वर्चुअल दुनिया जब ठोस जमीन पर उतरी और संसद की ओर बढ़ने लगी, संसद का गेट बंद कर दिया गया। प्रधानमंत्री संसद से निकलकर बाहर चले गये। पुलिस ने भीषण लाठी चार्ज किया, आंसू गैस के गोले दागे गये। छात्र और युवा पीछे हटने को तैयार नहीं थे। वे दिल्ली के कनाॅट प्लेस की ओर गये और वहां रात उतरने तक वहीं डटे रहे। एक तरफ पुलिस और दूसरी ओर छात्र आमने सामने खड़े थे। पुलिस पूरी तरह से हथियारबंद हमला करने की रणनीति में दिख रही थी। छात्र ललकारते हुए खड़े थे।
इन दोनों की उम्र की लिहाज से देखा जाए तो बच्चे पुलिस वालों के बच्चों की उम्र के हैं। लेकिन, यहां उम्र का कोई लिहाज नहीं है। यहां तो अब दो ध्रुव बन गए। जिसमें पुलिस को युवाओं और छात्रों को खदेड़कर दिल्ली से बाहर कर देना था। जुल्म करने की सारी शर्मिंदगी तोड़कर पुलिस बल युवाओं को दिल्ली से बाहर करने में नाकाम रही। आधी रात गुजरने तक एक बार फिर छात्र और युवा जंतर-मंतर पर इकठ्ठा होने लगे।
यह सब कुछ 20 जुलाई, 2026 की सुबह से देर रात तक हुआ। अगले दिन एक बार फिर मोर्चेबंदी बन गई। युवाओं ने आंदोलन को चलाते रहने का रास्ता खोल दिया। 21 जुलाई की दोपहर के बाद विपक्ष और कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के आवास को घेर लिया। पंजाब से आये किसान दिल्ली-हरियाणा बार्डर पर डटे और 21 जुलाई को ही वापस चले गये। लेकिन, देश के हर शहर से युवाओं के प्रदर्शन की खबरें आती रहीं।
क्या यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन है? नहीं!
जब एक आंदोलन एक साथ कई जगहों पर उभरते हुए दिखे, तब उसे किसी भी सूरत में स्वतःस्फूर्त आंदोलन नहीं कहा जा सकता। स्वतःस्फूर्तता का अर्थ पार्टी, संगठन या नेतृत्तविहीनता नहीं होता है। विचारहीनता को जरूर अराजक कहा जा सकता है। लेकिन, विचारधारा यदि समाज की गति, उसके सपने को पकड़ पाने में असफल रहे तब ऐसे सपनों से भरे आंदोलन को अराजक कहना भी ठीक नहीं है।
असल में तो विचार को अपने समय की घटना को समझने की कूव्वत होनी चाहिए और उसे आगे ले जाने का साहस होना चाहिए।
डिजिटल प्लेटफार्म, सोशल मिडिया, फेसबुक से लेकर इंस्टाग्राम से होते हुए जिन युवाओं को हम दिल्ली की सड़कों पर देख रहे थे, वे ठोस हकीकत थे। वे उन आदर्शों से भरे हुए थे जो उन्हें उनके मोबाईल स्क्रीन पर दिखाया गया था। वे लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाने आये थे।
वे काक्रोच जनता पार्टी के नेताओं द्वारा बार-बार बताये गये पुलिस को अपना भाई समझकर आये थे। वे अभिजीत दिपके को पुलिस के पैरों में गिरकर उन्हें मनाते हुए देखकर आये थे। 18 जुलाई, 2026 को जब पुलिस ने भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को जबरदस्ती उठाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराने तक यही स्थिति बनी रही।
लेकिन, जब सोनम को जबरदस्ती उठा लिया गया, तब इसी जबरदस्ती के खिलाफ पहली बार अभिजीत दिपके ने पुलिस के खिलाफ मुंह खोला और उन्हें आरएसएस का गुंडा कहा। इसके बाद जंतर मंतर पर पुलिस से भिडंत की खबर आती रही। और, साथ ही सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील करते रहे।
