वर्धा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में वर्ष 2022 की पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े विवाद में 15 जुलाई 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट, नागपुर खंडपीठ में हुई सुनवाई के बाद एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। छात्रों के अनुसार, मुख्य याचिकाकर्ता अंजनेय ओझा एवं अन्य सह-याचिकाकर्ताओं की याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय की ओर से न्यायालय के समक्ष यह कहा गया कि पीएचडी-2022 प्रवेश प्रक्रिया की जांच में किसी प्रकार की अनियमितता नहीं पाई गई है।
इसके बाद न्यायालय ने 13 अगस्त 2024 के आदेश पर अंतरिम रोक (स्टे) लगाते हुए विश्वविद्यालय को प्रवेश प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति प्रदान की।
आंदोलनरत छात्रों का कहना है कि यह आदेश केवल न्यायालय की अंतरिम राहत नहीं, बल्कि वर्षों से पीएचडी-2022 प्रवेश की प्रतीक्षा कर रहे हजारों अभ्यर्थियों के लिए बड़ी उम्मीद लेकर आया है। उनका कहना है कि यदि स्वयं विश्वविद्यालय न्यायालय के समक्ष यह स्वीकार कर चुका है कि जांच में कोई अनियमितता नहीं मिली, तो सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि प्रवेश प्रक्रिया वर्षों तक किस आधार पर रोकी गई?
यदि जांच पहले ही पूरी हो चुकी थी, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? इस पूरी प्रक्रिया में हुए सार्वजनिक व्यय, छात्रों के शैक्षणिक नुकसान तथा निर्णय लेने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
इसी बीच विश्वविद्यालय में छात्रों का शांतिपूर्ण एवं संविधान सम्मत सत्याग्रह आज दसवें दिन भी जारी रहा। आंदोलनरत छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी मूल शैक्षणिक मांगों पर निर्णय लेने के बजाय आंदोलन को समाप्त कराने के उद्देश्य से लगातार कारण बताओ नोटिस जारी कर रहा है। अब तक आंदोलन से जुड़े छात्रों को तीन चरणों में नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
छात्रों की प्रमुख मांगों में स्त्री अध्ययन एवं फिल्म अध्ययन विभाग की वर्धा परिसर में पुनः स्थापना, वर्ष 2022 की लंबित पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को पूर्ण करना, नई पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ करना तथा पूर्व की भांति डिप्लोमा कार्यक्रमों को पुनः शुरू करना शामिल हैं। छात्रों ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन मांगों पर विश्वविद्यालय प्रशासन लिखित रूप में निर्णय अथवा आश्वासन नहीं देता, तब तक उनका सत्याग्रह जारी रहेगा।
आंदोलनरत छात्रों का आरोप है कि प्रशासन बार-बार कार्यपरिषद और अकादमिक परिषद की बैठकों का हवाला देकर निर्णय टाल रहा है, जबकि वर्ष 2022 में स्त्री अध्ययन एवं फिल्म अध्ययन विभाग का स्थानांतरण बिना कार्यपरिषद की औपचारिक स्वीकृति की प्रतीक्षा किए प्रशासनिक निर्णय के आधार पर कर दिया गया था।
छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि इसी वर्ष CUET प्रवेश प्रक्रिया के दौरान भी विश्वविद्यालय ने परिस्थितियों के अनुसार नियमों में बदलाव किया। निर्धारित समय तक पर्याप्त प्रवेश नहीं होने पर 10 जुलाई से प्रत्यक्ष प्रवेश प्रारंभ किया गया तथा बाद में इसे 14 जुलाई तक बढ़ा दिया गया, जबकि इसके लिए पहले कार्यपरिषद अथवा अकादमिक परिषद की बैठक की प्रतीक्षा नहीं की गई।
छात्रों का कहना है कि यदि अन्य मामलों में प्रशासन तत्काल निर्णय ले सकता है, तो विभागों की वापसी और पीएचडी-2022 जैसे महत्वपूर्ण शैक्षणिक मुद्दों पर वही तत्परता क्यों नहीं दिखाई जा रही। इससे विश्वविद्यालय में समान नियमों के अनुपालन और निर्णय प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।
छात्रों ने यह भी कहा कि वर्तमान में स्त्री अध्ययन एवं फिल्म अध्ययन विभाग से जुड़े शिक्षक अभी भी इलाहाबाद केंद्र में कार्यरत हैं, जबकि विभाग को पुनः वर्धा मुख्य परिसर में स्थापित नहीं किया जा रहा। उनका कहना है कि इससे शैक्षणिक गतिविधियाँ प्रभावित हो रही हैं तथा सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय के सभी स्वीकृत केंद्रों पर विभाग संचालित हों, साथ ही वर्धा मुख्य परिसर में भी इन विभागों और डिप्लोमा कार्यक्रमों को पुनः प्रारंभ किया जाए।
इसी बीच आंदोलन में शामिल छात्रों को लगातार कारण बताओ नोटिस जारी किए जा रहे हैं। आंदोलनरत छात्र राजेश सारथी और राकेश अहिरवार को एक ही दिन में लगभग एक घंटे के अंतराल पर दो-दो नोटिस जारी किए गए तथा उन्हें 22 जुलाई को कुलानुशासक के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा गया है। छात्रों का कहना है कि शांतिपूर्ण एवं संविधान सम्मत आंदोलन का उत्तर संवाद के बजाय लगातार नोटिस जारी कर देना लोकतांत्रिक विश्वविद्यालय की भावना के अनुरूप नहीं है।
छात्रों ने यह भी कहा कि सत्याग्रह के 10 दिन पूरे होने के बावजूद कुलपति द्वारा आंदोलनरत छात्रों से प्रत्यक्ष संवाद की कोई पहल नहीं की गई। उनका कहना है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन वास्तव में समाधान चाहता है, तो सबसे पहले वार्ता कर लिखित निर्णय की प्रक्रिया प्रारंभ करनी चाहिए।
अंत में आंदोलनरत छात्रों ने कहा कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा, शोधार्थियों के अधिकारों, पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए है। उन्होंने पुनः दोहराया कि उनका सत्याग्रह पूरी तरह शांतिपूर्ण, अहिंसक और संविधान सम्मत है तथा समाधान का एकमात्र रास्ता संवाद और लिखित प्रशासनिक निर्णय है।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)