इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारनपुर में मस्जिद को गिराने और वहां से बेदखल करने के खिलाफ दायर याचिका पर राज्य सरकार से जवाब मांगा। साथ ही कोर्ट ने सहारनपुर के सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा लगाए गए ₹6.41 करोड़ के हर्जाने की वसूली पर रोक लगाई।
जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की बेंच ने राज्य सरकार को 3 हफ़्ते के अंदर अपना जवाब (काउंटर-एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता को जवाब का जवाब (रिज़ॉइंडर) दाखिल करने के लिए 1 हफ़्ते का समय दिया गया।मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर, 2026 को होगी।
यह याचिका मोहम्मद तनवीर अहमद ने दायर की, जिसमें मस्जिद के संबंध में ‘पब्लिक प्रीमिसेस (अनधिकृत कब्ज़ा करने वालों की बेदखली) एक्ट, 1971’ की धारा 5 के तहत शुरू की गई कार्यवाही को चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता के पक्ष के अनुसार, उन्होंने सिटी मजिस्ट्रेट के सामने ज़मीन से जुड़े दावे पर आपत्ति जताते हुए लिखित बयान दाखिल किया और कहा कि विवादित ज़मीन पर मस्जिद 100 से ज़्यादा सालों से मौजूद थी।
यह भी कहा गया कि ज़मीन के असली मालिक याकूब खान और वाहिद खान थे और मस्जिद का इस्तेमाल करने वाले लोग इस ज़मीन को वक्फ़ के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे। याचिकाकर्ता का तर्क था कि निचली अदालतों ने उनके खिलाफ फैसला सुनाते समय इन पहलुओं पर विचार नहीं किया।
राज्य सरकार ने इन तर्कों का विरोध किया। एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल ने कहा कि प्रॉपर्टी रिकॉर्ड में इसे कचहरी/कलेक्ट्रेट के तौर पर दर्ज किया गया। उन्होंने आगे कहा कि भले ही याचिकाकर्ता ने याकूब खान और वाहिद खान को असली ज़मीन-मालिक बताया, लेकिन इस बात का कोई ज़िक्र नहीं था कि प्रॉपर्टी को वक्फ़ के तौर पर कब समर्पित किया गया।
यह भी बताया गया कि कोई वक्फ़ डीड रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई और कथित ज़मीन-मालिक प्रॉपर्टी पर अपना दावा करने के लिए निचली अदालतों के सामने पेश नहीं हुए। राज्य ने यह भी बताया कि विवादित ज़मीन पर एक पोस्ट ऑफिस चल रहा था और बेदखली की कार्रवाई इस आधार पर शुरू की गई कि किराए पर कमरे लेने के बाद प्रॉपर्टी पर मस्जिद बनाई गई और वहाँ नमाज़ पढ़ी जा रही थी।
दोनों पक्षकारों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले पर विचार करने की ज़रूरत है। इसलिए कोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 2 को नोटिस जारी किया और राज्य को तीन हफ़्ते के अंदर अपना जवाबी हलफ़नामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
उल्लेखनीय है कि कोर्ट ने सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा लगाए गए ₹6.41 करोड़ के हर्जाने की वसूली पर रोक लगाई। आदेश में कहा गया: “अगली सुनवाई की तारीख तक सिटी मजिस्ट्रेट, सहारनपुर द्वारा 16.7.2026 के आदेश के तहत लगाए गए हर्जाने की वसूली पर रोक रहेगी।”
बुधवार को सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में बनी एक मस्जिद को गिराने का मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा, जब इसे गिराने के आदेश को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की गई।
संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत वकील मोहम्मद तनवीर अहमद द्वारा दायर इस याचिका में सहारनपुर सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा 16 जुलाई, 2026 को दिए गए मस्जिद गिराने के आदेश और उसे सही ठहराने वाले ज़िला जज के 2 सितंबर, 2026 के आदेश को चुनौती दी गई है।
इस मामले में राज्य सरकार (सहारनपुर ज़िला मजिस्ट्रेट के ज़रिए) और मस्जिद के मौलवी व मैनेजर अब्दुल हामिद को पक्षकार बनाया गया है।याचिका में कहा गया है कि सिटी मजिस्ट्रेट और ज़िला जज, दोनों ने ही बिना अधिकार क्षेत्र या कानूनी अधिकार के मस्जिद गिराने के आदेश दिए थे।
गौरतलब है कि सिटी मजिस्ट्रेट ने ‘उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्ज़ेदारों की बेदखली) अधिनियम, 1972’ के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 16 जुलाई को मस्जिद गिराने का आदेश दिया था। यह मस्जिद कलेक्ट्रेट परिसर में 315 वर्ग मीटर के प्लॉट पर बनी थी। आदेश में मस्जिद के मैनेजमेंट पर 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।
मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ ज़िला अदालत में अपील दायर की गई थी। हालांकि, ज़िला जज ने 2 सितंबर को अपील खारिज कर दी, जिसके बाद अधिकारियों ने कड़ी सुरक्षा के बीच 5 सितंबर की सुबह मस्जिद को गिरा दिया।
(जनचौक ब्यूरो)