्णु ने अपनी आप बीती सुनाई। बिष्णु के शब्दों में: “खूंटी के रूम में खाना बनाया था, दोपहर 2 बजे दुकान से सामान लेने गया तभी बंध गाँव का एक दोस्त अविनाश जो 2 दिन पहले वो ही मिल के दोस्ती किया था, वो बोला चलो कोलकाता घूमने, जल्दी लौट जायेंगे । स्कूटी से हमको चक्रधरपुर स्टेशन लेके चला गया बीच रास्ते में हम मना किये तोधमकी दिया कि मार देंगे, चुप चाप चलो । स्कूटी वहीं पर मंदिर के पास रखा और ट्रेन का टिकट लिया कि नहीं हमको नहीं पता और सीधे हावड़ा ले के चला गया , सुबह हावड़ा पहुंचे और बाहर जाके एक आदमी का फोन मांग के घर फोन किये कि घूमने आये हैं। हम स्टेशन में बैठे थे, और बोले कि हमको टाटा (जमशेदपुर, चक्रधरपुर बगल में ही है) तभी अविनाश बोला कि हम फोन चार्ज करके आ रहे हैं फिर चलेंगे, और चला गया कुछ देर में एक  आदमी आया और बोला कि टाटा जाना है ना चलो ले चलेंगे, तुम्हारे दोस्त को कुछ काम है वो हमको बोला है लेजाने के लिए। हम डर गये थे कि वो कहाँ चला गया, इसके आदमी के साथ जाने के लिए मना किये लेकिन जबर्दस्ती करके ले गया और पुलिस से पकड़वा देंगे बोल कर के हमको डरा दिया। हम उसके साथ चल दिए एक ट्रेन में बैठ के। हमको नहीं पता कौन ट्रेन थी, हमको प्यास लगी थी, मांगने पर एक जूस दिया जो बहुत मीठा था, प्यास के कारण पी गये उसके बाद नींद आने लगी और हम सो गये, अचानक एक स्टेशन पर उतरे नींद में ही और स्टेशन के बगल में एक घर के कमरे में बंदकर दिया जहाँ पर 12-15 लोग थे कुछ लोग भागना चाह रहे थे, कुछ कह रहे थे कि काम पर जा रहे हैं, वहाँ पर कुछ खाना दिया और रात के 11-12 बजे के करीब सबको साथ में लेकर स्टेशन जाने लगा। हम बोले कि नहीं जायेंगे कहीं। हमको टाटा जाना है, लेकिन एक जो हमको लाया था वो चाकू दिखाकर धमका दिया कि ज्यादा बदमाशी करोगे तो मार देंगे, चुपचाप चलो टाटा लेके जा रहे हैं सबको। ट्रेन पर बैठे हम लोग, पानी की जगह पर हमको बार बार जूस दे रहा था जिससे हमको नींद आ रहीथी, हम सो गये। उठने के बाद हम पता नहीं कहाँ आ गये थे, रात का समय था तो सो गये। सुबह उठे तो देखे कि एक बड़ा मैदान है जहाँ पर काम चल रहा है, हमको भी काम करने के लिए कह रहा है, काम भारी था, ईंट -गिट्टी- राड उठाने के लिए कह रहा, मना करने पर मारता था और कहता था कितुमसे काम करवाने के लिए तुमको लाया गया है काम करो। फिर मेरे बैग में एक फोन था उससे फोन किये मनोज भैया को और बताये बात, लेकिन जैसे ही दलाल देखा वो फोन पटक दिया और धमका दिया, फिर सुपर वाइजर देखा और बात किया तो बात करवाया। खाने ठीक से नहीं देता था, भारी काम करवाया, सोने के समय कुछ ढंग का ओढ़ने का भी नहीं था” रफीकुल से हमने जब बात की तो उसने बताया: “हम बर्धमान में थे काम ढूंढने आये थे तभी एक काला आदमी आया और बोला काम चाहिए? मैंने हाँ बोल दिया, तभी वो मुझे एक रूम में ले गया और दूसरे आदमी से मिलाया और बोला कि ये 6000 लिया है इसको ले जाओ। मैंने मना किया कि मुझे कुछ पैसे नहीं मिले हैं लेकिन उन लोगों ने कमरे में बंद कर दिया जहाँ पर ये छोटू विष्णु आधा नींद में था, फिर हम लोगों को स्टेशन लेकर गया, हम मना कर रहे थे कि हमको 6000 रुपया नहीं दिया, लेकिन हमको भी मारने की धमकी दिया और बोला कि काम देंगे चिंता मतकरो। वो