बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक विश्व राजनीति में सबसे अधिक प्रभावशाली शक्ति यदि कोई रही है, तो वह संयुक्त राज्य अमेरिका है। सोवियत संघ के विघटन के बाद लगभग तीन दशकों तक अमेरिका ने एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का नेतृत्व किया।
इस दौरान उसने केवल अपनी सैन्य शक्ति के बल पर ही नहीं, बल्कि पूंजी, तकनीक, वित्त, मीडिया, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से भी अपना वैश्विक प्रभुत्व स्थापित किया। इस प्रभुत्व को केवल साम्राज्यवाद की पारंपरिक अवधारणा से नहीं समझा जा सकता; यह आधुनिक वैश्विक पूंजीवाद, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, डिजिटल तकनीक और वित्तीय संस्थाओं के जरिए संचालित होने वाला नया आधिपत्य है।
भारत भी इस वैश्विक व्यवस्था से अछूता नहीं रहा। विशेषकर 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत और अमेरिका के संबंधों में लगातार निकटता आई। आज दोनों देश रक्षा, व्यापार, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे अनेक क्षेत्रों में साझेदार हैं। लेकिन इसी के साथ यह बहस भी तेज हुई है कि क्या यह संबंध समानता पर आधारित साझेदारी है, या भारत धीरे-धीरे अमेरिकी रणनीतिक, आर्थिक और वैचारिक प्रभाव के दायरे में समाहित होता जा रहा है?
इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं या नारेबाजी से नहीं, बल्कि तथ्यों, ऐतिहासिक संदर्भों और समकालीन राजनीति के विवेकपूर्ण विश्लेषण से ही दिया जा सकता है।
भारत और अमेरिका के संबंध हमेशा इतने मधुर नहीं रहे। शीत युद्ध के दौर में भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई, जबकि अमेरिका पाकिस्तान का प्रमुख सहयोगी था। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के समय अमेरिकी सातवें बेड़े की तैनाती आज भी भारतीय स्मृति का हिस्सा है। 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाए। उस दौर में दोनों देशों के बीच अविश्वास अधिक था।
परंतु शीत युद्ध समाप्त होने के बाद परिस्थितियाँ बदलने लगीं। सोवियत संघ का विघटन हुआ, भारत ने नई आर्थिक नीति अपनाई और चीन के उभार ने अमेरिका तथा भारत के रणनीतिक हितों को एक-दूसरे के निकट ला दिया। 2005 का असैन्य परमाणु समझौता इस नए दौर का प्रतीक बना। इसके बाद दोनों देशों के संबंध निरंतर गहरे होते गए।
आज अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, सेवा क्षेत्र और स्टार्टअप अर्थव्यवस्था में दोनों देशों का व्यापक सहयोग है। लाखों भारतीय अमेरिकी कंपनियों में कार्यरत हैं तथा बड़ी संख्या में भारतीय विद्यार्थी अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अध्ययन करते हैं। यह संबंध भारत के लिए अवसर भी लेकर आया है।
किन्तु प्रश्न यह है कि क्या आर्थिक सहयोग अपने साथ निर्भरता भी लेकर आता है?
आज भारत का डिजिटल ढाँचा बड़ी अमेरिकी कंपनियों से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। इंटरनेट खोज, सोशल मीडिया, क्लाउड सेवाएँ, मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम, ऑनलाइन विज्ञापन, डिजिटल भुगतान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनेक क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों का व्यापक प्रभाव है। भारत के करोड़ों नागरिकों का डेटा विदेशी तकनीकी कंपनियों के पास उपलब्ध है। डेटा आज की दुनिया का सबसे मूल्यवान संसाधन माना जाता है। इसलिए डेटा पर नियंत्रण केवल आर्थिक प्रश्न नहीं बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रश्न भी है।
भारतीय बाजार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बढ़ती शक्ति ने स्थानीय उद्योगों के सामने नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं। मुक्त व्यापार का लाभ उपभोक्ताओं को अवश्य मिलता है, किंतु यदि घरेलू उत्पादन, अनुसंधान और रोजगार कमजोर पड़ते हैं तो दीर्घकाल में आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रभावित होती है।
रक्षा क्षेत्र में भारत और अमेरिका की बढ़ती निकटता भी गंभीर विश्लेषण की मांग करती है। पिछले वर्षों में अनेक रक्षा समझौते हुए हैं, संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़े हैं और भारत ने अमेरिकी रक्षा उपकरणों की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि की है। अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है।
इस सहयोग के समर्थक मानते हैं कि चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति और आक्रामकता के सामने भारत के लिए अमेरिका सहित अन्य लोकतांत्रिक देशों के साथ सहयोग आवश्यक है। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि किसी भी महाशक्ति के साथ अत्यधिक सामरिक निकटता अंततः विदेश नीति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है।
भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी शक्ति उसकी रणनीतिक स्वायत्तता रही है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन की विरासत केवल इतिहास नहीं, बल्कि स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का प्रतीक है। यदि भारत किसी भी वैश्विक शक्ति-संघर्ष में स्थायी रूप से एक पक्ष का हिस्सा बन जाता है, तो उसकी कूटनीतिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
