आजमगढ़, उमर खालिद, जुमा

कई बार एक व्यक्ति का सवाल, उसका नाम लेना, उसके जीवन, राजनीति, संघर्ष, विचारों पर बात करना करोड़ों अरबों लोगों की भलाई यहां तक कि मुक्ति की आवश्यकता बन जाता है। जैसे हमारे समय में मजदूर मेहनतकशों, छोटे किसानों, बेरोजगारों की मुक्ति का सवाल कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, लेनिन, भगत सिंह, आजाद, स्टालिन और माओ के नाम से आवश्यक रूप से जुड़ जाता है। क्योंकि यह एक, दो, कुछ व्यक्तियों नहीं, करोड़ों गरीबों वंचितों को, उत्पादन सेवाओं के प्रदाता नगण्य माने जाने वाले इंसानों को इस वंचना, असमानता, अन्याय भरी दुनिया में बंटवारे, समानता और न्याय की लड़ाई का वैज्ञानिक, ठोस, अनुभवसिद्ध रास्ता दिखाने वाले बल्कि खुद भी कुर्बानी करने वाले आदर्श, गुरु और (पांच) महागुरु लोग हैं।  

इनसे थोड़ा सा नीचे के या अलग समझ लें तो इसी प्रकार लगभग भुला दिए गए आईपीएस संजीव भट्ट आदि हैं। संजीव भट्ट 2002 के गुजरात दंगे में दिन को दिन और रात को रात कहने वाले चंद लोगों में थे। उन्होंने तब बोलने की हिम्मत की जब कांग्रेस पार्टी तक में भी दस साल तक अपने 2002 दंगे में मारे गए मुस्लिम सांसद के घर तक जाने की हिम्मत नहीं थी। संजीव ने श्वेता संजीव भट्ट और अपने बच्चों के बारे में नहीं सोचा। ऐसे ही पत्रकार निरंजन टकले ने जज लोया की संदिग्ध मौत के मामले में मोटी किताब ही लिख मारी। तो जनता जनार्दन साहिबान सुनिए! आईपीएस भट्ट की मुक्ति का सवाल आज भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के सामने बड़ा सवाल बनकर तन कर अकेला ही खड़ा हो रहा है। फिलहाल, तो इस लेख में हम उमर खालिद की बात कर रहे हैं। 

कामरेड उमर की जिनके साथ अनिर्बान भट्टाचार्य फरवरी 2016 में जेल में बंद था। यह दोनों भारत की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ाव रखने वाले जेएनयू के छात्र संघ से संबंधित थे, परंतु 2015 में ही महिलाओं आदि के सवालों पर इनका पार्टी, छात्र संगठन से मोहभंग हो गया था। कई हफ्तों साथ जेल में रहने के बाद कामरेड उमर खालिद, कामरेड अनिर्बान भट्टाचार्य जेल से बाहर आते हैं और फ्रीडम स्क्वायर में आधे घंटे से भी अधिक राष्ट्रवाद पर भाषण देते हैं।

इसमें अनिर्बान का भाषण एक परिपक्व संपूर्ण बुद्धिजीवी का भाषण था। जो भाजपा आरएसएस की संस्कार रूपी लंगोट तक निकाल फेंकता है। उनके झूठे राष्ट्रवाद, फर्जी देशभक्ति (अंग्रेज परस्त, हमेशा से माफीवीर और देशभक्त? क्या कहने! ) को तार-तार कर देता है। 

इस भाषण में एक जगह कामरेड अनिर्बान कहते हैं कि मुझे यह सोचकर भी डर लगता है कि अगर (नास्तिक कामरेड) उमर खालिद जुमे को मस्जिद जाता होता, अगर उमर खालिद आजमगढ़ का रहने वाला होता और वहीं के किसी विश्वविद्यालय का छात्र होता तो उसके साथ क्या होता?!!..

 अगर हम दोनों ही मुसलमान होते और आजमगढ़ के होते और जुम्मे के दिन नमाज जाते तो हमारा क्या होता??!!..

