अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल ने शिक्षा विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ देश को एकजुट किया है

जंतर-मंतर पर जारी भूख हड़ताल का आज 17 जुलाई को 20वां दिन है। सोनम वांगचुक समेत आइसा के तीन साथी नेहा, आमीन और हम ख़ुद अभी भी भूख हड़ताल पर बने हुए हैं। पिछले 20 दिन से जारी इस लड़ाई का हासिल यह है कि देश में शिक्षा व्यवस्था बहस के केंद्र में आ चुकी है। विपक्ष के सभी राजनीतिक दलों का समर्थन जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन को मिलने लगा है। इंडिया ब्लॉक से लेकर दूसरे अन्य राजनीतिक–सामाजिक संगठन भी इस आंदोलन के समर्थन में उतर चुके हैं।

20 जुलाई को संसद मार्च का आवाहन किया गया है। इस आवाहन का भी समर्थन सामाजिक–राजनीतिक संगठनों ने पुरजोर तरीके से किया है। 

59 साल की उम्र में भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक का गिरता स्वास्थ्य गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है। इसके बावजूद भी उन्होंने हिम्मत दिखाते हुए सभी लोगों से 20 तारीख के मार्च में शामिल होने की अपील की। तमाम विपक्ष की राजनीतिक पार्टियों के द्वारा इस आंदोलन के समर्थन में और सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है।

ज्यादा बेहतर होता कि इन सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठन तथा नागरिक समाज के लोगों के द्वारा आवाहन 20 तारीख के मार्च में शामिल होने का किया जाता तो इस निरंकुश सरकार के ऊपर अत्यधिक प्रभाव पड़ता जिसके प्रभाव में आकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को स्वीकार करना पड़ता।

इसके बावजूद भी देश के अलग-अलग हिस्से से लोग जिस प्रकार सोनम वांगचुक के पक्ष में खड़े हो रहे हैं वह दिखाता है कि पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था की चिंता हर एक व्यक्ति की चिंता है अब इसे और टाला नहीं जा सकता है। 

यह सवाल हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सिर्फ शिक्षा से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि जवाबदेही का भी है। हमारा देश संविधान के अनुसार चलता है और उसके नैतिक संवैधानिक दायित्वों को किसी भी सरकार के द्वारा उल्लंघन किया जाना समुचित व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी साबित होगा। जंतर मंतर पर चल रहा आंदोलन भारत को नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका बनने से बचाने के लिए चल रहा है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों साथ-साथ चलती है तभी सही मायने में लोकतंत्र कायम हो सकता है।अगर ऐसा नहीं है तो देश एक निरंकुश शासन स्थापित होने की ओर बढ़ रहा है जिसका परिणाम भयानक हो सकता है। 

जंतर मंतर पर चल रहे इस आंदोलन को लेकर अभी तक विपक्ष की एकजुटता को लेकर सवाल खड़ा किया जा रहा था लेकिन अब यह सवाल भी बहुत फीका पड़ गया है जब देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों के लोग इस आंदोलन के समर्थन में उतर चुके हैं।

भाकपा माले समेत वामपंथी राजनीतिक पार्टियां और उनके छात्र संगठन तो इस आंदोलन को शुरू से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े और पेपर लीक के खिलाफ ठोस कार्यवाही और जवाबदेही की मांग को लेकर नेतृत्व कर रहे थे।

इस सरकार के द्वारा पिछले 12 साल में सबसे ज्यादा नुकसान शिक्षा व्यवस्था को पहुंचाया गया है। शिक्षा व्यवस्था से ध्यान भटकाकर देश के युवाओं का ध्यान गाय- गोबर, हिंदू-मुस्लिम जैसे विषयों पर ले जाया गया है लेकिन इस आंदोलन में बहुत स्पष्ट रूप से भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडा को न सिर्फ खारिज किया है बल्कि देश में शिक्षा के सवाल को लेकर समाज के अलग-अलग हिस्से को एकजुट कर लिया है।