अमेरिकी प्रभाव केवल अर्थव्यवस्था और रक्षा तक सीमित नहीं है। संस्कृति, शिक्षा, मनोरंजन और जीवनशैली पर भी उसका गहरा असर दिखाई देता है। हॉलीवुड, नेटफ्लिक्स, सोशल मीडिया और उपभोक्तावादी संस्कृति ने भारतीय समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित किया है। अंग्रेज़ी भाषा का बढ़ता वर्चस्व और वैश्विक बाज़ार की सांस्कृतिक प्राथमिकताएँ भारतीय भाषाओं तथा स्थानीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि विदेशी संस्कृति का हर प्रभाव नकारात्मक है। संस्कृतियों का आदान-प्रदान मानव सभ्यता का स्वाभाविक गुण है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब बाज़ार संस्कृति को नियंत्रित करने लगे और स्थानीय पहचान, भाषाएँ तथा सामाजिक मूल्य केवल उपभोग की वस्तु बनकर रह जाएँ।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न वैचारिक प्रभाव का है। वैश्विक मीडिया, अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक, रेटिंग एजेंसियाँ और नीति-निर्माण से जुड़े अनेक संस्थान विश्वभर में सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करते हैं। लोकतंत्र, मानवाधिकार, मुक्त बाजार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अमेरिकी दृष्टिकोण का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है। यद्यपि इनमें अनेक मूल्य सार्वभौमिक महत्व रखते हैं, फिर भी किसी भी देश को अपने सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।
हालाँकि भारत को केवल अमेरिकी प्रभाव का निष्क्रिय शिकार मान लेना भी वास्तविकता का सरलीकरण होगा। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अनेक अवसरों पर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय दिया है। रूस से ऊर्जा आयात जारी रखना, पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना, ब्रिक्स तथा अन्य बहुपक्षीय मंचों में सक्रिय भूमिका निभाना और वैश्विक दक्षिण के मुद्दों को प्रमुखता देना इस रणनीतिक स्वायत्तता के उदाहरण हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि आज स्वयं विश्व व्यवस्था तेजी से बहुध्रुवीय होती जा रही है। चीन, यूरोपीय संघ, भारत तथा अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अमेरिका की एकाधिकारवादी स्थिति को चुनौती दे रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा और नई तकनीकों की प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक शक्ति-संतुलन को और जटिल बना दिया है। ऐसे समय में भारत के पास अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी।
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका शक्तिशाली क्यों है, बल्कि यह है कि भारत अपनी शक्ति कैसे बढ़ाए। यदि भारत विज्ञान, अनुसंधान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक संस्थानों और विनिर्माण क्षमता में आत्मनिर्भर बनता है तो किसी भी बाहरी शक्ति का प्रभाव स्वाभाविक रूप से सीमित होगा। परंतु यदि विकास का आधार विदेशी पूंजी, विदेशी तकनीक और विदेशी डिजिटल अवसंरचना पर अत्यधिक निर्भर रहेगा, तो रणनीतिक स्वायत्तता केवल एक नारा बनकर रह जाएगी।
भारत को ऐसी विदेश नीति की आवश्यकता है जो न तो किसी महाशक्ति-विरोध पर आधारित हो और न किसी महाशक्ति-निर्भरता पर। राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च रखते हुए सभी देशों के साथ संतुलित संबंध ही भारत की ऐतिहासिक कूटनीतिक परंपरा रही है। यही नीति भविष्य में भी सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
भारतीय लोकतंत्र की मजबूती भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि नीति-निर्माण पारदर्शी होगा, संसद की भूमिका प्रभावी होगी, मीडिया स्वतंत्र रहेगा और नागरिक समाज सक्रिय रहेगा, तो बाहरी प्रभावों का विवेकपूर्ण मूल्यांकन संभव होगा। परंतु यदि लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर होंगी तो किसी भी प्रकार का बाहरी दबाव अधिक प्रभावी हो जाएगा।
अंततः भारत पर अमेरिकी आधिपत्य का प्रश्न केवल अमेरिका से जुड़ा प्रश्न नहीं है। यह भारत की आर्थिक संरचना, तकनीकी क्षमता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, लोकतांत्रिक संस्थाओं और विदेश नीति की स्वायत्तता से जुड़ा प्रश्न है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक स्वतंत्रता केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से सुनिश्चित नहीं होती। आर्थिक आत्मनिर्भरता, ज्ञान-उत्पादन, वैज्ञानिक अनुसंधान, सांस्कृतिक सृजन और स्वतंत्र नीति-निर्माण उसकी वास्तविक संप्रभुता के आधार होते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच सहयोग आवश्यक है, क्योंकि दोनों विश्व की बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ हैं और अनेक वैश्विक चुनौतियों पर उनके साझा हित भी हैं। किंतु सहयोग और आधिपत्य के बीच एक महीन रेखा होती है। उस रेखा की पहचान करना और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए समानता पर आधारित संबंध विकसित करना ही भारत के नीति-निर्माताओं, बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
भारत का भविष्य किसी एक महाशक्ति की छाया में नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र सोच, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, वैज्ञानिक क्षमता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों के बल पर ही सुरक्षित और समृद्ध हो सकता है। यही इक्कीसवीं सदी के भारत की सबसे बड़ी ऐतिहासिक चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)