सतलुज फ़िल्म के मुख्य किरदार और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा, की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने अकाल तख्त जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गढ़गज से पंजाब में 1980 और 1990 के दशक के दौरान लापता किए गए लोगों, लावारिस घोषित शवों तथा फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की वास्तविक संख्या सामने लाने के लिए एक जन आयोग (लोक आयोग) का गठन करने का अनुरोध किया है।
श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गढ़गज के आह्वान पर हरिके पत्तन (जहाँ लावारिस घोषित कर शवों को बिना अंतिम संस्कार किये पानी में बहा दिया गया था ) में मंगलवार को एक अरदास समागम का आयोजन किया गया है। उसकी पूर्व संध्या पर परमजीत कौर ने कहा कि उन अज्ञात शवों को, जिनकी पहचान सरदार जसवंत सिंह खालड़ा ने अपने बलिदान के माध्यम से उजागर की, केंद्रीय सिख संग्रहालय में उनका उचित सम्मान और स्थान दिया जाए, जिसके वे अधिकारी हैं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान करे।
‘कोई भी राजनीतिक दल या व्यक्ति जवाबदेही और कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए। जिन्होंने निर्दोष लोगों का नरसंहार किया, न्याय देने से इनकार किया, नरसंहार के सत्य को छिपाया या मानवाधिकारों के उल्लंघन का समर्थन किया, उन्हें जनता की अदालत में जवाबदेह ठहराया जाए, उनके सभी सरकारी सम्मान वापस लिए जाएँ और उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाए’।
बीबी खालड़ा ने ये भी कहा कि इसका उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए न किया जाए, बल्कि पूरे तंत्र से जवाबदेही माँगी जाए। यही लावारिस शवों और सरदार जसवंत सिंह खालड़ा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
लगभग चार साल तक सेंसर में अटकी रहने के बाद फ़िल्म पिछली तीन जुलाई को सीधे ओटीटी पर रिलीज़ हुई थी लेकिन ओटीटी प्लेटफार्म ज़ी5 ने केंद्र सरकार के निर्देश पर फ़िल्म दो दिन में ही हटा दी, जिसके बाद से न सिर्फ़ फ़िल्म पर चर्चा छिड़ी हुई है बल्कि फ़िल्म ने कई मुद्दों पर चर्चा को जन्म दिया है।
पंजाब में सतलुज का केवल एक फिल्म के रूप में नहीं बल्कि एक सामाजिक और राजनितिक बहस के केंद्र के रूप में प्रभाव का विस्तर होते दिखाई देने लगा है। 80 और 90 के दशक के दौर पर एक नयी चर्चा पंजाब के गांव की चौपाल तक में फ़ैलने लगी है। युवा पीढ़ी जिसने उस दौर को नहीं देखा अब उस समय की घटनाओं पुलिस कार्यवाही उग्रवाद मानवाधिकार सरकारी तंत्र और राज्य की सरकारों की भूमिका और जवाबदेही को समझने की कोशिशों में लग रहे है।
देश की आज़ादी के बाद पंजाब के सबसे ख़राब दौर कहे जाने वाले 1982 से 1996 दौरान हुए मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए बाद में आई सरकारों ने भी पीड़ितों को न्याय दिलाने में कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभाई। ट्रूथ कमीशन बनाने का वायदा करके प्रकाश सिंह बदल के नेतृत्व में 1997 में सत्ता में आई अकाली दल की सरकार ने बाद में इस कमीशन को बनाने में कोई पहल नहीं की।
कांग्रेस की सरकार पर इस सारे दौर के लिए गंभीर आरोप लगते रहे हैं। कांग्रेस की सरकार के काल में 1984 में सिख विरोधी दंगों की घटनाओं के लिए पूर्ण न्याय की मांग अभी लंबित है।1998 में सोनिया गांधी और बाद में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सिखों के विरुद्ध हुए दंगों के लिए सर्वजनिक माफ़ी मांगी थी। मई 2025 में अमेरिका में एक कार्यक्रम के दौरान सिख छात्र के प्रश्न उठाने पर राहुल गांधी ने भी दंगों के लिए माफ़ी मांगी थी।
अकाली दल के नेतृत्व वाली सरकारों पर आरोपित पुलिस अधिकारियों को वीआईपी सुविधाएँ, कानूनी सहायता और उच्च पद प्रदान करने के आरोप हैं। आरोप है कि सुमेध सैनी, इज़हार आलम, दरबारा गुरु, उमरानंगल, मोहम्मद मुस्तफा आदि को खुलेआम उच्च पदों से सम्मानित किया गया, जबकि पीड़ित परिवारों को हाशिए पर धकेला गया, उन्हें परेशान किया गया और कानूनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
वर्तमान आम आदमी पार्टी की सरकार पर भी इसी राह पर चलते हुए दोषी ठहराए गए पुलिस अधिकारियों को कानून के कटघरे में लाने के बजाय उन्हें फरार होने में मदद करने के आरोप लग रहे हैं। इनमें खालड़ा की हत्या के मामले में सज़ा पाने वाले डीएसपी जसपाल सिंह, सब-इंस्पेक्टर जसबीर सिंह और सतनाम सिंह शामिल हैं।
भाजपा सरकार पर भी विदेशी धरती पर निशाना बनाकर की गई हत्याओं के संबंध में गंभीर आरोप हैं, जिनकी पुष्टि एफबीआई द्वारा किए जाने की बात कही जा रही है।
बीबी परमजीत कौर खालड़ा ने कहा है कि समूचा सिख पंथ श्री अकाल तख्त साहिब की ओर इस आशा से देखता है कि वह गुरु साहिबानों द्वारा स्थापित सिद्धांतों के अनुसार निर्भयता और निष्पक्षता के साथ नेतृत्व प्रदान करेंगे। हम जत्थेदार साहिब से विनम्र अनुरोध करते हैं कि पंजाब में 1980 और 1990 के दशक के दौरान लापता किए गए लोगों, लावारिस घोषित शवों तथा फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की वास्तविक संख्या सामने लाने के लिए एक जन आयोग (लोक आयोग) का गठन किया जाए।
उन अज्ञात शवों को, जिनकी पहचान सरदार जसवंत सिंह खालड़ा ने अपने बलिदान के माध्यम से उजागर की, केंद्रीय सिख संग्रहालय में उनका उचित सम्मान और स्थान दिया जाए, जिसके वे अधिकारी हैं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान करे।
‘कोई भी राजनीतिक दल या व्यक्ति जवाबदेही और कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए। जिन्होंने निर्दोष लोगों का नरसंहार किया, न्याय देने से इनकार किया, सिख नरसंहार के सत्य को छिपाया या मानवाधिकारों के उल्लंघन का समर्थन किया, उन्हें जनता की अदालत में जवाबदेह ठहराया जाए, उनके सभी सरकारी सम्मान वापस लिए जाएँ और उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाए’।
बीबी खालड़ा ने ये भी कहा कि हमारे इस तीसरे घल्लूघारे का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए न किया जाए, बल्कि पूरे तंत्र से जवाबदेही माँगी जाए। यही लावारिस शवों और सरदार जसवंत सिंह खालड़ा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
(जगदीप सिंह सिंधु वरिष्ठ पत्रकार हैं।)