उमर खालिद पर ब्रेक के बाद फिर आया जाएगा।

याद दिलाना चाहता हूं कि राष्ट्रवाद पर उस समय फ्रीडम स्क्वायर में दर्जनों भाषण हुए, जिसमें जेएनयू के दर्जनों जाने माने इतिहास, अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, भाषा विज्ञान के शिक्षकों ने राष्ट्रवाद पर अपने विचार रखे। एक बंगाल से आए विद्वान ने गुरुदेव टैगोर के राष्ट्रवाद पर आश्चर्यजनक विचार प्रकट किए। जो मेरे लिए भी बिल्कुल नई बात थी।

अधिकांश भाषण अकाट्य , वैज्ञानिकता के साथ हुए। जिसका मुकाबला नव फासीवादी एबीवीपी कैसे करती, सिवाय कुतर्कों, गालियों के, सिवाय मारपीट करने के। इसके पालतू चैनलों ने भी अंग्रेजी, हिंदी में नव फासीवादी रुख का अनुसरण किया। इनमें से लगभग सभी के स्वामी खुद अंबान-अदानी जो थे। इन विद्वता भरे भाषणों के विज्ञान महापर्व में राष्ट्र राज्य के ऐतिहासिक विकास, इसकी द्वंद्वात्मकता पर दुनिया की मशहूर इतिहासकार रोमिला थापर जैसे सामाजिक विज्ञान से लैस लोग बड़ी संख्या में शामिल थे । 

(वैसे लुधियाना से शहीद भगत सिंह के भांजे प्रोफेसर जगमोहन सिंह भी आए थे, जिनकी माता यानि भगत सिंह से तीन साल छोटी बहन और उनकी सबसे अच्छी दोस्त बीबी अमर कौर अपने मृत्यु वर्ष 1984 तक कहती थी कि नक्सलबाड़ी के योधे (योद्धा) भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद के अधूरे कार्य को सम्पन्न करने वाले वीर हैं। क्यों कहती होंगी ऐसा? लाहौर में चालीस रुपए खर्च कर एक बस किराए पर लेकर अपने भाइयों के अधजले शवों के टुकड़े समेट कर 23 मार्च 1931 को घर लाने वाली बहन ने देख ली थी सारी पूंजीवादी संसद (संसद में पर्चे भी फेंके थे)और सरकारें।

तो और क्या कहती ? सगा भाई भगत सिंह जो दिया था उसने। सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती ने अपना जान से प्यारा बेटा , जैसे हमारे आपके भी होते हैं। लेकिन हममें से कुछ के बेटों की दौलत कैसे हजारों गुना बढ़ जाती है, कैसे वो चलने में भी हांफने वाले टेढ़े -मेढ़े बेटे क्रिकेट एसोसिएशंस के अध्यक्ष बन जाते हैं? बजाय अयोध्या की कार सेवा में या कारगिल की लड़ाई में शहीद होने के? कैसे होता है ये सब? बड़ी पार्टियों के नेताओं के बच्चों की बड़ी बात!

 (अब पाखंडी सरकारें जानें क्यों बीबी अमर कौर की मृत्यु होने पर उन्हें राष्ट्रीय सम्मान देती हैं।)

 खैर, विषयांतर क्या करें, इधर आएं।

तब जेएनयू में इन भाषणों को एक पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित किया गया। भक्तों का दुर्भाग्य है कि यह अधिकांश भाषण अंग्रेजी भाषा में थे। अब ऐसा भी नहीं है कि भक्त लोग अंग्रेजी नहीं जानते। लेकिन उन्होंने प्रण ले रखा है कि वह हिंदी वार्तालाप में भी शुद्ध हिंदी का ही प्रयोग करेंगे। भले ही रेल छूट जाए पर पंजाब के रेल के पूछताछ काउंटर पर भी रेल को “लौह पथ गामिनी” ही कहेंगे। (सच कहूँ तो कुछ अति शुद्ध भक्तों ने तो यह भी प्रण ले रखा है कि वह मोहम्मद रफी के गाए “मन तड़पत हरि दर्शन को आज” जैसे दर्जनों भजनों का भी श्रवण नहीं करेंगे )

वैसे यह अच्छा ही रहता कि इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद भी होता जिससे कि हम जैसे खराब अंग्रेजी में बोलने वाले लोगों का भी कुछ कल्याण हो जाता। राष्ट्र की परिभाषा पल्ले पड़ जाती, समझते राष्ट्रवाद को। राष्ट्रवाद क्या है, सामंती राज्य सत्ता क्या है आदि। दुनिया भर में छह हजार सालों में अलग-अलग देशों में कैसे गुलामों और गुलाम स्वामियों के राज्य, भूदास और भू स्वामियों, फिर किसानों और सामंतों राजाओं से आज के पूंजीवादी लोकतंत्र में और कैसे 1917 में समाजवादी जनतंत्र में बदले। हर देश में राज्य सत्ता के क्या क्या रूप रहे।

