छात्र सड़कों पर लौटे हैं, क्या लोकतंत्र लौटेगा?

जब किसी लोकतंत्र में छात्रों की आवाज़ को कानून-व्यवस्था के लिए समस्या समझा जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि संकट केवल छात्रों का नहीं, लोकतंत्र का भी है।

जन आंदोलन किसी भी जीवंत लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा हैं। वे केवल असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि शासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का सबसे प्रभावी लोकतांत्रिक माध्यम हैं। ऐसे आंदोलनों से लोकतंत्र कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत होता है। जनता और जन मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य तत्व है। जबकि संवेदनहीनता निरंकुशता और अधिनायकवाद की ओर।

एक लंबे अंतराल के बाद देश में छात्र आंदोलन फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लौटते दिखाई दे रहे हैं। कभी विश्वविद्यालय और कॉलेज लोकतांत्रिक बहस और सामाजिक परिवर्तन के सबसे बड़े मंच माने जाते थे। फिर एक लंबा दौर ऐसा आया जब छात्र राजनीति और छात्र आंदोलन हाशिये पर चले गए। आज भर्ती परीक्षाओं, शिक्षा, रोज़गार और लोकतांत्रिक जवाबदेही के सवालों ने छात्र आंदोलनों को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

यह केवल आंदोलनों की वापसी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और सोशल मीडिया के इस दौर में आंदोलनों के बदलते चरित्र का भी संकेत है।

डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि लोकतंत्र मुख्य रूप से ‘एसोसिएटेड लिविंग’ यानी सहयोगी जीवन और साझा अनुभवों की व्यवस्था है, जहाँ नागरिकों को अपने उत्थान के लिए आवाज़ उठाने का पूरा अधिकार हो। संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार इसी उद्देश्य से दिया था कि सत्ता और जनता के बीच संवाद बना रहे।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा लगातार मजबूत हुई है कि अपने हकों और मांगों को लेकर सवाल उठाना, आंदोलन करना या सड़क पर उतरना मानो राष्ट्रद्रोह हो गया हो। लोकतंत्र में असहमति को स्थान देने के बजाय उसे संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरना मानो लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, कानून-व्यवस्था की समस्या बना दिया गया है। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

सत्ता की सबसे बड़ी भूल यह होती है कि वह असंतोष को विरोधी दलों की साज़िश समझने लगती है। जबकि अधिकांश जन आंदोलन विपक्ष नहीं, व्यवस्था की विफलताओं से जन्म लेते हैं। जब सरकार हर असहमति में षड्यंत्र खोजने लगे, तब वह समाधान की संभावना स्वयं समाप्त कर देती है। लोकतंत्र में हर असहमति सत्ता-विरोध नहीं होती। कई बार वह लोकतंत्र को बचाने की कोशिश भी होती है।

यह असंतोष किसी एक राज्य या एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक, बिहार में बीपीएससी अभ्यर्थियों के आंदोलन, राजस्थान में भर्ती घोटालों, महाराष्ट्र में एमपीएससी अभ्यर्थियों के प्रदर्शनों, पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती विवाद तथा देश के अनेक विश्वविद्यालयों में फीस, छात्र-अधिकारों और संस्थागत स्वायत्तता को लेकर समय-समय पर हुए आंदोलनों ने यह स्पष्ट किया है कि युवाओं की बेचैनी अब राष्ट्रीय स्वरूप ले चुकी है।

मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन उनकी जड़ एक ही है और वह है पारदर्शी व्यवस्था, समान अवसर और सम्मानजनक भविष्य की मांग।

पिछले करीब एक महीने से छात्र अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे हैं। उनकी मांग केवल पेपर-लीक तक सीमित नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश भी है, जिसने युवाओं का भविष्य अनिश्चित बना दिया है। पिछले कुछ वर्षों में अनेक प्रतियोगी परीक्षाएं पेपर लीक के कारण रद्द हुईं, भर्तियां वर्षों तक लटकी रहीं और लाखों अभ्यर्थियों की उम्र इंतजार में निकल गई। यह संयोग नहीं है कि आज देश का छात्र केवल पेपर-लीक या परीक्षा नहीं, पूरी व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है।

