उत्तर पूर्व के सिनेमा ने कलात्मकता, मौलिकता और विश्व पहचान के स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति की है : उत्पल बोरपुजारी

नई दिल्ली। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फ़िल्म समीक्षक-फिल्मकार उत्पल बोरपुजारी के अनुसार पिछले डेढ़ दशक में उत्तर पूर्व के सिनेमा ने कलात्मकता, मौलिकता और विश्व पहचान के स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति की है। वह न्यू दिल्ली फ़िल्म फाउंडेशन (एनडीएफएफ) के मासिक कार्यक्रम ‘टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर’ कार्यक्रम में बोल रहे थे।

कार्यक्रम का आयोजन श्री अरविंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव स्किल्स तथा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट स्किल्स कौंसिल के सहयोग से किया गया।

बातचीत में उनकी रचनात्मक यात्रा, स्वतंत्र फिल्म निर्माण, भारतीय सिनेमा के बदलते परिदृश्य तथा विशेष रूप से उत्तर-पूर्व भारतीय सिनेमा की विरासत, चुनौतियों और नई उपलब्धियों पर विस्तार से चर्चा हुई।

बोरपुजारी से संवाद की शुरुआत उनकी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फीचर फ़िल्म ‘इशू’ तथा चर्चित डॉक्यूमेंट्री ‘ द हाउस ऑफ़ बरुआज़’ के प्रोमो प्रदर्शन से हुई।

बोरपुजारी ने बताया कि साहित्य और संस्कृति से जुड़े पारिवारिक परिवेश तथा दिल्ली में विश्व सिनेमा से हुए परिचय ने उनकी फिल्मी दृष्टि को आकार दिया।

उत्तरपूर्व भारतीय सिनेमा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि असम में फिल्म निर्माण का इतिहास 1930 के दशक से शुरू हो जाता है, लेकिन पिछले लगभग डेढ़ दशक में पूरे उत्तर-पूर्व के सिनेमा ने कलात्मकता, मौलिकता और विश्व पहचान के स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति की है।

उन्होंने कहा कि आज स्थानीय कहानियाँ और सांस्कृतिक विविधता विश्व सिनेमा के मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत हो रही हैं। उभोने हाल के समय की चर्चित फ़िल्मों ‘द शेप ऑफ़ मोमो’ (सिक्किम), ‘बूंग’ (मणिपुर) और ‘नॉट ए हीरो’ (असम) का ज़िक्र करते हुए कहा कि उत्तरपूर्व सिनेमा आने वाले वर्षों में भारतीय फ़िल्म परिदृश्य को नई रचनात्मक ऊर्जा देने की क्षमता रखता है।

कार्यक्रम के दूसरे प्रमुख सत्र क्राफ्ट एंड क्रू का विषय था ‘सिनेमा ऑन रील्स – एस्थेटिक्स एंड टेकनीक इन रील मेकिंग’।सत्र की शुरुआत करते हुए एनडीएफएफ के आशीष सिंह ने कहा कि आज रील केवल सोशल मीडिया कंटेंट नहीं रह गए हैं बल्कि दृश्य संप्रेषण, कहानी कहने, व्यक्तिगत ब्रांडिंग और रचनात्मक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन चुकी है। ऐसे समय में यह समझना ज़रूरी है कि क्या रील के छोटे से फॉर्मेट में भी सिनेमा के कलात्मक मूल्यों, संवेदनशीलता और विजुअल भाषा को समाहित किया जा सकता है।

इस विषय पर प्रसिद्ध फोटोग्राफर, सिनेमैटोग्राफर और शूट्स एंड शूट्स एकैडमी के निदेशक श्याम प्रसाद ने विशेषज्ञ वक्ता के रूप में कहा की रील केवल सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं बल्कि प्रभावी दृश्य संप्रेषण और सिनेमाई अभिव्यक्ति का माध्यम है। उन्होंने मोबाइल फ़िल्ममेकिंग, विजुअल एस्थेटिक्स, फ़्रेमिंग, कैमरा एंगल, लाइटिंग, कैमरा मूवमेंट, कम्पोजीशन और एडिटिंग के अनेक व्यावहारिक उदाहरण पेश किए।

रील की संरचना पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आज दर्शकों का ध्यानाकर्षण समय (AttentionSpan) लगातार कम हो रहा है।ऐसे में शुरुआती कुछ सेकेंड में दर्शक का ध्यान खींचना, पात्र या विषय को स्थापित करना और सीमित समय में प्रभावी निष्कर्ष तक पहुंचना ही एक सफल रील की सबसे बड़ी चुनौती है।

वर्कशॉप के बाल प्रतिभागियों द्वारा निर्मित पाँच मिनट की लघु फिल्म ‘द टिफिन हाइस्ट’ का प्रदर्शन किया गया। जून चैप्टर के साथ टॉक सिनेम ऑन द फ्लोर ने अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश किया है, जबकि एनडीएफएफ ने भी इसी महीने अपनी स्थापना के दसवें वर्ष में प्रवेश किया है।

(जनचौक ब्यूरो)

Leave a Reply