यहां मसला इन दो नेतओं के द्वारा पुलिस को देखने के नजरिये का है। वे इन्हें खुद और सरकार के बीच एक रेफरी से अधिक नहीं समझ रहे थे। वे इस रेफरी से खुद और सरकार के बीच हो रहे खेल में बेहतर भूमिका में देखना चाह रहे थे। वे निश्चित ही ऐसा सोच सकते थे और आज भी वैसा सोचने के लिए आजाद हैं। लेकिन, जब वे एक आंदोलन के नेतृत्व में थे, तब उन्हें इस बात का खयाल रखना ही चाहिए था कि पुलिस कत्तई रेफरी नहीं है। यह वही करती है जो सरकार चाहती है।
यह सरकार के कार्यों को आगे ले जाने में सिर्फ सक्रिय भूमिका ही नहीं निभाती है, वह उसे पूरा करने के लिए बाध्य है। वह सरकार और कानून के आदेशों को पूरा करने की अग्रिम पंक्ति है। वह उससे अलग नहीं है। साथ ही, यह उच्च पदों पर बैठे लोगों के हितों को भी पूरा करने में कोई कसर नहीं उठाती।
20 जुलाई की दोपहर तक युवा और छात्र पुलिस की मार खाने के बाद भी डटे रहे। वे चुपचाप मार खाते रहे। इसे बहुत से लोग गांधीवादी तरीका बता रहे हैं और आदर्श बता रहे हैं। लेकिन, युवा इस बात को अलग तरीके से देख रहे थे। बहुत से युवा उन्हें अपने ही तरह के युवाओं के पिता की तरह देख रहे थे। बहुत से युवाओं ने नारा लगाया, पापा यह बताना बच्चों को हमने मारा है। इन युवाओं का बड़ा हिस्सा पहली बार ऐसे प्रदर्शनों में आया था।
15 से 20 साल के ऐसे युवाओं का हुजूम सोनम वांगचुक के संसद मार्च के आह्वान पर संसद तक अपनी बात पहुंचाना चाहता था। वे पुलिस को सिर्फ एक व्यवस्था बनाये रखने वाले लोगों की तरह देख रहे थे। लेकिन, बिना उकसावे के जब पुलिस ने उन्हें घेरकर एलआईसी भवन के पास लाठियां मारी, तब कई युवाओं का भ्रम टूट गया। युवाओं ने पुलिस को पकड़कर, जिसमें कई अधिकारी थे, उनके हाथ पकड़कर पूछा है, आपने मुझे क्यों मारा? आपके बच्चे नहीं हैं क्या? मुझे मारने की हिम्मत कैसे हुई? आदि।
दोपहर ढलने तक यह साफ हो चुका था कि संसद मार्च नहीं हो रहा है। जंतर मंतर से बाहर निकलने का जो रास्ता था वह मुख्यतः अशोक मार्ग की ओर था। जो स्वभावतः रायसीना मार्ग की ओर ले जाता था। युवाओं की बढ़ती संख्या उन्हें शहर के कंेद्र में ला रही थी। ऐसे में कनाॅट प्लेस से लेकर इंडिया गेट तक उनका होना लाजिमी था। और, निश्चित ही संसद मार्च का आह्वान उन्हें संसद के रास्ते की ओर ले जा रहा था। इंटरनेट न होने की स्थिति में जंतर मंतर के पास पहुंचने का अर्थ ही है संसद के आसपास होना।
इस कारण से संसद के पास रायसीना मार्ग पर युवाओं का इकठ्ठा हो जाना एक लाजिमी नतीजा था। और, उन पर अचानक ही पुलिस द्वारा हमला करना एक भयावह घटना थी। वे संसद तक आवाज पहुंचाना चाहते थे लेकिन उस समय संसद तक युवाओं की आवाज की बजाय पुलिस द्वारा दागे गये आंसू के गोलों की गूंज सुनाई दी। सच्मुच यह भयावह था।
लोकतंत्र में बहरा होने का अर्थ तानाशाह होता है
जब आप आवाज लगाते हैं और आपकी अपनी ही आवाज गूंजते हुए वापस आ जाती है तब आप समझ जाते हैं कि या तो आप पहाड़ों के बीच हैं या बंद दीवारों के अंदर फंस चुके हैं। भारत में इस समय दोनों ही स्थितियां नहीं हैं। यहां आपकी आवाज आपको ही सुनाई ही नहीं देगी। मध्य भारत में पिछले दस साल से सैन्य अभियान चलाकर हजारों लोगों को मार दिया गया, क्या आपको यह आवाज सुनाई दी। लाखों लोग देश में आत्महत्या कर रहे हैं, जिसमें किसान और युवा हैं, क्या आपको उनकी आवाज सुनाई दी?