इस आंदोलन की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसने पेपर-लीक के सवाल को शिक्षा व्यवस्था, रोजगार, भ्रष्टाचार और समाज में बढ़ती नफ़रत की राजनीति से जोड़ दिया है। छात्रों ने इन सबको अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही समस्या के विभिन्न संकटों के रूप में देखा है। यह संकेत है कि देश का युवा केवल नौकरी नहीं, भेदभाव रहित बेहतर शासन और अधिक जवाबदेह लोकतंत्र भी चाहता है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की इंडिया एम्पलाॉयमेंट रिपोर्ट 2024 बताती है कि भारत के कुल बेरोजगारों में लगभग 83 प्रतिशत युवा हैं और शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी सबसे अधिक है। भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, जिसे देश की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। इसमें 25 वर्ष से कम आयु के लगभग आधे बेरोजगार हैं।

ऐसे में सरकारी नौकरियों की संख्या भले कुल रोजगार का छोटा हिस्सा हो, लेकिन भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वास सबसे बड़ा प्रश्न बन गया है। इसी पृष्ठभूमि में 2014 के आम चुनाव अभियान के दौरान हर वर्ष दो करोड़ रोजगार देने का वादा आज भी युवाओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी समस्या का समाधान संवाद के रास्ते ही निकलता है। लेकिन सरकार इस पूरे आंदोलन के दौरान संवाद से बचती रही। इससे पहले आमरण अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के साथ जो व्यवहार किया गया वह भी इसका संकेत था। समय रहते बातचीत का रास्ता अपनाया गया होता, तो हालात शायद इतने नहीं बिगड़ते।

पिछले वर्षों में पेपर लीक की 90 घटनाओं और उनसे जुड़े मामलों में 22 छात्रों की आत्महत्याओं और लंबे आंदोलन के बावजूद सरकार ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी, जिससे युवाओं को यह भरोसा मिलता कि उनकी पीड़ा सचमुच सुनी जा रही है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग छात्र आंदोलन की शुरुआत से ही उठती रही, लेकिन वह तो दूर, प्रधानमंत्री की ओर से भी संवेदना का ऐसा कोई स्पष्ट संदेश नहीं आया, जिससे छात्रों के मन में यह विश्वास पैदा होता कि उनकी चिंता सरकार की प्राथमिकता है।

जब 20 जुलाई को भूखे-प्यासे छात्रों का हुजूम लाठी-डंडे और आँसू गैस के गोलों का सामना करते हुए संसद की ओर बढ़ चला तो यह केवल एक मार्च नहीं था बल्कि यह वर्षों से जमा होते आक्रोश का विस्फोट था। इस आक्रोश को देख सुरक्षा कारणों से संसद परिसर में अभूतपूर्व प्रतिबंध लगाने पड़े और प्रधानमंत्री के लिए संसद से बाहर निकलने की विशेष सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ी। यह केवल सुरक्षा का सवाल नहीं था। यह छात्रों और सरकार के बीच बढ़ चुकी संवादहीनता और दूरी का प्रतीक था।

पेपर लीक केवल प्रश्नपत्र की चोरी नहीं होती। वह करोड़ों युवाओं के आत्मविश्वास और सरकार के प्रति भरोसे की चोरी भी होती है। सवाल केवल इस भरोसे के टूटने का नहीं, लोकतंत्र की नैतिकता और जवाबदेही का भी है।

