झारखंड के शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का असमय जाना

झारखंड के पर्यटन, नगर विकास और उच्च शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का मात्र 56 वर्ष की उम्र में 6 सितंबर रविवार को सुबह ही निधन हो गया।

सुरक्षा प्रभारी विक्रम पासवान ने बताया कि मंत्री को 5 अगस्त शनिवार की रात करीब 12 बजे सीने में दर्द की शिकायत हुई। उनकी पत्नी ने उन्हें डॉक्टर के पास चलने को कहा, लेकिन उन्होंने गैस की समस्या होने की बात कह अस्पताल जाने से इंकार कर दिया।
रात करीब दो बजे तबीयत अधिक बिगड़ने पर उन्होंने कहा, गाड़ी निकालो अस्पताल जाना है। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। रास्ते में उन्हें उल्टी होने लगी। अस्पताल पहुँचने पर डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू किया, लेकिन उन्हें बचा नहीं सके।

पीएचईडी इंजीनियर शंभूनाथ के सबसे छोटे बेटे सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह में सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड में ठेकेदारी से अपना सफर शुरू किया। बाद में उन्होंने दामोदर घाटी निगम और कुछ अन्य संस्थानों में भी काम किया।

उनकी कोई भी पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी बावजूद वे यहां तक का सफर तय किया था।

1989 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा का दामन थामा। उस दौर में जब कई नेता बार-बार पार्टियां बदलते थे, सोनू जीवन के आखिरी दिन तक जेएमएम के साथ बने रहे।

2009 के विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने के कुछ ही समय बाद उन्हें जेल भी जाना पड़ा। अपने पहले विधानसभा चुनाव में सोनू को सिर्फ 8,272 वोट मिले थे। पांच साल बाद उनके वोट बढ़कर 47,517 हो गए, लेकिन दोनों ही चुनावों में वह जीत हासिल नहीं कर सके।

2019 में उन्हें पहली बार जीत मिली। उन्हें 80,871 वोट मिले। पिछली विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी जीत दोहराई और 94,042 वोट हासिल किए।

लेकिन सोनू के राजनीतिक सफर को सिर्फ उनके चुनावी प्रदर्शन के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। उन्हें जेएमएम के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन, जिन्हें लोग गुरुजी के नाम से जानते हैं, का दत्तक पुत्र माना जाता था। वहीं, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन उन्हें “सोनू भैया” कहकर बुलाते थे।

जिस व्यक्ति का कोई राजनीतिक परिवार या मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी, वह गुरुजी के बेटे जैसा और हेमंत सोरेन के भाई जैसा भरोसेमंद व्यक्ति रातोंरात नहीं बना। उन्होंने लंबे समय तक शिबू सोरेन के साथ काम किया और बाद में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए भी एक मजबूत ढाल बनकर खड़े रहे।

2004 में जब शिबू सोरेन के खिलाफ पिरटांड़ दोहरे हत्याकांड का मामला दोबारा खोला गया, उस समय सोनू जेएमएम के जिला अध्यक्ष थे। उस समय शिबू सोरेन केंद्रीय मंत्री थे और मामले के कारण उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। सोनू ने यह सुनिश्चित करने के लिए काम किया कि गुरुजी को सम्मानजनक तरीके से इस मामले से बरी कराया जा सके।

तब तक सुदिव्य कुमार सोनू विधायक नहीं बने थे, लेकिन वह शिबू सोरेन के बेहद करीबी और भरोसेमंद सहयोगी बन चुके थे।

विधायक बनने के बाद भी वह हेमंत सोरेन के साथ मजबूती से खड़े रहे। हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के दौरान सोनू ने पार्टी को गांडेय की सुरक्षित सीट से कल्पना सोरेन को चुनाव लड़ाने का सुझाव दिया।

2024 के विधानसभा चुनाव में चुनावी रणनीतिकार के रूप में सोनू की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। उनकी रणनीति ने इंडिया गठबंधन को ऐतिहासिक रूप से लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटने में मदद की।

हेमंत सोरेन का सोनू पर कितना भरोसा था, इसका अंदाजा 2024 में उन्हें दिए गए चार महत्वपूर्ण विभागों से लगाया जा सकता है। हाल ही में जेपीएसएल और सीजीएल परीक्षा रद्द करने की मांग को लेकर हुए आंदोलन के दौरान सोनू गठबंधन सरकार का प्रमुख चेहरा बने और उन्होंने आंदोलन के बीच सरकार का पक्ष मजबूती से रखा।

गिरिडीह के विधायक के रूप में अपने सात साल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने इस पिछड़े जिले में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं लाने में भूमिका निभाई। इनमें एक विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग कॉलेज, चिड़ियाघर और जैव विविधता पार्क तथा पेयजल आपूर्ति परियोजना शामिल हैं।

उनके परिवार में पत्नी, दो बेटियां और एक बेटा है।

उनके निधन की खबर सामने आते ही झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, उनकी पत्नी और गांडेय की विधायक कल्पना सोरेन तथा झारखंड कैबिनेट के कई मंत्री उनके अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि देने पहुंचे। इनमें इरफान अंसारी, हफीजुल हसन और दीपिका पांडेय भी शामिल थे।

माले विधायक अरूप चटर्जी और चंद्रदेव महतो, पूर्व विधायक विनोद सिंह, केंद्रीय मंत्री और कोडरमा की सांसद अन्नपूर्णा देवी, गिरिडीह की मेयर प्रमिला मेहरा समेत अलग-अलग राजनीतिक दलों के कई नेताओं, राज्य के आला अधिकारियों ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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