क्या आपकी अपनी आवाज, जैसा आप चाहते हैं, सुन पाते हैं? आपकी चीखें आपकी देह की तड़प में फंसकर रह जाएंगी। आज के युवाओं की स्थिति और भी भयावह है। उनकी मानसिक स्थिति बिखर जाने के बिंदु पर पहुंच गई है और आत्महत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। यहां आंकड़ा देना उपयुक्त नहीं लग रहा है। आंकड़े कई बार तकलीफ को बढ़ा ही देते हैं। लेकिन, इतना जानिये, भारत में 2020-22 के आंकड़ों में कुल मौतों में आत्महत्या सबसे ऊपर था। इसमें भी महिलाओं की संख्या अधिक थी।
यहां इस बात का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं क्योंकि जब यह लगने लगे कि कोई उसकी बात नहीं सुन रहा है, उसका कोई ख्याल नहीं रख रहा है, भविष्य अंधकारमय हो गया है, जीने का कोई रास्ता नहीं बचा है, आर्थिक तंगी से अब जीवन दूभर हो गया है, पढ़ने-लिखने का कोई फायदा नहीं रहा, रोजगार नहीं है, …तब चारों तरफ सन्नाटा ही नहीं अंधेरा पसरने लगता है।
2019-2020 से लेकर 2024-25 तक रोजगार वृद्धि दर लगभग 6 प्रतिशत से घटकर 1 प्रतिशत पर आ गई लेकिन जीडीपी वृद्धि में यह गिरावट सिर्फ 2 प्रतिशत की रही। इसके बाद के समय में इसी 1 प्रतिशत पर जीडीपी वृद्धि को 7 प्रतिशत पर अनुमानित किया गया। हम जानते हैं कि इसी दौरान सरकार ने और अन्य संस्थानों ने रोजगार की बात छोड़ सिर्फ जीडीपी वृद्धि का आंकड़ा पेश किया और ट्रिलिययन डाॅलर अर्थव्यवस्था का दावा किया गया। लेकिन, रोजगार की स्थिति वहीं की वहीं है।
यह नौकरी-विहीन, जाॅबलेसग्रोथ, विकास है जो पिछले दशक से चलता आ रहा है और सबसे गरीब लोगों तक पैसा पहुंचाने के लिए मनरेगा जैसा कार्यक्रम लिया गया, उसे भी दरकिनार किया जा रहा है। मोदी काल में यह पांच किलो अनाज वितरण में बदल गया है। भारत के युवाओं को सपनों की रंगीन दुनिया में ले जाने वालों ने हकीकत में उनके परिवारों को यही पाँच किलो अनाज दिया है।
भारत में एआई पर विश्व सम्मेलन आयोजित हुआ और उसका जो हाल उभरकर दिखाई दिया उसे हम ठीक से जानते हैं। उसकी असफलता का ठीकरा कांग्रेस के सिर पर फोड़ने की कोशिश की गई। जबकि हकीकत कुछ और थी। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंथ नागेश्वरन का बयान 16 जून, 2026 को कई जगहों पर छपकर आया कि, साॅफ्टवेयर और एमबीए का जमाना लद गया है, अब प्लम्बर, इलेक्ट्रिक और बढ़ईगिरी का काम ज्यादा फायदे वाला रहेगा।
जो युवा इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, उनसे उनके आय के बारे में पूछिये? इस मामले में बहुत सारे आंकड़े हैं जहां बमुश्किल जीवन चलाने भर की आय हो रही है। नोएडा के युवा मजदूरों के हाल ही में हुए न्यूनतम मजदूरी आंदोलन को देखिये। सच्चाई क्या है? वे बमुश्किल दस हजार रूपये प्रति महीने या उससे भी कम आय पर काम कर रहे हैं। सरकारी आंकड़े कुछ और हैं और जमीन पर पर कुछ और हैं।
ऐसा नहीं है कि आवाजें नहीं आ रही हैं। किसानों ने अपनी आय को बढ़ाने के लिए दिल्ली की सीमा पर बैठकर धरना दिया। सालों तक चले इस धरने में 700 से अधिक किसान मर गये। लेकिन, क्या हुआ? मजदूर संगठन श्रम कानूनों को मजदूर विरोधी बनाने का विरोध करने का विरोध करते रहे। क्या हुआ? न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाने की मांग सालों से चल रही थी और अब बढ़ाई भी गई तो नाममात्र की। इसका अंतिम नतीजा क्या आएगा?