छात्र आंदोलन अब एक ऐसे दौर में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है, जहाँ उसके नेतृत्व और आगे की दिशा को लेकर भी नए सवाल उठने लगे हैं। हाल के दिनों में अभिनव दीपके और सोनम वांगचुक को लेकर जो घटनाएं और बयान सामने आए, उनसे संकेत मिलता है कि आंदोलन अब अपने प्रारंभिक नेतृत्व के दायरे से बाहर निकल रहा है। बड़े जन आंदोलनों का स्वभाव ही ऐसा होता है। एक समय के बाद वे किसी एक व्यक्ति के नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना के आंदोलन बन जाते हैं।

अभिजीत के ताज़ा बयान ने इस आशंका को और बल दिया है कि आंदोलन अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। आगे यह किस दिशा में जाएगा और उसका स्वरूप क्या होगा, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी। राहुल, प्रियंका गांधी और केजरीवाल का अस्पताल जाकर घायल छात्रों का हालचाल लेना और सपा की डिम्पल यादव का घटना स्थल पर जाना यह संकेत है कि विभिन्न राजनीतिक दल अब इस आंदोलन से जुड़ने की कोशिश कर सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो इस आंदोलन को कमजोर ही करेगा।

इतिहास बताता है कि कई नेतृत्वविहीन आंदोलनों ने भी समाज और राजनीति को नई दिशा दी है। 1974 का छात्र आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। क्रांति और परिवर्तन का कोई निश्चित रास्ता नहीं होता। वह कहीं से भी शुरू हो सकता है और किसी भी दिशा से आगे बढ़ सकता है। ख़तरा इस बात का भी है कि यदि आंदोलन अराजकता की ओर बढ़ा या बढ़ाया गया अथवा अनुशासन से भटका, तो अंततः उसका लाभ सरकार को ही मिलेगा।

इसलिए इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसका लोकतांत्रिक चरित्र, उसका नैतिक आधार और उसका अनुशासन है।

इतना तय है कि देश के युवाओं के भीतर असंतोष की चिंगारी अब सुलग चुकी है। उसे लाठी, आँसू गैस या दमन से बुझाया नहीं जा सकता। उसके लिए संवाद, संवेदनशीलता और व्यवस्था में भरोसा बहाल करने वाले ठोस कदम उठाने होंगे। आंदोलन सफल होगा या नहीं, इसका निर्णय समय करेगा। लेकिन इतना तय है कि इस छात्र आंदोलन ने निराशा के लंबे दौर में उम्मीद की एक लौ ज़रूर जलाई है।

हर आंदोलन की सफलता उसके तात्कालिक परिणामों से नहीं मापी जाती। 1974 का छात्र आंदोलन केवल सरकार बदलने का आंदोलन नहीं था। उसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। निर्भया आंदोलन ने कानून बदले। किसान आंदोलन ने तीन कृषि कानून वापस कराए। इतिहास में कई ऐसे आंदोलन हैं, जिनकी उपलब्धि केवल मांगें मनवा लेना नहीं, बल्कि समाज की सोच को बदल देना रही है।

सरकार को यह बात समझनी चाहिए कि लोकतंत्र की असली परीक्षा बहुमत में नहीं, बल्कि तब होती है जब छात्र, किसान, मजदूर और आम नागरिक सवाल लेकर सड़क पर उतरते हैं। किसी आंदोलन की हर मांग मान लेना ज़रूरी नहीं लेकिन जो सत्ता उन सवालों को सुन लेती है, वही लोकतंत्र को मजबूत करती है। जो उन्हें कुचलने की कोशिश करती है, वह अंततः लोकतंत्र को ही कमजोर करती है।

आज सवाल यह नहीं है कि छात्र जीतेंगे या सरकार। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र अपने बेचैन युवाओं और नागरिकों की आवाज़ सुनने का साहस बनाए रखेगा? क्योंकि इतिहास गवाह है कि सवालों को दबाया जा सकता है, खत्म नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में सवाल फिर से लौटते हैं, पहले से अधिक तीखे और पहले से अधिक व्यापक होकर।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और एक दशक तक पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की पत्रिका यंग इंडियन के प्रभारी रहे हैं )

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