काला और नाटा आदमी जो हम सबको ट्रेन में बैठाया वो बनारस में उतर गया और किसी दूसरे आदमी के हवाले कर दिया। दूसरा आदमी जो साइट पर दिखा जो विकलांग था वही बनारस से साथ में था। दिल्ली में एक साइट पर ले आया लेकिन एक दिन बाद यहां पर ले आया, दोनों जगह बड़ामॉल /बिल्डिंग बनने वाला है। छोटू (विष्णु) पूरी ट्रेन में दिन और रात नींद में था, पता नहीं इसको क्या खिला पिला दिया था इन लोगों ने। भैया क्या बताएं, आप लोग आये तो जान बच गयी, मेरा 2 बच्चा है, ये लोग यहाँ पर सारा लेबर को ऐसे ही मार पीट, डरा धमका कर के रखता है, ऐसा खाना खिलाता है कि पशु भी ना खाए अन्दर में एक बेचारा पागल आदमी को भी ये लोग कहाँ से उठा लाया है पता नहीं, उससे भी पीट पीट कर काम करवाता है। गेट से किसी लेबर को बाहर जाने नहीं देता है, ये लोग चावल, आलू-सोयाबीन की सब्जी खिलाता है बस और रोज 100 रुपया खाना का काट लेता है, और फ्री फ़ोकट में काम करवा के 2-3 महीना के 2-4 हजार देकर भेज देता है। अगर कोई पहले जाना चाहता है तो टिकट का बहाना करके लेटकरता है और खटवाता है। ये लोग हमेशा नये नये आदमी को ठग ठग के लाते हैं, पता नहीं हम कैसे आ गये, 5 दिन में सब पता चल गया इन सब के बारे में।” अगर हम झारखण्ड को लेते हैं तो देखते हैं कि आये दिन चाइल्ड/ह्यूमन/गर्ल ट्रैफिकिंग होता रहता है। अगर सही तौर से हम देखें तो ज्यादातर केस रिपोर्ट ही नहीं होते। और जो रिपोर्ट होते हैं वोकाफी कम होते हैं। 2015 के NCRB की रिपोर्ट को देखें तो पता चलता है कि भारत के ह्यूमन ट्रैफिकिंग में कुल 1021 केस दर्ज हुए थे जिसमें झारखण्ड में 126 केस दर्ज हुए थे। यह देश मेंतीसरे नंबर पर था।¹ झारखण्ड में कई ऐसे माता-पिता, अभिभावक हैं जो अभी भी अपने बच्चों और परिवार के लोगों की राह देख रहे हैं। ऐसी रिपोर्ट्स को जब हम पढ़ते हैं तो पता चलता है कि झारखण्ड ह्यूमन ट्रैफिकिंग से सबसे ज्यादा प्रभावित है, ऐसा होने का कारण आप कई शोध में पाएंगे कि अपार खनिज सम्पदा होने के बावजूद, झारखण्ड की वित्तीय हालत काफी कमजोर है। झारखण्ड के जनजातीय जिलों में ट्रैफिकिंग कीसमस्या काफी खतरनाक है। विष्णु के रेस्क्यू के दौरान एक दलाल ने बताया कि “हमारे पास झारखण्ड के आदिवासी क्षेत्रों से सबसे ज्यादा मजदूर होते हैं”। जैसे विष्णु की कहानी सरकार के दस्तावेज में दर्ज नहीं हुई, ऐसे ही झारखण्ड सहित भारत के हजारों केस दर्ज नहीं होते क्योंकि जो ट्रैफिक हो जाते हैं वो या तो जनजातीय समुदाय से होते हैं, या एकदम गरीब, या फिर marginalised minority से होते हैं और हमारी व्यवस्था इनको सुनती कहाँ है।हाल में रिलीज़ हुई फिल्म “जय भीम” में इसी को फिल्माया गया है। झारखण्ड में ऐसी हजारों कथाएं दफ़न हैं। जिस साइट पर मैं गया था वहाँ पर ज्यादातर मुस्लिम लोग थे जिन्हें जबर्दस्ती रखा गया था, इससे ये पता चलता है कि भारत में अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों की स्थिति बद से बदतर है। (लेखक शिशु रंजन जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली से बी.एड. कर रहे हैं और विद्यार्थी राजनीति में लगातार सक्रिय हैं, विद्यार्थी संगठन AIRSO के ऑल इंडिया महासचिव हैं।)

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