युवाओं ने हर राज्य में नौकरी के लिए प्रदर्शन किया, बदले में उन्हें लाठियों के सिवा क्या मिल रहा है? पर्यावरण की सुरक्षा की मांग करने वालों का हश्र हम सभी ने देखा। केन-बेतवा प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों का आंदोलन पुलिस द्वारा उसी समय खत्म किया गया। नागरिक होने के अधिकार के लिए सालों प्रदर्शन होते रहे और उन्हें देशद्रोही करार दिये जाने का अभियान चला दिया गया। इससे भयावह क्या ही बात हो सकती है?
बहरा होने का अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि वह आंदोलनों और लोगों की आवाज को न सुने। इसका अर्थ यह भी है कि वह अपने किये के आंकड़ों में खुद को झांककर देखे। इस समय भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। यहां 35 साल तक की आयु के लोगों की हिस्सेदारी कुल जनसंख्या का 65 प्रतिशत है। ऐसा नहीं है कि यह बात अचानक पता चली है। इस पर दुनिया भर के रिपोर्ट और अनुमान पहले से सामने आ चुके थे। मोदी काल में इन युवाओं के लिए किन नीतियों को अपनाया गया?
रोजगार और शिक्षा के लिए कौन से कदम उठाये गये? आप याद करें, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया की शुरूआत हुई। इन दोनों का नतीजा क्या निकला है? क्या भारत एआई की ओर एक कदम भी बढ़ा सका? क्या भारत चिप बनाने की क्षमता भी हासिल कर सका? खेती का क्या हुआ? कोविड आपदा के समय में करोड़ो मजदूरों को फैक्टरियों से उठाकर खेतों की ओर भेज दिया गया। यह दुनिया की अपने तरह की इकलौती घटना है।
नोटबंदी में छोटी फैक्टरीयों और व्यवसाय को बर्बाद करने के बाद जीडीपी का ग्रोथ की दर को ठीक तो कर लिया गया लेकिन हकीकत में कुछ और ही बनी रही। बेरोजगारी की दर में कोई खास सुधार नहीं आया और बाद में तो यह नीचे ही चली गई। शिक्षा के लिए क्या कदम उठाये गये? स्किल इंडिया के क्या नतीजे निकले हैं? कुकरमुत्तों की तरह उगने वाले फार्मेंसी डिप्लोमा संस्थान से लेकर आईटीआई के प्रमाणपत्र क्या किसी नौकरी के लिए उपयुक्त हैं?
कोचिंग संस्थानों की बाढ़ ने भारत की शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई को सामने ला दिया है। जब इन्हीं कोचिंग संस्थानों के शिक्षक सरकार की आलोचना में उतर आये तब उन्हें दुश्मन करार देने का ढोंग रचा जा रहा है। इस पूरे मामले में मोदी के दो बयान को याद करें। एक टीवी इंटरव्यू में वह पकौड़े बनाने के रोजगार के बारे में बताते हैं। और, दूसर हाल ही के दिनों बिहार में रील बनाकर पैसा कमाने की बात कर रहे हैं। यह बात साफ है कि मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया का अंतिम नतीजा यही है।
रास्ता क्या है?
