भूमिका में सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि किसी अपराध से घृणा करना और किसी अपराध के आरोपी के भी संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की मांग करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सभ्यता और भीड़ के बीच का अंतर भी यही है।
किसी लोकतांत्रिक समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह अपने सबसे अच्छे, सबसे लोकप्रिय और सबसे सम्मानित नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे घृणित, सबसे अलोकप्रिय और सबसे जघन्य आरोपों का सामना कर रहे व्यक्ति के साथ भी कानून और संविधान के अनुसार व्यवहार करता है या नहीं।
यदि किसी समाज में यह धारणा स्थापित होने लगे कि न्यायालयों की प्रक्रिया एक औपचारिकता भर है, मुकदमे समय की बर्बादी हैं, साक्ष्य अप्रासंगिक हैं और पुलिस की गोली ही सबसे प्रभावी तथा सबसे तेज न्याय है, तो यह केवल किसी व्यक्ति के जीवन का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि संविधान, विधि के शासन, शक्तियों के पृथक्करण और मौलिक अधिकारों की संपूर्ण अवधारणा के सामने खड़े एक गंभीर संकट का संकेत बन जाता है।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब समाज स्वयं न्यायिक प्रक्रिया के स्थान पर प्रतिशोध की संस्कृति को स्वीकार करना शुरू कर देता है और अपराध तथा दंड के बीच स्थित अदालतों, साक्ष्यों और संवैधानिक संस्थाओं को अनावश्यक समझने लगता है।
मार्च 2017 से मई 2026 तक उत्तर प्रदेश पुलिस और राज्य सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए आँकड़ों के अनुसार लगभग 17,043 पुलिस मुठभेड़ें हुईं, जिनमें 34,253 अभियुक्त गिरफ्तार किए गए, 11,834 घायल हुए और 289 व्यक्तियों की मृत्यु हुई। लगभग 1,852 पुलिसकर्मी घायल हुए तथा 18 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई। वर्ष 2025 में अकेले 2,739 पुलिस अभियानों और 48 मौतों की जानकारी दी गई, जो 2017 के बाद किसी एक वर्ष में सर्वाधिक संख्या थी।
ये आँकड़े किसी मानवाधिकार संगठन, विपक्षी दल या वैचारिक मंच के नहीं, बल्कि स्वयं राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय के दावों पर आधारित हैं, जिन्हें एनडीटीवी सहित अनेक राष्ट्रीय समाचार संस्थानों ने प्रकाशित किया। अर्थात् यह निर्विवाद तथ्य है कि मुठभेड़ अब अपवाद नहीं रह गई है, बल्कि कानून-व्यवस्था की एक ऐसी शैली के रूप में प्रस्तुत की जा रही है जिसे सार्वजनिक विमर्श में सफलता का पैमाना बनाया जाने लगा है।
प्रश्न यह नहीं है कि अपराधियों के विरुद्ध कठोरता होनी चाहिए या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या कठोरता संविधान के भीतर रहेगी या संविधान से ऊपर चली जाएगी।
भारतीय संविधान ने पुलिस को अपराध की जांच, गिरफ्तारी और अभियोजन का अधिकार दिया है, लेकिन दोष सिद्ध करना और दंड देना न्यायपालिका का कार्य है। अनुच्छेद 21 केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि राज्य की शक्ति पर लगाया गया सबसे बड़ा संवैधानिक नियंत्रण है। इसका अर्थ यह है कि चाहे कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो, उसका जीवन किसी अधिकारी की संतुष्टि, किसी सरकार की लोकप्रियता या किसी भीड़ की उत्तेजना के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।
यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) 10 SCC 635 में स्पष्ट निर्देश दिए कि प्रत्येक मुठभेड़ मृत्यु के मामले में स्वतंत्र जांच, एफआईआर, मजिस्ट्रियल जांच, पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी तथा मानवाधिकार आयोग को सूचना देना आवश्यक होगा।
न्यायालय ने यह इसलिए नहीं कहा था कि वह अपराधियों के प्रति सहानुभूति रखता है, बल्कि इसलिए कि संविधान पुलिस को न्यायालय का विकल्प नहीं बनने देता। यदि पुलिस शिकायतकर्ता भी होगी, जांचकर्ता भी होगी, गवाह भी होगी और अंततः दंड देने वाली संस्था भी होगी, तो फिर न्यायपालिका की आवश्यकता क्या रह जाएगी? तब संविधान की पूरी संरचना केवल औपचारिक दस्तावेज बनकर रह जाएगी।
सबसे चिंताजनक परिवर्तन तथाकथित जागरूक “समाज” की मानसिकता में दिखाई दे रहा है। आज किसी अपराध की खबर सामने आते ही बड़ी संख्या में प्रतिक्रियाएँ लगभग एक जैसी दिखाई देती हैं—”ठोक दो”, “एनकाउंटर कर दो”, “सीधा ऊपर भेज दो”, “घर गिरा दो”, “पैर में गोली मार दो”, “ऐसे लोगों को अदालत की क्या जरूरत?”, “हाफ एनकाउंटर होना चाहिए”, “जेल में खिलाने से अच्छा है खत्म कर दो”। और यह प्रतिक्रियाएँ केवल किसी एक विचारधारा या वर्ग तक सीमित नहीं हैं।
धीरे-धीरे यह धारणा स्थापित की जा रही है कि अदालतें धीमी हैं, न्यायिक प्रक्रिया बोझ है और पुलिस की बंदूक ही सबसे प्रभावी न्याय है। लेकिन यदि किसी लोकतंत्र में दंड का निर्धारण न्यायालयों के बजाय सोशल मीडिया की उत्तेजना, टेलीविजन की बहसों और भीड़ की भावनाओं से होने लगे, तो सबसे पहले समाप्त विधि का शासन होता है। इतिहास में कभी भी भीड़ ने न्याय नहीं दिया; भीड़ ने केवल प्रतिशोध दिया है।