इस देश का नागरिक जो सरकार की नीतियों के प्रति कर्तव्यपरायण होकर अधिकार बोध को पूरी तरह से भूल चुका था अब वह एक बार फिर से न सिर्फ जाग गया है बल्कि देश के अलग-अलग हिस्से में सरकार से सवाल पूछने लगा है। 22 बच्चों की आत्महत्या और लगातार पेपर लीक की बढ़ती घटनाओं पर जवाबदेही मांग रहा है और देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा मांग रहा है। 

यह बीजेपी का वही शासन काल है जब एक मंत्री ने कहा था कि इस सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते उसका मुंह तोड़ जवाब देते हुए छात्र–नौजवान मजबूती के साथ सड़कों पर उतरकर संघर्ष कर रहा है और इस्तीफ़ा मांग रहा है। 

इस आंदोलन को बदनाम करने की बहुत सी कोशिश सरकार और भाजपा के आईटी सेल के द्वारा की गई। लेकिन जब सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ मोर्चा आम जनता ने संभाल रखा हो ऐसे में भाजपा का आईटी सेल पूरी तरह से पस्त हो चुका है। उनके द्वारा फैलाया गया प्रोपेगेंडा, आंदोलनकारी को ढपली गैंग, टुकड़े-टुकड़े गैंग और दहशतगर्द जैसे शब्दों के प्रयोग के खिलाफ लोगों में आक्रोश बढ़ा और यह आंदोलन अधिक मजबूत होता गया। 

जो चिंगारी देश के जंतर मंतर से शुरू हुई थी वह अब अलग-अलग कोने में पहुंच चुकी है। आगामी 20 तारीख को देश के कई हिस्सों में बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारी चल रही है। 20 तारीख से सदन की शुरुआत हो रही है। जब लोग शिक्षा के सवाल को लेकर सड़कों पर उतरे होंगे और सदन चल रहा होगा तो जाहिर तौर पर सरकार जवाबदेही और जिम्मेदारी से पीछे नहीं भाग पाएगी।

नफरत का चोला उतार कर जब लोग अपने हक और अधिकार के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रहे होंगे तब लोग इंतजार करेंगे कि सरकार आखिर किस तरीके से अपने नापाक हरकतों को छुपाती है और उस पर किस तरह से पर्दा ढकने का प्रयास करती है। ये सब कारनामे धीरे-धीरे इस देश के सामने उजागर होंगे। 

एक लोकतांत्रिक देश में भूख हड़ताल की नौबत तभी आती है जब सरकार निरंकुश तानाशाह होकर जनता की आवाज को सुनना बंद कर देती है। कभी साम्राज्यवादी दौर के खिलाफ भगत सिंह ने भूख हड़ताल की थी। उनके द्वारा की गई भूख हड़ताल आज़ादी के इतिहास के पन्नों में सबसे अधिक दिनों तक की गई भूख हड़ताल के रूप में दर्ज है।

डॉ अंबेडकर ने कहा था कि अगर सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के संवैधानिक तरीके पूरी तरह से विफल हो जाएं तो लोगों के द्वारा की जाने वाली भूख हड़ताल भी जायज होगी।

आज इस देश में संवैधानिक नैतिकता और मूल्य पर बुलडोजर चला कर उसे तहस-नहस कर दिया गया है। ऐसे में जनता को संगठित करने और उसकी चेतना को, अधिकारों के प्रति सचेत करने के लिए भूख हड़ताल एक जरूरी हथियार के रूप में फासीवादी सरकार के खिलाफ उपयोग किया जा सकता है। इसका सरकार के ऊपर कितना प्रभाव पड़ेगा या नहीं पड़ेगा उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आम जनमानस इस कदम के साथ कितना जुड़ा हुआ महसूस कर रहा है और निरंकुश सत्ता के खिलाफ एकजुट हो रहा है या नहीं।

जाहिर तौर पर सोशल मीडिया से लेकर सड़क पर अलग-अलग तरीकों से इस देश के जनमानस का गुस्सा इस सरकार के खिलाफ दिखाई दे रहा है, यही इस आंदोलन का हासिल है। लड़ाई और आगे बढ़ेगी एक दिन एक बड़ा जनउभार इस देश में आमूल चूल परिवर्तन लाकर रहेगा। 

(मनीष कुमार, प्रदेश अध्यक्ष, आइसा उत्तर प्रदेश, की टिप्पणी)

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