जब संकट आ खड़ा होता है तब अक्सर पूछा जाता है कि इसका हल क्या है? इस बात तक आने के पहले यह पूछना जरूरी है कि संकट क्या है? समस्या क्या है? क्या यह युवाओं के रोजगार का सवाल है? क्या यह किसानों की आय का सवाल है? क्या यह मजदूरों के अधिकार और मजदूरी का सवाल है? क्या यह आदिवासी समुदायों की जमीन पर हकदारी का सवाल है? निश्चित ही इन सभी सवालों का जवाब हां है। ये सारे सवाल एक दूसरे के साथ जाकर जुड़ते हैं।
लेकिन, इन्हें आपस में जोड़ते हुए एक सवाल में बदल देना मुख्य बात है। यदि यह मुख्य बात में नहीं बदल सकती तब क्या करें? तब निश्चित ही अपनी जगह से आवाज उठाते रहना होगा और दूसरों की आवाज को सुनने का माद्दा पैदा करना होगा।
एक बात साफ है कि मोदी सरकार किसी भी सूरत में किसी भी बात की जिम्मेदारी नहीं लेती है। यह काम हर कोई मंत्री कर रहा है। हजारों करोड़ रूपये की बनी सड़कें और पुल टूटकर गिर रहे हैं, उखड़ रहे हैं, गढ़ढों में तब्दील हो जा रहे हैं। लेकिन, इसकी जिम्मेदारी सड़क परिवहन से जुड़े मंत्री नहीं लेते हैं। उल्टा, जो सवाल उठाते हैं उन्हें जेल भेज देने की धमकी दे रहे रहे होते हैं। यही स्थिति पेट्रोल और एथेनाॅल को लेकर है और गैस के दाम में इुई वृद्धि को पर उठे सवालों पर चुप्पियों की है।
अमेरीका द्वारा अपमानित हो रही भारत की विदेश नीति की है। यह स्थिति रेलवे से लेकर मानव संसाधन मंत्रालय तक है। यहां तक कि राम मंदिर को लेकर बनाये गये ट्रस्ट तक की यही स्थिति है। जो इनमें हो रही गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाता है उन्हें धमकाया और बहुत बार जेल तक भेज दिया जाता है। ज्यादातर सरकार में बैठे मंत्री या उनके समर्थक आवाज उठाने वालों को ‘देशद्रोही’ घोषित करने में लगे रहते हैं।
20 जुलाई को जब पुलिस वालों ने युवाओं को मारना शुरू किया तब युवाओं ने यह सवाल उठाया, कि क्या वे आंतकवादी हैं, क्या वे देशद्रोही हैं? यह सवाल वे सिर्फ मीडिया के सामने नहीं उठा रहे थे, वे पुलिस वालों से भी पूछ रहे थे। यह सवाल उस गहरे मर्म को उजागर करता है जो उसकी पहचान को छीनने की कोशिश कर रहा है। मोदी सरकार इस देश में करोड़ों लोगों की पहचान को मतदाता पहचान-पत्र या अन्य पहचान पत्रों के आधार पर या तो छीन रही है या उसे इसके संकट में डाल रही है।
इस कतार में अब उच्च-मघ्यवर्ग के समूह तक आ गये हैं। निश्चित ही इस समस्या को यह उच्च मध्य वर्ग हल कर लेगा। लेकिन, नीचे का करोड़ों-करोड़ गरीब और निम्न मध्य आय वर्ग समूह इस समस्या को झेलने के लिए विवश बना हुआ है। ऐसे में, यह सवाल बनता हुआ दिख रहा है कि यह देश किसका है? क्या यह देश एक राजनीतिक विचारधारा और उसके समूह का है? उसके लिए काम करने वालों का है? या यहां निवासियों का है!
युवाओं ने पुलिस द्वारा लाठी मारे जाने के बाद भी जंतर मंतर से हटना गवारा नहीं किया। वे वापस वहीं इकठ्ठा हुए। देर रात वे वहां जुटते रहे। उन्होंने कहा कि यह देश मेरा है और हम अपनी आवाज उठाना बंद नहीं करेंगे। ये युवा न तो अभिजीत दिपके हैं और न सोनम वांगचुक, जो राजनीति की पैंतरेबाजी में कुछ का कुछ बोल या लिख रहे हैं। निश्चित ही, इन दोनों के आह्वान ने युवाओं को एक साथ आने का रास्ता दिया। जो अन्य कोई भी पार्टी दे सकने में सफल नहीं हो सकी।
और, ये राजनीतिक पार्टियां सीजेपी के मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए विवश हो गईं। लेकिन, हमें जरूर देखना होगा यहां आये हुए युवा अपनी स्वतंत्र आवाज लेकर आये थे और खुले हुए घोड़ों की तरह पूरी राजधानी में पूरी उर्जा के साथ टापते हुए घूम रहे थे और एकजुट होकर संसद के सामने अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। इस आवाज को सुनना ही एक रास्ता है। ये आवाजें पहली बार सामने नहीं आई हैं। इन्हें गुरूग्राम, नोएडा से लेकर हर जगह सुना जा सकता है।
(अंजनी कुमार वरिष्ठ लेखक-टिप्पणीकार हैं।)