“यू कैन ब्रेक आवर बॉडीज, बट नॉट बैडीज।” (जंतर-मंतर पर जेन ज़ी प्रदर्शनों से निकला एक प्रतिनिधि नारा)
दुनिया ने पिछले दिनों जंतर-मंतर पर जो कुछ देखा, वह सबको हतप्रभ कर गया। हालांकि इसमें ‘जंतर-मंतर’ जैसा कुछ भी नहीं था। वह हमारे समाज की युवा पीढ़ी – जेन ज़ी – की उस शक्ति का संयत, विवेकशील और विराट प्रदर्शन था, जिसके होने में किसी को कभी कोई संदेह नहीं रहा, लेकिन उसके इस तरह से प्रकट होने की किसी ने उम्मीद नहीं की थी।
सोनम वांगचुक हों या अभिजीत दिपके और नेहा वोरा हों या आइसा से जुड़े उनके साथी – लगभग एक महीने तक जंतर मंतर पर चली उनकी ‘तपस्या’ ने इस शक्ति को जागृत करने और इसके प्रकट होने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन किसी शक्ति का प्रकट होना जितना आसान होता है, उसे संभाले रखना उतना ही कठिन। देवों और असुरों के सामूहिक प्रयास से सागर मंथन तो हो सकता है, लेकिन उससे निकले विष को संभालने के लिए किसी नीलकंठ की जरूरत पड़ती है।
यह नीलकंठ समाज की उस सामूहिक विवेक शक्ति का ही दूसरा नाम है, जो अलग-अलग मोड़ों पर अलग-अलग रूप में मार्गदर्शन करती है। कभी यह बुद्ध और कबीर बनकर सामने आती है तो कभी गांधी और जेपी (लोकनायक जयप्रकाश नारायण) के रूप में रास्ता बताती है। कभी इन महापुरुषों का दिया संस्कार ही काफी होता है मार्गदर्शन के लिए।
इस बार शायद यह हमारा सामूहिक संस्कार ही था, जिसने युवा शक्ति के इस विराट रूप को पूरे समय संयमित और रचनात्मक बनाए रखा। वरना, भारतीय उपमहाद्वीप की ही बात करें तो श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल – इन तीनों पड़ोसी मुल्कों में इसी जेन ज़ी के शक्ति प्रदर्शन का परिणाम हम असंवैधानिक सत्ता परिवर्तन के रूप में देख चुके हैं।
यह सत्ता परिवर्तन कितना उचित, आवश्यक और सार्थक था या साबित हुआ, इसका आकलन उन समाजों को ही करना है। यह काम उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए। लेकिन एक बारीक, फिर भी बड़ा फर्क जरूर ध्यान में रखना चाहिए।
यह सत्ता परिवर्तन कितना उचित, आवश्यक और सार्थक था या साबित हुआ, इसका आकलन उन समाजों को ही करना है। यह काम उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए। लेकिन एक बारीक, फिर भी बड़ा फर्क जरूर ध्यान में रखना चाहिए।
फर्क यह है कि उन तीनों उदाहरणों में युवा शक्ति की हिंसा का डर निर्णायक साबित हुआ। इसी डर के कारण उन देशों में सत्ताधीशों ने सत्ता समर्पित की। यहां हमारी युवा शक्ति को हिंसा का सहारा नहीं लेना पड़ा। बल्कि, उसने अपने संयम और संकल्प से सत्ता को भी यह समझा दिया कि तुम्हारी हिंसा बेमानी है, बेअसर है हमारे मामले में।
‘यू कैन ब्रेक आवर बॉडीज, बट नॉट बैडीज’। भाषा जेन ज़ी की अपनी है, लेकिन उसका मर्म वही है जो गांधी ने अंग्रेजों को समझाया था कि आप हमारे शरीर का जो चाहे करें, हमारी आत्मा का कुछ बिगाड़ नहीं सकते, हमारे मनोबल को तोड़ नहीं सकते, हमारे हौसलों की उड़ान को कंट्रोल नहीं कर सकते।
यही संदेश निर्णायक साबित हुआ। सत्ता को भी यह संदेश समय पर समझ आ गया तो इसके पीछे गांधी जैसे महापुरुषों के दिए संस्कार का ही प्रभाव है। इस प्रभाव को आप इस रूप में भी देख, सुन, समझ सकते हैं कि यहां गोडसेवादियों को भी कठिन समय में सबसे पहले गांधी ही याद आते हैं।
वे भी शुचिता, शालीनता और अहिंसा का वास्ता यूं देने लगते हैं, जैसे सबसे बड़े गांधीवादी हों। लब्बो लुआब यह कि भारत में भारतीयता के प्रभाव से अछूता कोई नहीं। इसलिए भारत की आत्मा से खिलवाड़ का दुस्साहस किसी भी सत्ता को गर्त में पहुंचा सकता है।
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)