ब्रेक खत्म हुआ चाहता है। आइए हम लोग फिर उमर खालिद पर आते हैं। 

तो 2016 में मैं भी जेएनयू गया था। मुख्यतः अनिर्बान भट्टाचार्य से मिलने, वह तो मिले नहीं। अगले दिन होली का दिन था और 23 मार्च भी उसी दिन थी। 23 मार्च, सुना है कि इस दिन तीन अपनी जान से लापरवाह युवकों को आरएसएस समर्थित, हेडगेवार समर्थित अंग्रेज़ी सरकार ने एक गौर वर्ण प्रभु सांडर्स को जीवन मुक्ति देने के फलस्वरूप फांसी दे दी थी। तो उस दिन एक दुकान के बाहर नास्तिक उमर खालिद मिल गया। साथ में कुछ महिला दोस्त भी थी। जेब में पैसे नहीं थे शायद। या अगले कुछ दिनों के लिए बचाए हो सकते हैं। तो मैंने उनसे दही खिलाने का अनुरोध किया जिसे उन्होंने बहुत खुशी से मान लिया।

बता दिया जाए कि उमर खालिद के पास तब तक कोई पासपोर्ट नहीं था। जबकि उनके लगभग सभी भाई बहनों के पास पासपोर्ट था। फिर भी शायद किसी मुस्लिम काले जादू, किसी खबीस, किसी जिन्नात की मदद से वे तीन बार पाकिस्तान हो आए थे, जैसा कि हमारे भारत के माननीय गृह मंत्री ने कहा था। (अब सभी भाजपाई झूठे थोड़े हैं।)

उस समय इंडिया टुडे ने अंग्रेजी भाषा में जेएनयू पर एक विशेष अंक निकाला था, जिसमें लिखा था कि सरकार के दावों के विपरीत उमर खालिद कभी भी सिमी के सदस्य नहीं रहे। हां, उनके पिता अवश्य सिमी के सदस्य रहे थे लेकिन यह भी काफी समय पूर्व की, 2016 से बहुत पहले की बात है।

पीयूडीआर (पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स) की एक बुकलेट के मुताबिक बार-बार ट्रिब्युनलो द्वारा सिमी को प्रतिबंधित किया जाता रहा। परंतु बाद में एक महिला जज द्वारा इस प्रतिबंध को यह कहकर हटा दिया गया कि सिमी के खिलाफ कोई भी ऐसा दस्तावेज नहीं मिला जिसके आधार पर सिमी पर प्रतिबंध लगाया जा सके।

अब लोग कहेंगे कि आरएसएस पर भी प्रतिबंध लगे। क्योंकि उसका तो रजिस्ट्रेशन ही नहीं है। ना उसके मेंबर्स के बारे में कुछ पता है। ना उसके एकाउंट्स का ऑडिट होता है। बस साल में एक बार इसकी विभिन्न शाखों में लिफाफे में बंद गुरु दक्षिणा दी जाती है। इस बार गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को पड़ रही है। यानि देशद्रोही लोग यह भी कह सकते हैं कि इस गुरु दक्षिणा जो की पूर्णतया एक धार्मिक अनुष्ठान है इसका भी ऑडिट हो। क्या पागलों वाली बात कर रहे हैं लोग। 

वैसे मेरे अनुमान से उमर खालिद का जेल में रहना भारत की तमाम पूंजीवादी पार्टियों के हित में ही है। क्योंकि अगर मुस्लिम लोग मार्क्सवादी लेनिनवादी हो जाएंगे तो तमाम पार्टियों के नेता क्या घुईयां छीलेंगे?

ऐसे तो रूस चीन की तरह दुनिया के मजदूरों एक हो वाली बात का खतरा नहीं होगा?

देश में इतनी शांति है। फिर तो पूरे भारत में मजदूर, किसानों, बेरोजगारों के आंदोलन शुरू हो जाएंगे।

ऐसा तो देशभक्त कम्युनिस्ट पार्टियां भी नहीं चाहतीं कि क्रांति ही हो जाए।

लाहौल विला कुव्वत! खुदा बचाये इन कम्युनिस्ट लोगों से। जो खुदा को भी नहीं मानते।

इसलिए तमाम पार्टियों के हित में है कि उमर खालिद की रिहाई के बारे में कोई बात ना की जाए। हो सके तो इसे कम्युनिस्ट होने के अपराध में फांसी की सजा सुना दी जाए। (जैसे एक बार हमारे माननीय उच्च न्यायालय या शायद उच्चतम न्यायालय ने भारत की “सामूहिक अंतरात्मा की आवाज” के आधार पर पर एक और मुस्लिम व्यक्ति को फांसी दे दी थी।

आमीन!

(डॉ उमेश चंदोला का लेख)

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