इस मानसिकता का एक और खतरनाक पक्ष यह है कि न्याय के मानक व्यक्ति की पहचान देखकर बदलने लगते हैं। जब किसी प्रभावशाली, राजनीतिक रूप से निकट या बहुसंख्यक समाज से जुड़े व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगते हैं, तब वही समाज कहता दिखाई देता है—”जांच होने दीजिए”, “कानून अपना काम करेगा”, “अदालत फैसला करेगी”। लेकिन जैसे ही कोई आरोपी सामाजिक रूप से अलोकप्रिय हो, किसी अल्पसंख्यक, एससी-एसटी समुदाय से हो या पहले से सार्वजनिक घृणा का विषय बना दिया गया हो, तब अचानक आवाजें बदल जाती हैं—”अभी ठोक दो”, “ऐसे लोगों के लिए अदालत नहीं होनी चाहिए”, “गोली मार दो”।
यह स्थिति संविधान के समानता के सिद्धांत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। संविधान यह नहीं पूछता कि आरोपी कौन है, उसका धर्म क्या है, उसकी जाति क्या है या समाज उससे प्रेम करता है या घृणा; संविधान केवल यह कहता है कि कानून सबके लिए समान होगा।
हाल के दिनों में दो घटनाएँ व्यापक चर्चा में रहीं। बिहार के भोजपुर जनपद के बिलौटी गाँव निवासी भरत तिवारी की 17 जून 2026 को हुई पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु के बाद मामला एक व्यापक सामाजिक प्रश्न में बदल गया। पुलिस ने आत्मरक्षा में कार्रवाई का दावा किया, लेकिन परिजनों और स्थानीय लोगों ने गंभीर प्रश्न उठाए। बाद में पुलिस की ओर से प्रारंभिक स्तर पर चूक स्वीकार की गई, संबंधित पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हुई और न्यायिक जांच की घोषणा की गई।
परिवार द्वारा सीबीआई जांच की मांग की जा रही है और 24 जून को सर्व समाज महापंचायत बुलाए जाने की घोषणा की गई। यह पूरा घटनाक्रम यह बताता है कि किसी भी मुठभेड़ का अंतिम सत्य पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आता है।
दूसरी ओर प्रयागराज में नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपी मुशर्रफ को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किए जाने का मामला सामने आया। पुलिस के अनुसार उसने गिरफ्तारी से बचने के लिए फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। उसके पास से अवैध तमंचा और कारतूस बरामद करने का दावा किया गया। नाबालिग से दुष्कर्म जैसा अपराध अत्यंत घृणित और कठोरतम दंड का पात्र है, लेकिन यही वह क्षण है जब संविधान की परीक्षा होती है।
पीड़िता के लिए न्याय और आरोपी के लिए विधिक प्रक्रिया, दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि अपराध की गंभीरता के आधार पर ही अदालतों की आवश्यकता समाप्त कर दी जाए, तो फिर न्यायालयों का अस्तित्व केवल सामान्य मामलों के लिए रह जाएगा और जघन्य अपराधों में बंदूक ही न्याय का स्थान ले लेगी।
और यहीं सबसे बड़ा प्रश्न न्यायपालिका के सामने खड़ा होता है। अनुच्छेद 32 और 226 के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को केवल अधिकार नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों का संरक्षक होने की जिम्मेदारी भी दी गई है।
जब बार-बार मुठभेड़ों की घटनाएँ सामने आती हैं, जब पैरों में गोली लगने के समान पैटर्न सार्वजनिक बहस का विषय बनते हैं, जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष शिकायतें पहुंचती हैं और जब समाज का एक वर्ग खुलकर अदालतों के स्थान पर गोली की मांग करने लगता है, तब यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि न्यायपालिका केवल व्यक्तिगत याचिकाओं की प्रतीक्षा न करे, बल्कि संस्थागत स्तर पर भी यह सुनिश्चित करे कि कार्यपालिका न्यायिक क्षेत्र में स्थायी रूप से प्रवेश न कर जाए।
क्योंकि इतिहास यह बताता है कि जब कार्यपालिका दंड देने लगती है और समाज उसका उत्सव मनाने लगता है, तब सबसे पहले न्यायपालिका की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगना शुरू होता है।
लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था का अर्थ यह नहीं है कि अदालतों की आवश्यकता समाप्त हो जाए, बल्कि इसका अर्थ यह है कि सबसे जघन्य अपराध का उत्तर भी संविधान और कानून के भीतर रहकर दिया जाए। गोली तात्कालिक संतोष दे सकती है, लेकिन न्याय केवल न्यायालय ही दे सकते हैं।
यदि समाज यह मान ले कि अदालतों से तेज बंदूक है, तो कल कोई भी व्यक्ति—चाहे वह दोषी हो या निर्दोष—सिर्फ एक पुलिस कथा, एक सार्वजनिक धारणा और एक क्षणिक उत्तेजना के आधार पर अपने जीवन और स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है। जिस दिन गोली न्याय का स्थान ले लेगी, उस दिन सबसे बड़ी हार किसी आरोपी की नहीं होगी, बल्कि उस संविधान की होगी जिसने प्रत्येक नागरिक को यह भरोसा दिया था कि उसके जीवन और स्वतंत्रता का अंतिम निर्णय किसी व्यक्ति, किसी सरकार, किसी भीड़ या किसी हथियार से नहीं, बल्कि कानून और न्यायालयों से होगा।
(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।)